Tuesday, September 15, 2026
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Surviving Spouse: पति की मृत्यु के बाद भ्रूण नष्ट करने के बजाय उपयोग करने की मंशा; जीवित पत्नी की मातृत्व इच्छा सर्वोपरि, विधवा को फ्रोजन भ्रूण सौंपे

हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी तर्क

  • अस्पताल की लापरवाही और नियमावली का उल्लंघन: हाईकोर्ट ने पाया कि ART Rules के तहत निर्धारित आधिकारिक ‘Form 9’ में यह स्पष्ट विकल्प होता है कि किसी एक जीवनसाथी की मृत्यु के स्थिति में भ्रूण जीवित जीवनसाथी (Surviving Spouse) को सौंपा जा सकता है। अस्पताल ने यह फॉर्म उपलब्ध न कराकर अपनी गलती की थी।
  • पति की अनुमानित सहमति (Inferred Consent): अदालत ने माना कि चूंकि पति ने ‘नष्ट करने’ के बजाय ‘उपयोग करने’ का विकल्प चुना था, इससे स्पष्ट होता है कि उनकी मंशा भ्रूण के वास्तविक उपयोग की थी।“मृतक की ‘अनुमानित सहमति’ और माता-पिता बनने में ‘साथी के हित’ को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए। जैसा कि पाया गया है, मृतक का इरादा भ्रूण के ‘वास्तविक उपयोग’ को सुनिश्चित करना था, और इसलिए, याचिकाकर्ता-पत्नी की माता-पिता बनने की इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए।”केरल हाईकोर्ट
  • मातृत्व का अधिकार (Right to Parenthood): अदालत ने कहा कि केवल इसलिए एक महिला के माँ बनने के अधिकार को छीना नहीं जा सकता क्योंकि अस्पताल प्रक्रियागत फॉर्म सही तरीके से भरवाने में विफल रहा।

कोच्चि/तिरुवनंतपुरम: केरल हाईकोर्ट ने सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (ART) विनियमन कानून, प्रजनन स्वायत्तता (Reproductive Autonomy) और मातृत्व के मौलिक अधिकार पर एक अत्यंत संवेदनशील और प्रगतिशील फैसला सुनाया है।

न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन की एकल पीठ ने 1 सितंबर 2026 के अपने आदेश में तिरुवनंतपुरम स्थित आईवीएफ अस्पताल को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता 43 वर्षीय विधवा को उसके मृत पति के संरक्षित भ्रूण (Frozen Embryos) सहायक प्रजनन उपचार के लिए तत्काल सौंपे। अदालत ने स्पष्ट किया है कि पति की मृत्यु के बाद उसके क्रायोप्रिजर्व्ड (सुरक्षित रखे गए) भ्रूण के उपयोग के मामले में ‘मृतक की अनुमानित सहमति’ (Inferred Consent) और ‘जीवित साथी की माता-पिता बनने की इच्छा’ सबसे महत्वपूर्ण कारक हैं। अस्पताल द्वारा वैधानिक नियमों के विपरीत त्रुटिपूर्ण सहमति फॉर्म भरवाने की प्रशासनिक गलती के कारण एक विधवा को मां बनने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां

1. अनुमानित सहमति (Inferred Consent) और मातृत्व की इच्छा प्रजनन अधिकारों और मृतक की वास्तविक मंशा का विश्लेषण करते हुए न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन ने कहा: “यह विशेष रूप से पाया गया है कि इस मामले में ‘मृतक की अनुमानित सहमति’ (Deceased’s Inferred Consent) और माता-पिता बनने में ‘साथी की रुचि’ (Partner’s Interest) ही अत्यधिक विचारणीय विषय हैं। जैसा कि रिकॉर्ड से स्पष्ट है, मृतक की मंशा भ्रूण को नष्ट करने के बजाय उसका ‘वास्तविक उपयोग’ सुनिश्चित करने की थी। इसलिए, याचिकाकर्ता-पत्नी की माता-पिता बनने की इच्छा का पूर्ण सम्मान किया जाना चाहिए।”

2. अस्पताल द्वारा विहित प्रारूप ‘फॉर्म 9’ का उल्लंघन

  • अदालत ने पाया कि सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (विनियमन) नियमावली, 2021 (ART Rules) के तहत भ्रूण को फ्रीज करने के लिए ‘फॉर्म 9’ निर्धारित है, जिसमें एक अनिवार्य विकल्प यह होता है कि किसी एक जीवनसाथी की मृत्यु की स्थिति में भ्रूण जीवित जीवनसाथी (Surviving Spouse) को सौंप दिया जाए।
  • अस्पताल ने वैधानिक ‘फॉर्म 9’ देने के बजाय अपनी मनमर्जी का एक अलग सहमति फॉर्म दिया, जिसमें केवल तीन विकल्प थे:
    1. भ्रूण किसी अज्ञात जोड़े को दे दिया जाए,
    2. भ्रूण का उपयोग चिकित्सा अनुसंधान (Research) के लिए हो, अथवा
    3. भ्रूण को नष्ट (Destroy) कर दिया जाए।
  • पति ने नष्ट करने के बजाय भ्रूण के “उपयोग” (अज्ञात जोड़े को देने) का विकल्प चुना था, जिससे सिद्ध होता है कि वह भ्रूण को जीवित रखने और उपयोग करने के पक्ष में था। यदि जीवित पत्नी को सौंपने का विकल्प उपलब्ध होता, तो वह निश्चित रूप से वही चुनता।

