हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और कानूनी सिद्धांत
हाईकोर्ट ने अपील खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट की नजीरों (M.B. Ramesh v. K.M. Veeraje URS, 2013) का हवाला देकर निम्नलिखित सिद्धांत तय किए:
- धारा 90 का अपवाद (No Automatic Presumption):भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 90 सामान्य दस्तावेजों के 30 साल पुराने होने पर उनके निष्पादन को सही मानती है, लेकिन यह नियम वसीयत पर लागू नहीं होता। वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद ही वसीयत प्रभाव में आती है, इसलिए इसकी प्रामाणिकता पर स्वतः धारणा नहीं बनाई जा सकती।
- गवाहों की गैर-मौजूदगी में वसीयत कैसे साबित हो? (Section 69 Compliance):
- इस मामले में वसीयत के लेखक (Scribe) और दोनों अटेस्टिंग गवाहों की मृत्यु हो चुकी थी।
- भाइयों द्वारा पेश किए गए अन्य दो गवाहों ने स्वीकार किया कि उन्होंने अपनी आंखों से महादेव को वसीयत पर हस्ताक्षर करते नहीं देखा था।
- साक्ष्य अधिनियम की धारा 69 के अनुसार, यदि गवाह जीवित न हों, तो कम से कम एक अटेस्टिंग गवाह के हस्ताक्षर और वसीयतकर्ता के हस्ताक्षरों को साबित करना अनिवार्य था, जो भाई नहीं कर सके।
- केवल रजिस्ट्री होना पर्याप्त नहीं:कोर्ट ने साफ किया कि वसीयत का केवल पंजीकृत (Registered) होना ही उसके वैध निष्पादन का अकाट्य प्रमाण नहीं है; उसे गवाहों द्वारा कोर्ट में साबित करना ही होगा।
क्या भाई अब भी संपत्ति के हकदार हैं?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, यद्यपि दोनों भाइयों ने वसीयत के आधार पर मालिकाना हक खो दिया है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वे पूरी तरह बेदखल हो गए हैं:
1.1. वसीयत का दावा समाप्त (Testamentary Claim Failed):वसीयती उत्तराधिकार खारिज.
1958 की वसीयत साबित न होने के कारण भाइयों का पूरी जमीन पर एकतरफा मालिकाना हक का दावा खारिज हो गया।
2.2. बिना-वसीयत उत्तराधिकार का अधिकार (Intestate Succession):हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 8.
वे अब हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 8 के तहत अपने पिता (रामावतार) के वैध वारिस होने के नाते पुस्तैनी संपत्ति में अपना कानूनी हिस्सा पाने के हकदार हैं।
बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने वसीयत के विधिक निष्पादन, 30 वर्ष से पुराने दस्तावेजों की उपधारणा (Presumption as to 30-year-old documents under Section 90 of Indian Evidence Act) और सीपीसी की धारा 100 के तहत द्वितीय अपील (Second Appeal) के सीमित क्षेत्राधिकार पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है।
उच्च न्यायालय ने कोरिया (मनेंद्रगढ़) जिले के ग्राम पाराडोल स्थित पैतृक कृषि भूमि पर दो भाइयों द्वारा अपने चाचा के खिलाफ दायर द्वितीय अपील को खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत के समवर्ती निष्कर्षों (Concurrent Findings) को बरकरार रखा। अदालत ने फैसला सुनाया है कि कोई वसीयत चाहे कितनी भी पुरानी हो (30 वर्ष से अधिक पुरानी भी), कानूनन यह उपधारणा नहीं बनाई जा सकती कि वह विधिवत निष्पादित और अनुप्रमाणित (Duly executed and attested) है। वसीयत को भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 63(c) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 68 व 69 के कड़े कानूनी मापदंडों के अनुसार अनुप्रमाणक साक्षियों (Attesting Witnesses) के माध्यम से साबित करना अनिवार्य है [रामप्यारे एवं अन्य बनाम रामकिशुन एवं अन्य ]।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक सिद्धांत एवं टिप्पणियां
