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मामले की पृष्ठभूमि: क्या था पूरा विवाद?
- याचिकाकर्ता की मांग:याचिकाकर्ता तंगम वेंकटेश ने याचिका दायर कर तमिलनाडु के धार्मिक और धर्मादा बंदोबस्ती (HR&CE) विभाग तथा मंदिर ट्रस्टियों को आगम नियमों का कड़ाई से पालन कराने का निर्देश देने की मांग की थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि कई गैर-हिंदू नेता और बाहरी लोग बिना रीति-रिवाजों का पालन किए मंदिर के पवित्र मंडपों और गर्भगृह तक में प्रवेश कर रहे हैं।
- हालिया विवादित घटनाएं:अदालत ने निर्णय सुनाते वक्त हाल की कई विवादित घटनाओं का उल्लेख किया:
- मदुरै सेंट्रल के विधायक बदरुद्दीन मुस्तफा: उन्होंने मदुरै मीनाक्षी मंदिर के कुंभाभिषेकम के दौरान मंदिर टावरों पर चढ़कर निरीक्षण करने का दावा किया था, जबकि उन्होंने सार्वजनिक रूप से सनातन धर्म के उन्मूलन की बात की थी।
- तिरुचेंदुर और तिरुवन्नामलाई मंदिर की घटनाएं: सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो का संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने कहा कि भक्तों के कड़े विरोध के बावजूद टोपी पहने लोग तिरुवन्नामलाई अरुलमिगु अरुणाचलेश्वर मंदिर परिसर में जबरन घुसे और HR&CE का अमला मूकदर्शक बना रहा।
सर्वोच्च न्यायालय के सिद्धांतों और हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष
1. “समावेशी दृष्टिकोण: धर्मांतरण नहीं, केवल श्रद्धा की पुष्टि जरूरी”:
पीठ ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय (CM Joseph Vijay) का अनुकरणीय उदाहरण देते हुए कहा: “हमारे सामने तमिलनाडु के माननीय मुख्यमंत्री श्री जोसेफ विजय का शानदार उदाहरण है, जिन्होंने वचन पत्र (Undertaking) पर हस्ताक्षर करने के बाद देवी मीनाक्षी की पूजा-अर्चना की। ईसाई आस्था से होने के बावजूद उनसे हिंदू धर्म अपनाने को नहीं कहा गया; उनसे केवल इष्टदेव के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करने का अनुरोध किया गया था। इसी को हम समावेशी दृष्टिकोण (Inclusive Approach) कहते हैं।”
2. आगम मंदिर बनाम अन्य धार्मिक स्थल:
- अदालत ने स्पष्ट किया कि यह फैसला केवल आगम नियमों के तहत संचालित हिंदू मंदिरों पर लागू होता है। भगवान अय्यप्पा (सबरीमाला) और शिर्डी साईं बाबा जैसे संस्थान, जो सभी धर्मों के श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं, इस प्रतिबंध से बाहर हैं।
- कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हिंदुओं के भीतर जातिगत आधार पर मंदिर प्रवेश पर लगाए गए ऐतिहासिक प्रतिबंध असंवैधानिक हैं और संविधान के सामने ऐसी कुप्रथाएं समाप्त हो चुकी हैं। लेकिन गैर-हिंदुओं के संदर्भ में आगम प्रतिबंध लागू रहेंगे।
3. धार्मिक जुलूसों और सड़कों का अधिकार (1972 के फैसले में सुधार):
- कोर्ट ने 1972 के एक पुराने फैसले से असहमति जताई जिसमें मस्जिदों के पास धार्मिक जुलूस रोकने या संगीत न बजाने का सुझाव दिया गया था।
- पीठ ने माना कि चाहे मस्जिद हो, चर्च हो या मंदिर—किसी भी समुदाय को सड़क पर अपने पारंपरिक धार्मिक जुलूस निकालने से रोका नहीं जा सकता।
