मुख्य बिंदु (Key Highlights)
- विवाद की पृष्ठभूमि: विवाद की शुरुआत 2018 में हुई जब अधिवक्ता सिद्धार्थ सिंह ने बार काउंसिल ऑफ दिल्ली में पिनाकी मिश्रा के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद जनवरी 2019 में एक ऑनलाइन पोर्टल (‘डेली हंट न्यूज’) को दिए साक्षात्कार में मिश्रा ने कथित तौर पर सिंह के लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था।
- स्वतंत्र गवाह की कमी: हाईकोर्ट ने पाया कि प्री-समनिंग साक्ष्य (Pre-summoning Evidence) के दौरान शिकायतकर्ता (सिद्धार्थ सिंह) ने केवल खुद का बयान दर्ज कराया था। उन्होंने किसी भी स्वतंत्र गवाह (Independent Witness) को पेश नहीं किया, जो यह साबित कर सके कि इन शब्दों से समाज या अन्य लोगों की नजरों में उनकी प्रतिष्ठा कम हुई है।
- IPC की धारा 499 (स्पष्टीकरण 4): कोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 499 के स्पष्टीकरण 4 (Explanation 4) के अनुसार मानहानि का अपराध तब तक सिद्ध नहीं होता जब तक यह साबित न हो कि कथित टिप्पणी से दूसरों की नजर में व्यक्ति की साख घटी है।
- पत्रकार का बयान न होना: अदालत ने यह भी नोट किया कि जिस ऑनलाइन समाचार रिपोर्ट के आधार पर आरोप लगाए गए थे, उसके रिपोर्टर, लेखक, संपादक या न्यूज़ पोर्टल से जुड़े किसी भी व्यक्ति का साक्ष्य दर्ज नहीं कराया गया था।
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता और बीजू जनता दल (BJD) के पूर्व सांसद पिनाकी मिश्रा के खिलाफ दायर आपराधिक मानहानि (Criminal Defamation) की शिकायत और मजिस्ट्रेट अदालत द्वारा 2019 में जारी किए गए समन आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया है [पिनाकी मिश्रा बनाम राज्य व अन्य]।
एक वकील ने पिनाकी मिश्रा पर एक समाचार साक्षात्कार में उन्हें कथित रूप से “धूर्त” (Crook) और “ब्लैकमेलर” (Blackmailer) कहने का आरोप लगाते हुए मानहानि का मुकदमा दर्ज कराया था। न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की एकल पीठ ने 25 अगस्त को आदेश पारित करते हुए स्पष्ट किया कि पर्याप्त बुनियादी साक्ष्यों के अभाव में इस आपराधिक कार्यवाही को जारी रखने की अनुमति देना न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होगा।
उच्च न्यायालय की प्रमुख कानूनी टिप्पणियां
अदालत ने मानहानि के वैधानिक मानकों पर जोर देते हुए कहा: “अदालत का यह सुविचारित मत है कि याचिकाकर्ता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना न्याय के हित में नहीं होगा, विशेषकर तब जब शिकायतकर्ता ने प्री-समनिंग साक्ष्य के दौरान केवल खुद की गवाही कराई और ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया जिससे प्रथम दृष्टया यह साबित हो सके कि कथित बयान से दूसरों की नजरों में उनकी प्रतिष्ठा कम हुई थी, जैसा कि आईपीसी की धारा 499 के स्पष्टीकरण 4 (Explanation 4) के तहत परिकल्पित है।”
समाचार रिपोर्ट की सत्यता पर अदालत ने रेखांकित किया: “कथित आरोप एक ऑनलाइन समाचार रिपोर्ट पर आधारित था, जिसे संबंधित रिपोर्टर, लेखक, संपादक या समाचार पोर्टल से जुड़े किसी भी व्यक्ति की गवाही द्वारा प्रमाणित या संपुष्ट (Corroborate) नहीं किया गया था।”
मामले की पृष्ठभूमि
- बार काउंसिल में शिकायत (2018): अधिवक्ता सिद्धार्थ सिंह ने अगस्त 2018 में दिल्ली बार काउंसिल में पिनाकी मिश्रा के खिलाफ पेशेवर कदाचार (Professional Misconduct) की शिकायत दर्ज कराई थी। यह विवाद नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में बिजली वितरण कंपनियों की ओर से मिश्रा की पेशी से जुड़ा था।
- अखबारी रिपोर्ट और साक्षात्कार (2019): जब इस विवाद को ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ ने प्रकाशित किया, तो पिनाकी मिश्रा ने कथित तौर पर जनवरी 2019 में ‘डेलीहंट न्यूज’ को एक साक्षात्कार दिया। शिकायतकर्ता का आरोप था कि इस साक्षात्कार के दौरान मिश्रा ने उनके खिलाफ “क्रुक” और “ब्लैकमेलर” शब्दों का प्रयोग किया।
- मानहानि का मुकदमा: इसके बाद सिद्धार्थ सिंह ने आईपीसी की धारा 500 (आपराधिक मानहानि) के तहत शिकायतें दर्ज कराईं, जिस पर मजिस्ट्रेट अदालत ने अप्रैल 2019 में मिश्रा को बतौर आरोपी समन जारी किया था।
हाईकोर्ट द्वारा मामला रद्द करने के मुख्य आधार
- स्वतंत्र गवाह का अभाव: समन जारी करने से पहले की प्रक्रिया में शिकायतकर्ता के अलावा किसी अन्य स्वतंत्र गवाह का बयान दर्ज नहीं कराया गया, जिससे साबित हो सके कि उक्त बयानों के बाद समाज या कानूनी बिरादरी में शिकायतकर्ता की साख गिरी थी।
- समाचार रिपोर्ट की असत्यापित प्रकृति: जिस ऑनलाइन साक्षात्कार का हवाला दिया गया था, उसकी पुष्टि के लिए पत्रकार, संपादक या प्रकाशक को गवाह के तौर पर परीक्षित नहीं किया गया था।
- धारा 482 CrPC का प्रयोग: ठोस साक्ष्यों के अभाव में किसी व्यक्ति को लंबी आपराधिक मुकदमेबाजी की प्रताड़ना में नहीं धकेला जा सकता।
परिणाम
दिल्ली उच्च न्यायालय ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत अपने अंतर्निहित अधिकारों का प्रयोग करते हुए 2019 के समन आदेश और पिनाकी मिश्रा के खिलाफ उत्पन्न सभी परिणामी आपराधिक कार्यवाहियों को पूरी तरह खारिज (Quash) कर दिया।
दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने आदेश जारी करते हुए कहा: “इस न्यायालय का मानना है कि आपराधिक कार्यवाही को जारी रखने से न्याय के उद्देश्य की पूर्ति नहीं होगी, बल्कि पर्याप्त प्राथमिक सामग्री के अभाव में याचिकाकर्ता को आपराधिक मुकदमे की कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा। शिकायतकर्ता ने खुद को एकमात्र गवाह के रूप में परीक्षित किया और यह साबित करने के लिए कोई सामग्री पेश नहीं की कि कथित आरोपों ने दूसरों की नजरों में उनकी प्रतिष्ठा को कम किया है।”
Criminal Defamation: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा (Justice Swarana Kanta Sharma) |
| याचिकाकर्ता | वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पूर्व सांसद पिनाकी मिश्रा |
| शिकायतकर्ता | अधिवक्ता सिद्धार्थ सिंह |
| संबंधित धारा | IPC धारा 500 (आपराधिक मानहानि) / CrPC धारा 482 |
| अदालत का निर्णय | 2019 का समनिंग आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द |

