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मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी तर्क
- मामले की पृष्ठभूमि (120 चेकों पर एक हस्ताक्षर का संकट):याचिकाकर्ता अपर्णा पुरी, जो ‘अमीरा प्योर फूड्स प्राइवेट लिमिटेड’ की एक कर्मचारी थीं, ने अपने नियोक्ता के निर्देशों पर चेक पर हस्ताक्षर किए थे। चेकों के अनादर (Bounce) होने पर उनके और कंपनी के खिलाफ कैथल (85 मामले), कुरुक्षेत्र और करनाल की अदालतों में धारा 138 NI Act के 120 से अधिक शिकायत दर्ज की गईं।
- व्यावहारिक कठिनाई और ट्रायल कोर्ट का रुख:प्रत्येक कोर्ट द्वारा अलग जमानत बॉन्ड और अलग-अलग श्योरिटी मांगने के कारण याचिकाकर्ता के लिए 120 ज़मानतदार जमा करना लगभग असंभव हो गया था। कैथल की एक अदालत ने हाईकोर्ट के पुराने आदेश के बावजूद उनसे ₹1 करोड़ का नया कॉमन श्योरिटी बॉन्ड मांगने का आदेश जारी कर दिया, जिसके बाद उन्होंने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की।
- सर्वोच्च न्यायालय के नज़ीरों का अनुप्रयोग:हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया:
- Girish Gandhi v. State of UP (2024 INSC 617): जहाँ कहा गया कि जब आरोपी कई राज्यों या मुकदमों में अलग-अलग श्योरिटी लाने में असमर्थ हो, तो अदालत को उसकी स्वतंत्रता (Article 21) और उपस्थिति सुनिश्चित करने की आवश्यकता के बीच संतुलन बनाना चाहिए।
- Hani Nishad v. State of UP: जहाँ 31 मुकदमों के लिए ₹30,000 का केवल एक व्यक्तिगत बॉन्ड और दो ज़मानती स्वीकार किए गए थे।
- BNSS की धारा 485(4) / CrPC 441(4) के तहत प्रक्रियात्मक सरलीकरण:अदालत ने माना कि कानून ज़मानतदार की उपयुक्तता साबित करने के लिए कॉमन शपथ पत्र स्वीकार करने की अनुमति देता है। अतः ज़मानतदार को हर कोर्ट में अलग-अलग चक्कर काटने के बजाय एक ही कॉमन एफिडेविट फाइल करने की छूट दी गई।
- सशर्त उपस्थिति का जनादेश:अदालत ने स्पष्ट किया कि यह राहत कोई “मुफ्त पास” (Free Pass) नहीं है। याचिकाकर्ता को सभी ट्रायल अदालतों में नियत तिथियों पर पेश होना अनिवार्य होगा। किसी भी मामले में अनुपस्थित रहने पर संबंधित अदालत बॉन्ड जब्त (Forfeiture of Bonds) करने की कानूनी कार्यवाही शुरू करने के लिए स्वतंत्र होगी।
मुख्य विधिक व ज़मानत न्यायशास्त्र निष्कर्ष
1. “Excessive Bail is No Bail” का संवैधानिक सिद्धांत:
यह निर्णय स्थापित करता है कि bailable अपराधों (जैसे Section 138 NI Act) में यदि अदालतें ऐसी शर्तें लगाती हैं जिन्हें पूरा करना आरोपी के लिए असंभव हो, तो वह प्रत्यक्ष रूप से अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। अदालतों का प्राथमिक उद्देश्य आरोपी की उपस्थिति सुनिश्चित करना है, न कि उसे सजा के तौर पर जेल में रखना।
2. बहु-आपराधिक शिकायतों में प्रक्रियात्मक सुगमता (Procedural Rationalization in Multi-Case Prosecutions):
जब एक ही लेन-देन या कंपनी के कारण किसी व्यक्ति के खिलाफ दर्जनों शिकायतें दर्ज होती हैं, तो प्रक्रियात्मक कानूनों (BNSS Section 485) का उपयोग करके एक साझा ज़मानत बॉन्ड और कॉमन श्योरिटी एफिडेविट को लागू किया जाना चाहिए।
चंडीगढ़: भारत का संविधान के अनुच्छेद 21 (दैहिक स्वतंत्रता और गरिमा का मौलिक अधिकार), परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (Negotiable Instruments Act, 1881) की धारा 138 (खाते में अपर्याप्त निधि के कारण चेक अनादरण—जमानती अपराध) व धारा 141 (कंपनियों द्वारा किए गए अपराध व अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता का दायित्व), भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 485(4) (पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 441(4)—जमानती की उपयुक्तता का शपथ पत्र द्वारा सत्यापन), तथा सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णयों—गिरीश गांधी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य [2024 INSC 617] एवं हनी निषाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य [SLP (Crl.) No. 8914-8915/2018] के विधिक सिद्धांतों के तहत पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने चेक बाउंस मुकदमों के बोझ तले दबी एक कर्मचारी को अभूतपूर्व प्रक्रियात्मक राहत प्रदान की है।
