हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष (Key Findings)
- ‘Public View’ का अर्थ निष्पक्ष जनता से है: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि SC/ST एक्ट की धारा 3(1) के तहत ‘सार्वजनिक दृश्य’ का मतलब सिर्फ किसी का वहां मौजूद होना नहीं है। वहां मौजूद व्यक्ति ऐसे होने चाहिए जो स्वतंत्र और निष्पक्ष हों। शिकायतकर्ता से करीबी संबंध, हित या आपराधिक सांठगांठ रखने वाले व्यक्तियों को इस दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए।
- देरी और पुलिसकर्मी की भूमिका: घटना के 20 दिन बाद शिकायत दर्ज कराई गई थी। कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता खुद एक पुलिसकर्मी था, इसलिए अपनी नीयत की सच्चाई (Bona fides) साबित करने के लिए उसे तुरंत शिकायत दर्ज करानी चाहिए थी।
- बदले की भावना (Malicious Prosecution): कोर्ट ने माना कि विभागीय निलंबन का बदला लेने के लिए निजी रंजिश के तहत यह फर्जी मामला दर्ज कराया गया था। ऐसी कार्यवाही को आगे बढ़ाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
अमरावती: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम (SC/ST Act) के तहत एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि जाति आधारित अपमान या उत्पीड़न के मामलों में कानून के तहत ‘सार्वजनिक दृष्टि’ (Public View) की अनिवार्यता को इस संदर्भ में परखा जाना चाहिए कि कथित चश्मदीद गवाह स्वतंत्र और निष्पक्ष (Independent and Impartial) थे या नहीं।
न्यायमूर्ति के. श्रीनिवास रेड्डी की एकल पीठ ने हेड कांस्टेबल की शिकायत पर एक सब-इंस्पेक्टर और एक कांस्टेबल के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को पूरी तरह रद्द (Quash) कर दिया। अदालत ने पाया कि यह शिकायत दुर्भावनापूर्ण थी और निलंबन की अनुशासनात्मक कार्रवाई के बदले (Counterblast) के रूप में दर्ज कराई गई थी।
उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां
SC/ST एक्ट में ‘सार्वजनिक दृष्टि’ (Public View) की व्याख्या करते हुए अदालत ने कहा: “अधिनियम के उद्देश्यों और लक्ष्यों को देखते हुए, धारा 3(1)(r)/3(1)(s) में प्रयुक्त ‘सार्वजनिक दृष्टि’ (Public View) शब्द की व्याख्या इस प्रकार की जानी चाहिए कि वहां उपस्थित आम लोग स्वतंत्र और निष्पक्ष हों तथा किसी भी पक्ष से स्वार्थ से जुड़े न हों। दूसरे शब्दों में, शिकायतकर्ता से किसी भी प्रकार का घनिष्ठ संबंध, जुड़ाव या सांठगांठ रखने वाले व्यक्ति स्वाभाविक रूप से इस दायरे से बाहर हो जाएंगे।”
आपराधिक प्रक्रिया के दुरुपयोग और दुर्भावना पर पीठ ने रेखांकित किया: “इस मामले में कथित चश्मदीदों का पुराना आपराधिक इतिहास रहा है, वे घटनास्थल के स्थानीय निवासी नहीं हैं, और उन पर कई आपराधिक मामले दर्ज हैं। मामले के तथ्यों और परिस्थितियों से यह स्पष्ट निष्कर्ष निकलता है कि यह आपराधिक कार्यवाही याचिकाकर्ताओं के खिलाफ दुर्भावनापूर्ण मंशा, निजी द्वेष और बदला लेने के गुप्त उद्देश्य से शुरू की गई थी, जो कानूनी प्रक्रिया का स्पष्ट दुरुपयोग है।”
मामले की पृष्ठभूमि
- विवाद की जड़ (अनुशासनात्मक कार्रवाई): धोने टाउन पुलिस स्टेशन में तैनात शिकायतकर्ता हेड कांस्टेबल के खिलाफ इंस्पेक्टर ने रिपोर्ट दी थी कि वह गांजा तस्करी और मटका जैसे अवैध धंधों में लिप्त अपराधियों को पुलिस छापेमारी की अग्रिम सूचना लीक करता था। कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDR) में अपराधियों और हेड कांस्टेबल के बीच सैकड़ों कॉल्स पाए जाने के बाद पुलिस अधीक्षक (SP) ने उसे निलंबित कर दिया था।
