हाईकोर्ट का फैसला और मुख्य कानूनी सिद्धांत
1.1. पूर्व में स्वीकार की गई बात से मुकरना गैर-कानूनी:Supreme Court Precedent: LIC vs Sanjeev Builders (2022).
अदालत ने कहा कि कोई भी पक्ष ऐसा संशोधन (Amendment) नहीं कर सकता, जिससे वह पहले दी गई अपनी ही स्पष्ट स्वीकारोक्ति (Clear Admission) को वापस ले ले और इससे दूसरे पक्ष (बहनों) का कानूनी अधिकार छिन जाए।
2.2. बेटियों का हक सुरक्षित रखा गया:Mother’s Estate Devolution.
मां का मालिकाना हक (Absolute Ownership) बने रहने का मतलब है कि उनकी मृत्यु के बाद उनकी संपत्ति का हिस्सा भाइयों और बहनों में बराबर बांटा जाएगा।
3.3. वसीयत की प्रामाणिकता साबित करने की छूट:Order VIII Rule 1(A) CPC.
हाईकोर्ट ने भाइयों द्वारा दाखिल की गई अर्जी रद्द कर दी, लेकिन उन्हें छूट दी कि वे अलग से नई अर्जी देकर पिता की मूल वसीयत को कोर्ट के समक्ष साबित (Prove Authenticity) कर सकते हैं।
मामले में दो मुख्य अंतर: Absolute Ownership बनाम Life Interest
- पूर्ण अधिकार (Absolute Ownership): जब संपत्ति का पूरा मालिकाना हक किसी व्यक्ति को मिलता है। उसकी मृत्यु के बाद वह संपत्ति उसके सभी कानूनी वारिसों (बेटे व बेटियों) में बराबर बंटती है।
- जीवनकाल हित (Life Interest): व्यक्ति केवल जीवित रहने तक संपत्ति का इस्तेमाल/आय ले सकता है, लेकिन उसे बेचने का हक नहीं होता। मृत्यु के बाद संपत्ति पहले से तय व्यक्ति (जैसे केवल बेटों) को मिलती है।
अदालत का निष्कर्ष: न्यायमूर्ति वी. सुजाता ने फैसला सुनाते हुए ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द कर दिया और माना कि भाइयों का यह कदम बहनों को जायदाद से बेदखल करने की नीयत से उठाया गया था, जिसे कानून की अनुमति नहीं दी जा सकती।
अमरावती: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश VI नियम 17 (अभिवचनों में संशोधन / Amendment of Pleadings), आदेश VIII नियम 1A (अतिरिक्त दस्तावेज प्रस्तुत करना) और न्यायिक स्वीकृतियों को वापस लेने पर रोक के विधिक सिद्धांतों पर एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है।
न्यायमूर्ति वी. सुजाता की एकल पीठ ने बेटियों (बहनों) द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिकाओं को स्वीकार करते हुए निचली अदालत के उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसने दो भाइयों को अपनी दिवंगत मां के मूल हलफनामे (Counter-Affidavit) में संशोधन करने की अनुमति दी थी। इस संशोधन के जरिए बेटे अपनी मां के ‘पूर्ण स्वामित्व’ (Absolute Ownership) को ‘सीमित जीवन हित’ (Life Interest) में बदलकर बहनों को संपत्ति से बेदखल करने का प्रयास कर रहे थे। अदालत ने फैसला दिया है कि किसी पक्षकार द्वारा अपने जीवनकाल में दिए गए स्पष्ट बयानों या लिखित स्वीकृतियों (Judicial Admissions), जिसने विरोधी पक्षकार के पक्ष में वैधानिक अधिकार या कानूनी बचाव (Valid Defence) सृजित कर दिया हो, उसकी मृत्यु के बाद उसके कानूनी वारिसों द्वारा संशोधन के जरिए वापस नहीं लिया जा सकता [सिविल रिवीजन याचिका सं. 2580 एवं 2581/2023]।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं टिप्पणियां
