Tuesday, October 27, 2026
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Let Him Repent: उन्हें पश्चाताप करने दीजिए; न्यायिक अधिकारी हाईकोर्ट पर चिल्ला नहीं सकता, यह घोर अनुशासनहीनता है, जज पर सुप्रीम टिप्पणी पढ़ें

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और कड़े सवाल

  • वकील की दलील: अधिकारी के वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने दलील दी कि अधिकारी ने गुस्से में नहीं, बल्कि माइक दूर होने के कारण आवाज ऊंची की थी। उन्होंने यह भी बताया कि अधिकारी ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) दे दी है, लेकिन उन्हें 3 महीने का नोटिस पीरियड उस नक्सल प्रभावित इलाके में काटना पड़ेगा।
  • सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी: शीर्ष अदालत ने अवमानना कार्यवाही और ट्रांसफर आदेश पर रोक लगाने से साफ इनकार कर दिया:

“उन्हें पछतावा करने दीजिए। यह अत्यंत अनुशासनहीनता है। एक न्यायिक अधिकारी को हाईकोर्ट पर चिल्लाने का कोई अधिकार नहीं है। यदि आप इतने गर्म दिमाग के हैं, तो आप न्यायिक सेवा के योग्य नहीं हैं। जब कोई IAS अधिकारी भी कोर्ट आता है तो वह आवाज उठाने की हिम्मत नहीं करता।” — सुप्रीम कोर्ट

  • अंतिम निर्देश: पीठ ने बॉम्बे हाईकोर्ट को नोटिस जारी किया है और निर्देश दिया है कि सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई (28 सितंबर 2026) तक हाईकोर्ट अवमानना मामले में कोई अंतिम फैसला (Final Decision) न सुनाए।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे उच्च न्यायालय की खुली अदालत में कथित तौर पर आक्रामक लहजे में चिल्लाने और अदालती प्रशासन पर आरोप मढ़ने वाले महाराष्ट्र के एक वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी दिलीप एस. घुमरे के खिलाफ शुरू की गई आपराधिक अवमानना (Contempt of Court) कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया है।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने न्यायिक अधिकारी की विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए बॉम्बे उच्च न्यायालय प्रशासन को नोटिस जारी किया है। हालांकि, अदालत ने अवमानना आदेश पर रोक लगाने से इनकार करते हुए निर्देश दिया कि अगली सुनवाई तक बॉम्बे हाईकोर्ट अवमानना मामले में कोई अंतिम फैसला न ले। शीर्ष अदालत ने न्यायिक अधिकारी के आचरण को “घोर अनुशासनहीनता” (Gross Indiscipline) करार देते हुए कहा कि कोई भी न्यायिक अधिकारी उच्च न्यायालय के समक्ष चिल्लाने का दुस्साहस नहीं कर सकता [दिलीप एस. घुमरे बनाम बॉम्बे उच्च न्यायालय एवं अन्य]।

सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख विधिक व मौखिक टिप्पणियां

1. न्यायिक अनुशासनहीनता पर सख्त रुख याचिकाकर्ता द्वारा अवमानना कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग को खारिज करते हुए खंडपीठ ने तल्ख टिप्पणी की: “उन्हें पश्चाताप करने दीजिए (Let him repent)। यह घोर अनुशासनहीनता है। एक न्यायिक अधिकारी हाईकोर्ट पर इस तरह नहीं चिल्ला सकता। जब एक आईएएस अधिकारी भी अदालत में आता है, तो वह भी अपनी आवाज ऊंची करने की हिम्मत नहीं करता।”

2. गुस्से और इस्तीफे पर अदालत का सवाल जब पीठ को बताया गया कि अधिकारी ने घटना के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS / Resignation) का आवेदन दे दिया है, तो पीठ ने कहा: “आपने इस्तीफा क्यों दिया? अगर आपका इतना दिमाग खराब है (If you are so hot-headed), तो आप न्यायिक सेवा के लिए उपयुक्त नहीं हैं। उचित रास्ता यह था कि आप अदालत के समक्ष बिना शर्त माफी (Unconditional Apology) मांगते।”

