अदालत की मुख्य तीखी टिप्पणियां
- “PIL की फैक्ट्री खोल रखी है”:सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति नरसिम्हा ने याचिकाकर्ता वकील के ढर्रे पर सवाल उठाते हुए कहा:“आप हर हफ्ते एक PIL दाखिल करते हैं। आप किस तरह की याचिकाएं ड्राफ्ट करते हैं? आपने इसे फैक्ट्री बना दिया है। जैसे ही आप कोई खबर देखते हैं, याचिका ड्राफ्ट कर देते हैं। अपनी मांगों (Prayers) को देखें, क्या आप कभी दिमाग लगाते हैं?”
- पब्लिसिटी स्टंट पर प्रहार:पीठ ने पूछा कि क्या ऐसी याचिकाएं केवल लोकप्रियता या विज्ञापन के उद्देश्य से दाखिल की जाती हैं:“सिर्फ इसलिए कि रिट याचिका दाखिल करना आसान है और कोई भी आकर पब्लिसिटी पा सकता है, आप ऐसा क्यों करते हैं? इस तरह नियमित रूप से याचिकाओं का ढेर हमारे सामने मत लगाइए।”
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने प्रचार-प्रसार (Publicity) और सुर्खियां बटोरने के उद्देश्य से बिना गहन शोध व कानूनी मस्तिष्क के प्रयोग के अंधाधुंध जनहित याचिकाएं (Public Interest Litigation – PIL) दाखिल करने की प्रवृत्ति पर कड़ा ऐतराज जताया है।
न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ ने 16 सितंबर 2026 को मामले की सुनवाई करते हुए वकीलों द्वारा नियमित आधार पर गैर-गंभीर जनहित याचिकाएं दायर कर न्यायिक समय बर्बाद करने की बढ़ती प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता व्यक्त की। शीर्ष अदालत ने देश में कथित फर्जी और जाली मेडिकल डिग्रियों (Fake & Forged Medical Degrees) के मुद्दे पर मेडिकल नियमों के ऑडिट और एक विशेषज्ञ समिति के गठन की मांग को लेकर एक वकील द्वारा व्यक्तिगत रूप से (Party-in-person) दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए याचिकाकर्ता को कड़ी फटकार लगाई।
शीर्ष अदालत की तीखी मौखिक टिप्पणियां
1. ‘आपने याचिकाओं की फैक्ट्री बना रखी है’ याचिका के मसौदे और बार-बार जनहित याचिकाएं दायर करने के ढर्रे पर भड़कते हुए न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा ने याचिकाकर्ता वकील से कहा: “आप हर हफ्ते एक पीआईएल (PIL) दाखिल करते हैं। आप किस तरह की याचिकाएं ड्राफ्ट कर रहे हैं? आपने इसे एक फैक्ट्री बना दिया है। आप समाचार देखते ही तुरंत याचिका का मसौदा तैयार कर लेते हैं। अपनी प्रार्थनाओं (Prayers) को देखिए—क्या आप कभी याचिका का ड्राफ्ट तैयार करते समय अपने न्यायिक मस्तिष्क का प्रयोग (Application of mind) भी करते हैं?”