3. अपनी गलती का लाभ नहीं उठा सकता अस्पताल

  • कोर्ट ने माना कि अस्पताल की अपनी विफलता और प्रक्रियात्मक चूक के कारण पत्नी के वैध प्रजनन अधिकार को नहीं छीना जा सकता।

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (तिरुवनंतपुरम का मामला)

  • उपचार व क्रायोप्रिजर्वेशन: 43 वर्षीय याचिकाकर्ता और उसके पति ने तिरुवनंतपुरम के एक निजी अस्पताल में बांझपन निवारण हेतु आईवीएफ (IVF) प्रक्रिया शुरू की थी। इस दौरान उनके भ्रूण तैयार कर क्रायोप्रिजर्व (Cryopreserved) किए गए।
  • पति का निधन: उपचार पूरा होने से पहले ही पति का असामयिक निधन हो गया।
  • अस्पताल का इनकार: पति की मृत्यु के बाद जब विधवा ने मातृत्व हेतु संरक्षित भ्रूण के उपयोग की मांग की, तो अस्पताल और केंद्र सरकार ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि ART अधिनियम, 2021 की धारा 22(1)(a) के तहत पति की कोई स्पष्ट लिखित सहमति नहीं है जिसमें भ्रूण पत्नी को सौंपने का उल्लेख हो।
  • हाईकोर्ट में रिट: अस्पताल के इस रुख के खिलाफ महिला ने अधिवक्ता क्लारा शेरिन फ्रांसिस के माध्यम से केरल हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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केंद्र सरकार व अस्पताल का विरोध खारिज

  • विरोध का तर्क: अस्पताल और केंद्र सरकार के वकील ने दलील दी कि पति ने सहमति पत्र में भ्रूण अज्ञात जोड़े को दान करने का विकल्प चुना था, इसलिए पत्नी को भ्रूण सौंपना मृतक की अंतिम इच्छा के विपरीत होगा।
  • अदालत का निष्कर्ष: हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि जब अस्पताल ने जीवित पत्नी को भ्रूण सौंपने का विहित वैधानिक विकल्प फॉर्म में दिया ही नहीं था, तो पति के पास सीमित विकल्पों में से चुनने की मजबूरी थी। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है कि पति अपनी पत्नी को मां बनने से रोकना चाहता था।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश

  1. याचिका मंजूर: उच्च न्यायालय ने विधवा की रिट याचिका को पूरी तरह स्वीकार किया।
  2. भ्रूण सौंपने का निर्देश: अस्पताल को निर्देश दिया गया कि वह क्रायोप्रिजर्व्ड भ्रूण को याचिकाकर्ता महिला को सौंपे ताकि वह सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (ART) के माध्यम से गर्भधारण की प्रक्रिया को आगे बढ़ा सके।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: सिविल रिट याचिका (ART अधिनियम के तहत फ्रोजन भ्रूण के उपयोग की मांग)
  • प्रासंगिक कानून: सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (विनियमन) अधिनियम, 2021 (ART Act) की धारा 22(1)(a); ART नियमावली, 2021 का फॉर्म 9; भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (प्रजनन स्वायत्तता एवं मातृत्व का अधिकार)
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ता (विधवा) की ओर से: अधिवक्ता क्लारा शेरिन फ्रांसिस
    • केंद्र सरकार एवं राष्ट्रीय एआरटी/सरोगेसी बोर्ड की ओर से: अधिवक्ता के. अर्जुन वेणुगोपाल
    • राज्य सरकार की ओर से: शासकीय अधिवक्ता दिनेश थंकप्पन
  • पीठ: न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन (केरल उच्च न्यायालय)

Surviving Spouse: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकेरल उच्च न्यायालय (Kerala High Court)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन (Justice Harishankar V Menon)
संबंधित कानूनसहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (विनियमन) अधिनियम, 2021 (ART Act, Section 22 & Form 9)
मुख्य मुद्दाक्या पति की मृत्यु के बाद पत्नी को IVF के लिए पहले से संरक्षित (Cryopreserved) भ्रूण का उपयोग करने का अधिकार है?
अदालत का फैसलायाचिका स्वीकार; अस्पताल को निर्देश दिया गया कि वह फ्रोजन भ्रूण महिला को सौंपे ताकि वह मातृत्व प्राप्त कर सके।
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