1. धारा 90 साक्ष्य अधिनियम की 30-वर्षीय उपधारणा वसीयत पर लागू नहीं होती सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय एम.बी. रमेश बनाम के.एम. वीराजे अर्स (2013) और आशुतोष सामंत बनाम रंजन बाला दासी (2023) पर भरोसा करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया: “30 वर्ष पुराने दस्तावेजों के संबंध में भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 90 के तहत उपलब्ध विधिक उपधारणा वसीयत (Will) पर लागू नहीं होती है। वसीयत केवल वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद ही प्रभावी होती है और उसके जीवनकाल में सदैव प्रतिसंहरणीय (Revocable) रहती है; अतः केवल इसके पुराने होने (Antiquity) के आधार पर इसकी सत्यता और निष्पादन की कानूनी उपधारणा नहीं की जा सकती। इसे भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 63(c) और साक्ष्य अधिनियम की धारा 68 व 69 के अनिवार्य प्रावधानों के तहत ही साबित किया जाना चाहिए।”
2. महज पंजीकरण (Registration) से साक्ष्य की अनिवार्यता समाप्त नहीं होती
- अदालत ने रेखांकित किया कि वसीयत का सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में पंजीकृत होना मात्र ही उसे कानूनन साबित नहीं कर देता।
- यदि अनुप्रमाणक साक्षियों की मृत्यु हो चुकी है, तो साक्ष्य अधिनियम की धारा 69 के तहत कम से कम एक अनुप्रमाणक साक्षी के हस्ताक्षर और वसीयतकर्ता के हस्ताक्षर को साबित करने के वैधानिक कदम उठाने पड़ते हैं। वर्तमान मामले में वादी पक्ष ऐसा करने में पूरी तरह विफल रहा।
3. गवाह जिन्होंने वसीयत निष्पादन नहीं देखा, उनका साक्ष्य निष्फल
- वसीयत के लेखक (Scribe) टेकचंद जैन और दोनों अनुप्रमाणक साक्षी (राजधर व रामलखन सिंह) स्वर्गवासी हो चुके थे।
- वादी पक्ष द्वारा पेश किए गए अन्य दो गवाहों (P.W.-3 और P.W.-4) ने स्वीकार किया कि उन्होंने महादेव को अपनी आंखों से वसीयत पर हस्ताक्षर या निष्पादन करते हुए नहीं देखा था। अदालत ने माना कि ऐसा साक्ष्य धारा 63(c) और धारा 68 की शर्तों को पूरा नहीं करता।
4. सीपीसी की धारा 100 के तहत द्वितीय अपील का सीमित दायरा
- अदालत ने राजस्थान राज्य बनाम शिव दयाल (2019, सुप्रीम कोर्ट) का संदर्भ देते हुए कहा कि जब निचली अदालत और प्रथम अपीलीय अदालत ने तथ्यों का समवर्ती मूल्यांकन करके वसीयत को ‘असाबित’ (Not Proved) माना हो, तो जब तक कोई विधिक विकृति (Perversity) न हो, हाईकोर्ट साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन (Re-appreciation of evidence) नहीं कर सकता। मामले में कोई ‘सारवान विधिक प्रश्न’ (Substantial Question of Law) मौजूद नहीं था।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (कोरिया/मनेंद्रगढ़ पैतृक भूमि विवाद)
- वंशावली व पक्षकार: पैतृक भूमि के मूल खातेदार महादेव थे। उनके छोटे भाई जगदेव अहीर के दो पुत्र थे—रामावतार और रामकिशुन (प्रतिवादी/चाचा)। रामावतार के दो पुत्र रामप्यारे और शिवशंकर (अपीलार्थी/भतीजे) हैं।
- 1958 की पंजीकृत वसीयत का दावा: दोनों भाइयों का दावा था कि उनके बाबा महादेव ने 12 अगस्त 1958 को एक वसीयत निष्पादित की, जो 28 नवंबर 1958 को सब-रजिस्ट्रार मनेंद्रगढ़ के कार्यालय में पंजीकृत हुई। इसके तहत महादेव ने अपनी समस्त कृषि भूमि, मवेशी व बर्तन अपने बड़े भतीजे रामावतार (भाइयों के पिता) के पक्ष में छोड़ दिए थे।
