Thursday, October 8, 2026
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3-Year Practice Rule-II:अदालती अनुभव प्राप्त करने के लिए केवल वकालत ही एकमात्र जरिया नहीं; जजों की भर्ती पर सुप्रीम टिप्पणी यह भी है

केस अवलोकन (Case Snapshot)

पहलूविवरण
अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
मामलाभूमिका ट्रस्ट बनाम भारत संघ व अन्य (Review Petition)
नया मॉडल (अप्रैल 2027 से)1 वर्ष वकालत + 1 वर्ष अकादमी ट्रेनिंग + 1 वर्ष जज क्लर्कशिप (6 महीने जिला अदालत + 6 महीने हाईकोर्ट)
उद्देश्यन्यायिक सेवा को मेधावी युवाओं के लिए आकर्षक बनाना और एक समान व्यावहारिक प्रशिक्षण देना।

3-Year Practice Rule-II: सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक सेवा में प्रवेश के लिए आवश्यक अदालती अनुभव पर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल बार (Bar) में वकालत करना ही सार्थक अदालती अनुभव हासिल करने का एकमात्र कारक नहीं है। न्यायालय ने व्यवस्था दी कि व्यावहारिक अनुभव और न्यायिक प्रशिक्षण को पेशेवर वकालत और संस्थागत प्रशिक्षण के संयोजन (Combination) के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है [भूमिका ट्रस्ट बनाम भारत संघ एवं अन्य]।

पीठ और फैसले का संदर्भ

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने मई 2025 के उस फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर यह फैसला सुनाया, जिसमें सिविल जज बनने के लिए 3 साल की वकालत अनिवार्य की गई थी।

पीठ में सीजेआई सूर्यकांत और न्यायमूर्ति मसीह के बहुमत के फैसले ने इस अनिवार्यता को 3 वर्ष से घटाकर 1 वर्ष कर दिया, जबकि न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन ने असहमति जताते हुए 2025 के 3 वर्षीय नियम को बरकरार रखने का मत दिया।

यह भी पढ़ें: 3-Year Practice Rule-I: सिविल जज बनने के लिए वकालत के अनुभव की शर्त 3 साल से घटाकर 1 साल; कड़े प्रशिक्षण का नया ढांचा भी तय किया

वकालत की गुणवत्ता और व्यावहारिक सीमाएं

बहुमत के फैसले में कहा गया कि न्यायिक पद संभालने से पहले व्यावहारिक अनुभव जरूरी है, लेकिन केवल बार में समय बिताना ही सक्षम न्यायाधीश बनाने का एकमात्र रास्ता नहीं है:

  • वकालत की गुणवत्ता पर निर्भरता: अदालत ने रेखांकित किया कि बार में बिताया गया समय कई बाहरी कारकों पर निर्भर करता है—जैसे कि संबंधित वकील का चैंबर कैसा है, वह किस अदालत में प्रैक्टिस कर रहा है, उसे जिरह के कितने अवसर मिले, कोई मार्गदर्शक (मेंटोर) उपलब्ध था या नहीं, और उम्मीदवार की आर्थिक स्थिति कैसी है।
  • निरंतर विकास: न्यायालय ने कहा कि व्यावहारिक अनुभव और न्यायिक क्षमता किसी व्यक्ति के न्यायिक सेवा में शामिल होने के बाद भी लगातार विकसित होती रहती है। इसे संस्थागत और पेशेवर दोनों अनुभवों के मिश्रण से बेहतर बनाया जा सकता है।

यहां पढ़ें: 3-Year Practice Rule:न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन बोले; 3 साल की वकालत का नियम शिथिल करने से ‘न्यायविद’ नहीं, केवल ‘कैरियरिस्ट’ पैदा होंगे…

3 साल की अनिवार्य वकालत से युवाओं को होने वाली कठिनाइयां

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि 3 साल की सख्त अनिवार्यता ने कई प्रतिभाशाली युवाओं के करियर को असमान रूप से प्रभावित किया है:

  • वित्तीय संघर्ष: जिन युवा वकीलों के पास पारिवारिक या पेशेवर नेटवर्क नहीं है और कोई वित्तीय समर्थन नहीं है, उनके लिए वकालत के शुरुआती वर्षों में बिना किसी निश्चित मानदेय के टिके रहना बेहद मुश्किल होता है।
  • महिला उम्मीदवार: बार में खुद को स्थापित करने के शुरुआती दौर में महिला वकीलों को अतिरिक्त सामाजिक और पारिवारिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
  • दिव्यांग अभ्यर्थी: दिव्यांग व्यक्तियों को बार में सार्थक और समान अवसर प्राप्त करने में गंभीर बाधाएं आती हैं।
  • प्रतिभा पलायन का खतरा: अदालत ने आगाह किया कि यदि प्रवेश की शर्तें इतनी कठिन बना दी जाएंगी कि प्रतिभाशाली युवा परीक्षा देने से ही हतोत्साहित हो जाएं, तो न्यायपालिका उन योग्य उम्मीदवारों को खो देगी। न्यायिक सेवा को होनहार युवा वकीलों के लिए आकर्षक बने रहना चाहिए।

न्यायिक प्रशिक्षण और लॉ क्लर्कशिप का नया विकल्प

3 साल की वकालत के शेष 2 वर्षों के विकल्प के रूप में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य न्यायिक अकादमियों में 1 वर्ष का गहन प्रशिक्षण और 1 वर्ष की लॉ क्लर्कशिप (6 महीने जिला जज और 6 महीने हाईकोर्ट जज के अधीन) का नया ढांचा तय किया है:

  • संरचित कौशल विकास: देश भर में मौजूद न्यायिक अकादमियां एक संरचित और पर्यवेक्षित वातावरण में वे सभी कौशल सिखा सकती हैं, जिन्हें युवा वकील बार में असमान रूप से सीखते हैं।
  • अदालती मर्यादा और अनुशासन: आसीन न्यायाधीशों की सीधी देखरेख में लॉ क्लर्कशिप करने से उम्मीदवारों को अदालती कार्यवाही के संचालन, वकीलों व वादियों के प्रति गरिमापूर्ण व्यवहार, केस के विश्लेषण, प्रक्रियात्मक कानूनों के प्रयोग और न्यायिक आदेश तैयार करने के अनुशासन की बारीक समझ मिलेगी।
  • सुगम संक्रमण: न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह बदलाव हाल के विधि स्नातकों की कठिनाइयों को कम करने, अनिश्चितता दूर करने और न्यायिक सेवा में श्रेष्ठ प्रतिभाओं को आकर्षित करने के उद्देश्य से किया गया है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के प्रमुख कारण व अवलोकन

  1. गुणवत्तापूर्ण वकालत सभी के लिए समान रूप से उपलब्ध नहीं
    • अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल वकालत में बिताया गया समय ही गुणवत्ता की गारंटी नहीं है।
    • वकालत का स्तर इस बात पर निर्भर करता है कि उम्मीदवार को किस तरह के सीनियर का मार्गदर्शन (Mentor) मिला, वे किस कोर्ट में प्रैक्टिस कर रहे हैं, बहस करने का कितना मौका मिला और उनकी आर्थिक स्थिति (Financial Circumstances) कैसी है।
  2. युवा वकीलों और वंचित वर्गों की व्यावहारिक कठिनाइयां
    • आर्थिक तंगी: शुरुआती वर्षों में बहुत कम या बिना किसी निश्चित आय के कारण बिना पारिवारिक पृष्ठभूमि वाले प्रतिभाशाली युवा वकीलों के लिए 3 साल तक सर्वाइव करना कठिन होता है।
    • महिलाएं व दिव्यांगजन: सामाजिक व पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण महिला उम्मीदवारों और अवसरों की कमी के चलते दिव्यांगजनों (PwD) के लिए लंबे समय तक बार में बने रहना चुनौतीपूर्ण होता है।
    • कोर्ट ने कहा कि अत्यधिक कठिन शर्तें रखने से देश के सबसे प्रतिभाशाली युवा कानून स्नातक न्यायिक सेवा में आने से हतोत्साहित होंगे।
  3. न्यायिक अकादमी ट्रेनिंग और जज क्लर्कशिप का महत्व
    • स्टेट ज्यूडिशियल अकादमी (1 वर्ष): अब न्यायिक अकादमियां देश भर में स्थापित हैं जो एक संरचित (Structured) तरीके से वे कौशल सिखा सकती हैं, जो वकालत के दौरान असमान रूप से मिलते हैं।
    • जज क्लर्कशिप (1 वर्ष): जिला न्यायाधीश और हाईकोर्ट जज के अधीन क्लर्कशिप करने से भावी जजों को कोर्ट रूम की मर्यादा, मुवक्किलों व वकीलों से व्यवहार, केस का विश्लेषण और न्यायिक आदेश (Judicial Orders) लिखने का व्यावहारिक अनुशासन सीखने को मिलेगा।

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