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मामले की पृष्ठभूमि (1 सितंबर का बॉम्बे हाईकोर्ट वाकया)

  • विवाद का केंद्र (फास्ट ट्रैक कोर्ट्स में 179 पद): 1 सितंबर 2026 को बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति ए.एस. गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खाता की खंडपीठ फास्ट ट्रैक कोर्ट्स के लिए 179 नए पदों की रिक्तियों से संबंधित हलफनामे की समीक्षा कर रही थी।
  • खुली अदालत में तीखी बहस: कोर्ट में मौजूद न्यायिक अधिकारी दिलीप एस. घुमरे से जब स्थिति स्पष्ट करने को कहा गया, तो हाईकोर्ट ने दर्ज किया कि उन्होंने शांत रहने के बजाय बेहद आक्रामक और ऊंची आवाज (Bordering to Shouting) में बोलना शुरू कर दिया और भरी अदालत में यह कह दिया कि “179 पदों को न भरने के लिए हाईकोर्ट प्रशासन ही जिम्मेदार है।”
  • प्रत्यक्ष अवमानना (Ex-Facie Contempt): हाईकोर्ट ने माना कि सार्वजनिक रूप से ऐसा अमर्यादित और आक्रामक व्यवहार न्यायपालिका की गरिमा और अधिकार को कमतर (Lowering Authority) करने वाला है, जो संविधान के अनुच्छेद 215 और न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c) के तहत सीधे तौर पर आपराधिक अवमानना है। इसके बाद हाईकोर्ट ने कारण बताओ नोटिस जारी किया।
  • अगले दिन ट्रांसफर और वीआरएस: घटना के तुरंत बाद अधिकारी का तबादला लगभग 1,000 किलोमीटर दूर एक कथित नक्सल प्रभावित क्षेत्र में कर दिया गया। इसके बाद अधिकारी ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

सुप्रीम कोर्ट में दोनों पक्षों की दलीलें

  • याचिकाकर्ता (जज घुमरे) की ओर से — वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह
    • दलील दी गई कि अधिकारी चिल्ला नहीं रहे थे, बल्कि चूंकि वे माइक के पास खड़े नहीं थे, इसलिए अपनी बात पहुंचाने के लिए केवल आवाज ऊंची की थी।
    • घटना के अगले ही दिन अधिकारी को 1,000 किमी दूर नक्सल क्षेत्र में ट्रांसफर कर दिया गया, जहां उन्हें नोटिस पीरियड के 3 महीने सेवा देनी होगी।
    • उन्होंने हाईकोर्ट के समक्ष माफी भी मांग ली थी, इसलिए अवमानना कार्यवाही पर रोक लगाई जानी चाहिए और उन्हें इस्तीफा वापस लेने की छूट दी जानी चाहिए।
  • सुप्रीम कोर्ट का रुख: अदालत ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों से सर्वोच्च संयम और गरिमा की अपेक्षा की जाती है। हालांकि, हाईकोर्ट को अवमानना मामले में अंतिम फैसला सुरक्षित रखने को कहते हुए मामले की अगली सुनवाई 28 सितंबर 2026 तय कर दी।

विधिक विवरण

  • केस शीर्षक: दिलीप एस. घुमरे बनाम बॉम्बे उच्च न्यायालय एवं अन्य
  • प्रासंगिक प्रावधान: संविधान का अनुच्छेद 215, न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c)
  • याचिकाकर्ता की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह
  • पीठ: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता
  • अगली सुनवाई: 28 सितंबर 2026

Let Him Repent:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठन्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता
याचिकाकर्ता अधिकारीदिलीप एस. घुमारे (वरिष्ठ न्यायिक अधिकारी, महाराष्ट्र)
विवाद का कारणबॉम्बे हाईकोर्ट में बहस के दौरान तेज आवाज में बोलने और हाईकोर्ट प्रशासन पर आरोप लगाने पर अवमानना नोटिस।
सुप्रीम कोर्ट का आदेशअवमानना पर रोक से इनकार; हालांकि अगली सुनवाई (28 सितंबर 2026) तक हाईकोर्ट को अंतिम फैसला न लेने का निर्देश।
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