Saturday, October 31, 2026
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Advocates Act: बिना राज्य बार काउंसिल में विधिवत इनरोलमेंट के किसी को भी वकालत करने या खुद को वकील बताने की अनुमति नहीं दी जा सकती

हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और टिप्पणी

  • एडवोकेट्स एक्ट 1961 का अनिवार्य अनुपालन: न्यायमूर्ति रवि चिरानिया ने स्पष्ट शब्दों में कहा:“जब तक कोई व्यक्ति एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के प्रावधानों के अनुसार संबंधित राज्य बार काउंसिल के साथ विधिवत नामांकित (Enrolled) नहीं होता, तब तक उसे एक वकील के रूप में अभ्यास करने या खुद को वकील के रूप में पेश करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।” — राजस्थान हाईकोर्ट
  • सीनियर एडवोकेट की सहायता: मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद पुरोहित से सहायता ली। दोनों पक्षों को सुनने के बाद वरिष्ठ अधिवक्ता ने भी कोर्ट से इस याचिका को भारी जुर्माने के साथ खारिज करने का अनुरोध किया।

जोधपुर/जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने कानूनी पेशे की पवित्रता, फर्जी अधिवक्ताओं की रोकथाम और एडवोकेट्स एक्ट के कड़े अनुपालन पर एक सख्त संदेश देते हुए बड़ा फैसला सुनाया है।

न्यायमूर्ति रवि चिरानिया की एकल पीठ ने निर्देश दिया कि यह ₹50,000 का हर्जाना एक माह के भीतर ‘राजस्थान हाईकोर्ट एडवोकेट क्लर्क एसोसिएशन’ के खाते में जमा कराया जाए।अदालत ने ट्रायल कोर्ट में खुद को वकील बताकर पैरवी करने और केस फाइल करने वाले एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज एफआईआर (FIR) को रद्द करने से साफ इनकार कर दिया। इसके साथ ही, अदालत का समय बर्बाद करने और झूठी याचिका दायर करने पर आरोपी पर ₹50,000 का हर्जाना (Costs) ठोका।

उच्च न्यायालय की प्रमुख टिप्पणियां व विधिक सिद्धांत

1. एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के तहत इनरोलमेंट अनिवार्य न्यायमूर्ति रवि चिरानिया ने 25 अगस्त के अपने आदेश में कड़ा रुख अपनाते हुए कहा: “अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) के प्रावधानों के तहत संबंधित राज्य बार काउंसिल में विधिवत पंजीकृत (Enrolled) हुए बिना किसी भी व्यक्ति को एक अधिवक्ता के रूप में वकालत करने या खुद को एक वकील के रूप में प्रस्तुत करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

2. अदालत के कड़े रुख पर याचिका वापस लेने की मांग से आरोप पुष्ट

  • सुनवाई के दौरान जब कोर्ट ने मामले की गंभीरता और रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों पर सख्त टिप्पणियां कीं, तो आरोपी के वकील ने याचिका वापस (Withdraw) लेने की अनुमति मांगी।
  • अदालत ने आदेश में दर्ज किया कि याचिकाकर्ता का यह आचरण एफआईआर में लगाए गए आरोपों की पुष्टि करता है।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (मकराना कोर्ट से दीवार फांदकर भागा था आरोपी)

  • कथित कृत्य: आरोपी ने निचली अदालतों (Trial Courts) में खुद को विधिवत वकील के रूप में प्रस्तुत किया था, विभिन्न मुकदमों में वकालत की और कई कानूनी दस्तावेज व आवेदन दाखिल किए थे।
  • अदालत परिसर से भागने की घटना: रिकॉर्ड के अनुसार, जब आरोपी एक ट्रायल कोर्ट में फर्जी वकील के रूप में पेश हो रहा था, तो स्थानीय वकीलों को उस पर शक हुआ और उन्होंने उसे पकड़ने की कोशिश की। आरोपी कोर्ट परिसर की दीवार फांदकर भाग निकला था।
  • एफआईआर दर्ज (31 मई 2025): इस घटना के बाद 31 मई 2025 को डीडवाना-कुचामन जिले के मकराना पुलिस थाने में आरोपी के खिलाफ धोखाधड़ी और प्रतिरूपण (Impersonation) की धाराओं में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी।

सुनवाई और वरिष्ठ अधिवक्ता की सहायता

  • याचिकाकर्ता की दलील: आरोपी के वकीलों (अधिवक्ता विनोद चौधरी और तेज सिंह बड़गुर्जर) ने तर्क दिया कि उसने कोई अपराध नहीं किया और उसने कभी खुद को वकील के रूप में पेश नहीं किया तथा ऐसा कोई कार्य नहीं किया जो केवल एक वकील ही कर सकता है।
  • वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद पुरोहित की राय: मामले की जमीनी हकीकत जानने के लिए हाईकोर्ट ने बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद पुरोहित से दोनों पक्षों के तथ्य सुनकर निष्पक्ष रिपोर्ट देने को कहा। वरिष्ठ अधिवक्ता ने तथ्यों की समीक्षा के बाद अदालत से कहा कि यह याचिका भारी जुर्माने के साथ खारिज किए जाने योग्य है।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश

  1. एफआईआर रद्द करने की याचिका खारिज: अदालत ने आपराधिक कार्यवाही में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए पुलिस जांच जारी रखने का मार्ग प्रशस्त किया।
  2. ₹50,000 की कॉस्ट: याचिकाकर्ता को एक महीने के भीतर राजस्थान हाईकोर्ट एडवोकेट क्लर्क एसोसिएशन में ₹50,000 जमा करने का निर्देश दिया गया।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: आपराधिक विविध याचिका (CrPC धारा 482 / BNSS धारा 528 – एफआईआर निरस्तीकरण)
  • प्रासंगिक कानून: अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) की धारा 29, 32 और धारा 45 (अनधिकृत रूप से वकालत करने पर दंड)
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ता (आरोपी) की ओर से: अधिवक्ता विनोद चौधरी और तेज सिंह बड़गुर्जर
    • राज्य की ओर से: लोक अभियोजक विक्रम सिंह राजपुरोहित
    • शिकायतकर्ता की ओर से: अधिवक्ता रामप्रकाश डूडी
    • न्यायमित्र / वरिष्ठ अधिवक्ता: वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद पुरोहित
  • पीठ: न्यायमूर्ति रवि चिरानिया (राजस्थान उच्च न्यायालय)

मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतराजस्थान उच्च न्यायालय
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति रवि चिरानिया (Justice Ravi Chirania)
संबंधित कानूनएडवोकेट्स एक्ट, 1961 (Advocates Act, 1961)
मुख्य मुद्दाबिना राज्य बार काउंसिल में पंजीकृत हुए खुद को वकील बताना और कोर्ट में पेश होना
अदालत का फैसलाFIR रद्द करने की याचिका खारिज, ₹50,000 का जुर्माना

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