जस्टिस दीपांकर दत्ता की मुख्य बातें और टिप्पणियां
- संवैधानिक नैतिकता और संस्थागत क्षरण:“भारत के लोगों का दुर्भाग्य यह रहा है कि संविधान ने जिन उच्च आदर्शों की कल्पना की थी, वे अतीत और वर्तमान की सरकारों द्वारा इरादे की कमी और संवैधानिक नैतिकता का पालन न करने के कारण बड़े पैमाने पर अपूरे रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप भारी संस्थागत क्षरण हुआ है।” — जस्टिस दीपांकर दत्ता
- आपराधिक पृष्ठभूमि वाले नेताओं की पदोन्नति: केंद्र सरकार की उस दलील का जवाब देते हुए कि प्रधानमंत्री का पद “पवित्र संवैधानिक विश्वास” रखता है, जस्टिस दत्ता ने कहा कि संसद, विधानसभाओं और मंत्रालयों में गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों की बड़ी उपस्थिति सार्वजनिक आंकड़ों में दर्ज है। राजनीतिक दलों ने सार्वजनिक जीवन को स्वच्छ करने का इरादा कभी नहीं दिखाया।
- इतिहास की चेतावनी और इमरजेंसी का जिक्र: चुनाव से जुड़े संवेदनशील मामलों में अदालती संयम की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने एक ऐतिहासिक चेतावनी दी। उन्होंने याद दिलाया कि पिछली बार जब शीर्ष अदालत ने बिना अत्यधिक संयम के चुनाव जैसे संवेदनशील विषय से निपटने की कोशिश की थी, तो अनजाने में “राष्ट्रीय आपातकाल (National Emergency) जैसा हिमस्खलन” आ गया था।
- 1951 से ECI पर सरकारी नियंत्रण का प्रयास (डाॅ. अंबेडकर का हवाला):
- जस्टिस दत्ता ने 1951 में डॉ. बी.आर. अंबेडकर और डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के चेतावनियों का जिक्र किया। डॉ. अंबेडकर ने चेताया था कि उद्योगपतियों से धन लेना और चुनाव में सरकारी तंत्र का सत्ताधारी दल द्वारा इस्तेमाल करना संसदीय लोकतंत्र को खतरे में डाल देगा।
- उन्होंने कहा कि 7 दशकों से किसी भी सरकार ने अनुच्छेद 324(2) के तहत चुनाव आयोग पर से अपना कार्यपालक (Executive) नियंत्रण छोड़ने की इच्छा नहीं दिखाई।
- क्रिकेट मैच और ‘अंपायर’ का रूपक (Cricket Metaphor): चयन समिति में प्रधानमंत्री और उनके कैबिनेट मंत्री (2:1 बहुमत) की उपस्थिति पर बोलते हुए उन्होंने कहा:“यदि किसी क्रिकेट मैच में अंपायर का चुनाव एक टीम का कप्तान करता है और उसकी टीम जीत जाती है, तो भले ही अंपायर के फैसले सही हों, फिर भी उस पर संदेह का साया बना रहता है; क्योंकि अंततः अंपायर को जीतने वाले कप्तान ने ही चुना था।”
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की वैधता पर अपने पृथक विधिक निर्णय में भारत के राजनीतिक नेतृत्व, कार्यपालिका द्वारा संवैधानिक संस्थाओं के क्रमिक अवमूल्यन (Institutional Erosion), और राजनीतिक शुचिता के खोखले दावों पर आजादी के बाद की सबसे तीखी और बेबाक न्यायिक टिप्पणियां दर्ज की हैं।
जस्टिस दत्ता ने स्पष्ट रूप से कहा कि भारतीय राजनीति में “संवैधानिक भरोसे” (Constitutional Trust) की अवधारणा को व्यवहार में बार-बार तोड़ा गया है। उन्होंने ऐतिहासिक साक्ष्यों और आंकड़ों का हवाला देते हुए रेखांकित किया कि चाहे भूतकाल की सरकारें रही हों या वर्तमान की, सभी सत्तारूढ़ व्यवस्थाएं उन संस्थाओं पर अपना वर्चस्व बनाए रखने की दोषी रही हैं जिन्हें उनकी ही सत्ता की वैधता पर निष्पक्ष फैसला देना होता है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता के निर्णय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं कटु सत्य
1. ‘संवैधानिक नैतिकता की अनदेखी और संस्थागत क्षरण’