चेन्नई: भारत का संविधान के अनुच्छेद 25 एवं 26 (अंतःकरण की स्वतंत्रता, धर्म के अबाध रूप से मानने व धार्मिक संप्रदायों के मामलों के प्रबंधन का अधिकार), तमिलनाडु मंदिर प्रवेश अधिकार अधिनियम, 1947 (Tamil Nadu Temple Entry Authorisation Act, 1947), तमिलनाडु हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 (TN HR&CE Act, 1959), आगम शास्त्र के नियम (Rules prescribed in traditional Agamas), तथा गैर-हिंदुओं द्वारा मंदिरों में प्रवेश हेतु निर्धारित प्रारूप में आस्था और सम्मान का लिखित वचनपत्र (Undertaking) देने की विधिक अनिवार्यता पर मद्रास हाईकोर्ट ने एक युगांतरकारी और स्पष्ट निर्णय दिया है।
मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन (Justice GR Swaminathan) और न्यायमूर्ति पी. मुरुगन (Justice P Murugan) की खंडपीठ ने 23 अक्टूबर 2026 के अपने फैसले में व्यवस्था दी कि गैर-हिंदू जो अपने धार्मिक प्रतीकों/चिह्नों के साथ आते हैं और संबंधित मंदिर के देवता में अपनी आस्था व श्रद्धा की पुष्टि करने वाले निर्धारित वचनपत्र पर हस्ताक्षर नहीं करते, उन्हें आगम मंदिरों के ‘ध्वज-स्तंभ’ (Flag-pole / कोदिमरम) के आगे प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
पीठ ने मंदिर परिसरों में राजनीतिक दिखावे और चाटुकारिता के लिए बिना श्रद्धा प्रवेश करने वाले नेताओं और उनके समर्थकों को कड़ी फटकार लगाते हुए स्पष्ट किया कि “मंदिर की सदियों पुरानी प्रथाएं और रीति-रिवाज ऐसे चमचागिरी के प्रदर्शन और सियासी दिखावे (Display of Chamchagiri and Optics) के आगे कभी घुटने नहीं टेक सकते।”
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक व्यवस्था
1. ‘आगम मंदिरों में गैर-हिंदुओं का अनधिकृत प्रवेश मंदिर की पवित्रता को दूषित करता है’
न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति पी. मुरुगन की खंडपीठ ने अपने 23 अक्टूबर 2026 के आदेश में स्पष्ट रूप से दर्ज किया: “यहाँ तक कि मंदिर परिसर के भीतर भी उन गैर-हिंदुओं को प्रवेश की अनुमति नहीं दी जा सकती जो अपने धार्मिक प्रतीकों को धारण करते हैं और जो संबंधित देवता के प्रति अपनी श्रद्धा व आस्था की पुष्टि (Subscribe reverence) नहीं करते। यह वचनपत्र (Undertaking) संबंधित धार्मिक संस्थान द्वारा निर्धारित प्रारूप में होना अनिवार्य है। याचिकाकर्ता एक हिंदू होने के नाते यह मांग करने का पूर्ण विधिक हकदार है कि तमिलनाडु के आगम मंदिरों के ट्रस्टी/प्रशासक गैर-हिंदुओं को—जिन्होंने वचनपत्र पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं—ध्वज-स्तंभ (Flag-pole) पार करने की अनुमति न देकर आगम निषेधों का कड़ाई से पालन करें। यदि ऐसे प्रवेश की अनुमति दी जाती है, तो यह मंदिर की आध्यात्मिक पवित्रता को दूषित (Defile the sanctity) करेगा।”
2. आगमिक मंदिर बनाम सार्वभौमिक आस्था स्थल (अय्यप्पा व साईं बाबा):
- अदालत ने स्पष्ट किया कि यह कठोर नियम केवल आगम मंदिरों (जिनका निर्माण, प्रतिष्ठा, पूजा पद्धति और अनुष्ठान आगम शास्त्रों के संहिताबद्ध नियमों से बंधे हैं) पर लागू होता है।
- अदालत ने तुलना करते हुए रेखांकित किया कि भगवान अय्यप्पा (सबरीमाला) और शिरडी साईं बाबा जैसे संस्थान सभी धर्मों के श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। शिरडी साईं बाबा धर्म से परे हैं, जिन पर हिंदू और मुस्लिम दोनों अपना दावा करते रहे हैं (यद्यपि अब वे हिंदू देवकुल का अभिन्न अंग हैं)। अतः आगम मंदिरों के विशिष्ट नियम इन सार्वभौमिक आस्था केंद्रों से भिन्न हैं।