- विवाद की उत्पत्ति:
- महादेव का निधन 1988 में हुआ और रामावतार का निधन 1998 में हुआ। राजस्व रिकॉर्ड में भाइयों का नाम दर्ज था।
- भाइयों का आरोप था कि उनके सगे चाचा रामकिशुन ने राजस्व कर्मियों की मिलीभगत से अपना नाम भी रिकॉर्ड में दर्ज करा लिया और 2007-08 में विवादित भूमि पर कब्जा करके फसल काटने की तैयारी कर ली।
- इसके बाद भाइयों ने स्वत्व की घोषणा, कब्जे और स्थायी निषेधाज्ञा हेतु सिविल वाद दायर किया।
- अदालती कार्यवाही:
- ट्रायल कोर्ट ने वसीयत को विधि अनुसार अप्रमाणित (Not Proved) पाते हुए वाद खारिज कर दिया।
- प्रथम अपीलीय अदालत ने भी अपील खारिज की।
- दोनों भाइयों ने हाईकोर्ट में द्वितीय अपील दाखिल कर तर्क दिया कि वसीयत 30 वर्ष से अधिक पुरानी होने के कारण धारा 90 साक्ष्य अधिनियम के तहत स्वतः वैध मानी जानी चाहिए क्योंकि सभी गवाह मर चुके हैं।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश एवं वारिसों की वर्तमान विधिक स्थिति
- द्वितीय अपील खारिज: उच्च न्यायालय ने अपीलार्थियों की याचिका खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत के फैसले को विधि-सम्मत ठहराया।
- वसीयती हक समाप्त, लेकिन निर्वसीयती उत्तराधिकार (Intestate Succession) सुरक्षित:
- वसीयत अप्रमाणित होने के कारण दोनों भाई वसीयत के आधार पर संपूर्ण भूमि के अनन्य स्वामित्व का दावा हार चुके हैं।
- हालांकि, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 8 व प्रथम अनुसूची के तहत वे अपने पिता रामावतार के हिस्से के कानूनी वारिस होने के नाते निर्वसीयती उत्तराधिकार के नियमों के अनुसार पैतृक भूमि में अपने वैधानिक अंश (Share) के हकदार बने रहेंगे।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: रामप्यारे एवं अन्य बनाम रामकिशुन एवं अन्य [ द्वितीय अपील]
- प्रासंगिक कानून: भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 63(c); भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 68, 69 एवं धारा 90 (30 वर्ष पुराने दस्तावेजों की उपधारणा); सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 100 (द्वितीय अपील); हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 8
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें
- एम.बी. रमेश (मृत) विधिक प्रतिनिधि बनाम के.एम. वीराजे अर्स (2013) — ‘धारा 90 की उपधारणा वसीयत के निष्पादन और अनुप्रमाणन को साबित करने के लिए लागू नहीं की जा सकती।’
- आशुतोष सामंत बनाम रंजन बाला दासी (2023) — ‘सभी अनुप्रमाणक साक्षियों की मृत्यु की स्थिति में धारा 69 साक्ष्य अधिनियम के तहत साबित करने की अनिवार्य प्रक्रिया।’
- राजस्थान राज्य बनाम शिव दयाल (2019)— ‘समवर्ती तथ्यात्मक निष्कर्षों में धारा 100 सीपीसी के तहत गैर-हस्तक्षेप का सिद्धांत।’
- अधिकारिता: छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (बिलासपुर)
Evidence Act: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (Bilaspur Bench) |
| फैसले की तिथि | 29 जनवरी 2026 |
| विवादित संपत्ति | मनेन्द्रगढ़ क्षेत्र में स्थित पारिवारिक पुस्तैनी कृषि भूमि |
| अपीलकर्ता (भतीजे) | रामप्यारे और शिवशंकर (रामावतार के बेटे) |
| प्रतिवादी (चाचा) | रामकिशुन (जगदेव का बेटा) |
| मुख्य कानूनी मुद्दा | क्या 30 साल पुरानी पंजीकृत वसीयत स्वतः प्रमाणित मानी जाएगी? (उत्तर: नहीं) |