केंद्र सरकार की इस दलील को संबोधित करते हुए कि प्रधानमंत्री का पद सर्वोच्च संवैधानिक विश्वास धारण करता है, जस्टिस दत्ता ने सार्वजनिक जीवन में दागी नेताओं के बढ़ते दबदबे पर उंगली उठाते हुए कहा: “भारत के नागरिकों का यह दुर्भाग्य है कि संविधान ने जिन उदात्त आदर्शों (Lofty Ideals) की परिकल्पना की थी, वे अतीत और वर्तमान की सत्तारूढ़ व्यवस्थाओं की मंशा के अभाव और संवैधानिक नैतिकता (Constitutional Morality) का पालन न करने के कारण काफी हद तक अधूरे रह गए हैं, जिसका परिणाम संस्थागत क्षरण (Substantial Institutional Erosion) के रूप में सामने आया है। केंद्र और राज्यों दोनों जगह बड़ी संख्या में सांसदों, विधायकों और यहां तक कि मंत्रियों की आपराधिक पृष्ठभूमि होना सार्वजनिक डोमेन में मौजूद आधिकारिक आंकड़ों से पुष्ट होता है।”
- संवैधानिक भरोसे के साथ विश्वासघात:“ऐसी स्थिति में व्यक्ति यह पूछने पर विवश हो जाता है कि क्या संविधान सभा की बहसों के दौरान डॉ. बी.आर. आंबेडकर द्वारा और इस अदालत द्वारा ‘मनोज नरूला’ मामले में व्यक्त किए गए ‘संवैधानिक भरोसे’ के साथ व्यवहार में विश्वासघात (Betrayed in practice) नहीं किया गया है? इसलिए, निर्वाचित निकायों के सदस्यों की आपराधिक पृष्ठभूमि को देखते हुए, संवैधानिक भरोसे का दायरा केवल पदों तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि इसे नियुक्ति प्रक्रिया की स्वयं की संवैधानिक नैतिकता तक विस्तारित होना चाहिए।”
2. न्यायिक संयम और 1975 की ‘राष्ट्रीय इमरजेंसी’ की ऐतिहासिक चेतावनी
चुनावी मामलों में न्यायिक सीमाओं पर एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक चेतावनी देते हुए जस्टिस दत्ता ने कहा: “पिछली बार जब देश की सर्वोच्च अदालत ने चुनावों जैसे अत्यंत संवेदनशील विषय को अत्यधिक न्यायिक संयम (Extreme Restraint) बरते बिना सुलझाने का प्रयास किया था, तो उसने अनजाने में ‘राष्ट्रीय आपातकाल’ (National Emergency) नामक एक भारी हिमस्खलन (Avalanche) को जन्म दे दिया था।”
3. 1951 से ECI पर एकाधिकार की मंशा: डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी और डॉ. आंबेडकर का हवाला
जस्टिस दत्ता ने इतिहास के पन्नों को पलटते हुए 1951 के जालंधर संबोधन का उल्लेख किया, जहां बाबासाहेब आंबेडकर ने सत्ताधारी दलों द्वारा बड़े उद्योगपतियों से आर्थिक मदद लेने और सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग पर आगाह किया था:
- 1951 में डॉ. मुखर्जी की चेतावनी: डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1951 में ही इंगित किया था कि चुनाव जीतने के लिए सत्तारूढ़ दल की मदद सरकारी नौकरशाह कर रहे थे। डॉ. आंबेडकर ने इसे संसदीय लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया था।
- अनुच्छेद 324(2) का मूल उद्देश्य: जस्टिस दत्ता ने रेखांकित किया कि संविधान का अनुच्छेद 324(2) इसीलिए बनाया गया था ताकि ‘चुनावी मध्यस्थ’ (Electoral Arbiter) पर कार्यपालिका का प्रभुत्व न रहे। परंतु सात दशकों तक किसी भी दल की सरकार ने कार्यपालिका का नियंत्रण छोड़ने वाला कानून नहीं बनाया।“इस अदालत की समझ में, यह किसी एक राजनीतिक दल या किसी एक कालखंड की विफलता नहीं रही है। दशकों से राजनीतिक सत्ता का एक सतत लक्षण यह रहा है कि वह उस संस्था पर अपना प्रभाव बनाए रखना चाहती है, जिसे उसके सत्ता के दावे पर निष्पक्ष फैसला देना होता है।”
4. ‘विजेता टीम का कप्तान ही अंपायर चुने’: चयन समिति में 2:1 बहुमत की विफलता