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय वशिष्ठ (Justice Sanjay Vashisth) की एकल पीठ ने 27 अक्टूबर 2026 को पारित अपने महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट व्यवस्था दी कि कंपनी के चेक पर हस्ताक्षर करने के कारण 120 से अधिक मुकदमों का सामना कर रही कर्मचारी अपर्णा पुरी (Aparna Puri) द्वारा पूर्व में प्रस्तुत ₹10 लाख मूल्य के बेल बॉन्ड और स्योरिटी बॉन्ड कैथल, कुरुक्षेत्र और करनाल की विचारण अदालतों में लंबित उसके शेष सभी आपराधिक मामलों के लिए संयुक्त रूप से मान्य (Common Surety) रहेंगे।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट की नज़ीरों का हवाला देते हुए रेखांकित किया कि जमानत की शर्तें ऐसी नहीं होनी चाहिए जिनका पालन करना व्यावहारिक रूप से असंभव हो जाए; क्योंकि “अत्यधिक और अनुचित जमानत वस्तुतः जमानत से इनकार करने के समान (Excessive bail is no bail)” होती है। अदालत ने प्रक्रिया को सरल बनाने हेतु जमानती को सभी मामलों के लिए केवल एक ‘साझा शपथ पत्र’ (Single Common Affidavit) दाखिल करने की अनुमति दी, हालांकि यह स्पष्ट किया कि प्रत्येक अदालत अलग से जमानत आदेश पारित करेगी और आरोपी को अदालती तारीखों पर व्यक्तिगत रूप से पेश होना अनिवार्य रहेगा।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘अत्यधिक जमानत वास्तव में जमानत न मिलने के बराबर; शर्तें आनुपातिक होनी चाहिए’:
न्यायमूर्ति संजय वशिष्ठ ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय गिरीश गांधी (2024) पर भरोसा जताते हुए अपने निर्णय में दर्ज किया: “जमानती (Surety) का मुख्य उद्देश्य विचारण के दौरान अभियुक्त की उपस्थिति सुनिश्चित करना होता है। किंतु कानून का यह भी सुस्थापित सिद्धांत है कि ‘अत्यधिक जमानत वस्तुतः जमानत से इनकार (Excessive bail is no bail) है’। जहाँ किसी अभियुक्त के विरुद्ध कई मामले दर्ज हों और वह प्रत्येक मामले में अलग-अलग जमानती की व्यवस्था करने में असमर्थ हो, वहाँ अदालत को उसकी उपस्थिति की आवश्यकता और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उसकी दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार के बीच संतुलन साधना अनिवार्य है। कोई भी ऐसी शर्त जिसका पालन करना असंभव हो जाए, वह अभियुक्त की रिहाई के मूल विधिक उद्देश्य को ही समाप्त कर देती है।”
2. ‘120 मामलों में अलग-अलग जमानती मांगना दमनकारी बोझ’:
पीठ ने ट्रायल कोर्ट के ₹1 करोड़ के नए बॉन्ड मांगने के रवैये को अनुचित मानते हुए कहा: “याचिकाकर्ता से प्रत्येक मामले में अलग-अलग और भारी-भरकम जमानती प्रस्तुत करने की मांग करना उस पर एक अत्यंत दमनकारी और असंभव बोझ (Onerous and impossible burden) डालना है। जमानत की शर्तें तार्किक, व्यावहारिक और आनुपातिक होनी चाहिए, न कि इतनी कठोर कि उनका पालन करना किसी के लिए भी असंभव बन जाए।”
3. BNSS की धारा 485(4) के तहत एकल साझा शपथ पत्र (Common Affidavit) की व्यवस्था:
- विचारण अदालतों में जमानती के सत्यापन की व्यावहारिक समस्या को दूर करने हेतु उच्च न्यायालय ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 485(4) (पूर्ववर्ती CrPC धारा 441(4)) की शक्ति का उपयोग किया।
- अदालत ने निर्देश दिया कि जमानती को प्रत्येक 120 मुकदमों में अलग-अलग 120 हलफनामे देने की आवश्यकता नहीं है; एक ही साझा शपथ पत्र (Single Common Affidavit), जिसमें सभी प्रासंगिक विवरण और प्रतिबद्धताएं दर्ज होंगी, सभी संबंधित विचारण अदालतों (कैथल, कुरुक्षेत्र और करनाल) द्वारा पर्याप्त मानकर स्वीकार किया जाएगा।
4. उपस्थिति से कोई पूर्ण छूट नहीं; अनुपस्थिति पर बॉन्ड जब्ती का अधिकार:
- उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यह आदेश कोई ‘खुली छूट’ (Free Pass) नहीं है। अपर्णा पुरी को प्रत्येक विचारण अदालत के समक्ष कानून के अनुसार नियत तारीखों पर उपस्थित होना होगा।
- यदि वह किसी भी मामले में बिना वैध कारण के अनुपस्थित रहती हैं, तो संबंधित ट्रायल कोर्ट कानून सम्मत प्रक्रिया अपनाते हुए उसके जमानत और स्योरिटी बॉन्ड को जब्त (Forfeiture of Bonds) करने की कार्यवाही शुरू करने के लिए स्वतंत्र होगी।
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़.
