Wednesday, November 4, 2026
HomeLaworder HindiDoctor Harass Old Mother: 82 वर्षीय मां को प्रताड़ित करने वाले सरकारी...

Doctor Harass Old Mother: 82 वर्षीय मां को प्रताड़ित करने वाले सरकारी डॉक्टर बेटे की बेदखली का आदेश; यह आंख खोलनेवाला है, पढ़ें

हाईकोर्ट के मुख्य कानूनी निष्कर्ष

  • धारा 22 के तहत “जीवन और संपत्ति की सुरक्षा”:अदालत ने अधिनियम की धारा 22 की व्यापक व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया:“एक वरिष्ठ नागरिक के लिए, इसका मतलब गरिमा के साथ जीने का अधिकार है, जिसमें बिना किसी डर, उत्पीड़न या अपमान के अपने घर में शांति से रहने का अधिकार शामिल है। वैधानिक सुरक्षा केवल भरण-पोषण के भुगतान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें उत्पीड़न के स्रोत को घर से हटाना भी शामिल है।” — कर्नाटक हाईकोर्ट
  • विडियो कॉन्फ्रेंसिंग और प्रत्यक्ष साक्ष्य:हाईकोर्ट ने स्वयं वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से 82 वर्षीय मां का बयान दर्ज किया, जिसमें उन्होंने उत्पीड़न की बात दोहराई।
  • सिविल विवाद (Title Dispute) का बेदखली पर असर नहीं:हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वसीयत या संपत्ति के मालिकाना हक को लेकर लंबित सिविल मुकदमा, वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत अधिकारियों को सुरक्षात्मक अधिकार (Protective Jurisdiction) का उपयोग करने से नहीं रोकता।

बेंगलुरु: कर्नाटक हाईकोर्ट ने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 (Senior Citizens Act, 2007) की धारा 22, वरिष्ठ नागरिकों के जीवन और गरिमा के अधिकार (अनुच्छेद 21) तथा आवासीय सुरक्षा के दायरे पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील निर्णय सुनाया है।

न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज की एकल पीठ ने सरकारी डॉक्टर (तालुक स्वास्थ्य अधिकारी) बेटे द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए सहायक आयुक्त (AC) और उपायुक्त (DC), मैसूरु द्वारा पारित बेदखली आदेशों को पूरी तरह बरकरार रखा। अदालत ने सहायक आयुक्त को निर्देश दिया कि वह 60 दिनों के भीतर इस बेदखली आदेश को कड़ाई से लागू कराए ताकि 82 वर्षीय बुजुर्ग मां अपने घर में शांति से रह सके। अदालत ने स्पष्ट किया है कि वरिष्ठ नागरिकों के अधिनियम के तहत वैधानिक संरक्षण केवल भरण-पोषण (Maintenance) के भुगतान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें बुजुर्गों के आवास से उत्पीड़न के स्रोत (Source of Harassment) को पूरी तरह हटाना और बेदखल (Evict) करना भी शामिल है [डॉ. एम.एस. महेश बनाम उपायुक्त, मैसूरु एवं अन्य]।

उच्च न्यायालय की प्रमुख विधिक टिप्पणियां

1. ‘जीवन और संपत्ति के संरक्षण’ का व्यापक वैधानिक दायरा (धारा 22) वरिष्ठ नागरिक अधिनियम, 2007 की धारा 22 के तहत राज्य की सुरक्षात्मक शक्तियों का विश्लेषण करते हुए न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज ने कहा: “एक वरिष्ठ नागरिक के लिए, जीवन के अधिकार में गरिमा के साथ जीने का अधिकार अंतर्निहित है, और इसमें बिना किसी भय, उत्पीड़न या अपमान के अपने ही घर में शांतिपूर्वक निवास करने का अधिकार शामिल है। अधिनियम की धारा 22 के तहत ‘वरिष्ठ नागरिकों के जीवन और संपत्ति का संरक्षण’ वाक्यांश इतना व्यापक है कि यह वरिष्ठ नागरिक द्वारा अपने घर के शांतिपूर्ण उपभोग की रक्षा करता है। यह वैधानिक संरक्षण केवल भरण-पोषण की राशि देने तक सीमित नहीं है, बल्कि जहां परिस्थितियां उचित ठहराती हैं, वहां वरिष्ठ नागरिक के आवास से उत्पीड़न के किसी भी स्रोत को बाहर निकालना भी इसमें शामिल है।”

2. लंबित सिविल वाद या वसीयत का विवाद बेदखली में बाधा नहीं

  • बेटे ने अपने दिवंगत पिता द्वारा निष्पादित कथित वसीयत (Will) के आधार पर संपत्ति के स्वामित्व का दावा किया था और बताया कि दीवानी मुकदमा लंबित है।
  • अदालत ने व्यवस्था दी कि संपत्ति के स्वत्व (Title Dispute) या वसीयत को लेकर सिविल कोर्ट में मुकदमा लंबित होना वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के तहत सक्षम अधिकारियों को अपनी सुरक्षात्मक शक्तियों का प्रयोग करने से नहीं रोकता।
  • अदालत ने स्पष्ट किया कि बेदखली आदेश से संबंधित टिप्पणियां केवल प्रथम दृष्टया हैं और सिविल कोर्ट गुण-दोष के आधार पर स्वतंत्र रूप से स्वामित्व का फैसला करेगा।

3. यांत्रिक तरीके से बेदखली नहीं, वास्तविक उत्पीड़न की पुष्टि

  • अदालत ने आगाह किया कि बेदखली की शक्ति का प्रयोग यांत्रिक (Mechanically) रूप से नहीं किया जाना चाहिए।
  • वर्तमान मामले में अदालत ने स्वयं वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से 82 वर्षीय सुभद्रम्मा का बयान सुना, जिसमें उन्होंने सीधे तौर पर बेटे और बहू द्वारा कमरे में बंद करने, अंधेरे में रखने और लगातार झगड़े करने के उत्पीड़न की पुष्टि की।

Read The Story;Alimony Reduce: स्थायी गुजारा भत्ता का उद्देश्य संपत्ति का समानीकरण करना नहीं: पत्नी का 2 करोड़ का एलिमनी घटाकर 50 लाख रुपये क्यों किया?

