सुप्रीम कोर्ट का कानूनी विश्लेषण और मुख्य निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट की व्याख्या को पूरी तरह से गलत ठहराते हुए निम्नलिखित प्रमुख बिंदु स्पष्ट किए:
- दस्तावेज़ को समग्र रूप से पढ़ा जाना चाहिए (Document must be read as a whole): जस्टिस चंद्रशेखर द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि कोर्ट को किसी आवेदन के एक अकेले वाक्य को उठाकर फैसला नहीं देना चाहिए, बल्कि पूरे आवेदन को समग्रता में देखना चाहिए। जांच एजेंसी ने अतिरिक्त समय इसलिए मांगा था ताकि वह एकत्र किए गए सबूतों को अंतिम रूप से संकलित कर सके। इस बयान का इस्तेमाल एटीएस के खिलाफ जांच के अधिकार को सीमित करने के लिए नहीं किया जा सकता।
- अभियोजन की मंजूरी (Sanction under Section 45 UAPA) पर अनावश्यक चर्चा: हाईकोर्ट ने अपने फैसले में UAPA की धारा 45 के तहत केंद्र/राज्य सरकार से अभियोजन की मंजूरी (Sanction) लेने के मुद्दे पर भी काफी चर्चा की थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट का यह कदम पूरी तरह से “अनावश्यक और अप्रासंगिक (Off-route)” था। मुख्य मुद्दा केवल यह था कि क्या विशेष अदालत द्वारा दिया गया दूसरा विस्तार वैध था या नहीं, न कि मंजूरी के बिंदु पर बहस करना।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) की धारा 43D(2)(b), दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 167(2) / BNSS के तहत डिफॉल्ट जमानत (Default Bail / Statutory Bail), जांच अवधि के विस्तार (Extension of Time) और अभियोजन की समय विस्तार रिपोर्ट की व्याख्या पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण व निर्णायक फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की खंडपीठ ने बॉम्बे उच्च न्यायालय के उस आदेश को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसके तहत UAPA के आरोपियों को 15 दिनों के दूसरे समय विस्तार (Second Extension) को अवैध ठहराते हुए डिफॉल्ट जमानत दे दी गई थी। शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय द्वारा दी गई वैधानिक जमानत को रद्द करते हुए विशेष एनआईए/एटीएस अदालत के समय विस्तार आदेश को पूर्णतः वैध ठहराया। अदालत ने व्यवस्था दी है कि जांच एजेंसी द्वारा समय विस्तार की अर्जी में केवल यह उल्लेख कर देना कि ‘चार्जशीट दाखिल करने के लिए पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है’, जांच के पूर्ण होने की स्वीकारोक्ति नहीं मानी जा सकती। यदि एजेंसी को गवाहों के बयानों, बैंक खातों, डिजिटल साक्ष्यों और फोरेंसिक इनपुट्स के विश्लेषण व संकलन (Collation & Analysis) के लिए अतिरिक्त समय की आवश्यकता है, तो ऐसी अर्जी को खारिज कर अभियुक्त को डिफॉल्ट बेल नहीं दी जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं सिद्धांत
1. ‘पर्याप्त सामग्री होने का कथन जांच पूर्ण होने की स्वीकारोक्ति नहीं’: न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर फैसले का लेखन करते हुए न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर ने बॉम्बे हाईकोर्ट की संकीर्ण व्याख्या को पलटते हुए कहा: “अभियोजन पक्ष द्वारा यह कथन कि चार्जशीट दाखिल करने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद है, अदालत द्वारा इस रूप में व्याख्यायित नहीं किया जा सकता कि मामले में जांच पूरी हो चुकी थी। अभियोजन की ओर से दिए गए ऐसे कथन का उपयोग एटीएस/जांच एजेंसी की जांच पूरी करने या आगे की जांच करने की शक्तियों को सीमित करने के लिए उसके खिलाफ नहीं किया जा सकता। उच्च न्यायालय ने दूसरी विस्तार अर्जी में दिए गए एक अकेले वाक्य को यह निष्कर्ष निकालने के लिए चुनकर गंभीर त्रुटि की कि जांच पूरी हो चुकी थी।”
2. दस्तावेज को समग्रता में पढ़ा जाना चाहिए (Document must be read as a whole)
- पीठ ने कानूनी व्याख्या के बुनियादी सिद्धांत को रेखांकित करते हुए कहा कि किसी भी कानूनी दस्तावेज या अर्जी को टुकड़ों में (In piecemeal) अलग-थलग करके नहीं, बल्कि उसकी संपूर्णता में (As a whole) पढ़ा जाना चाहिए।
- जांच एजेंसी ने अपनी अर्जी में स्पष्ट लिखा था कि प्राथमिक साक्ष्य मिल चुके हैं, परंतु जब्त इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, बैंकिंग लेन-देन, वित्तीय ट्रेल और गवाहों के बयानों के क्रॉस-वेरिफिकेशन और साक्ष्यों के एकत्रीकरण के लिए उसे अतिरिक्त 15 दिनों के समय की आवश्यकता है।
3. धारा 45 UAPA के तहत अभियोजन स्वीकृति (Sanction) पर हाईकोर्ट की चर्चा ‘अनावश्यक व अप्रासंगिक’
- बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस बात पर लंबा विमर्श किया था कि क्या UAPA की धारा 45 के तहत केंद्र/राज्य सरकार से अभियोजन स्वीकृति प्राप्त करने के आधार पर जांच अवधि बढ़ाई जा सकती है।