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2025–2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
|---|---|
| फोरम / न्यायालय | पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ (आपराधिक एवं संवैधानिक क्षेत्राधिकार) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति संजय वशिष्ठ (Justice Sanjay Vashisth) (एकल पीठ) |
| निर्णय की तिथि | 27 अक्टूबर 2026 |
| केस संदर्भ | अपर्णा पुरी बनाम हरियाणा राज्य व अन्य [CRM-M / 2026] |
| याचिकाकर्ता | अपर्णा पुरी (Aparna Puri) — ‘अमीरा प्योर फूड्स प्राइवेट लिमिटेड’ की कर्मचारी एवं अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता। |
| याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता | वरिष्ठ अधिवक्ता पी.एस. अहलूवालिया (Senior Advocate P.S. Ahluwalia) एवं अधिवक्ता एच.एस. रंधावा (Advocate H.S. Randhawa)। |
| प्रतिवादी पक्ष | हरियाणा राज्य (गृह विभाग व अभियोजन पक्ष — अतिरिक्त महाधिवक्ता रुचि सेखरी (Additional Advocate General Ruchi Sekhri) द्वारा प्रतिनिधित्व)। |
| मूल कॉर्पोरेट संस्था (मुख्य अभियुक्त) | अमीरा प्योर फूड्स प्राइवेट लिमिटेड (Amira Pure Foods Pvt Ltd) — चावल व कृषि उत्पाद निर्यातक कंपनी। |
| लंबित आपराधिक शिकायतों का पैमाना | परक्राम्य लिखत अधिनियम (NI Act) की धारा 138 के तहत 120 से अधिक आपराधिक परिवाद—जिनमें से अकेले 85 मामले कैथल सत्र प्रभाग (Kaithal Sessions Division) में तथा शेष मामले कुरुक्षेत्र और करनाल की अदालतों में लंबित हैं। |
| विवाद का उद्भव | एक वेतनभोगी कर्मचारी के रूप में अपर्णा पुरी ने अपने नियोक्ता कंपनी के निर्देशों पर चेकों पर हस्ताक्षर किए थे। जब कंपनी के बैंक खातों में निधि अपर्याप्त होने के कारण चेक बाउंस हो गए, तो अनाज व्यापारियों और आपूर्तिकर्ताओं ने कंपनी के साथ-साथ अपर्णा पुरी के खिलाफ व्यक्तिगत रूप से 120 से अधिक अदालत कक्षों में केस दायर कर दिए। |
| जमानत की प्रक्रियात्मक बाधा | यद्यपि धारा 138 एक जमानती अपराध है, किंतु प्रत्येक अदालत अलग-अलग जमानती और बॉन्ड मांग रही थी। 4 अक्टूबर 2025 को कैथल अदालत (M/s Sat Narain Case) में उन्होंने ₹2 लाख का बॉन्ड भरा। किंतु दूसरे मामले (M/s Mansa Devi Case) में मजिस्ट्रेट ने उनसे ₹1 करोड़ का नया कॉमन स्योरिटी बॉन्ड भरने का आदेश दे दिया, जिससे वे जेल जाने की कगार पर आ गईं क्योंकि किसी भी मध्यमवर्गीय कर्मचारी के लिए 120 अलग-अलग स्थानीय जमानती जुटाना असंभव था। |
| उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय | याचिका पूर्णतः स्वीकृत (Allowed); ₹10 लाख के मौजूदा निष्पादित बॉन्ड्स को सभी 120 मुकदमों हेतु साझा जमानत (Common Surety) के रूप में स्वीकार करने का आदेश; एकल शपथ पत्र मान्य; प्रत्येक अदालत को अलग से औपचारिक जमानत आदेश पारित करने और आरोपी को सुनवाई में उपस्थित रहने का निर्देश। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘अनुच्छेद 21, अत्यधिक जमानत का निषेध और सुप्रीम कोर्ट की नज़ीरें’
- ‘गिरीश गांधी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ [2024 INSC 617] का सिद्धांत:
- सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि देश के विभिन्न राज्यों या अदालतों में दर्जनों मुकदमों का सामना करने वाले अभियुक्त को यदि हर केस में अलग स्थानीय जमानती लाने के लिए बाध्य किया जाएगा, तो जमानत मिलने के बावजूद वह जीवन भर जेल में सड़ने को विवश होगा।