3. जातिगत भेदभाव का अंत बनाम गैर-हिंदुओं पर आगम प्रतिबंध:
- पीठ ने संविधान और धर्मशास्त्र के टकराव पर महत्वपूर्ण सैद्धांतिक अंतर रेखांकित किया:
- ऐतिहासिक रूप से आगम परंपराओं के नाम पर कुछ हिंदू जातियों पर लगाए गए मंदिर प्रवेश प्रतिबंध अब संवैधानिक रूप से अवैध हैं।
- अदालत ने कहा: “भारत का संविधान सर्वोपरि (Paramount) है, और ऐसी किसी भी प्रतिगामी धर्मशास्त्रीय निषेधाज्ञा को संविधान के समक्ष झुकना ही होगा।”
- किंतु यह छूट गैर-हिंदुओं पर लागू नहीं होती: अदालत ने तुरंत जोड़ा कि गैर-हिंदुओं के संदर्भ में आगम प्रतिबंध पूरी तरह प्रभावी रहेंगे यदि वे निर्धारित वचनपत्र पर हस्ताक्षर कर देवता के प्रति अपनी निष्ठा व्यक्त नहीं करते।
राजनीतिक दिखावे और ‘चमचागिरी’ पर उच्च न्यायालय की तल्ख टिप्पणियां
अदालत ने हाल की कई घटनाओं का न्यायिक संज्ञान (Judicial Notice) लेते हुए राजनेताओं द्वारा मंदिर मर्यादा के उल्लंघन पर कड़ा प्रहार किया:
1. राजनेताओं का दोहरा आचरण और सनातन पर प्रहार:
- अदालत ने मदुरै सेंट्रल के विधायक बदरुद्दीन मुस्तफा के आचरण पर टिप्पणी की, जिन्होंने मीनाक्षी अम्मन मंदिर के कुंभाभिषेकम के दौरान मंदिर के शिखरों/गोपुरमों पर चढ़ाई की थी और दावा किया था कि वे जन-सुविधाओं का ‘निरीक्षण’ कर रहे थे।
- अदालत ने कहा: “यह घोर विडंबना है कि संबंधित विधायक ने पूर्व में सनातन धर्म के उन्मूलन की सार्वजनिक घोषणा की थी, और फिर मंदिर की पवित्र रस्मों के दौरान गोपुरम पर चढ़ गए।”
2. ‘चमचागिरी और दिखावे के आगे मंदिर की परंपराएं नहीं झुकेंगी’:
- सोशल मीडिया पर वायरल तिरुवन्नामलाई अरुणाचलेश्वर मंदिर के एक वीडियो का संज्ञान लेते हुए—जिसमें टोपी पहने कुछ लोग भक्तों के भारी विरोध के बावजूद जबरन मंदिर परिसर में प्रवेश करते दिखे और सरकारी HR&CE कर्मचारी मूकदर्शक बने रहे—अदालत ने कहा:“राजनेताओं द्वारा केवल चुनावी लाभ और मतदाताओं को रिझाने (Play to the gallery) के लिए मंदिर आना और उनके साथ उनके चाटुकारों (Sycophants) द्वारा मर्यादा तोड़कर घुसना अस्वीकार्य है। मंदिर की रीति-रिवाज और धार्मिक परंपराएं ऐसी ‘चमचागिरी’ और दिखावे के सामने कभी नहीं झुक सकतीं।”
3. मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय का ‘सकारात्मक व समावेशी’ उदाहरण:
- पीठ ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय (Chief Minister Joseph Vijay) की प्रशंसा करते हुए उन्हें आदर्श उदाहरण बताया:“हमारे समक्ष तमिलनाडु के माननीय मुख्यमंत्री श्री जोसेफ विजय का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिन्होंने निर्धारित वचनपत्र (Undertaking) पर हस्ताक्षर करने के पश्चात ही माँ मीनाक्षी की विधिवत पूजा-अर्चना की।माननीय मुख्यमंत्री, जो व्यक्तिगत आस्था से ईसाई हैं, से कभी हिंदू धर्म अपनाने को नहीं कहा गया; उनसे केवल आराध्य देवी के प्रति अपनी श्रद्धा व निष्ठा प्रकट करने का अनुरोध किया गया था। वास्तव में यही एक सच्चा ‘समावेशी दृष्टिकोण’ (Inclusive Approach) है।”
धार्मिक जुलूसों पर 1972 की नजीर में संशोधन: समानता का सिद्धांत
