इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य निर्देश
- अदालती अधिकारियों द्वारा न्यायिक जांच: हाईकोर्ट ने प्रयागराज जिला अदालत के जज ऑफ स्मॉल कॉज कोर्ट (Judge of Small Cause Court) और विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (Special CJM), प्रयागराज को इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे (Sealed Cover) में प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
- गवाह छात्रों की गोपनीयता की सुरक्षा: अदालत ने जांच अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं कि जांच के दौरान बयान दर्ज कराने वाले अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (SC/ST) के छात्रों की पहचान पूरी तरह गुप्त रखी जाए, ताकि उन पर किसी प्रकार की प्रतिशोधात्मक कार्रवाई (Retaliation) न हो सके।
- उत्तर पुस्तिकाओं का पुनः मूल्यांकन (Re-evaluation): यूनिवर्सिटी के कुलपति को एक स्वतंत्र समिति का गठन कर आरोपी प्रोफेसर द्वारा जांची गई छात्र की उत्तर पुस्तिकाओं का निष्पक्ष पुनः मूल्यांकन कराने का आदेश दिया गया है।
- UGC नियमों और इक्वल अपॉर्चुनिटी सेल पर जवाब तलब: हाईकोर्ट ने कुलपति से हलफनामा दायर कर जवाब मांगा है कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नियमों के तहत संस्थान में ‘बराबर अवसर सेल’ (Equal Opportunity Cell) और SC/ST छात्रों की शिकायतों के निवारण के लिए विशेष समिति का गठन किया गया है या नहीं।
प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों (NLUs) और उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव, हाशिए के वर्गों (SC/ST) के छात्रों के संरक्षण, परीक्षा मूल्यांकन में पूर्वाग्रह और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के अनिवार्य संस्थागत विनियमों के क्रियान्वयन पर कड़ा संज्ञान लिया है।
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने बीए एलएलबी (ऑनर्स) के पांचवें सेमेस्टर के छात्र और एक पीएचडी शोधार्थी द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि ऐसे गंभीर आरोपों की निष्पक्ष एजेंसी से जांच जरूरी है। अदालत ने उत्तर पुस्तिकाओं के पुनर्मूल्यांकन के लिए एक स्वतंत्र समिति गठित करने का निर्देश देने के साथ-साथ जिला न्यायालय प्रयागराज के दो न्यायिक अधिकारियों को जांच कर सीलबंद लिफाफे में रिपोर्ट सौंपने का आदेश दिया है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (प्रयागराज) के एक शिक्षक पर दो विधि छात्रों द्वारा जातिगत अपमानजनक टिप्पणियां करने और उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में जानबूझकर पक्षपात करने के आरोपों की निष्पक्ष जांच के लिए अदालत ने दोहरी जांच प्रणाली का आदेश दिया है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं निर्देश
1. ‘आरोप गंभीर हैं, निष्पक्ष एजेंसी द्वारा जांच अपरिहार्य’: न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर विश्वविद्यालय परिसर में समानता और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों को रेखांकित करते हुए अदालत ने कहा: “आरोप गंभीर हैं, और ठीक इसी कारण से यह आवश्यक है कि संबंधित व्यक्ति को सुनवाई का पूरा अवसर प्रदान करने के बाद किसी निष्पक्ष एजेंसी द्वारा इनकी सूक्ष्म जांच कराई जाए। इस जांच का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होगा कि क्या अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के छात्रों को प्रतिवादी संख्या 6 (शिक्षक) या विश्वविद्यालय में कार्यरत किसी अन्य व्यक्ति द्वारा जाति आधारित अपमान या भेदभाव का शिकार बनाया गया है, और क्या इस संबंध में की गई शिकायतों पर विश्वविद्यालय द्वारा लागू विनियमों के अनुसार उचित कार्रवाई की गई थी।”
2. न्यायिक अधिकारियों द्वारा स्वतंत्र जांच और छात्रों की पहचान की सुरक्षा
- अदालत ने प्रयागराज जिला न्यायालय के लघु वाद न्यायालय (Small Cause Court) के न्यायाधीश और विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (Special CJM), प्रयागराज को स्वतंत्र रूप से इस पूरे प्रकरण की संयुक्त जांच करने और अगली सुनवाई से पूर्व अपनी विस्तृत जांच रिपोर्ट सीलबंद लिफाफे (Sealed Cover) में अदालत के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।
- प्रतिशोध से सुरक्षा: याचिका में छात्रों द्वारा संभावित प्रतिशोध (Apprehension of Retaliation) की आशंका जताए जाने के मद्देनजर अदालत ने निर्देश दिया कि जांच अधिकारी उन छात्रों की पहचान गोपनीय रखने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएंगे जो जांच के दौरान अपने बयान दर्ज कराते हैं।
3. उत्तर पुस्तिकाओं का स्वतंत्र पुनर्मूल्यांकन
- पीठ ने स्पष्ट किया कि आदेश में व्यक्त कोई भी बात आरोपों की सत्यता पर अदालत की अंतिम राय नहीं मानी जाएगी।
- अदालत ने विश्वविद्यालय के कुलपति (Vice-Chancellor) को निर्देश दिया कि वे एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति का गठन करें, जो याचिकाकर्ता छात्र की पांचवें सेमेस्टर की उन उत्तर पुस्तिकाओं का पुनर्मूल्यांकन (Re-evaluation) करेगी जिन्हें आरोपी शिक्षक द्वारा पढ़ाया और जांचा गया था, साथ ही उन अन्य विषयों की कॉपियों का भी जिन्हें छात्र इंगित करे।
4. यूजीसी विनियमों और ‘इक्वल अपॉर्चुनिटी सेल’ पर हलफनामा तलब
- अदालत ने कुलपति को एक संक्षिप्त व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया जिसमें स्पष्ट किया जाए कि:
- क्या विश्वविद्यालय ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के संबंधित नियमों के तहत ‘इक्वल अपॉर्चुनिटी सेल’ (Equal Opportunity Cell) और एससी/एसटी छात्रों की शिकायतों के निवारण के लिए विशेष समिति का गठन किया है?
