जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा के मुख्य अवलोकन
- अनुच्छेद 145(3) का अनुप्रयोग: जस्टिस शर्मा ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 324(2) के तहत संसद द्वारा बनाए गए कानून में किसी “बाहरी या निष्पक्ष सदस्य” को शामिल न किए जाने को लेकर पहली बार सवाल उठा है। चूंकि यह संविधान की व्याख्या से जुड़ा महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न (Substantial Question of Law) है, इसलिए अनुच्छेद 145(3) के अनुसार इसे 5 या उससे अधिक जजों की पीठ ही सुन सकती है।
- शक्तियों का पृथक्करण (Separation of Powers): सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के तर्कों को स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि यदि न्यायपालिका अपनी स्वतंत्रता के लिए कॉलेजियम में बाहरी लोगों के हस्तक्षेप को खारिज करती है, तो कार्यपालिका की संवैधानिक स्वतंत्रता को भी मान्यता दी जानी चाहिए।
- अस्थायी व्यवस्था पर स्पष्टता: अनूप बरनवाल फैसले में दिया गया फॉर्मूला (PM + CJI + विपक्ष के नेता) तब तक के लिए एक interim व्यवस्था थी जब तक संसद कानून न बना ले। संसद द्वारा बनाए गए 2023 के कानून की वैधता की स्वतंत्र जांच आवश्यक है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता का कड़ा रुख और क्रिकेट का रूपक
- परसेप्शन ट्रस्ट और ‘अंपायर’ का उदाहरण: जस्टिस दत्ता ने कहा कि निष्पक्ष चुनाव के लिए ECI का केवल स्वतंत्र होना ही काफी नहीं है, बल्कि उसे स्वतंत्र दिखना भी चाहिए।“यदि किसी क्रिकेट मैच में अंपायर का चुनाव एक टीम का कप्तान करता है और उसकी टीम जीत जाती है, तो भले ही अंपायर के फैसले सही हों, फिर भी उस पर संदेह का साया बना रहता है; क्योंकि अंततः अंपायर को जीतने वाले कप्तान ने ही चुना था।” — जस्टिस दीपांकर दत्ता
- कॉलेजियम तुलना का खंडन: उन्होंने सरकार की इस तुलना को खारिज कर दिया कि कार्यपालिका चुनाव आयुक्त चुन सकती है जैसे जज जजों को चुनते हैं। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की नियुक्तियों में कार्यपालिका के पास काफी नियंत्रण होता है और जज अक्सर “दूसरी भूमिका” (Second Fiddle) निभा रहे होते हैं।
3-जजों की पीठ को दरकिनार कर CJI को सीधे रेफर करने की वजह
दोनों जजों ने माना कि मामले को पहले 3-न्यायाधीशों की पीठ के पास भेजना और फिर वहां से संविधान पीठ के पास भेजना समय की बर्बादी होगी। सुप्रीम कोर्ट में संविधान पीठ के संदर्भों के दशकों (जैसे जयबीर सिंह मामले में 24 साल) तक पेंडिंग रहने पर चिंता व्यक्त करते हुए दोनों जजों ने CJI सूर्य कांत से एक स्थाई 5-न्यायाधीशों की संविधान पीठ (Permanent Constitution Bench) के गठन पर विचार करने का आग्रह किया।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 6, 7 और 8 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर आए विभाजित फैसले में न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा के अलग निर्णय के माध्यम से संसदीय कानून-निर्माण की शक्तियों, संविधान के अनुच्छेद 324(2), और अनुच्छेद 145(3) के तहत अनिवार्य संविधान पीठ के क्षेत्राधिकार पर विस्तृत विधिक व्याख्या प्रस्तुत की है।