- सुप्रीम कोर्ट ने इसे पूरी तरह ‘मार्ग से भटकाव’ (Off-route and detour) करार दिया:“अभियोजन की मंजूरी (Sanction for Prosecution) पर पूरी चर्चा अप्रासंगिक और विषयांतर थी। उच्च न्यायालय ने समय विस्तार के अभियोजन पक्ष के मूल आधार को दरकिनार करते हुए अनावश्यक मोड़ ले लिया। विशेष अदालत द्वारा अभियोजन को आरोप पत्र दाखिल करने के लिए 18 जनवरी 2023 को दिए गए दूसरे समय विस्तार के आदेश में हस्तक्षेप करने का उच्च न्यायालय का निर्णय प्रत्यक्षतः गलत (Palpably wrong) है और निरस्त किए जाने योग्य है।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (ATS जांच और 90+30+15 दिनों का विस्तार)
- UAPA के तहत गिरफ्तारी: महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधी दस्ते (ATS) ने आरोपियों के खिलाफ UAPA के कड़े प्रावधानों के तहत मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया था।
- समय विस्तार की समयरेखा:
- कानून के तहत सामान्य 90 दिनों की प्राथमिक अवधि पूरी होने के बाद विशेष अदालत ने लोक अभियोजक की रिपोर्ट पर विचार कर पहली बार 30 दिनों का विस्तार दिया था।
- इसके बाद, जांच एजेंसी ने विशेष अदालत में दूसरी अर्जी दाखिल कर 15 अतिरिक्त दिनों के विस्तार की मांग की, ताकि विभिन्न डिजिटल और दस्तावेजी साक्ष्यों को अंतिम रूप देकर चार्जशीट के साथ संकलित किया जा सके।
- विशेष अदालत ने परिस्थितियों की जटिलता को देखते हुए 18 जनवरी 2023 को 15 दिनों का यह दूसरा विस्तार मंजूर कर लिया।
- बॉम्बे हाईकोर्ट का दृष्टिकोण: बॉम्बे हाईकोर्ट ने आरोपियों की याचिका स्वीकार करते हुए माना कि चूंकि एजेंसी ने अर्जी में यह लिख दिया था कि चार्जशीट दाखिल करने हेतु ‘पर्याप्त सामग्री’ मौजूद है, इसका मतलब जांच पूरी हो चुकी थी और केवल औपचारिकता शेष थी; इसलिए विशेष अदालत को दूसरा विस्तार नहीं देना चाहिए था। इस आधार पर हाईकोर्ट ने आरोपियों को धारा 167(2) के तहत डिफॉल्ट जमानत दे दी थी।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश
- डिफॉल्ट जमानत रद्द: सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे उच्च न्यायालय के फैसले को अपास्त (Set aside) कर दिया और प्रतिवादी-अभियुक्तों को दी गई डिफॉल्ट जमानत तत्काल प्रभाव से रद्द (Cancelled) कर दी।
- विशेष अदालत का आदेश बहाल: विशेष अदालत द्वारा 18 जनवरी 2023 को जांच अवधि में 15 दिनों के विस्तार की अनुमति देने वाले आदेश को पूर्णतः वैध और विधिसम्मत घोषित किया गया।
- अपील स्वीकृत: राज्य/जांच एजेंसी द्वारा दायर आपराधिक अपील को गुण-दोष के आधार पर पूर्ण रूप से स्वीकार कर लिया गया।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: महाराष्ट्र राज्य (एटीएस) बनाम संबंधित अभियुक्तगण [आपराधिक अपील – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक विधायी प्रावधान: गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 (UAPA) की धारा 43D(2)(b) (जांच अवधि को 90 दिनों से बढ़ाकर 180 दिनों तक करने का विशेष प्रावधान); दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 167(2) / BNSS 2023 की धारा 187 (वैधानिक/डिफॉल्ट जमानत); UAPA की धारा 45 (अभियोजन स्वीकृति की अनिवार्यता)
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- संजय दत्त बनाम राज्य (1994, सुप्रीम कोर्ट संविधान पीठ) एवं हितेंद्र विष्णु ठाकुर बनाम महाराष्ट्र राज्य (1994, सुप्रीम कोर्ट) — ‘विशेष कानूनों (TADA/UAPA) के तहत लोक अभियोजक की रिपोर्ट में जांच की प्रगति और हिरासत की निरंतरता की आवश्यकता का उल्लेख होना चाहिए; यदि अदालत संतुष्ट है तो 180 दिनों तक का विस्तार वैध है।’
- बिक्रमजीत सिंह बनाम पंजाब राज्य (2020, सुप्रीम कोर्ट) — ‘डिफॉल्ट जमानत एक मौलिक अधिकार है, परंतु यह अधिकार केवल तभी उत्पन्न होता है जब तय वैधानिक समय सीमा के भीतर न तो आरोप पत्र दाखिल हो और न ही सक्षम अदालत द्वारा जांच की अवधि का वैध विस्तार किया गया हो।’
- गुरविंदर सिंह बनाम पंजाब राज्य (2024, सुप्रीम कोर्ट) — ‘UAPA जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर मामलों में साक्ष्यों के विश्लेषण और तकनीकी डेटा की पुनर्प्राप्ति में लगने वाले समय को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।’
- पीठ: न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर (सर्वोच्च न्यायालय)
UAPA Case: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ (Judges) | न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर |
| कानून | यूएपीए, 1967 (UAPA) और दंड प्रक्रिया संहिता / BNSS (डिफ़ॉल्ट ज़मानत प्रावधान) |
| मुख्य मुद्दा | क्या जांच की अवधि बढ़ाने की अर्जी में ‘पर्याप्त सबूत हैं’ का बयान जांच पूरी होने का सबूत है? |
| अदालत का निर्णय | बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश रद्द; आरोपियों की डिफ़ॉल्ट ज़मानत निरस्त |

