Wednesday, October 28, 2026
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Gaps In Portal: जमानत मिलने के 7 दिन बाद भी 341 कैदी जेल से रिहा नहीं हुए; ई-प्रिजन्स पोर्टल पर अपलोड नहीं हो रहे अदालती आदेश, खामी समझें

मुख्य निष्कर्ष और निर्देश

  • डाटा का मिलान और तकनीकी जांच: अदालत ने KeLSA को निर्देश दिया कि वह 3 दिनों के भीतर उन कैदियों की सूची राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) और हाईकोर्ट के IT निदेशालय को सौंपे जिनके आदेश गायब हैं। अधिकारियों को यह जांच कर रिपोर्ट देनी होगी कि समस्या आदेशों के अपलोड न होने के कारण है या सिस्टम में सिंक (Synchronisation) की तकनीकी गड़बड़ी से है।
  • ई-प्रिज़न पोर्टल में नए फीचर्स जोड़ने के निर्देश:
    1. केवल जुर्माना न भरने वाले कैदी: सिस्टम में एक अलग टैग/सुविधा जोड़ी जाए ताकि उन कैदियों की तुरंत पहचान हो सके जो सिर्फ जुर्माना न चुका पाने के कारण जेल में हैं।
    2. अपील न करने वाले कैदी: पोर्टल में ऐसा विकल्प बनाया जाए जिससे विधिक सेवा प्राधिकरण उन सजायाफ्ता कैदियों को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान कर सके जिन्होंने अब तक अपील दायर नहीं की है।
    3. अस्थायी रूप से बाहर कैदी: जो कैदी अस्पताल में भर्ती हैं या जिन्हें कोर्ट ले जाया गया है, उनके अदालती आदेशों को भी पोर्टल पर ट्रैक करने की व्यवस्था हो।
  • एकीकृत प्रणाली (Integrated System): अदालत ने निर्देश दिया कि हाईकोर्ट केस मैनेजमेंट सिस्टम का पुलिस के iCOPS और e-Prisons सिस्टम के साथ एकीकरण (Integration) 4 सप्ताह के भीतर पूरी तरह से क्रियान्वित किया जाए।

कोच्चि: केरल हाईकोर्ट ने राज्य के ‘ई-प्रिजन्स’ (e-Prisons) पोर्टल की कार्यप्रणाली और तकनीकी खामियों पर कड़ा संज्ञान लिया है।

न्यायमूर्ति राजा विजयराघवन वी. और न्यायमूर्ति के.वी. जयकुमार की खंडपीठ ने कैदियों की ट्रैकिंग और पोर्टल पर अदालती आदेशों के गायब होने की विसंगतियों को प्राथमिकता के आधार पर ठीक करने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 30 सितंबर 2026 को होगी। केरल राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (KeLSA) द्वारा अदालत को अवगत कराया गया कि जमानत मंजूर होने के सात दिनों के भीतर भी 341 कैदियों को जेल से रिहा नहीं किया गया, क्योंकि सिस्टम में उनके जमानत आदेश उपलब्ध ही नहीं थे [सुओ मोटो बनाम केरल राज्य एवं अन्य]।

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उच्च न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियां

1. पोर्टल और अदालती आदेशों के बीच का बड़ा अंतर अस्वीकार्य केएलएसए (KeLSA) के आंकड़ों पर चिंता व्यक्त करते हुए खंडपीठ ने कहा: “हमारे सामने रखे गए आंकड़े पोर्टल पर दिखने वाले मामलों और सिस्टम में उपलब्ध संबंधित अदालती आदेशों के बीच एक बड़े अंतर (Substantial Gap) को दर्शाते हैं। इस विसंगति की तुरंत जांच की जानी चाहिए, क्योंकि कैदियों की स्थिति की निगरानी करने और समय पर रिहाई जैसी परिणामी कार्रवाई करने के लिए पोर्टल पर अदालती आदेश का उपलब्ध होना अनिवार्य है।”

2. कानूनी उपचार से वंचित न रहें कैदी सजा के खिलाफ अपील न कर पाने वाले कैदियों की पहचान पर अदालत ने रेखांकित किया: “ऐसी जानकारी उपलब्ध होना इसलिए जरूरी है ताकि विधिक सेवा प्राधिकरण उन मामलों की पहचान कर सके जहां अपील दायर करने की आवश्यकता है, जिससे कोई भी पात्र कैदी उचित कानूनी उपचार पाने के अवसर से वंचित न रहे।”

