Thursday, August 27, 2026
HomeLaw Firms & Assoc.Consumers of Justice: अदालत में सुनवाई योग्य न होने वाले मामलों में...

Consumers of Justice: अदालत में सुनवाई योग्य न होने वाले मामलों में वादियों को कोर्ट फीस वापस की जानी चाहिए; मुकदमेबाज पर बड़ी टिप्पणी की

मुख्य बिंदु (Key Indicators)

  • ‘न्याय के उपभोक्ता’ का सिद्धांत: कोर्ट ने प्रसिद्ध न्यायविद् उपेन्द्र बक्षी के विचारों का हवाला देते हुए कहा कि पक्षकार अदालतों में अपने विवादों के निपटारे के लिए आते हैं। यदि अधिकार क्षेत्र न होने या गलती से गलत मंच पर याचिका दायर होने के कारण मामला सुना ही नहीं गया, तो पक्षकार को वह सेवा (Service) मिली ही नहीं, जिसके लिए उसने फीस दी थी।
  • भूलवश या अज्ञानता में ली गई फीस (Inadvertence): तमिलनाडु कोर्ट-फीस अधिनियम की धारा 70 के तहत गलती या असावधानी से दी गई फीस को वापस करना अनिवार्य है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘असावधानी’ (Inadvertence) के दायरे में कानून की अनभिज्ञता या सही समझ न होना भी शामिल है।
  • राजकोषीय कानून का निर्वचन: कोर्ट-फीस अधिनियम एक राजकोषीय (Fiscal) कानून है। यदि इसके प्रावधानों में कोई अस्पष्टता या संशय हो, तो इसका लाभ राज्य के बजाय हमेशा नागरिक/याचिकाकर्ता के पक्ष में जाना चाहिए।
  • मामले की पृष्ठभूमि: याचिकाकर्ता ने मध्यस्थता (Arbitration) के अंतिम फैसले को चुनौती देने के लिए मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 37 के तहत सीधे हाईकोर्ट में अपील दायर कर दी थी। जबकि धारा 37 केवल कुछ विशिष्ट आदेशों की अपील की अनुमति देती है और अंतिम अवार्ड को केवल धारा 34 के तहत चुनौती दी जा सकती है। कोर्ट ने इस अपील को अप्रत्यक्ष रूप से खारिज कर दिया लेकिन फीस रिफंड करने का आदेश दिया।

चेन्नई: मद्रास हाईकोर्ट ने अदालती फीस और वादियों के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाते हुए कहा है कि मुकदमेबाज ‘न्याय के उपभोक्ता’ (Consumers of Justice) हैं।

न्यायमूर्ति जी. आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति के. के. रामकृष्णन की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यदि ऐसी स्थिति में कोर्ट फीस वापस नहीं की जाती है, तो यह राज्य द्वारा ‘अनुचित संवर्धन’ (Unjust Enrichment) माना जाएगा। यदि कोई मामला क्षेत्राधिकार या विचारणीयता (Maintainability) के अभाव में अदालत द्वारा सुना ही नहीं जा सकता, तो वादी द्वारा जमा की गई कोर्ट फीस उसे वापस (Refund) की जानी चाहिए [मुरुगावेल बनाम पिचाई]।

उच्च न्यायालय की मुख्य कानूनी टिप्पणियां

प्रख्यात विधिवेत्ता प्रो. उपेंद्र बख्शी का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा: “विधिवेत्ता उपेंद्र बख्शी वादियों को ‘न्याय का उपभोक्ता’ कहते हैं। वादकारी अपने विवाद के न्यायिक निपटारे (Adjudication) के लिए अदालत का रुख करते हैं। यदि प्रथम दृष्टया मामला विचारणीय न होने के कारण अदालत उस पर सुनवाई ही नहीं कर सकती, तो वादकारी को वह सेवा नहीं मिली जिसके लिए उसने शुल्क चुकाया था। यह ‘प्रतिफल की विफलता’ (Failure of Consideration) का मामला है और कोर्ट फीस की वापसी का पूर्ण आधार बनता है।”

अदालती फीस प्रतिधारण और वित्तीय कानूनों की व्याख्या पर अदालत ने कहा: “जब अदालत कानूनी रूप से मांगी गई राहत देने में असमर्थ हो, तो वह कोर्ट फीस को अपने पास नहीं रख सकती। कोर्ट-फीस अधिनियम एक वित्तीय कानून (Fiscal Statute) है और इसके प्रावधानों में किसी भी अस्पष्टता का लाभ राज्य के बजाय नागरिक के पक्ष में दिया जाना चाहिए। यदि रिफंड का आदेश न दिया जाए, तो यह राज्य के लिए अनुचित संवर्धन (Unjust Enrichment) होगा।”

