अनुच्छेद 22(1) पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय 4 मुख्य सिद्धांत
- लिखित और समझने योग्य भाषा में कारण अनिवार्य: गिरफ्तारी के कारण लिखित में (in writing) होने चाहिए और आरोपी को उस भाषा में दिए जाने चाहिए जिसे वह समझता हो। बिना किसी अपवाद के इसकी प्रति तत्काल उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
- मौलिक अधिकार का उल्लंघन क्षम्य नहीं: आरोपी को लिखित में कारण प्राप्त करने का मौलिक और वैधानिक अधिकार है। इस अधिकार में किसी भी तरह की कटौती गिरफ्तारी और रिमांड की पूरी प्रक्रिया को दूषित कर देती है।“यह एक पवित्र मौलिक अधिकार है जिसका किसी भी स्थिति में उल्लंघन नहीं किया जा सकता। किसी भी उल्लंघन के परिणामस्वरूप आरोपी की तुरंत रिहाई होगी क्योंकि ऐसी गिरफ्तारी असंवैधानिक है।”
- चार्जशीट या संज्ञान से अवैधता खत्म नहीं होती: बाद में चार्जशीट दाखिल कर देने या अदालत द्वारा अपराध पर संज्ञान (Cognizance) ले लेने से शुरुआती अवैध गिरफ्तारी वैध नहीं हो जाती।
- अपराध की गंभीरता से परे सार्वभौमिक नियम: यह नियम आईपीसी/भारतीय न्याय संहिता (BNS) से लेकर विशेष कानूनों (जैसे UAPA, PMLA आदि) तक सब पर लागू होता है। जब संविधान के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होता है, तो आरोपी को ‘जमानत’ पर रिहा नहीं किया जाता, बल्कि उसे अवैध और असंवैधानिक हिरासत से मुक्त किया जाता है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 22(1) व 22(2) के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संरक्षण, मनमानी गिरफ्तारी पर रोक, गिरफ्तारी का आधार लिखित रूप में उपलब्ध कराने की अनिवार्यता और दोषी जांच अधिकारियों की प्रशासनिक व अनुशासनात्मक जवाबदेही पर एक युगांतरकारी व विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किया है।
Grounds of Arrest: शिरोमणि अकाली दल के मुल्लांपुर दाखा हलका प्रभारी जसकरनजीत सिंह की गिरफ्तारी असंवैधानिक घोषित
न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चांदुरकर की खंडपीठ ने शिरोमणि अकाली दल (SAD) के मुल्लांपुर दाखा हलका प्रभारी जसकरनजीत सिंह की गिरफ्तारी को असंवैधानिक घोषित करते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा स्थानीय अदालत के रिहाई आदेश पर लगाए गए स्टे को खारिज करते हुए शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025) में प्रतिपादित कानून ही सही और बाध्यकारी स्थिति को दर्शाता है। अदालत ने स्पष्ट व्यवस्था दी है कि अभियुक्त को उसकी समझ में आने वाली भाषा में लिखित में गिरफ्तारी का आधार न देना न केवल गिरफ्तारी और रिमांड की पूरी प्रक्रिया को दूषित करता है, बल्कि यह सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 22(1) का घोर उल्लंघन है। ऐसी विफलता पर अभियुक्त की तत्काल रिहाई का आदेश होगा और संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ अनिवार्य रूप से विभागीय जांच (Departmental Inquiry) शुरू की जाएगी, जिसका प्रतिकूल निष्कर्ष उसकी सर्विस बुक में दर्ज होगा।
अनुच्छेद 22(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिपादित मूल संवैधानिक सिद्धांत
1. ‘लिखित आधार देना अनिवार्य मौलिक अधिकार, कोई औपचारिकता नहीं’: न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां न्यायालय ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित करने से पहले अपनाई जाने वाली सुरक्षात्मक प्रक्रिया कोई सतही औपचारिकता नहीं है:
- लिखित और बोधगम्य भाषा: गिरफ्तारी का आधार अनिवार्य रूप से लिखित में और अभियुक्त की समझ में आने वाली भाषा में होना चाहिए। लिखित आधार की प्रति बिना किसी अपवाद के स्वतः अभियुक्त को तत्काल सौंपी जानी चाहिए।