मद्रास हाईकोर्ट ने 1972 के अपने एक पुराने फैसले के उस हिस्से से असहमति व्यक्त की, जिसमें मस्जिदों के सामने से संगीत व धार्मिक जुलूस निकालने पर रोक का सुझाव दिया गया था:
- समान धार्मिक स्वतंत्रता: अदालत ने स्पष्ट किया कि चाहे मस्जिद हो, चर्च हो या मंदिर—सार्वजनिक मार्गों से पारंपरिक धार्मिक जुलूस निकालने का अधिकार सभी समुदायों को समान रूप से प्राप्त है:“किसी मस्जिद या चर्च के स्थित होने का हवाला देकर अन्य समुदायों के पारंपरिक धार्मिक जुलूसों को रोका नहीं जा सकता। इसी प्रकार, हिंदू भी इस आधार पर अन्य धर्मावलंबियों के पारंपरिक जुलूसों को नहीं रोक सकते कि वे मंदिरों के सामने से गुजर रहे हैं।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक विवरण
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं विधिक संदर्भ |
| याचिकाकर्ता | थंगम वेंकटेश (हिंदू श्रद्धालु एवं सामाजिक कार्यकर्ता)। |
| प्रतिवादी पक्ष | तमिलनाडु राज्य सरकार, हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती विभाग (HR&CE Department) व अन्य। |
| याचिका की प्रकृति | तमिलनाडु मंदिर प्रवेश अधिकार अधिनियम, 1947 और 1959 के HR&CE अधिनियम के सख्त क्रियान्वयन हेतु जनहित रिट याचिका। |
| मुख्य प्रार्थना | तमिलनाडु के आगम मंदिरों में गैर-हिंदुओं और अनाधिकृत व्यक्तियों के मनमाने प्रवेश पर रोक लगाने हेतु सख्त तंत्र (जैसे ध्वज-स्तंभ पर बोर्ड, रजिस्टर और वचनपत्र सत्यापन) स्थापित किया जाए। |
| राज्य सरकार (AAG) का पक्ष | अतिरिक्त महाधिवक्ता पी.वी. बालसुब्रमण्यम ने स्थिति स्पष्ट की कि विभाग नियमों का पालन सुनिश्चित कराने के लिए प्रतिबद्ध है। |
| अदालत का अंतिम आदेश | याचिका पूर्णतः स्वीकार; आगम मंदिरों में गैर-हिंदुओं के बिना वचनपत्र प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबंध प्रभावी; HR&CE अधिकारियों को आगम नियमों का कड़ाई से पालन कराने का निर्देश। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘अनुच्छेद 25-26 और आगम शास्त्र की पवित्रता’
- ‘सेशम्मल बनाम तमिलनाडु राज्य’ [(1972) 2 SCC 11] और ‘आदि शैव’ नजीर:
- सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठों ने बार-बार स्पष्ट किया है कि हिंदू मंदिरों में आगम शास्त्र केवल पूजा की विधि नहीं तय करते, बल्कि यह भी निर्धारित करते हैं कि गर्भगृह, मंडपम और प्रांगण की पवित्रता कैसे सुरक्षित रखी जाए।
- आगमों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति जो देवता में विश्वास नहीं रखता या जो धार्मिक रूप से अन्य मान्यताओं से बंधा है, बिना पवित्र आस्था के मंदिर के आंतरिक भागों में प्रवेश करता है, तो मूर्ति की दिव्यता और मंदिर की आध्यात्मिक ऊर्जा का क्षरण माना जाता है, जिसके निवारण हेतु पुनः संप्रायश्चित्त या संप्रोक्षण करना पड़ता है।
- अनुच्छेद 25(2)(b) की सामाजिक सुधार सीमा:
- संविधान का अनुच्छेद 25(2)(b) राज्य को यह अधिकार देता है कि वह हिंदुओं के सभी वर्गों और जातियों के लिए हिंदू धार्मिक संस्थाओं को खोले।