- बदले में शिकायत: हेड कांस्टेबल को संदेह था कि उसके निलंबन की रिपोर्ट के पीछे उसी थाने के सब-इंस्पेक्टर और कांस्टेबल का हाथ है। इसके बाद उसने आरोप लगाया कि निलंबन पर सवाल उठाने पर दोनों अधिकारियों ने उसके साथ जातिसूचक गाली-गलौज और जान से मारने की धमकी दी। निलंबन के लगभग 20 दिन बाद, हेड कांस्टेबल ने निजी शिकायत दर्ज कराते हुए आरोप लगाया कि दोनों अधिकारियों ने उसकी जाति का नाम लेकर उसे अपमानित किया और धमकी दी।
- निलंबन और विभागीय कार्रवाई: शिकायतकर्ता हेड कांस्टेबल को अवैध गांजा परिवहन और मटका गतिविधियों में शामिल अपराधियों को पुलिस रेड की गुप्त जानकारी लीक करने के आरोप में निलंबित (Suspend) किया गया था। इस रिपोर्ट को तैयार करने में याचिकाकर्ता अधिकारियों (SI और कांस्टेबल) की भूमिका थी।
- दावेदार गवाहों का आपराधिक इतिहास: शिकायतकर्ता ने जिन 3 प्रत्यक्षदर्शियों को पेश किया, वे उस स्थान के निवासी नहीं थे। इसके अलावा, उन गवाहों का पुराना आपराधिक इतिहास (Chequered history) था और उनके खिलाफ कई मामले दर्ज थे।
हाईकोर्ट द्वारा मामला रद्द करने के मुख्य आधार
- चश्मदीदों की निष्पक्षता का अभाव: शिकायतकर्ता ने जिन तीन लोगों को गवाह बनाया था, वे स्थानीय निवासी नहीं थे बल्कि आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति थे। ऐसे गवाह ‘स्वतंत्र और निष्पक्ष सार्वजनिक गवाह’ की श्रेणी में नहीं आते।
- शिकायत दर्ज कराने में 20 दिन की देरी: कथित घटना के लगभग 20 दिन बाद निजी शिकायत दर्ज कराई गई। अदालत ने माना कि एक पुलिसकर्मी होने के नाते उसे अपनी सत्यनिष्ठा (Bona fides) साबित करने के लिए तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए थी।
- दुर्भावनापूर्ण और प्रतिशोधात्मक कार्रवाई: समग्र परिस्थितियों से स्पष्ट हुआ कि विभागीय निलंबन की कार्रवाई से ध्यान भटकाने और अधिकारियों से बदला लेने के लिए यह झूठी शिकायत दर्ज की गई थी।
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट की टिप्पणी
न्यायमूर्ति के. श्रीनिवास रेड्डी ने फैसला सुनाते हुए कहा: “SC/ST अधिनियम के तहत ‘सार्वजनिक दृश्य’ (Public View) शब्द की व्याख्या इस प्रकार की जानी चाहिए कि वहां मौजूद लोग स्वतंत्र, निष्पक्ष और किसी भी पक्ष में रुचि न रखने वाले हों। दूसरे शब्दों में, शिकायतकर्ता से किसी भी प्रकार का संबंध या निकटता रखने वाले व्यक्ति स्वतः ही बाहर हो जाएंगे। वर्तमान मामले में गवाहों का आपराधिक इतिहास रहा है और शिकायत केवल बदला लेने की नीयत से दर्ज कराई गई है, जो कि पूरी तरह से तुच्छ और द्वेषपूर्ण है।”
अंतिम आदेश
आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने माना कि इस तरह की दुर्भावनापूर्ण आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। अदालत ने दोनों पुलिस अधिकारियों की याचिका स्वीकार करते हुए एससी/एसटी सेशंस केस की कार्यवाही को पूरी तरह निरस्त (Quash) कर दिया।
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| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय (Andhra Pradesh High Court) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति के. श्रीनिवास रेड्डी (Justice K. Sreenivasa Reddy) |
| मामला/कानून | SC/ST (Prevention of Atrocities) Act – धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) |
| पक्षकार | सब-इंस्पेक्टर व कांस्टेबल (याचिकाकर्ता) बनाम निलंबित हेड कांस्टेबल (शिकायतकर्ता) |
| अदालत का फैसला | आपराधिक कार्यवाही रद्द; शिकायत को बदला लेने की नीयत (Mala fide) से दर्ज माना गया। |