- संवैधानिक उल्लंघन पर तत्काल रिहाई: अदालत ने दो टूक शब्दों में कहा:“अनुच्छेद 22(1) के तहत प्रदत्त सुरक्षा उपाय केवल प्रक्रियात्मक उपाय नहीं हैं; ये वे मौलिक सिद्धांत हैं जिनका पालन किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित करते समय किया जाना अनिवार्य है। इसलिए यह कहना कानूनन गलत है कि गिरफ्तारी का आधार न देने की प्रक्रियात्मक चूक से हिरासत अवैध नहीं होती। जब अभियुक्त को अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन पर रिहा किया जाता है, तो उसे ‘जमानत’ (Bail) पर रिहा नहीं किया जाता; बल्कि उसे असंवैधानिक और अवैध हिरासत से मुक्त (Released from illegal detention) किया जाता है।”
- चार्जशीट या संज्ञान से दोष ठीक नहीं होगा: बाद में आरोप पत्र (Chargesheet) दाखिल करने या मजिस्ट्रेट द्वारा संज्ञान (Cognizance) लेने मात्र से मूल रूप से अवैध और असंवैधानिक गिरफ्तारी वैध नहीं हो जाती।
- सभी कानूनों पर लागू: यह संवैधानिक सुरक्षा आईपीसी/बीएनएस से लेकर विशेष कानूनों (UAPA, PMLA, NDPS आदि) तक समान रूप से बाध्यकारी है। इसमें किसी पूर्वाग्रह (Prejudice) को साबित करने की आवश्यकता नहीं होती।
अवैध गिरफ्तारी के बाद ‘पुनः गिरफ्तारी’ (Re-arrest) की 6-सूत्रीय विधिक प्रक्रिया
अदालत ने रेखांकित किया कि यदि अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन के कारण किसी अभियुक्त को रिहा किया जाता है और जांच एजेंसी को आगे की जांच या कस्टोडियल पूछताछ के लिए उसे पुनः गिरफ्तार करना आवश्यक लगता है, तो मनमाने ढंग से दोबारा नहीं पकड़ा जा सकता। इसके लिए निम्नलिखित अनिवार्य प्रक्रिया तय की गई है:
- मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन: जांच एजेंसी को संबंधित न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष औपचारिक आवेदन दाखिल करना होगा, जिसमें पुनः गिरफ्तारी का ठोस कारण और कस्टडी की वास्तविक आवश्यकता स्पष्ट की जाएगी।
- पहले लिखित आधार सौंपना अनिवार्य: मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन तभी पेश किया जा सकेगा जब जांच एजेंसी पहले अभियुक्त को लिखित में गिरफ्तारी का आधार तामील करा चुकी हो और आवेदन में यह स्पष्टीकरण दर्ज हो कि पहली बार में यह आधार क्यों नहीं सौंपा जा सका था।
- वरिष्ठ अधिकारी का सत्यापन (Endorsement): किसी भी प्रकार की मिलीभगत या मनमानी को रोकने के लिए, आवेदन पर संबंधित थाना प्रभारी/जांच अधिकारी के तत्काल उच्चाधिकारी (Immediate Senior Authority) का औपचारिक अनुमोदन (Endorsement) होना आवश्यक होगा ताकि वरिष्ठ स्तर पर यह संज्ञान में आए कि मातहत अधिकारी ने संवैधानिक उल्लंघन किया है।
- न्यायिक विवेक और प्राकृतिक न्याय: मजिस्ट्रेट Mihir Rajesh Shah फैसले के अनुरूप प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए तेजी से (अधिमानतः आवेदन प्राप्ति के एक सप्ताह के भीतर) सुनवाई कर निर्णय लेंगे। पुनः गिरफ्तारी की शक्ति पुलिस के विवेकाधिकार पर नहीं छोड़ी जा सकती, यह विशुद्ध रूप से न्यायिक परीक्षण के अधीन होगी।
- संतुष्टि पर ही अनुमति: यदि मजिस्ट्रेट वास्तविक और सद्भावनापूर्ण कारणों (Bona fide reasons) से संतुष्ट होते हैं कि पहली बार आधार क्यों नहीं दिया जा सका था और अब कस्टडी अनिवार्य है, तभी पुनः गिरफ्तारी की न्यायिक अनुमति दी जा सकेगी।
- जांच का तबादला और विभागीय जांच: प्रशासनिक स्तर पर, वरिष्ठ प्राधिकारी तुरंत उस मामले की आगे की जांच किसी अन्य निष्पक्ष अधिकारी को सौंपेंगे। इसके साथ ही, गंभीर संवैधानिक चूक करने वाले संबंधित पुलिस अधिकारी के खिलाफ अनिवार्य रूप से विभागीय जांच (Departmental Inquiry) के आदेश दिए जाएंगे। जांच में प्रतिकूल निष्कर्ष आने पर अधिकारी के विरुद्ध दंडात्मक कार्रवाई होगी और उसकी सर्विस बुक (Service Book) में स्थायी प्रविष्टि की जाएगी।
अनुच्छेद 22(2) का उल्लंघन, मुआवजा और ‘खत्री’ नजीर का स्मरण
- 24 घंटे में पेशी का पत्थर पर उकेरा गया सिद्धांत: अदालत ने ऐतिहासिक खत्री बनाम बिहार राज्य (भागलपुर अंखफोड़वा कांड) का स्मरण करते हुए कहा कि गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने का संवैधानिक अधिदेश (Article 22(2)) आज भी पत्थर पर उकेरी गई लकीर की तरह अडिग है। अनुच्छेद 22(2) के उल्लंघन के मामलों में भी पुनः कस्टडी हेतु यही प्रक्रिया लागू होगी।
