Tuesday, November 3, 2026
HomeConsumer NewsSuccession Act: जिन हिंदू महिलाओं के पति या बच्चे नहीं हैं, वे...

Succession Act: जिन हिंदू महिलाओं के पति या बच्चे नहीं हैं, वे विवादों से बचने के लिए तत्काल वसीयत बनाएं; स्व-अर्जित संपत्ति पर ससुराल मायके के झगड़ों को रोकने का यही उपाय

सुप्रीम कोर्ट के दो प्रमुख निर्देश

1.1. तुरंत वसीयत (Will) तैयार करें:धारा 30 – हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम.

महिलाएं अपनी उम्र का लिहाज किए बिना अपनी स्व-अर्जित संपत्ति के लिए भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम एवं HSA की धारा 30 के तहत कानूनी वसीयत बनाएं, ताकि संपत्ति मनचाहे व्यक्ति (माता-पिता या अन्य) को मिल सके।

2.2. विवाद की स्थिति में अनिवार्य मध्यस्थता:Pre-Litigation Mediation Mandatory.

यदि महिला की मृत्यु बिना वसीयत होती है और मायके पक्ष/माता-पिता संपत्ति पर दावा करते हैं, तो कोर्ट जाने से पहले अनिवार्य मध्यस्थता (Pre-Litigation Mediation) से गुजरना होगा। मध्यस्थता में हुआ समझौता कोर्ट की डिक्री माना जाएगा।

संवैधानिक चुनौती और कोर्ट का रुख

अधिवक्ता स्निधा मेहरा द्वारा दायर याचिका में धारा 15(1)(b) को अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन बताते हुए रद्द करने की मांग की गई थी। केंद्र सरकार (अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के.एम. नटराज) ने इसका विरोध करते हुए कहा कि पारिवारिक और सामाजिक ताने-बाने को ध्यान में रखकर यह व्यवस्था बनाई गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक ढांचे के संतुलन को ध्यान में रखते हुए धारा को रद्द करने के बजाय महिलाओं को वसीयत बनाने और मध्यस्थता अपनाने का व्यावहारिक समाधान दिया।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 (Hindu Succession Act, 1956) की धारा 15(1)(b) के तहत संपत्ति के वितरण, कामकाजी महिलाओं की स्व-अर्जित संपत्ति (Self-Acquired Property) और निसंतान अविवाहित/विधवा महिलाओं के उत्तराधिकार विवादों पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यावहारिक सलाह दी है।

न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने अधिवक्ता स्निग्धा मेहरा द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) का निस्तारण करते हुए यह महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए। इसके साथ ही पीठ ने यह भी अनिवार्य किया कि यदि ऐसी महिला बिना वसीयत के दिवंगत हो जाती है, तो अदालत में मुकदमा दायर करने से पहले पक्षों को अनिवार्य प्री-लिटिगेशन मध्यस्थता (Pre-litigation Mediation) से गुजरना होगा। शीर्ष अदालत ने देश की उन सभी हिंदू महिलाओं से अपील की है जिनके पति, पुत्र या पुत्री नहीं हैं, कि वे अपनी स्व-अर्जित और अन्य संपत्तियों के लिए भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के तहत तत्काल वसीयत (Will) निष्पादित करें, ताकि उनके निधन के बाद मायके (माता-पिता) और ससुराल पक्ष के बीच कटु कानूनी लड़ाइयों को रोका जा सके।

शीर्ष अदालत की प्रमुख विधिक टिप्पणियां एवं चिंताएं

1. महिलाओं की प्रगति और 1956 के वैधानिक प्रावधानों का अंतर्विरोध 1956 के सामाजिक परिवेश और आधुनिक समय में महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता की तुलना करते हुए न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना की पीठ ने टिप्पणी की: “संसद ने 1956 में जब हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम बनाया था, तब शायद यह मान लिया गया था कि महिलाओं के पास अपनी कोई स्व-अर्जित संपत्ति नहीं होगी। लेकिन पिछले दशकों में महिलाओं की प्रगति को कम करके नहीं आंका जा सकता। शिक्षा, रोजगार और उद्यमिता के कारण आज हिंदू महिलाएं बड़े पैमाने पर स्व-अर्जित संपत्ति अर्जित कर रही हैं। यदि ऐसी स्व-अर्जित संपत्तियां किसी महिला की बिना पति, पुत्र या पुत्री के मृत्यु होने पर केवल पति के वारिसों (ससुराल पक्ष) को हस्तांतरित होती हैं, तो यह स्वाभाविक रूप से उसके मायके/मातृ परिवार (Maternal Family) के लिए गहरी मानसिक पीड़ा (Heartburn) का कारण बनती हैं।”

2. सभी महिलाओं से वसीयत बनाने की खुली अपील पीठ ने स्पष्ट विधिक संदेश देते हुए कहा:

  • अदालत अपील करती है कि वे सभी महिलाएं, विशेष रूप से हिंदू महिलाएं, जिनकी स्थिति धारा 15(1) के अंतर्गत आती है, वे हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 30 सहपठित भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम के तहत अपनी संपत्तियों (विशेषकर स्व-अर्जित संपत्तियों) के संबंध में तत्काल वसीयत/वसीयतनामा तैयार करने के कदम उठाएं।
  • ऐसा करना न केवल महिलाओं के हितों की रक्षा करेगा, बल्कि भविष्य में होने वाली अंतहीन मुकदमों की बाढ़ को भी रोकेगा।