यहां पढ़ें: Property Purchase: पत्नी ने पति से खरीदी ₹7.5 करोड़ की मुंबई प्रॉपर्टी; आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT) ने दी धारा 54F के तहत कर छूट

मामले की पृष्ठभूमि और क्षेत्राधिकार की भूल

  • मध्यस्थता अवॉर्ड के खिलाफ अपील: अपीलकर्ता जे. मुरुगावेल ने अक्टूबर 2024 के एक मध्यस्थता अवॉर्ड (Arbitral Award) के खिलाफ सीधे मद्रास हाईकोर्ट में मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 37 के तहत अपील दायर कर दी थी।
  • कानूनी त्रुटि: अदालत ने रेखांकित किया कि धारा 37 के तहत केवल कुछ विशिष्ट अंतरिम या अपीलीय आदेशों को चुनौती दी जा सकती है, सीधे अंतिम मध्यस्थता अवॉर्ड को नहीं। अंतिम अवॉर्ड को केवल धारा 34 के तहत याचिका दायर करके चुनौती दी जा सकती है।
  • अपील खारिज व रिफंड की मांग: अदालत ने अपील को विचारणीय न मानते हुए खारिज कर दिया। इसके बाद अपीलकर्ता के वकील ने जमा की गई कोर्ट फीस वापस करने की मांग की।

तमिलनाडु कोर्ट-फीस अधिनियम की धारा 70 का विश्लेषण

अदालत ने तमिलनाडु कोर्ट-फीस एंड सूट्स वैल्यूएशन एक्ट, 1955 की धारा 70 का विश्लेषण किया, जिसके अनुसार यदि कोई शुल्क गलती या अनजाने में (Mistake or Inadvertence) जमा किया गया हो, तो उसे वापस किया जाना अनिवार्य है:

  • पीठ ने स्पष्ट किया कि धारा 37 के कानूनी दायरे को ठीक से न समझ पाना ‘अनजाने में हुई भूल’ (Inadvertence) के दायरे में आता है, जिसमें कानून की अनभिज्ञता (Ignorance of Law) भी शामिल हो सकती है।
  • चूंकि हाईकोर्ट सीधे इस अपील को स्वीकार करने का अधिकार नहीं रखता था, इसलिए इस पर कोर्ट फीस वसूलना और अपने पास रखना कानूनन अनुचित था।

हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी

न्यायमूर्ति जी. आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति के. के. रामकृष्णन की पीठ ने निर्णय सुनाते हुए कहा: “पक्षकार न्याय के उपभोक्ता हैं। जब अदालत कानूनी रूप से चाही गई राहत देने में असमर्थ है और मामला सुनवाई के लिए लिया ही नहीं जा सका, तो कोर्ट फीस को अपने पास बनाए रखने का राज्य के पास कोई कानूनी अधिकार नहीं है। यदि फीस की वापसी का आदेश नहीं दिया जाता है, तो यह राज्य सरकार का ‘अवैध संवर्धन’ (Unjust Enrichment) होगा।” दालत ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता की कोर्ट फीस तुरंत वापस की जाए और उसे उचित कानूनी मंच (धारा 34 के तहत) पर जाने की छूट दी।

अंतिम आदेश

मद्रास उच्च न्यायालय ने रजिस्ट्री को निर्देश दिया कि अपीलकर्ता द्वारा जमा की गई पूरी कोर्ट फीस तत्काल वापस की जाए। इसके साथ ही, अदालत ने अपीलकर्ता को मध्यस्थता अधिनियम की धारा 34 के तहत कानून सम्मत उचित कानूनी मंच पर जाने की छूट (Liberty) प्रदान की।

एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)

विवरणविवरण जानकारी
केस शीर्षकमुरुगावेल बनाम पिचाई (Murugavel v. Pichai)
संबंधित अदालतमद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court)
पीठ (Bench)न्यायमूर्ति जी. आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति के. के. रामकृष्णन
संबंधित कानूनतमिलनाडु कोर्ट-फीस एंड सूट्स वैल्यूएशन एक्ट, 1955 की धारा 70
अदालत का निर्णयअपील खारिज; लेकिन पूरी कोर्ट फीस याचिकाकर्ता को तुरंत वापस करने का निर्देश।
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
few clouds
31 ° C
31 °
31 °
79 %
3.6kmh
23 %
Thu
34 °
Fri
34 °
Sat
30 °
Sun
33 °
Mon
32 °

Recent Comments