- पीठ ने कहा था कि अदालतों को यह नहीं भूलना चाहिए कि ज़मानत का उद्देश्य अभियुक्त की उपस्थिति सुनिश्चित करना है, न कि उसे आर्थिक रूप से पंगु बनाकर उसकी स्वतंत्रता छीन लेना। जब एक बार किसी सक्षम जमानती ने अदालत के समक्ष अपनी वित्तीय हैसियत प्रमाणित कर दी हो, तो उसे अन्य जुड़े हुए मामलों में भी साझा जमानती के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।
- ‘हनी निषाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ [SLP (Crl.) No. 8914-8915/2018]:
- इस मामले में अभियुक्त 31 प्राथमिकियों का सामना कर रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने केवल ₹30,000 का एक व्यक्तिगत मुचलका और दो सामान्य जमानती प्रस्तुत करने पर सभी 31 मामलों में उसकी रिहाई का आदेश दिया था।
- पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने अपर्णा पुरी के मामले में इसी उदार और व्यावहारिक दृष्टिकोण को लागू किया।
- सुओ मोटो जमानत नीति दिशानिर्देश (जनवरी 2023):
- सर्वोच्च न्यायालय ने In Re: Policy Strategy for Grant of Bail में स्पष्ट किया था कि अदालतें ‘स्थानीय जमानती’ (Local Surety) पर अड़ियल रुख नहीं अपना सकतीं। यदि कोई बाहरी जमानती भी वैध संपत्ति दस्तावेज प्रस्तुत करता है, तो उसे स्वीकार किया जाना चाहिए।
- कंपनी बनाम अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता (धारा 141 NI Act):
- अपर्णा पुरी कंपनी की प्रमोटर या मुख्य लाभार्थी नहीं थीं, बल्कि केवल एक अधिकृत कर्मचारी थीं। कॉर्पोरेट विवादों में कर्मचारियों को सैकड़ों मुकदमों में फंसाकर प्रत्येक केस में लाखों के बॉन्ड की मांग करना न्यायिक उत्पीड़न (Harassment through Judicial Process) का रूप ले लेता है, जिसे उच्च न्यायालय ने समय रहते रोक दिया।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- न्यायालय: पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ (आपराधिक क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: अपर्णा पुरी बनाम हरियाणा राज्य व अन्य [CRM-M Group Cases / 2026]
- पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति संजय वशिष्ठ (Justice Sanjay Vashisth) (एकल पीठ)
- आदेश की तिथि: 27 अक्टूबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: याचिका स्वीकृत; कैथल, कुरुक्षेत्र और करनाल की विचारण अदालतों में लंबित सभी 120+ मामलों में ₹10 लाख के मौजूदा स्योरिटी बॉन्ड साझा (Common) माने जाएंगे; एकल शपथ पत्र स्वीकार करने का आदेश; आदेश की प्रति कैथल, करनाल व कुरुक्षेत्र अदालतों को अनुपालनार्थ प्रेषित।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (अपर्णा पुरी) की ओर से:
- वरिष्ठ अधिवक्ता पी.एस. अहलूवालिया (Senior Advocate P.S. Ahluwalia)
- अधिवक्ता: एच.एस. रंधावा (Advocate H.S. Randhawa)।
- प्रतिवादी हरियाणा राज्य की ओर से:
- अतिरिक्त महाधिवक्ता (Additional Advocate General – AAG) रुचि सेखरी (Ruchi Sekhri)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 21 (प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार)
- परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (NI Act, 1881):
- धारा 138 — चेक अनादरण पर दंड (जमानती अपराध)
- धारा 141 — कंपनियों और हस्ताक्षरकर्ताओं का दायित्व
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS):
