Friday, September 18, 2026
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Shiv Sena Conflict: मतदाता असल में पार्टी को वोट देता है, उम्मीदवार को नहीं; चुने जाने के बाद पाला बदलने वाले विधायकों के वोटों को नए गुट का समर्थन कैसे माना जा सकता है?

सुप्रीम कोर्ट की मुख्य कानूनी टिप्पणियां

  1. “जनता पार्टी को वोट देती है, व्यक्ति को नहीं”:न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने टिप्पणी की कि लोकतंत्र में जब कोई विधायक चुनाव जीतने के बाद अपनी वफादारी बदल लेता है, तो उसके द्वारा प्राप्त वोटों को उसकी नई पार्टी या गुट का समर्थन नहीं माना जा सकता। “आज के समय में मतदाता वास्तव में उम्मीदवार के बजाय राजनीतिक दल के नाम पर वोट देता है। ऐसे में चुनाव जीतने के बाद पाला बदलने वाले विधायक के वोटों को उसकी नई पार्टी के समर्थन के रूप में देखना क्या सही होगा?”
  2. अयोग्यताओं की लंबित कार्यवाही (Disqualification Proceedings):अदालत ने कहा कि जब ECI यह फैसला कर रहा था, तब विधायकों की अयोग्यता की कार्यवाही लंबित थी, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यदि विधायक ही अयोग्य ठहराए जाते हैं, तो उनके आधार पर तय हुआ ‘विधायी बहुमत’ सुरक्षित परीक्षण नहीं माना जा सकता।
  3. न्यूट्रल विकल्प (तीसरा/चौथा रास्ता) क्यों नहीं अपनाया?अदालत ने सवाल किया कि यदि ECI के सामने संगठनात्मक बहुमत (Organisational Wings) को आंकने में चुनौतियां थीं, तो उसने दोनों गुटों को ‘धनुष-बाण’ चिह्न देने से इनकार क्यों नहीं किया? “यदि सभी मौजूदा परीक्षण अपर्याप्त या बाधित थे, तो चुनाव आयोग के पास यह विकल्प मौजूद था कि वह किसी भी गुट को बढ़त न दे। दोनों गुटों को अपने-अपने नए चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ने दिया जाता, न कि बालासाहेब के नाम और चिह्न पर।”

शिंदे गुट का पक्ष और दलीलें

शिंदे गुट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने चुनाव आयोग के फैसले का बचाव करते हुए निम्नलिखित तर्क रखे:

  • वोट शेयर का आंकड़ा: कौल ने बताया कि शिंदे गुट के 40 विधायकों को 2019 के विधानसभा चुनावों में शिवसेना के कुल विजयी वोटों का 76% वोट शेयर मिला था। इसी तरह, 13 सांसदों को लोकसभा चुनावों में 73% वोट प्राप्त हुए थे।
  • संगठनात्मक ढांचे की सीमाएं: पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में ज्यादातर मनोनीत (Nominated) सदस्य थे, जो जमीनी कार्यकर्ताओं की इच्छा को नहीं दर्शाते थे। इसलिए परिस्थितियों को देखते हुए केवल ‘विधायी बहुमत’ ही एकमात्र व्यावहारिक रास्ता बचा था।
  • Subhash Desai मामले का हवाला: उन्होंने तर्क दिया कि संविधान पीठ के सुभाष देसाई मामले के फैसले ने अयोग्यता याचिकाएं लंबित रहने के बावजूद ECI को Symbols Order के तहत फैसला लेने से नहीं रोका था।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों में विभाजन, चुनाव चिह्न (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 के पैरा 15, संविधान की दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून) और चुनाव आयोग (ECI) द्वारा अपनाए जाने वाले ‘विधायी बहुमत परीक्षण’ (Legislative Majority Test) के विधिक मानकों पर अत्यंत महत्वपूर्ण और बुनियादी संवैधानिक सवाल खड़े किए हैं।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की विशेष पीठ शिवसेना पार्टी के नाम और उसके आरक्षित ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न को एकनाथ शिंदे गुट को आवंटित करने के चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ उद्धव ठाकरे गुट द्वारा दायर याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई कर रही है।शीर्ष अदालत ने टिप्पणी की है कि संसदीय लोकतंत्र में मतदाता वास्तव में किसी प्रतिनिधि (उम्मीदवार) को नहीं बल्कि राजनीतिक दल और उसकी विचारधारा को वोट देता है। ऐसे में चुनाव जीतने के बाद यदि कोई गुट मूल दल से अलग हो जाता है, तो उसके विधायकों को मिले मतों को नए गुट के प्रति जनता का समर्थन मान लेना एक अत्यंत संदेहास्पद और काल्पनिक निष्कर्ष (Conjectural Inference) है।

