पटना हाईकोर्ट का विवादित फैसला क्या था?
- घटना की पृष्ठभूमि: 2008 के एक मामले में आरोपी हिमांशु पाठक ने एक महिला को अपने फोटो स्टूडियो के अंदर बंद कर लिया था, उसकी सलवार खोलने का प्रयास किया और उसके साथ शारीरिक छेड़छाड़ की।
- ट्रायल कोर्ट का फैसला: निचली अदालत ने आरोपी को दुष्कर्म के प्रयास (IPC की धारा 376/511) और अवैध रूप से बंधक बनाने का दोषी ठहराया था।
- हाईकोर्ट का आदेश (9 जुलाई 2026): पटना हाईकोर्ट के जस्टिस पूर्णेंदु सिंह ने आरोपी की धारा 376/511 के तहत सजा रद्द कर दी। कोर्ट ने कहा कि आरोपी के कृत्य केवल महिला की लज्जा भंग करने (IPC धारा 354 – Outraging the Modesty of a Woman) के दायरे में आते हैं, न कि बलात्कार के प्रयास में, क्योंकि इसमें स्पष्ट रूप से दुष्कर्म के प्रयास का कोई प्रत्यक्ष कदम प्रमाणित नहीं होता।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के खिलाफ यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक संवेदनशीलता, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 सहपठित धारा 511 (दुष्कर्म का प्रयास) बनाम धारा 354 (महिला की लज्जा भंग) की कानूनी सीमा, और उच्च न्यायालयों द्वारा दिए जाने वाले विवादित फैसलों पर एक बार फिर असाधारण कदम उठाया है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने पटना हाईकोर्ट के फैसले में दर्ज निष्कर्षों को “अत्यंत आपत्तिजनक” (Offending Observations) करार दिया। खंडपीठ ने बरी/सजा कम किए गए आरोपी हिमांशु पाठक को औपचारिक नोटिस जारी करते हुए बिहार के महाधिवक्ता (Advocate General) एस.डी. संजय को निर्देश दिया कि वे स्थानीय पुलिस के माध्यम से आरोपी पर तुरंत नोटिस की तामील सुनिश्चित कराएं। शीर्ष अदालत ने पटना उच्च न्यायालय के 9 जुलाई 2026 के उस फैसले पर स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognisance) लिया है, जिसमें कहा गया था कि महिला को स्टूडियो में बंद कर उसका सलवार खोलने का प्रयास करना और उसका सीना दबाना ‘दुष्कर्म का प्रयास’ नहीं बल्कि केवल ‘लज्जा भंग’ का अपराध है।
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख अवलोकन एवं निर्देश
1. ‘फैसले में कई आपत्तिजनक टिप्पणियां, आरोपी को सुनकर ही रद्द करेंगे’: CJI सूर्यकांत सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बिहार के महाधिवक्ता को संबोधित करते हुए कहा: “इस फैसले में कुछ बेहद आपत्तिजनक टिप्पणियां (Offending observations) हैं। हम आरोपी को व्यक्तिगत रूप से सुने बिना इन टिप्पणियों और आदेश को निरस्त नहीं कर सकते। इसलिए आरोपी हिमांशु पाठक को नोटिस जारी किया जाता है। हम बिहार राज्य के महाधिवक्ता एस.डी. संजय से अनुरोध करते हैं कि वे स्थानीय पुलिस के माध्यम से प्रतिवादी पर नोटिस की तामील (Service of Notice) सुनिश्चित कराएं। इसके पश्चात मामले को आगे के विचारार्थ सूचीबद्ध किया जाए।”
2. इलाहाबाद हाईकोर्ट के विवादित आदेश और पूर्व दिशानिर्देशों की अनदेखी पर चिंता
- शीर्ष अदालत को वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता और वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एस. फूलका ने अवगत कराया कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा पूर्व में इलाहाबाद हाईकोर्ट के ऐसे ही एक विवादित आदेश (जिसमें नाबालिग लड़की का पाजामा तोड़ने और पुलिया के नीचे खींचने को दुष्कर्म का प्रयास नहीं माना गया था) को स्वतः संज्ञान लेकर रद्द किए जाने और न्यायिक अधिकारियों के लिए सख्त संवेदनशीलता दिशानिर्देश जारी करने के बावजूद, पटना हाईकोर्ट ने लगभग समान तथ्यों पर वही विधिक त्रुटि दोहराई है।
पटना हाईकोर्ट का विवादित फैसला (9 जुलाई 2026)
- मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि (2008 का प्रकरण):
- अभियोजन के अनुसार, आरोपी हिमांशु पाठक ने पीड़िता को अपने फोटो स्टूडियो के भीतर बंद कर दिया, स्टूडियो का दरवाजा बंद किया, उसका सलवार खोलने का प्रयास किया और उसका सीना दबाकर शारीरिक छेड़छाड़ की।
- निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) ने आरोपी को गलत तरीके से बंधक बनाने (IPC धारा 342) और दुष्कर्म के प्रयास (IPC धारा 376/511) का दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी।
- जस्टिस पूर्णेंदु सिंह का निर्णय:
- पटना हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति पूर्णेंदु सिंह ने एकल पीठ के फैसले में माना कि यदि अभियोजन के सभी आरोपों को सच भी मान लिया जाए, तब भी यह कृत्य ‘दुष्कर्म के प्रयास’ की श्रेणी में नहीं आता।
- हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ‘प्रत्यक्ष कृत्य’ (Overt Act) साबित नहीं हुआ है जो यह असंदिग्ध रूप से स्थापित करे कि आरोपी का इरादा दुष्कर्म करने का ही था।
- अदालत ने IPC धारा 376/511 के तहत उसकी दोषसिद्धि को रद्द कर दिया और मामले को केवल IPC की धारा 354 (महिला की लज्जा भंग करने के इरादे से आपराधिक बल का प्रयोग) के तहत दंडनीय माना:“मेरा मानना है कि अपीलकर्ता ने पीड़िता को स्टूडियो के अंदर बंद करके, दरवाजा बंद करके, उसका सलवार उतारने का प्रयास करके और उसके सीने को दबाकर शारीरिक छेड़छाड़ करके उसके खिलाफ आपराधिक बल का प्रयोग किया। ये कृत्य महिला पर इस इरादे से या कम से कम इस ज्ञान के साथ आपराधिक बल के प्रयोग को स्पष्ट रूप से स्थापित करते हैं कि ऐसे कृत्यों से उसकी लज्जा भंग होने की संभावना थी।”
विधिक विवाद: ‘तैयारी’ बनाम ‘प्रयास’ (Preparation vs Attempt)
- आईपीसी की धारा 376 सहपठित 511: कानून के अनुसार, किसी अपराध के प्रयास (Attempt) का अर्थ है कि आरोपी ने अपराध को अंजाम देने की दिशा में एक ऐसा प्रत्यक्ष कदम उठा लिया है जो केवल किसी बाहरी बाधा के कारण अंतिम परिणाम (Penetration) तक नहीं पहुंच सका।
- सहमति और जबरन निर्वस्त्र करने का प्रयास: किसी महिला को कमरे में बंद कर जबरन निर्वस्त्र करने का प्रयास करना और शारीरिक हमला करना केवल सामान्य लज्जा भंग (Modesty) नहीं बल्कि यौन हमले और दुष्कर्म के प्रयास का प्रत्यक्ष साक्ष्य है।
- सर्वोच्च न्यायालय अब यह तय करेगा कि क्या ऐसे गंभीर शारीरिक व यौन हमलों को मात्र धारा 354 तक सीमित कर देना आपराधिक न्यायशास्त्र और पीड़ित के गरिमापूर्ण जीवन के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) के विपरीत है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: In Re: Order dated 09.07.2026 passed by the High Court of Judicature at Patna in Criminal Appeal (SJ) No. 775/2013 and Ancillary Issues [स्वतः संज्ञान आपराधिक याचिका – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- संबंधित पूर्ववर्ती आदेश: पटना उच्च न्यायालय, आपराधिक अपील (SJ) संख्या 775/2013 (निर्णय तिथि: 9 जुलाई 2026, न्यायमूर्ति पूर्णेंदु सिंह)
- अदालत में उपस्थित वरिष्ठ वकील / अधिकारी:
- राज्य की ओर से: बिहार के महाधिवक्ता (Advocate General) एस.डी. संजय
- एमिकस / सहायता: वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता एवं वरिष्ठ अधिवक्ता एच.एस. फूलका
- प्रासंगिक कानून एवं धाराएं:
- भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 376 (दुष्कर्म), धारा 511 (अपराध करने के प्रयास के लिए दंड), धारा 354 (लज्जा भंग) एवं धारा 342 (गलत तरीके से परिरोध)
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) के समतुल्य प्रावधान (धारा 63, 62, 74 एवं 127)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 21, अनुच्छेद 136 एवं अनुच्छेद 142
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- अमन कुमार बनाम हरियाणा राज्य (2004, सुप्रीम कोर्ट) — ‘दुष्कर्म के प्रयास (Attempt to Rape) और तैयारी (Preparation) के बीच अंतर का निर्धारण करते समय आरोपी के प्रत्यक्ष आचरण, इरादे और पीड़िता के प्रतिरोध पर विचार करना आवश्यक है।’
- सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान आदेश (इलाहाबाद हाईकोर्ट फैसला निरस्तीकरण) — ‘यौन अपराधों से जुड़े मामलों में अदालतों को लैंगिक रूढ़िवादिता और असंवेदनशील कानूनी व्याख्याओं से बचना अनिवार्य है।’
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (सर्वोच्च न्यायालय)
- वर्तमान स्थिति: आरोपी हिमांशु पाठक को नोटिस जारी; बिहार पुलिस को व्यक्तिगत तामील का निर्देश दिया गया है।
Suo Motu Cognisance: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ के न्यायाधीश | CJI सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| मामला | स्वतः संज्ञान याचिका (पटना हाईकोर्ट के 9 जुलाई 2026 के आपराधिक अपील आदेश पर) |
| आरोपी | हिमांशु पाठक (Himanshu Pathak) |
| बिहार राज्य की ओर से | अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल / एजी एस.डी. संजय |