- यदि हां, तो उसकी वास्तविक संरचना (Composition) क्या है और वह कितनी सक्रियता से कार्य कर रही है?
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं याचिकाकर्ताओं के आरोप
- याचिकाकर्ता: याचिका डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, प्रयागराज के दो छात्रों द्वारा दायर की गई थी—पहला याचिकाकर्ता पीएचडी शोधार्थी है और दूसरा बीए एलएलबी (ऑनर्स) के पंचम सेमेस्टर का नियमित छात्र है।
- जातिगत पूर्वाग्रह और अपमान के आरोप:
- छात्र का आरोप है कि उसकी उत्तर पुस्तिकाओं का दुर्भावनापूर्ण और अत्यधिक कड़ा मूल्यांकन केवल उसकी जाति के कारण किया गया।
- आरोप के अनुसार, प्रतिवादी संख्या 6 (संकाय सदस्य) ने कक्षा और सार्वजनिक मंचों पर कई बार जाति और आरक्षण प्रणाली को लेकर अपमानजनक टिप्पणियां कीं, साथ ही आरक्षित श्रेणी के तहत नियुक्त एक अन्य वर्तमान संकाय सदस्य के विरुद्ध भी अनुचित व्यक्तिगत बातें कहीं।
- प्रशासनिक निष्क्रियता और प्रोफेसर को संरक्षण:
- पीड़ित छात्र ने विश्वविद्यालय के कुलपति को ईमेल के माध्यम से औपचारिक शिकायत भेजी थी।
- आरोप है कि सक्षम प्राधिकारियों ने शिकायत पर कोई कार्रवाई नहीं की और आरोपी शिक्षक को बचाने का प्रयास किया। बार-बार स्मरण पत्र (Reminders) भेजने के बावजूद कोई निवारण तंत्र सक्रिय नहीं हुआ, जिसके चलते छात्रों को उच्च न्यायालय की शरण लेनी पड़ी।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: विधि छात्रगण बनाम डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, प्रयागराज व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रयागराज]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: अधिवक्ता शिवम अग्रवाल
- विश्वविद्यालय व राज्य की ओर से: मुख्य स्थायी अधिवक्ता (Chief Standing Counsel)
- प्रासंगिक कानून एवं विनियम:
- विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता का संवर्धन) विनियम, 2012 (UGC Promotion of Equity in Higher Educational Institutions Regulations, 2012)
- अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST PoA Act)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (जातिगत भेदभाव का निषेध), अनुच्छेद 21 एवं अनुच्छेद 226
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- सुखदेव सिंह बनाम भगतराम (सुप्रीम कोर्ट) एवं रोहित वेमुला प्रकरण संबंधी दिशानिर्देश — ‘उच्च शिक्षण संस्थानों का यह संवैधानिक और वैधानिक दायित्व है कि वे परिसरों को जातिगत पूर्वाग्रहों से मुक्त रखें और वंचित वर्गों के छात्रों के लिए निष्पक्ष, पारदर्शी व भयमुक्त शिकायत निवारण तंत्र स्थापित करें।’
- पीठ: न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर (इलाहाबाद उच्च न्यायालय)
- जांच एजेंसी/अधिकारी: न्यायाधीश, लघु वाद न्यायालय एवं विशेष CJM, प्रयागराज (सीलबंद रिपोर्ट अगली सुनवाई पर प्रस्तुत की जाएगी)।
Dr. Rajendra Prasad National Law University:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर |
| याचिकाकर्ता | पीएचडी शोधार्थी और बीए एलएलबी (5वां सेमेस्टर) का छात्र |
| प्रतिवादी संस्थान | डॉ. राजेंद्र प्रसाद नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, प्रयागराज |
| मुख्य आरोप | प्रोफेसर (प्रतिवादी सं. 6) द्वारा जातिगत अपमान और उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन में पक्षपात |
| हाईकोर्ट का निर्देश | जिला न्यायपालिका के जजों व यूनिवर्सिटी द्वारा स्वतंत्र समितियों का गठन |