शीर्ष अदालत की प्रमुख विधिक टिप्पणियां एवं सवाल

1. ‘मतदाता पार्टी को चुनता है, व्यक्ति को नहीं’: न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची

न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने विधायी बहुमत के आधार पर पार्टी के स्वामित्व का निर्धारण करने के चुनाव आयोग के दृष्टिकोण पर सवाल उठाते हुए कहा:

“आज के समय में मतदाता वास्तव में राजनीतिक दल को वोट देता है, न कि व्यक्तिगत प्रतिनिधि को। जब किसी विधायक के चुने जाने के बाद उसकी राजनीतिक निष्ठा बदल जाती है, तो क्या उस विधायक को मिले वोटों को निरंतर उसी का और उसके नए दल का समर्थन माना जा सकता है? क्या यह जनमत का सही प्रतिबिंब होगा? यह एक ऐसा विधिक पहलू है जिस पर अब तक किसी भी पूर्व फैसले में गहराई से विचार नहीं किया गया है।”

“मूल वोट तो अविभाजित शिवसेना को मिले थे। विभाजन के बाद यह कोई नहीं जान सकता कि मतदाता ने अलग हुए गुट के उम्मीदवार को वोट दिया होता या नहीं। यह मान लेना कि मतदाता खंडित दल को ही वोट देगा, पूरी तरह अनुमान पर आधारित (Conjecture) है और चुनाव आयोग ने यही काल्पनिक निष्कर्ष निकाला है।”

2. न्यायिक समीक्षा का दायरा और चुनाव आयोग के विकल्प

  • पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत चुनाव आयोग के विवेक की जगह अपना विवेक नहीं थोप रही है, लेकिन न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के तहत यह देखना अदालत का संवैधानिक दायित्व है कि क्या आयोग ने निर्णय लेते समय सभी उपलब्ध विकल्पों और कानूनी पहलुओं पर विचार किया था या नहीं।
  • न्यायमूर्ति बागची ने सवाल उठाया:“यदि संगठनात्मक परीक्षण (Organisational Test) और अन्य मानक विफल हो रहे थे, तो क्या चुनाव आयोग ने दोनों गुटों को आरक्षित ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न से वंचित रखने और दोनों को अपने-अपने अलग चुनाव चिह्नों पर स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने का निर्देश देने के विकल्प पर विचार किया था? दोनों गुटों को बालासाहेब के प्रभाव के बजाय अपनी-अपनी ताकत पर चुनाव लड़ना चाहिए था।”

3. अयोग्यता कार्यवाही के लंबित रहते विधायी बहुमत कितना सुरक्षित?

  • अदालत ने रेखांकित किया कि जब उन्हीं विधायकों के खिलाफ संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता याचिकाएं (Disqualification Proceedings) विचाराधीन थीं, तो केवल उनके संख्याबल को पार्टी के वास्तविक नियंत्रण का ‘सुरक्षित पैमाना’ कैसे माना जा सकता है।

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शिंदे गुट की दलीलें (वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल)

  • केवल सिर गिनने का मामला नहीं: एकनाथ शिंदे गुट की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने चुनाव आयोग के आदेश का बचाव करते हुए तर्क दिया कि आयोग ने केवल विधायकों की संख्या नहीं गिनी, बल्कि 2019 के चुनावों में मिले कुल मत प्रतिशत (Vote Share) और जनादेश का भी गहन विश्लेषण किया:
    • शिंदे गुट का समर्थन करने वाले 40 विधायकों ने 2019 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना के कुल 55 विजयी विधायकों को मिले मतों का लगभग 76% वोट शेयर हासिल किया था।
    • इसी तरह, लोकसभा में शिंदे गुट का समर्थन करने वाले 13 सांसदों ने शिवसेना के कुल 18 सांसदों को मिले मतों का लगभग 73% वोट प्राप्त किया था।
  • सुभाष देसाई फैसले का हवाला: कौल ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के सुभाष देसाई बनाम प्रधान सचिव फैसले ने अयोग्यता कार्यवाही लंबित होने पर विधायी बहुमत परीक्षण के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया था; यह केवल परिस्थितियों के अनुसार परीक्षण के कमजोर होने की संभावना को स्वीकार करता है।
  • संगठनात्मक ढांचे की सीमा: उन्होंने कहा कि 2018 का संगठनात्मक ढांचा पार्टी प्रमुख के मनोनीत सदस्यों से भरा था और जमीनी कार्यकर्ताओं के बीच जनमत संग्रह (Referendum) कराना व्यावहारिक रूप से असंभव था, जिसके कारण विधायी बहुमत ही एकमात्र व्यावहारिक विकल्प बचा था।

