Thursday, October 15, 2026
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Deed Writer: पटना हाईकोर्ट की दो टूक; पेशेवर दायित्व निभाने वाले कातिब को आपराधिक मंशा के ठोस सबूत बिना धोखाधड़ी में नहीं फंसाया जा सकता

मुख्य बिंदु (Kery Indicators)

  • विवाद की पृष्ठभूमि: एक सह-आरोपी ने किसी अन्य व्यक्ति के पक्ष में जमीन का बैनामा (Sale Deed) निष्पादित किया था। सूचक (Informant) का आरोप था कि बेचने वाले के पास उस जमीन का वैध स्वामित्व नहीं था और याचिकाकर्ता (कातिब) ने गवाहों व पहचानकर्ताओं के साथ सांठगांठ करके धोखाधड़ी से रजिस्ट्री तैयार कराई।
  • कातिब की दलील: याचिकाकर्ता का तर्क था कि उसका नाम केवल इसलिए आया क्योंकि उसने पेशेवर के रूप में बैनामा लिखा था। मूल विवाद पारिवारिक/पैतृक संपत्ति को लेकर है जो मुख्य रूप से दीवानी (Civil Nature) प्रकृति का है। एक दस्तावेज लेखक के रूप में उसकी कोई आपराधिक मंशा (Mens Rea) नहीं थी और न ही उसे कोई संपत्ति सौंपी (Entrustment) गई थी।
  • अदालत का निष्कर्ष: कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस सबूत (Tangible Material) नहीं है जो यह साबित करे कि दस्तावेज लेखक किसी धोखाधड़ी का हिस्सा था। उसने केवल अपनी पेशेवर जिम्मेदारी निभाई थी।
  • भजन लाल केस का संदर्भ: सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम भजन लाल फैसले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने माना कि जब प्रथम दृष्टया भी आरोपी के खिलाफ अपराध नहीं बनता, तो आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।

पटना: पटना हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल सेल डीड (बिक्री विलेख) का मसौदा तैयार करने वाले कातिब (Deed Writer) को धोखाधड़ी या साजिश के मामले में तब तक आरोपी नहीं बनाया जा सकता, जब तक कि उसके खिलाफ दुर्भावनापूर्ण मंशा (Mens Rea) या मिलीभगत का कोई ठोस साक्ष्य न हो। अदालत ने कहा कि अपना पेशेवर दायित्व निभाना किसी धोखाधड़ी का हिस्सा होना साबित नहीं करता।

न्यायमूर्ति सोनी श्रीवास्तव की एकल पीठ ने याचिकाकर्ता कातिब के खिलाफ निचली अदालत द्वारा लिए गए संज्ञान (Cognizance) आदेश और संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही को पूरी तरह रद्द (Quash) कर दिया।

उच्च न्यायालय की प्रमुख कानूनी टिप्पणियां

कातिब की भूमिका और आपराधिक मंशा पर अदालत ने स्पष्ट किया: “अदालत पाती है कि याचिकाकर्ता, एक सेल डीड लेखक (कातिब) होने के नाते, केवल अपना पेशेवर कर्तव्य निभा रहा था। किसी भी धोखाधड़ी गतिविधि में शामिल होने के लिए आवश्यक आपराधिक मंशा (Mens Rea) और इरादा याचिकाकर्ता के खिलाफ सामने नहीं आता है। मिलीभगत का आरोप किसी भी ठोस सामग्री द्वारा समर्थित नहीं है और यह केवल एक निराधार और सामान्य आरोप बना हुआ है।”

अदालत ने आगे रेखांकित किया कि विवाद में किसी भी प्रकार के विवाद या झगड़े में याचिकाकर्ता शामिल नहीं था, बल्कि यह सह-आरोपी और उसके अपने परिवार के सदस्यों के बीच का मामला था।

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मामले की पृष्ठभूमि और विवाद

  • पैतृक भूमि की बिक्री: मामला एक ऐसी भूमि के निबंधित बिक्री विलेख (Sale Deed) के निष्पादन से जुड़ा था, जिसके बारे में सूचक (Informant) का दावा था कि विक्रेता के पास भूमि का वैध और पूर्ण स्वामित्व नहीं था।
  • कातिब पर मिलीभगत का आरोप: प्राथमिकी में आरोप लगाया गया था कि कातिब (याचिकाकर्ता) ने गवाहों और पहचानकर्ताओं के साथ मिलकर धोखाधड़ी के माध्यम से जाली तरीके से सेल डीड तैयार करने की साजिश रची।
  • याचिकाकर्ता की दलील: याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि विवाद पैतृक संपत्ति से जुड़ा है और अनिवार्य रूप से दीवानी (Civil) प्रकृति का है। उसने केवल दस्तावेज़ लिखने का काम किया था और उसका कोई आपराधिक इरादा या व्यक्तिगत लाभ नहीं था। न ही उसे कोई संपत्ति सौंपी गई थी, जिससे आपराधिक विश्वासघात (Criminal Breach of Trust) का अपराध बने।

हाईकोर्ट द्वारा मामला रद्द करने के मुख्य आधार

  1. सद्भावपूर्ण विश्वास (Bona Fide Belief): अदालत ने पाया कि कातिब ने इस सद्भावपूर्ण विश्वास के साथ दस्तावेज़ तैयार किया था कि संबंधित भूमि सूचक और सह-आरोपी की संयुक्त पैतृक संपत्ति थी।
  2. सह-आरोपी की गलती की स्वीकारोक्ति: रिकॉर्ड पर यह सामने आया कि सह-आरोपी ने स्वयं स्वीकार किया था कि उससे गलती हुई थी। ऐसे में कातिब पर आपराधिक विश्वासघात या षड्यंत्र का दोष मढ़ने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।
  3. ‘भजन लाल’ मामले के सिद्धांतों का प्रयोग: सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल का हवाला देते हुए अदालत ने माना कि यदि प्राथमिक आरोपों को जस का तस मान भी लिया जाए, तब भी याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई आपराधिक अपराध नहीं बनता है।

पटना हाईकोर्ट की टिप्पणी

न्यायमूर्ति सोनी श्रीवास्तव की पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा: अदालत पाती है कि याचिकाकर्ता, एक बैनामा लेखक (कातिब) होने के नाते, केवल अपना पेशेवर कर्तव्य निभा रहा था। किसी भी धोखाधड़ी गतिविधि में शामिल होने के लिए आवश्यक आपराधिक मंशा (Mens Rea) याचिकाकर्ता के खिलाफ सामने नहीं आती है। सांठगांठ का आरोप केवल एक सामान्य और निराधार आरोप है।

अंतिम आदेश

पटना उच्च न्यायालय ने पाया कि प्रथम दृष्टया कोई संज्ञेय अपराध न बनने के बावजूद कातिब के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। तदनुसार, अदालत ने कातिब (याचिकाकर्ता) से संबंधित संज्ञान आदेश और आपराधिक कार्यवाही को पूरी तरह रद्द और निरस्त कर दिया।

एट ए ग्लान्स (At a Glance of Judgment)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतपटना उच्च न्यायालय (Patna High Court)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति सोनी श्रीवास्तव (Justice Soni Shrivastava)
याचिकाकर्ता की भूमिकाकातिब / दस्तावेज लेखक (Deed Writer)
संबंधित कानूनी सिद्धांतMens Rea (आपराधिक मंशा/दुराशय) और State of Haryana v. Bhajan Lal
अदालत का फैसलाकातिब के खिलाफ संज्ञान आदेश और पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द।
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