- धारा 485(4) — जमानती की उपयुक्तता का शपथ पत्र द्वारा परीक्षण (पूर्ववर्ती CrPC धारा 441(4))
- धारा 491 — जमानत मुचलके की जब्ती की प्रक्रिया (पूर्ववर्ती CrPC धारा 446)
- सर्वोच्च न्यायालय नज़ीरें:
- गिरीश गांधी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य [2024 INSC 617]
- हनी निषाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य [2018]
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- एकाधिक आपराधिक शिकायतों में जमानत, साझा जमानती और अनुच्छेद 21 का विधिक मानक: ‘जब कोई अभियुक्त एक ही लेन-देन या एक ही कंपनी के अधिकार-पत्र के तहत दर्जनों या सैकड़ों आपराधिक मुकदमों (जैसे धारा 138 एनआई एक्ट) का सामना कर रहा हो, तो प्रत्येक अदालत द्वारा अलग-अलग और भारी-भरकम जमानती की मांग करना अभियुक्त पर असंभव विधिक बोझ डालना है; अत्यधिक और दुर्गम जमानत की शर्तें वस्तुतः जमानत से इनकार (Excessive bail is no bail) करने के समान हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का सीधा हनन करती हैं; अदालतों को जमानत की शर्तों को तार्किक और आनुपातिक बनाना चाहिए ताकि अभियुक्त की न्याय तक पहुंच बनी रहे; BNSS की धारा 485(4) के अंतर्गत विचारण अदालतें एक ही सक्षम जमानती के ‘साझा शपथ पत्र’ (Single Common Affidavit) को दर्जनों मामलों के लिए पर्याप्त साक्ष्य मान सकती हैं; तथापि, यह राहत अभियुक्त को व्यक्तिगत अदालती हाजिरी से मुक्त नहीं करती और गैर-हाजिरी की दशा में अदालतों को जमानत राशि जब्त करने का पूर्ण वैधानिक अधिकार प्राप्त रहता है।’
- वर्तमान स्थिति व अंतिम प्रभाव: पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के इस आदेश के बाद हरियाणा के कैथल (85 केस), कुरुक्षेत्र और करनाल की सभी मजिस्ट्रेट अदालतों को आदेश की प्रमाणित प्रतियां प्राप्त हो गई हैं; अपर्णा पुरी को अब हर केस के लिए नए जमानती तलाशने की आवश्यकता नहीं होगी, बल्कि उनके पूर्व में जमा ₹10 लाख के बॉन्ड्स और एकल शपथ पत्र के आधार पर सभी 120 अदालतों द्वारा उन्हें औपचारिक रूप से नियमित जमानत आदेश जारी किए जा रहे हैं। यह निर्णय देश भर के उन कर्मचारियों और कॉर्पोरेट अधिकारियों के लिए एक बड़ा जीवनदान है जो कंपनी के चेक बाउंस मामलों में सैकड़ों अदालतों में उलझ जाते हैं।
NI Act: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय (Punjab and Haryana High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति संजय वशिष्ठ (Justice Sanjay Vashisth) |
| केस / पक्षकार | अपर्णा पुरी बनाम हरियाणा राज्य व अन्य (Aparna Puri v. State of Haryana & Ors.) |
| प्रतिनिधित्व | याचिकाकर्ता पक्ष: वरिष्ठ अधिवक्ता पी.एस. अहलूवालिया व अधिवक्ता एच.एस. रंधावा | राज्य पक्ष: अतिरिक्त अधिवक्ता सामान्य (AAG) रुचि सेखरी |
| संबंधित कानून/प्रावधान | Negotiable Instruments Act, 1881 की धारा 138, BNSS की धारा 485(4) / CrPC की धारा 441(4) एवं संविधान का अनुच्छेद 21 |
| मूल विवाद | नियोक्ता कंपनी (अमीरा प्योर फूड्स प्रा. लि.) के लिए चेक पर हस्ताक्षर करने के कारण महिला कर्मचारी पर 120 से अधिक चेक बाउंस (Sec 138 NI Act) मुकदमे; हर कोर्ट द्वारा अलग ज़मानतदार मांगने से उत्पन्न विधिक संकट। |
| अदालत का अंतिम आदेश | कॉमन ज़मानत बॉन्ड मंजूर: ₹10 लाख के मौजूदा बॉन्ड सभी 120 मुकदमों में मान्य होंगे; ज़मानतदार का एक ही कॉमन हलफनामा (Single Common Affidavit) पर्याप्त होगा। |