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (2022 का विभाजन और ईसीआई का आदेश)

  • 2022 का राजनीतिक विभाजन: जून 2022 में शिवसेना दो धड़ों में बंट गई—एक का नेतृत्व उद्धव ठाकरे और दूसरे का नेतृत्व एकनाथ शिंदे ने किया।
  • चुनाव आयोग का फैसला (फरवरी 2023): * शिंदे गुट ने चुनाव आयोग में याचिका देकर मूल ‘शिवसेना’ नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न पर दावा किया।
    • चुनाव आयोग ने माना कि पार्टी का अद्यतन संविधान रिकॉर्ड पर न होने और पदाधिकारियों के दावों में स्पष्टता न होने के कारण ‘संगठनात्मक बहुमत परीक्षण’ अनिर्णायक रहा।
    • इसके बाद आयोग ने ‘सादिक अली’ (1971) नजीर के तहत विधायी विंग के संख्याबल पर भरोसा किया, जहां शिंदे गुट के पास विधानसभा में 40 विधायक (ठाकरे गुट के 15 के मुकाबले) और लोकसभा में 13 सांसद (ठाकरे गुट के 5 के मुकाबले) थे।
    • चुनाव आयोग ने विधायी बहुमत के आधार पर शिंदे गुट को ही ‘असली शिवसेना’ घोषित करते हुए नाम और चुनाव चिह्न आवंटित कर दिया।
  • सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: ठाकरे गुट ने इस आदेश को यह कहते हुए चुनौती दी कि विधायिका में बगावत करने वाला गुट पूरी राजनीतिक पार्टी और उसके कैडर की पहचान को हड़प नहीं सकता। मामले की सुनवाई अगले सप्ताह भी जारी रहेगी।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: उद्धव ठाकरे बनाम भारत निर्वाचन आयोग एवं अन्य [विशेष अनुमति याचिका / सिविल अपील – सर्वोच्च न्यायालय]
  • प्रासंगिक कानून: निर्वाचन प्रतीक (आरक्षण एवं आबंटन) आदेश, 1968 का पैरा 15 (मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों के प्रतिद्वंद्वी गुटों के दावों पर आयोग की शक्ति); भारत का संविधान – अनुच्छेद 324 (चुनाव आयोग की अधीक्षण शक्तियां), अनुच्छेद 226/136, एवं दसवीं अनुसूची (दलबदल विरोधी कानून)
  • संबद्ध संविधान पीठ नजीरें:
    • सादिक अली बनाम भारत निर्वाचन आयोग (1972, सुप्रीम कोर्ट) — ‘पार्टी विभाजन में तीन परीक्षण: उद्देश्य व लक्ष्य, संगठनात्मक बहुमत और विधायी बहुमत।’
    • सुभाष देसाई बनाम प्रधान सचिव, महाराष्ट्र राज्यपाल (2023, 5-जजों की संविधान पीठ) — ‘राजनीतिक दल (Political Party) और विधायी दल (Legislative Wing) दो अलग इकाइयां हैं; केवल विधायी दल की बगावत को राजनीतिक दल का आधिकारिक विभाजन नहीं माना जा सकता।’
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • एकनाथ शिंदे गुट की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल
    • उद्धव ठाकरे गुट की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल
  • पीठ: भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (सर्वोच्च न्यायालय)

Shiv Sena Conflict: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतसर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठासीन पीठCJI सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची, जस्टिस वी. मोहना
मूल विवादशिवसेना का नाम और ‘धनुष-बाण’ चुनाव चिह्न एकनाथ शिंदे गुट को दिए जाने के ECI फैसले को चुनौती
कोर्ट का मुख्य सवालक्या केवल विधायकों/सांसदों की संख्या के आधार पर पार्टी के असली स्वामित्व का फैसला किया जा सकता है?
ECI का फैसलाशिंदे गुट के पास 55 में से 40 MLA और 18 में से 13 MP थे, इसलिए उनके पक्ष में फैसला दिया।
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