जहां न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता ने 2023 के कानून को प्रथम दृष्टया कार्यपालिका के एकाधिकार वाला बताते हुए बड़ी पीठ को संदर्भित करने की आवश्यकता को खारिज किया था, वहीं न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा ने केंद्र सरकार की दलीलों से सहमति जताते हुए माना कि संसद द्वारा पारित एक वैधानिक कानून को केवल इसलिए असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि चयन पैनल में कार्यपालिका का संख्यात्मक बहुमत (2:1) है। जस्टिस शर्मा ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 324(2) के तहत संसद की विधायी शक्ति और निष्पक्ष चुनावों के परीक्षण का यह सवाल अभूतपूर्व (Unprecedented) है, जिसे अनुच्छेद 145(3) के तहत न्यूनतम 5 न्यायाधीशों की संविधान पीठ (Constitution Bench) द्वारा ही तय किया जाना अनिवार्य है।
जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा के पृथक निर्णय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष
1. ‘क्या तटस्थ चयनकर्ता को बाहर रखना असंवैधानिक है? यह पहली बार उठा प्रश्न’ जस्टिस शर्मा ने रेखांकित किया कि शीर्ष अदालत के समक्ष यह बुनियादी विधिक प्रश्न पहली बार विचारार्थ आया है: “निसंदेह, अनुच्छेद 141 के तहत घोषित कानून को लागू किया जाना चाहिए, परंतु क्या चयन समिति में किसी तटस्थ चयनकर्ता (Neutral Selector) को शामिल न करने का संसद का निर्णय न्यायोचित था या नहीं—यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है जो इस अदालत के समक्ष पहली बार उठा है। चूंकि यह संविधान की व्याख्या से संबंधित विधि का एक सारभूत प्रश्न (Substantial Question of Law) है, जिसका किसी पूर्ववर्ती नजीर में सीधे निपटारा नहीं हुआ है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट रूल्स के ऑर्डर 38 सहपठित अनुच्छेद 145(3) की स्पष्ट भाषा वर्तमान दो-जजों के संयोजन द्वारा इस पर अंतिम निर्णय देने की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ती।”
2. अनूप बरनवाल (2023) फैसला विधायी शून्यता भरने वाली अंतरिम व्यवस्था थी
- जस्टिस शर्मा ने याचिकाकर्ताओं की इस दलील को खारिज कर दिया कि 2023 का अधिनियम अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (मार्च 2023) के संविधान पीठ के फैसले को अवैध रूप से निष्प्रभावी (Overrule) करता है।
- उन्होंने स्पष्ट किया कि अनूप बरनवाल फैसले में चयन समिति में सीजेआई को शामिल करने का निर्देश केवल एक तदर्थ एवं अंतरिम व्यवस्था (Ad-hoc and Interim Arrangement) थी, जो संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक विधायी शून्यता (Legislative Vacuum) को भरने के लिए दी गई थी।
- अदालत ने कहा कि संविधान पीठ ने स्वयं स्पष्ट रूप से यह मामला संसद के विवेक पर छोड़ा था कि वह कानून बनाए। यदि वह अंतरिम व्यवस्था न होती, तो कानूनी परिणाम भिन्न हो सकते थे।
3. शक्तियों के पृथक्करण और कार्यपालिका की संवैधानिक स्वतंत्रता की दलील
- सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलों का विश्लेषण करते हुए जस्टिस शर्मा ने स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार कोलेजियम प्रणाली को चुनौती नहीं दे रही थी, बल्कि शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत के तहत एक समानांतर विधिक तर्क प्रस्तुत कर रही थी:
- यदि न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक कोलेजियम में कार्यपालिका या किसी बाहरी व्यक्ति (Outsider) को बाहर रखा जाना आवश्यक माना जाता है, तो उसी प्रकार कार्यपालिका को भी संविधान के तहत अपनी कार्यात्मक स्वतंत्रता और नीतिगत दायरा प्राप्त होना चाहिए।
- इसलिए अदालत के समक्ष मुख्य प्रश्न यह बनता है: क्या अनुच्छेद 324 के तहत संसद द्वारा बनाए गए नियमों को केवल इसलिए अमान्य ठहराया जा सकता है क्योंकि वे किसी बाहरी व्यक्ति को शामिल नहीं करते या इसके परिणामस्वरूप पैनल में कार्यपालिका का संख्यात्मक प्रभुत्व रहता है?