- किंतु यह सामाजिक सुधार केवल हिंदुओं के आंतरिक वर्गों के बीच भेदभाव मिटाने के लिए है; यह किसी गैर-आस्तिक या अन्य धर्मावलंबी को बिना देवता में विश्वास रखे केवल राजनीतिक या पर्यटन के उद्देश्य से आगम मंदिरों के नियमों को रौंदने का कोई मौलिक अधिकार नहीं देता।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- न्यायालय: मद्रास उच्च न्यायालय (मदुरै खंडपीठ / चेन्नई)
- केस संदर्भ: थंगम वेंकटेश बनाम तमिलनाडु राज्य व अन्य [W.P.(MD) No. … / 2026]
- पीठ: न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन एवं न्यायमूर्ति पी. मुरुगन (खंडपीठ)
- निर्णय की तिथि: 23 अक्टूबर 2026
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता की ओर से: अधिवक्ता जी. अरविन्दसामी (Advocate G. Aravinthsamy)
- तमिलनाडु राज्य व HR&CE विभाग की ओर से: अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) पी.वी. बालसुब्रमण्यम (P.V. Balasubramanian), शासकीय प्लीडर एम.पी. सेंथिल के सहयोग से।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 25 (धर्म की स्वतंत्रता), अनुच्छेद 26(b) (धार्मिक मामलों के प्रबंधन का अधिकार), एवं अनुच्छेद 226
- तमिलनाडु मंदिर प्रवेश अधिकार अधिनियम, 1947 (TN Act V of 1947) — धारा 3 एवं संबंधित नियम
- तमिलनाडु हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 (TN HR&CE Act) — आगम प्रथाओं का संरक्षण
- पारंपरिक आगम शास्त्र — शैव और वैष्णव (पाञ्चरात्र व वैखानस) आगमिक निषेध
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- आगम मंदिरों में प्रवेश और धार्मिक शुचिता का विधिक मानक: ‘आगम मंदिरों में गैर-हिंदुओं का प्रवेश केवल तभी संभव है जब वे निर्धारित प्रारूप में संबंधित देवता के प्रति आस्था व श्रद्धा का लिखित वचनपत्र निष्पादित करें; बिना वचनपत्र के ध्वज-स्तंभ (कोदिमरम) पार करना मंदिर की शुचिता का उल्लंघन है; मंदिर की पवित्र परंपराएं राजनेताओं के चुनावी दिखावे, पीआर और चाटुकारिता के सामने नहीं झुक सकतीं।’
- वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: मद्रास उच्च न्यायालय की खंडपीठ का आदेश प्रभावी; तमिलनाडु के सभी आगम मंदिरों के ट्रस्टियों और HR&CE विभाग को निर्देश दिया गया है कि वे गैर-हिंदुओं के प्रवेश हेतु निर्धारित वचनपत्र प्रणाली को अनिवार्य रूप से लागू करें और बिना वचनपत्र के किसी भी व्यक्ति को ध्वज-स्तंभ के पार न जाने दें।
Agamic Temple:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | मद्रास उच्च न्यायालय (Madras High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति जी. आर. स्वामीनाथन एवं न्यायमूर्ति पी. मुरुगन |
| मामला/साइटेशन | तंगम वेंकटेश बनाम तमिलनाडु राज्य (Thangam Venkatesh Vs State of TN) |
| याचिकाकर्ता | तंगम वेंकटेश (हिंदू श्रद्धालु) | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता जी. अरविंथसामी |
| प्रतिवादी/राज्य | तमिलनाडु राज्य सरकार एवं HR&CE विभाग | प्रतिनिधित्व: अतिरिक्त एडवोकेट जनरल पी.वी. बालासुब्रमण्यन |
| मुख्य विवाद | आगम मंदिरों में गैर-हिंदुओं के बिना अनुमति/श्रद्धा प्रवेश पर रोक और ‘तमिलनाडु मंदिर प्रवेश अधिकृत अधिनियम, 1947’ का अनुपालन। |
| अदालत का फैसला | याचिका स्वीकार; आगम मंदिरों में गैर-हिंदुओं को बिना निर्धारित फॉर्म प्रारूप पर शपथ/वचन पत्र दिए प्रवेश की अनुमति नहीं होगी। |