KeLSA द्वारा सामने लाए गए चौंकाने वाले आंकड़े

  • 341 कैदियों की रिहाई अटकी: 341 कैदियों को जमानत मिल चुकी थी, लेकिन 7 दिन बीत जाने के बाद भी वे रिहा नहीं हो सके।
  • केवल 60 मामलों में ऑर्डर अपलोड: 29 अगस्त तक की स्थिति के अनुसार, इन 341 मामलों में से केवल 60 बंदियों के ही जमानत आदेश पोर्टल पर अपलोड थे।
  • खारिज याचिकाओं के आदेश भी गायब: पोर्टल पर 113 ऐसे कैदी दर्ज थे जिनकी जमानत अर्जियां खारिज हो चुकी थीं, लेकिन सिस्टम में केवल 70 मामलों के आदेश ही उपलब्ध थे।
  • सिस्टम में एकीकरण की कमी: जेल अधीक्षकों के पास उन कैदियों की पहचान करने की अलग सुविधा नहीं थी जो केवल जुर्माना (Fine) न भर पाने के कारण जेल में बंद हैं या जिन्होंने अपनी सजा के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील (Appeal) दाखिल नहीं की है।

हाईकोर्ट के मुख्य निर्देश और तकनीकी सुधार

  1. 3 दिन में डेटा साझा करने का निर्देश: हाईकोर्ट ने KeLSA को निर्देश दिया कि वह ऐसे सभी कैदियों की सूची 3 दिनों के भीतर राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (NIC) और हाईकोर्ट के आईटी निदेशालय के साथ साझा करे, ताकि तकनीकी विसंगति का तुरंत समाधान किया जा सके।
  2. कारणों की जांच: अधिकारियों को यह जांचने का निर्देश दिया गया है कि आदेश अपलोड ही नहीं किए गए थे या डेटा ट्रांसमिशन/सिंक्रोनाइजेशन में कोई तकनीकी खराबी आई थी।
  3. जुर्माना न भर पाने वाले कैदियों के लिए अलग ट्रैकिंग: जेल अधीक्षकों के सुझाव पर, केवल जुर्माना (Fine) न भर पाने के कारण जेल में बंद कैदियों की अलग से पहचान करने के लिए पोर्टल में नया फीचर जोड़ने का आदेश दिया गया।
  4. अस्पताल व पेशी वाले कैदियों का रिकॉर्ड: पैरोल, अस्पताल में भर्ती या पुलिस एस्कॉर्ट के तहत कोर्ट पेशी पर बाहर जाने वाले कैदियों के आदेश भी पोर्टल पर अनिवार्य रूप से अपडेट किए जाएं।
  5. अपील न करने वाले दोषियों की पहचान: जिन दोषियों ने अपनी सजा के खिलाफ अपील दायर नहीं की है, उन्हें विधिक सहायता (Legal Aid) मुहैया कराने के लिए सिस्टम में आवश्यक बदलाव किए जाएं।
  6. 4 सप्ताह में सिस्टम इंटीग्रेशन: हाईकोर्ट केस मैनेजमेंट सिस्टम, पुलिस के iCOPS और जेलों के e-Prisons सिस्टम के एकीकरण (Integration) को 4 सप्ताह के भीतर पूरी तरह क्रियाशील बनाने का निर्देश दिया गया।

विधिक प्रतिनिधित्व

  • केरल राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (KeLSA) की ओर से: स्टैंडिंग काउंसिल लियो लुकोस।

Gaps In Portal: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकेरला उच्च न्यायालय (Kerala High Court)
खंडपीठन्यायमूर्ति राजा विजयाराघवन वी एवं न्यायमूर्ति के.वी. जयकुमार
मामले का प्रकारसुओ मोटो (स्वतः संज्ञान) याचिका
मुद्दाई-प्रिज़न पोर्टल में तकनीकी कमियां, जमानत आदेशों का अपलोड न होना और कैदियों की समय पर रिहाई न होना
अगली सुनवाई की तिथि30 सितंबर 2026
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