2023 के अधिनियम के तहत गठित 3-सदस्यीय चयन समिति (प्रधानमंत्री, एक कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता) के ढांचे पर जस्टिस दत्ता ने क्रिकेट का जीवंत रूपक दोहराते हुए कहा: “यह कोई गलत उपमा नहीं होगी यदि यह कहा जाए कि चूंकि एक क्रिकेट मैच में अंपायर को एक टीम के कप्तान द्वारा चुना जाता है और वही टीम जीत जाती है, तो भले ही उस अंपायर द्वारा लिए गए फैसले बिल्कुल सही क्यों न हों, फिर भी उन पर संदेह की एक परत (Patina of Suspicion) हमेशा रहेगी, क्योंकि दिन के अंत में अंपायर को प्रभावी रूप से जीतने वाले कप्तान द्वारा ही चुना गया था।”
दोनों न्यायाधीशों की संयुक्त चिंता: ‘स्थायी 5-जज संविधान पीठ’ का गठन जरूरी
यद्यपि मामले को 5 जजों की बड़ी संविधान पीठ को भेजने पर पीठ विभाजित रही (जस्टिस दत्ता ने इनकार किया, जबकि जस्टिस शर्मा ने इसे जरूरी माना), लेकिन दोनों न्यायाधीशों ने संवैधानिक संदर्भों (Constitutional References) के दशकों तक लटके रहने पर गहरी संस्थागत चिंता व्यक्त की:
- दशकों की न्यायिक देरी संस्थागत शर्मिंदगी:
- खंडपीठ ने रेखांकित किया कि अनूप बरनवाल मामले को तय होने में 8 वर्ष लगे, जबकि जय बीर सिंह संदर्भ में निर्णय आने में 24 वर्ष का लंबा समय लग गया।
- ऐसी अत्यधिक देरी न्यायपालिका के लिए गंभीर ‘संस्थागत शर्मिंदगी’ (Institutional Embarrassment) का कारण बनती है।
- CJI सूर्यकांत से ऐतिहासिक सिफारिश: दोनों न्यायाधीशों ने अपने संयुक्त आदेश में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत से औपचारिक आग्रह किया कि वे देश में मूल संवैधानिक व्याख्या से जुड़े जटिल प्रश्नों के त्वरित निपटारे के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक स्थायी 5-न्यायाधीशों की संविधान पीठ (Permanent 5-Judge Constitution Bench) गठित करने की संभावना तलाशें।
Election Commission-III:विधिक विवरण
- केस संदर्भ: डॉ. जया ठाकुर व अन्य बनाम भारत संघ [W.P.(C) No. 14/2024] सहपठित एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) बनाम भारत संघ [W.P.(C) No. 87/2024 – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक संवैधानिक प्रावधान:
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 324(2) (चुनाव आयोग की संरचना व नियुक्तियां)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 75(3) (मंत्रिपरिषद का सामूहिक उत्तरदायित्व)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 145(3) (संविधान की व्याख्या हेतु न्यूनतम 5 जजों की पीठ)
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- मनोज नरूला बनाम भारत संघ (2014, सुप्रीम कोर्ट 5-जज संविधान पीठ) — ‘संवैधानिक भरोसा और मंत्रियों व जन-प्रतिनिधियों की आपराधिक पृष्ठभूमि पर दिशा-निर्देश।’
- अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023, सुप्रीम कोर्ट) — ‘चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और सीजेआई युक्त चयन समिति का निर्देश।’
- इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975, सुप्रीम कोर्ट) — ‘चुनावी विवाद, स्वतंत्र चुनाव और संविधान का आधारभूत ढांचा।’
- पीठ: न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा (सर्वोच्च न्यायालय)
- निर्णय तिथि: 23 सितंबर 2026 (विभाजित निर्णय; मामला 5-जज संविधान पीठ के गठन पर निर्णय हेतु CJI के समक्ष संदर्भित)