Also Read; Absolute Ownership: मां की मृत्यु के बाद भाई नहीं बदल सकते पिता की वसीयत; वसीयत की व्याख्या बदलकर बहनों का पैतृक हक छीनने वाला संशोधन अवैध

संपत्ति विवादों में ‘अनिवार्य प्री-लिटिगेशन मध्यस्थता’ का निर्देश

अदालत ने भविष्य के पारिवारिक मुकदमों को रोकने के लिए एक बाध्यकारी प्रक्रियागत निर्देश जारी किया:

  • मुकदमे से पहले मध्यस्थता अनिवार्य: यदि कोई हिंदू महिला बिना वसीयत के (Intestate) मर जाती है और उसके माता-पिता या उनके वारिस [धारा 15(1)(c), (d), (e)] संपत्ति पर दावा करते हैं (जहां धारा 15(2) लागू नहीं होती), तो किसी भी दीवानी अदालत में मुकदमा दायर करने से पहले पक्षों को प्री-लिटिगेशन मध्यस्थता (Pre-litigation Mediation) में जाना अनिवार्य होगा।
  • अदालती डिक्री का दर्जा: मध्यस्थता के दौरान दोनों पक्षों (मायके और ससुराल) के बीच जो भी औपचारिक समझौता (Settlement) होगा, उसे कानूनन सक्षम अदालत की अंतिम डिक्री (Decree of the Court) के रूप में मान्यता दी जाएगी।

कानूनी विवाद की पृष्ठभूमि: धारा 15(1)(b) की विधिक विसंगति

  • याचिकाकर्ता की दलील: अधिवक्ता स्निग्धा मेहरा ने जनहित याचिका में हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 15(1)(b) को संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (लिंग आधारित भेदभाव पर रोक) और अनुच्छेद 21 के उल्लंघन के आधार पर असंवैधानिक घोषित करने की मांग की थी।
  • धारा 15(1) का मौजूदा क्रम: * (a) पुत्र, पुत्री और पति;
    • (b) पति के वारिस (Heirs of the Husband);
    • (c) माता और पिता;
    • (d) पिता के वारिस;
    • (e) माता के वारिस।
  • मायके की उपेक्षा: मौजूदा कानून के तहत यदि महिला के बच्चे या पति जीवित नहीं हैं, तो उसकी मेहनत से खरीदी गई संपत्ति उसके जन्म देने वाले माता-पिता को मिलने के बजाय सीधे उसके पति के दूर के रिश्तेदारों/ससुराल वालों के पास चली जाती है।
  • केंद्र सरकार का रुख: अपर सॉलिसिटर जनरल (ASG) के.एम. नटराज ने जनहित याचिका का विरोध करते हुए कहा कि 1956 का यह कानून ऐतिहासिक सामाजिक ताने-बाने पर आधारित है और इसे जनहित याचिका के जरिए चुनौती नहीं दी जानी चाहिए, बल्कि प्रभावित पक्षों द्वारा ही उठाया जाना चाहिए।
  • समाजिक संतुलन की रक्षा: अदालत ने पूर्व टिप्पणियों को दोहराया कि यद्यपि महिलाओं के अधिकार सर्वोपरि हैं, लेकिन हजारों वर्षों से चली आ रही सामाजिक व्यवस्था और कानूनी अधिकारों के बीच संतुलन बनाना आवश्यक है।

विधिक विवरण

  • प्रासंगिक कानून: हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 15(1)(b), 15(2) (विरासत में मिली संपत्ति के अपवाद), धारा 16 एवं धारा 30 (वसीयत निष्पादित करने का वसीयती अधिकार); भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 63; मध्यस्थता अधिनियम, 2023 (Mediation Act, 2023); भारत का संविधान – अनुच्छेद 14, 15, 21 एवं अनुच्छेद 32
  • विधिक प्रतिनिधित्व: * याचिकाकर्ता की ओर से: अधिवक्ता स्निग्धा मेहरा
    • केंद्र सरकार की ओर से: अपर सॉलिसिटर जनरल (ASG) के.एम. नटराज
  • पीठ: न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन (सर्वोच्च न्यायालय)

Succession Act: विवाद का मुख्य विषय (Section 15(1)(b) vs Section 15(1)(c))

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के मौजूदा नियमों के अनुसार यदि किसी हिंदू महिला की मृत्यु बिना वसीयत (Intestate) के हो जाती है और उनके पति या बच्चे नहीं हैं, तो संपत्ति का हस्तांतरण इस क्रम में होता है:

उत्तराधिकार की श्रेणीकिसे प्राथमिकता मिलती है?कानून का प्रभाव
धारा 15(1)(b)पति के वारिस (Heirs of Husband)महिला की संपत्ति सबसे पहले उसके ससुराल पक्ष/पति के वारिसों को मिलती है।
धारा 15(1)(c) & (d)महिला के माता-पिता (Parents)माता-पिता या मायके पक्ष का नंबर ससुराल पक्ष के बाद आता है।

अदालत की टिप्पणी: 1956 में कानून बनाते समय संसद ने संभवतः यह कल्पना नहीं की थी कि महिलाओं के पास अपनी कमाई की संपत्ति (Self-Acquired Property) होगी। यदि महिला की कमाई ससुराल पक्ष को जाती है, तो मायके पक्ष को दुख होना स्वाभाविक है।

RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
clear sky
23.7 ° C
23.7 °
23.7 °
74 %
2.7kmh
0 %
Tue
24 °
Wed
30 °
Thu
30 °
Fri
29 °
Sat
29 °

Recent Comments