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (मैसूरु का पारिवारिक विवाद)

  • शिकायतकर्ता और आरोप: 82 वर्षीय सुभद्रम्मा ने अप्रैल 2023 में मैसूरु के सहायक आयुक्त (Maintenance Tribunal) के समक्ष शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि उनके बेटे डॉ. एम.एस. महेश (सरकारी डॉक्टर) और उनकी बहू ने उन्हें और उनकी बहन को एक अंधेरे कमरे में बंद (Wrongful Confinement) कर दिया था और बहू लगातार झगड़े कर उनके शांतिपूर्ण जीवन को नारकीय बना रही थी।
  • प्रशासनिक अधिकारियों के आदेश:
    • 12 अगस्त 2024: सहायक आयुक्त ने डॉक्टर और उनके परिवार को आवासीय परिसर खाली करने का आदेश दिया।
    • 4 फरवरी 2025: उपायुक्त (अपीलीय अधिकरण), मैसूरु ने बेटे की अपील खारिज कर बेदखली आदेश की पुष्टि की।
  • याचिकाकर्ता (डॉक्टर) का बचाव:
    • डॉक्टर ने तर्क दिया कि वह अपने परिवार के साथ दशकों से उस घर में रह रहा है।
    • उसने पिता की वसीयत के आधार पर स्वामित्व का दावा किया।
    • हालांकि, अदालत ने संज्ञान लिया कि वह मैसूरु से लगभग 150 किलोमीटर दूर तालुक स्वास्थ्य अधिकारी (THO) के पद पर तैनात है; ऐसे में उसका प्रतिदिन 300 किलोमीटर की यात्रा करने का दावा अव्यावहारिक और अविश्वसनीय था।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश और निर्देश

  1. याचिका खारिज व बेदखली बरकरार: उच्च न्यायालय ने बेटे की याचिका खारिज कर दी और मैसूरु जिला प्रशासन द्वारा दिए गए निष्कासन आदेश को सही ठहराया।
  2. 60 दिनों में निष्पादन: सहायक आयुक्त, मैसूरु को आदेश दिया गया कि वह 60 दिनों के भीतर डॉक्टर और उसके परिवार को परिसर से बेदखल कर घर का शांतिपूर्ण कब्जा बुजुर्ग मां को सौंपना सुनिश्चित करे।
  3. सिविल कोर्ट पर कोई प्रभाव नहीं: अदालत ने स्पष्ट किया कि लंबित सिविल सूट को इस आदेश की टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना पूरी तरह स्वतंत्र रूप से तय किया जाएगा।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: डॉ. एम.एस. महेश बनाम उपायुक्त, मैसूरु एवं अन्य [Dr. M S Mahesh v. Deputy Commissioner, Mysuru & Ors – रिट याचिका (सिविल)]
  • प्रासंगिक कानून: माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 (Senior Citizens Act) की धारा 3, धारा 22 एवं धारा 23; भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार)
  • संबद्ध सुप्रीम कोर्ट नजीर: एस. वनिता बनाम उपायुक्त, बेंगलुरु अर्बन (2020, सुप्रीम कोर्ट) — ‘वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत साझा गृहस्थी के अधिकारों का सामंजस्यपूर्ण अर्थान्वयन’
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • याचिकाकर्ता (डॉक्टर) की ओर से: अधिवक्ता के.एस. भीमैया
    • प्रशासन/राज्य की ओर से: अतिरिक्त सरकारी अधिवक्ता (AGA) मोहम्मद जाफर शाह
    • बुजुर्ग मां (सुभद्रम्मा) की ओर से: अधिवक्ता के. मूर्ति
  • पीठ: न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज (कर्नाटक उच्च न्यायालय)

Doctor Harass Old Mother: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतकर्नाटक उच्च न्यायालय (Karnataka High Court)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज (Justice Suraj Govindaraj)
याचिकाकर्ता / प्रतिवादीडॉ. एम.एस. महेश (बेटा) / सुभद्रम्मा (82 वर्षीय मां)
संबंधित कानूनवरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम, 2007 की धारा 22
मुख्य बिंदुकेवल गुजारा भत्ता देना ही पर्याप्त नहीं है; प्रताड़ना देने वाले को घर से बेदखल करना कानून के तहत सही है।
कोर्ट का आदेशबेदखली का आदेश बरकरार; 60 दिनों के भीतर डॉक्टर बेटे को घर खाली कराने का निर्देश।
RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
broken clouds
22.9 ° C
22.9 °
22.9 °
85 %
3kmh
80 %
Tue
22 °
Wed
30 °
Thu
29 °
Fri
29 °
Sat
29 °

Recent Comments