Saturday, August 29, 2026
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Agony of Trial: वर्ष 1993 में ₹300 की रिश्वत का मामला; आरोपी ने तीन दशकों तक झेली मुकदमे की मानसिक प्रताड़ना, आई राहत वाली खबर, जानें

मुख्य बिंदु

  • विवाद की पृष्ठभूमि: यह मामला 1993 का है, जब याचिकाकर्ता (BCCL का तत्कालीन फंड क्लर्क) पर धनबाद के वासुदेवपुर खदान के एक कर्मचारी से उसके पीएफ (Provident Fund) बकाए के कागजात आगे बढ़ाने के एवज में ₹300 की रिश्वत मांगने का आरोप लगा था।
  • CBI ट्रैप और ट्रायल: सीबीआई ने जाल बिछाकर आरोपी को पकड़ा था। 2005 में विशेष सीबीआई अदालत ने उसे धारा 7 और 13 के तहत दोषी ठहराते हुए 2 साल की कठोर कैद की सजा सुनाई थी।
  • न्यूनतम सजा का प्रावधान: हालांकि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत कम से कम 6 महीने की सजा का प्रावधान है, लेकिन हाईकोर्ट ने मामले के विशेष तथ्यों और परिस्थितियों का अवलोकन किया।
  • राहत के मुख्य आधार: हाईकोर्ट ने सजा कम करते हुए निम्नलिखित कारकों पर ध्यान दिया:
    1. घटना 1993 की है और लगभग 33 वर्षों का लंबा समय बीत चुका है।
    2. मांगी गई रिश्वत की राशि बेहद मामूली (₹300) थी।
    3. आरोपी का कोई पूर्व आपराधिक इतिहास नहीं रहा है।
    4. वह पहले ही 1 महीना और 1 दिन की हिरासत काट चुका था और जुर्माने व जमानत शर्तों के तहत कुल मिलाकर ₹7,000 जमा करा चुका था।

रांची: झारखंड हाईकोर्ट ने वर्ष 1993 के एक भ्रष्टाचार मामले में दोषी व्यक्ति की सजा को घटाकर उसके द्वारा पहले ही काटी जा चुकी जेल अवधि (Period Already Undergone) तक सीमित कर दिया है। यह मामला भविष्य निधि (PF) के बकाये के भुगतान के बदले ₹300 की कथित रिश्वत मांगने से जुड़ा था। अदालत ने इस बात को प्रमुखता से रेखांकित किया कि आरोपी ने पिछले तीन दशकों (30 वर्षों) से मुकदमे की लंबी और थकाऊ प्रताड़ना (Agony of Trial) झेली है।

न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की धारा 7 के तहत सजा की मात्रा पर विचार करते हुए यह फैसला सुनाया।

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उच्च न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियां

अदालत ने तीन दशक लंबे मुकदमे के मानवीय और न्यायिक प्रभाव पर विचार करते हुए कहा: “घटना वर्ष 1993 की है। अपीलकर्ता पहले ही तीन दशकों की अवधि तक मुकदमे की मानसिक प्रताड़ना और पीड़ा (Agony of the Trial) झेल चुका है तथा उसका कोई पूर्व आपराधिक इतिहास भी नहीं है।” अदालत ने माना कि मामले के विशिष्ट तथ्यों, अभियोजन की लंबी अवधि और परिस्थितियों के संचयी प्रभाव (Cumulative Effect) को देखते हुए अपीलकर्ता को अपराध के लिए पर्याप्त दंड मिल चुका है।

मामले की पृष्ठभूमि

  • 1993 का रिश्वतकांड: अपीलकर्ता पर 1993 में शिकायतकर्ता के प्रोविडेंट फंड (PF) के पैसों के निपटारे के एवज में ₹300 रिश्वत मांगने का आरोप लगा था।
  • दोषसिद्धि और अपील: विशेष अदालत ने उसे भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषी ठहराया था, जिसके खिलाफ उसने झारखंड उच्च न्यायालय में आपराधिक अपील दायर की थी।

सजा कम करने के मुख्य आधार

अदालत ने सजा की मात्रा (Quantum of Sentence) को घटाने के लिए निम्नलिखित प्रमुख कारकों को ध्यान में रखा:

  • मामूली रकम और लंबा समय: कथित तौर पर मांगी गई रिश्वत की राशि बेहद कम (मात्र ₹300) थी और मामला 33 वर्षों से अधिक पुराना था।
  • साफ आपराधिक रिकॉर्ड: अपीलकर्ता का कोई पूर्व आपराधिक इतिहास (No Criminal Antecedents) नहीं था।
  • हिरासत की अवधि: कानून के तहत न्यूनतम 6 महीने की सजा का प्रावधान होने के बावजूद, अदालत ने पाया कि वह 1 महीना और 1 दिन जेल में बिता चुका है।
  • आर्थिक जुर्माना: अपीलकर्ता ने अंतरिम जमानत की शर्त के तहत ₹5,000 जमा किए थे और कुल मिलाकर वह ₹7,000 की राशि का भुगतान कर चुका था।

अंतिम आदेश

झारखंड उच्च न्यायालय ने अपीलकर्ता की सजा को घटाकर उसके द्वारा पहले ही भुगती जा चुकी हिरासत अवधि (1 माह और 1 दिन) में तब्दील कर दिया और अदालत द्वारा निर्देशित मौद्रिक राशि के साथ अपील का अंतिम रूप से निस्तारण कर दिया।

झारखंड हाईकोर्ट की टिप्पणी

न्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने अपने आदेश में कहा: “यह घटना वर्ष 1993 की है। अपीलकर्ता तीन दशकों की लंबी अवधि से मुकदमे की पीड़ा (Agony of Trial) झेल चुका है और उसका कोई आपराधिक इतिहास नहीं रहा है। इन परिस्थितियों को देखते हुए अपीलकर्ता को उसके अपराध के लिए पर्याप्त सजा मिल चुकी है।” अदालत ने दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए जेल की सजा को पहले काटी गई अवधि तक सीमित कर दिया और उसे जमानत बांड की देनदारियों से मुक्त कर दिया।

Agony of Trial: एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतझारखंड उच्च न्यायालय (Jharkhand High Court)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति प्रदीप कुमार श्रीवास्तव (Justice Pradeep Kumar Srivastava)
संबंधित मामला/कानूनभ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की धारा 7 और 13
मामले का वर्ष1993 (घटना) / 2005 (ट्रायल कोर्ट दोषसिद्धि)
रिश्वत की राशि₹300 (प्रोविडेंट फंड बकाया भुगतान के लिए)
अदालत का निर्णयदोषसिद्धि बरकरार; सजा घटाकर 1 महीना 1 दिन (पहले काटी गई अवधि) की गई।
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