- सार्वजनिक विधि मुआवजा (Public Law Compensation): उच्च न्यायालयों को यह अधिकार होगा कि वे अनुच्छेद 22(2) के उल्लंघन के मामलों में सार्वजनिक कानून उपचार के तहत पीड़ित को राज्य से आर्थिक मुआवजा (Compensation) दिलाने का निर्देश दें, जिसके साथ पीड़ित को दीवानी अदालत में अलग से नुकसान की भरपाई का मुकदमा दायर करने की छूट रहेगी।
- अपराध की गंभीरता स्वतंत्रता छीनने का बहाना नहीं: तीन जजों की ऐतिहासिक पीठ के फैसले प्रभु दयाल देवराह बनाम डीएम कामरूप (1974) का उद्धरण देते हुए पीठ ने रेखांकित किया कि समाज के विरुद्ध अपराध या असामाजिक कृत्यों की गंभीरता चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, वह किसी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर कानून और संविधान द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना प्रहार करने का आधार कभी नहीं बन सकती।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम आदेश एवं अखिल भारतीय निर्देश
- जसकरनजीत सिंह की रिहाई बहाल: उच्च न्यायालय के स्टे आदेश को निरस्त करते हुए स्थानीय अदालत के रिहाई आदेश को बरकरार रखा गया।
- देशव्यापी सर्कुलेशन: सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया कि इस ऐतिहासिक फैसले की आधिकारिक प्रति सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस महानिदेशकों (DGPs) को तुरंत भेजी जाए, ताकि देश के प्रत्येक थाने और जांच अधिकारी को इस संवैधानिक दायित्व व परिणामी विभागीय कार्रवाई से अवगत कराया जा सके।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: जसकरनजीत सिंह बनाम पंजाब राज्य व अन्य [आपराधिक अपील – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक संवैधानिक प्रावधान: भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता), अनुच्छेद 22(1) (गिरफ्तारी का आधार जानने व विधिक परामर्श का अधिकार), अनुच्छेद 22(2) (24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी) एवं अनुच्छेद 32/136
- प्रासंगिक प्रक्रियात्मक विधियां: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 47, 48 एवं 58 (गिरफ्तारी के आधार और प्रक्रिया) / CrPC 1973 की धारा 50 एवं 57; पुलिस अधिनियम, 1861 एवं राज्य पुलिस सेवा नियम (विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई)
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025, सुप्रीम कोर्ट) — ‘अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तारी का लिखित आधार न देना गिरफ्तारी को आरंभ से ही शून्य (Void ab initio) बनाता है; पुनः गिरफ्तारी केवल न्यायिक अनुमति और शर्तों के अधीन संभव है।’
- पंकज बंसल बनाम भारत संघ (2023, सुप्रीम कोर्ट) एवं प्रबीर पुरकायस्थ बनाम राज्य (NCT of Delhi) (2024, सुप्रीम कोर्ट) — ‘गिरफ्तारी के कारणों (Reasons) और गिरफ्तारी के आधार (Grounds of arrest) में अंतर है; लिखित आधार अभियुक्त को बिना देरी के सौंपा जाना एक अनुल्लंघनीय संवैधानिक अधिदेश है।’
- खत्री (II) बनाम बिहार राज्य (1981, सुप्रीम कोर्ट) — ’24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेशी का पालन पुलिस अधिकारियों द्वारा अत्यंत निष्ठा और कठोरता से किया जाना अनिवार्य है।’
- प्रभु दयाल देवराह बनाम जिला मजिस्ट्रेट, कामरूप (1974, सुप्रीम कोर्ट) — ‘अपराध की वीभत्सता या सामाजिक प्रभाव कभी भी विधिक प्रक्रिया को दरकिनार करने का बहाना नहीं बन सकते।’
- पीठ: न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां और न्यायमूर्ति अतुल एस. चांदुरकर (सर्वोच्च न्यायालय)
Grounds of Arrest: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ (Judges) | न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर |
| मामला | जसकरणजीत सिंह (SAD नेता) बनाम पंजाब राज्य |
| मुख्य संवैधानिक प्रावधान | अनुच्छेद 22(1) व 22(2) — गिरफ्तारी और निरोध के खिलाफ संरक्षण |
| मुख्य लैंडमार्क फैसला संदर्भित | Mihir Rajesh Shah v. State of Maharashtra (2025) |
| अदालत का फैसला | बिना लिखित कारणों के गिरफ्तारी अवैध; दोषी अधिकारी पर विभागीय जांच और सर्विस बुक में प्रतिकूल प्रविष्टि |