2. सस्ता प्रचार और लोकप्रियता पाने की कोशिश पर फटकार
- पीठ ने सवाल किया कि क्या ऐसी याचिकाएं केवल समाचारों में नाम चमकाने या मुफ्त विज्ञापन के लिए दाखिल की जा रही हैं:“सिर्फ इसलिए कि एक रिट याचिका दायर करना बहुत आसान है और कोई भी इसे दाखिल करके सस्ती पब्लिसिटी हासिल कर सकता है, आप ऐसा क्यों करते हैं? हमें नियमित रूप से इस तरह याचिकाओं के ढेर से मत पाटिए।”
3. अपुष्ट आंकड़ों पर आधारित सतही याचिकाओं की अस्वीकार्यता
- याचिकाकर्ता ने दलील देने की कोशिश की कि यह एक गंभीर सार्वजनिक मुद्दा है और दावा किया कि “हर चार डॉक्टरों में से कम से कम एक के पास जाली या फर्जी डिग्री है।”
- पीठ इस प्रकार के सामान्यीकृत और गैर-जिम्मेदाराना सांख्यिकीय दावों से बिल्कुल संतुष्ट नहीं हुई और माना कि बिना किसी पुख्ता आधार, व्यवस्थित जांच सामग्री या जमीनी अध्ययन के ऐसी याचिकाएं केवल अदालत का कीमती समय नष्ट करती हैं।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि
- याचिकाकर्ता की प्रार्थना: पेशे से अधिवक्ता याचिकाकर्ता ने व्यक्तिगत रूप से (Party-in-person) सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत एक रिट याचिका दायर की थी।
- उठाया गया मुद्दा: याचिका में देश भर में कथित फर्जी मेडिकल डिग्रियों और अयोग्य चिकित्सकों की बढ़ती संख्या का मुद्दा उठाते हुए राष्ट्रीय स्तर पर मेडिकल विनियमों के ऑडिट (Auditing of Medical Regulations) और इसकी जांच के लिए एक स्वतंत्र उच्च स्तरीय विशेषज्ञ समिति (Expert Committee) गठित करने की मांग की गई थी।
- अदालत का संज्ञान: अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता वकील किसी वास्तविक जनहित या शोध के बजाय लगभग हर सप्ताह विभिन्न विषयों पर सुर्खियां बटोरने वाली जनहित याचिकाएं दायर करने का आदी रहा है, जिसकी प्रार्थनाएं अपरिपक्व और विचारहीन थीं।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश
- याचिका पूरी तरह खारिज: पीठ ने याचिका को विचारणीय न मानते हुए और प्रचार हित याचिका (Publicity Interest Litigation) करार देते हुए खारिज (Dismissed) कर दिया।
- भविष्य के लिए सख्त हिदायत: याचिकाकर्ता को चेतावनी दी गई कि वह अदालतों को बिना तथ्यात्मक आधार वाली नियमित याचिकाओं का मंच न बनाए।
विधिक विवरण
- प्रासंगिक कानून: भारत का संविधान – अनुच्छेद 32 (रिट क्षेत्राधिकार); सुप्रीम कोर्ट रूल्स, 2013 (जनहित याचिकाओं के विनियमन के नियम)
- संबद्ध संवैधानिक सिद्धांत व नजीर:
- स्टेट ऑफ उत्तरांचल बनाम बलवंत सिंह चौफाल (2010, सुप्रीम कोर्ट) — ‘जनहित याचिकाओं के दुरुपयोग को रोकने और वास्तविक जनहित बनाम प्रचार जनहित (Publicity Interest Litigation) की जांच हेतु दिशा-निर्देश’
- होली काउ फाउंडेशन बनाम भारत संघ — ‘बिना गहन अध्ययन और शोध के सतही जनहित याचिकाओं पर अदालती समय नष्ट करने पर रोक’
- पीठ: न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आलोक अराधे (सर्वोच्च न्यायालय)
Court Chides Lawyer: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का उच्चतम न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ (Bench) | न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा एवं न्यायमूर्ति अलोक अराधे |
| याचिकाकर्ता | व्यक्तिगत रूप से पेश हुए एक अधिवक्ता (Party-in-Person) |
| याचिका की मांग | फर्जी मेडिकल डिग्रियों की जांच के लिए विशेषज्ञ समिति का गठन और मेडिकल नियमों का ऑडिट |
| अदालत की टिप्पणी | “PIL को फैक्ट्री मत बनाओ; खबरों को देखकर बिना विचार किए याचिकाएं दाखिल न करें।” |
| अदालत का फैसला | याचिका पूरी तरह खारिज। |