1. अधिकार सृजित करने वाली न्यायिक स्वीकृति को वापस लेने पर पूर्ण रोक सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले एलआईसी बनाम संजीव बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड (2022 के सिद्धांतों को लागू करते हुए न्यायमूर्ति वी. सुजाता ने रेखांकित किया: “यदि किसी पक्षकार द्वारा अभिवचन में किया गया संशोधन किसी ऐसी स्पष्ट स्वीकृति (Clear Admission) को वापस लेने के उद्देश्य से लाया गया है जिसने विरोधी पक्ष को विधिक अधिकार प्रदान किया है, तो ऐसे संशोधन की अनुमति नहीं दी जा सकती। संशोधन के माध्यम से दूसरी पार्टी को अपने वैध बचाव (Valid Defence) से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। संशोधन केवल वहीं अनुमत होते हैं जो विवाद के वास्तविक प्रश्न के निर्धारण के लिए आवश्यक हों, बशर्ते इससे विरोधी पक्ष के साथ अन्याय या पूर्वाग्रह न हो।”
2. बहनों को बेदखल करने और हिस्से के स्वरूप को बदलने की चाल अमान्य
- अदालत ने संज्ञान लिया कि मां (प्रतिवादी सं. 1) ने अपने जीवनकाल में अदालत में दर्ज कराया था कि पिता की वसीयत के अनुसार संपत्तियां और सावधि जमा (FDs) उन्हें ‘पूर्ण रूप से’ (Absolutely) दी गई थीं। पूर्ण स्वामित्व होने के कारण मां के निधन पर हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत उनके सभी बेटे-बेटियों को बराबर हिस्सा मिलना तय था।
- भाइयों द्वारा चाहा गया संशोधन मां के पूर्ण स्वामित्व को समाप्त कर केवल ‘जीवन हित’ (Life Interest without power of alienation) में सीमित कर रहा था, ताकि मां के बाद शेष निहित अधिकार (Vested Remainder Rights) सीधे दोनों भाइयों को मिल जाएं और बहनें पूरी तरह बाहर हो जाएं। अदालत ने इसे बहनों के अधिकारों पर गंभीर कुठाराघात मानते हुए अवैध करार दिया।
3. वसीयत पेश करने की छूट बरकरार (ऑर्डर VIII नियम 1A CPC)
- अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि स्वीकृतियों को पलटने वाले संशोधन को खारिज किया गया है, लेकिन भाइयों को 18 जनवरी 2019 की मूल वसीयत को रिकॉर्ड पर पेश करने के लिए ट्रायल कोर्ट में नई अर्जी दाखिल करने की स्वतंत्रता होगी।
- सुप्रीम कोर्ट के फैसले सुगंधी (मृत) विधिक प्रतिनिधि बनाम पी. राजकुमार का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि मात्र संदेह के आधार पर किसी दस्तावेज को रिकॉर्ड पर लेने से नहीं रोका जा सकता; वसीयत असली है या फर्जी, इसका फैसला गवाहों के परीक्षण और जिरह (Cross-examination) के बाद मेरिट पर तय होगा।
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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (गद्दे वेंकटेश्वर राव का संपत्ति विवाद)
- पारिवारिक पृष्ठभूमि: स्वर्गीय गद्दे वेंकटेश्वर राव का 27 मार्च 2019 को निधन हुआ। उनके परिवार में उनकी पत्नी (प्रतिवादी सं. 1), दो बेटे (प्रतिवादी सं. 2 व 3) और चार बेटियां (एक मृत बेटी के वारिसों सहित) थीं।
- बहनों का विभाजन वाद (Partition Suit): जीवित बेटियों ने 2019 में विभाजन का मुकदमा (O.S. No. 92/2019) दायर कर दावा किया कि पिता की मृत्यु बिना वसीयत (Intestate) हुई है, इसलिए सभी 7 वारिसों को संपत्ति और बैंक जमा में 1/7वां बराबर हिस्सा मिलना चाहिए।
- मां का अदालत में बयान: मां ने 18 जनवरी 2019 की एक वसीयत का हवाला देते हुए अदालत में जवाब दाखिल किया कि उनके दिवंगत पति ने ‘A’ शेड्यूल की संपत्तियां और सावधि जमा उन्हें ‘पूर्ण रूप से’ (Absolutely) सौंपे थे।
- मां के निधन के बाद बेटों की पैंतरेबाजी:
- मां के निधन के तुरंत बाद, दोनों भाइयों ने ट्रायल कोर्ट में अर्जी (I.A. No. 156/2020) देकर मां के मूल काउंटर-हलफनामे के पृष्ठ 6 से उन पंक्तियों को हटाने की मांग की जहां ‘पूर्ण स्वामित्व’ दर्ज था।
- इसके स्थान पर वे यह जोड़ना चाहते थे कि मां को केवल जीवन पर्यंत उपयोग का सीमित अधिकार था और उनकी मृत्यु के बाद सारी अचल संपत्ति केवल दोनों भाइयों (प्रतिवादी 2 और 3) की होगी।
- ट्रायल कोर्ट बनाम हाईकोर्ट: ट्रायल कोर्ट ने 7 अगस्त 2023 को भाइयों की संशोधन अर्जी स्वीकार कर ली थी। इसके खिलाफ बहनों ने आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में सिविल रिवीजन पिटीशन दाखिल की।
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
- ट्रायल कोर्ट का संशोधन आदेश रद्द: उच्च न्यायालय ने निचली अदालत द्वारा संशोधन की अनुमति देने वाले 7 अगस्त 2023 के आदेश को पूरी तरह खारिज व निरस्त (Set aside) कर दिया।
- मां का मूल बयान बहाल: अदालत ने स्पष्ट किया कि मां द्वारा अपने जीवनकाल में दर्ज की गई स्वीकृति जस की तस रहेगी, जिससे संपत्ति में बेटियों के उत्तराधिकार का दावा सुरक्षित रहेगा।
- वसीयत दाखिल करने की नई छूट: भाइयों को छूट दी गई कि वे ऑर्डर VIII नियम 1A CPC के तहत 18 जनवरी 2019 की मूल वसीयत को रिकॉर्ड पर मंगवाने हेतु ट्रायल कोर्ट के समक्ष नई अर्जी लगा सकते हैं, जिस पर गुण-दोष के आधार पर विचार किया जाएगा।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: बहनें/बेटियां बनाम भाई एवं अन्य [Civil Revision Petition Nos. 2580 & 2581 of 2023]
- प्रासंगिक कानून: सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) का आदेश VI नियम 17 (संशोधन), आदेश VIII नियम 1A (दस्तावेज पेश करने की अनुमति), धारा 115 (पुनरीक्षण अधिकारिता); भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 18 व 21 (पक्षकारों की स्वीकृतियां); हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14 व 15
- संबद्ध सर्वोच्च न्यायालय नजीरें:
- लाइफ इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (LIC) बनाम संजीव बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य — ‘स्वीकृति को वापस लेने और विरोधी पक्ष का वैध बचाव छीनने वाले संशोधनों की अस्वीकार्यता।’
- सुगंधी (मृत) विधिक प्रतिनिधि बनाम पी. राजकुमार — ‘सारवान न्याय सुनिश्चित करने हेतु तकनीकी बाधाओं से परे दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लेना।’
- पीठ: न्यायमूर्ति वी. सुजाता (आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय)
Absolute Ownership: मामले का संक्षिप्त विवरण (Case Background)
| पक्षकार | विवरण |
| पिता (Late Gadde Venkateswara Rao) | 27 मार्च 2019 को मृत्यु। पीछे 2 बेटे और 4 बेटियां छोड़ गए। |
| मां (1st Defendant) | जीवनकाल में कोर्ट में बयान दिया कि पति की वसीयत (18 Jan 2019) से संपत्ति पर उनका पूर्ण अधिकार (Absolute Right) है। |
| बेटे (Brothers) | मां की मृत्यु के बाद कोर्ट में अर्जी दी कि वसीयत में मां को सिर्फ उपयोग का अधिकार (Life Interest) था और उनके बाद संपत्ति सिर्फ बेटों की होगी। |
| बेटियां (Daughters) | ट्रायल कोर्ट के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की, ताकि बहनों का हक न छीना जा सके। |