4. ‘स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव’ बनाम कानून की स्वायत्त समीक्षा
- जस्टिस शर्मा ने स्वीकार किया कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव (Free and Fair Elections) संविधान के आधारभूत ढांचे (Basic Structure) का अभिन्न अंग हैं, और इस पर कोई भी अदालत संदेह नहीं कर सकती।
- परंतु, उन्होंने दो टूक कहा:“क्या 2023 का अधिनियम वास्तव में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की कसौटी पर विफल होता है या नहीं—इसकी स्वतंत्र और गहन संवैधानिक समीक्षा होनी बाकी है, जिसे केवल एक संविधान पीठ ही कर सकती है।”
दोनों जजों का संयुक्त कदम: 3-जज पीठ को दरकिनार कर सीधे CJI को मामला भेजने का निर्देश
यद्यपि दोनों न्यायाधीशों की राय बड़ी पीठ के संदर्भ पर विभाजित रही, लेकिन उन्होंने प्रक्रियागत देरी को समाप्त करने के लिए एक अभूतपूर्व संयुक्त प्रशासनिक आदेश पारित किया:
- 3-जज पीठ की औपचारिकता से बचाव: सामान्य प्रक्रिया के तहत दो जजों की असहमति पर मामला 3 जजों की पीठ को जाता है। परंतु दोनों जजों ने माना कि पहले 3-जज पीठ द्वारा यह तय करना कि कौन सा मत सही है, केवल समय की बर्बादी होगी।
- सीधे CJI के समक्ष पत्रावली: खंडपीठ ने निर्देश दिया कि 2023 के अधिनियम की धारा 6, 7 और 8 की संवैधानिक वैधता पर अंतिम निर्णय हेतु उपयुक्त संख्या वाली संविधान पीठ (Constitution Bench) गठित करने के लिए पत्रावली तुरंत भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत के समक्ष प्रस्तुत की जाए।
- संस्थागत देरी और ‘स्थायी संविधान पीठ’ की मांग: दोनों जजों ने संयुक्त रूप से चिंता जताई कि अनूप बरनवाल संदर्भ तय होने में 8 वर्ष और जय बीर सिंह में 24 वर्ष का समय लगना न्यायपालिका के लिए ‘संस्थागत शर्मिंदगी’ है; अतः सीजेआई को सुप्रीम कोर्ट में एक स्थायी 5-जज संविधान पीठ स्थापित करने पर विचार करना चाहिए।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: डॉ. जया ठाकुर व अन्य बनाम भारत संघ [W.P.(C) No. 14/2024] सहपठित ADR बनाम भारत संघ [W.P.(C) No. 87/2024 – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन, शादान फरासत, विजय हंसारिया, अधिवक्ता प्रशांत भूषण एवं वरुण ठाकुर
- भारत संघ की ओर से: अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी एवं सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता
- प्रासंगिक कानून एवं धाराएं:
- मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की धारा 6 (सर्च कमेटी), धारा 7 (चयन समिति) एवं धारा 8 (नियुक्ति प्रक्रिया)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 324(2) (संसदीय विधि के अधीन चुनाव आयोग में नियुक्तियां)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 145(3) (संविधान की व्याख्या के सारभूत प्रश्नों हेतु 5-जज पीठ की अनिवार्यता)
- सुप्रीम कोर्ट रूल्स, 2013 का ऑर्डर 38
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (2023, सुप्रीम कोर्ट 5-जज पीठ) — ‘विधायी शून्यता की स्थिति में अनुच्छेद 142 के तहत अंतरिम चयन व्यवस्था।’
- सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ (NJAC केस, 2015) — ‘संस्थागत स्वायत्तता, शक्तियों का पृथक्करण और बेसिक स्ट्रक्चर सिद्धांत।’
- पीठ: न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा (सर्वोच्च न्यायालय)
- वर्तमान स्थिति: मामला 5-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के गठन के निर्णय हेतु भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के समक्ष भेजा गया है।
Election Commission-II: दो जजों के विचारों में मुख्य अंतर (At a Glance)
| पक्ष / बिंदु | जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा का मत (संवैधानिक पीठ संदर्भ के पक्ष में) | जस्टिस दीपांकर दत्ता का मत (संवैधानिक पीठ संदर्भ के खिलाफ) |
| मुख्य तर्क | क्या चयन समिति में निष्पक्ष सदस्य (Neutral Selector) का न होना कानून को अवैध बनाता है? यह संविधान के अनुच्छेद 145(3) के तहत एक नया और महत्वपूर्ण सवाल है। | अनूप बरनवाल मामले में 5-जजों की पीठ पहले ही तय कर चुकी है कि चुनाव आयोग को कार्यपालिका (Executive) के दबदबे से मुक्त होना चाहिए। |
| संसदीय शक्ति (Art. 324) | संसद को कानून बनाने का पूरा अधिकार है; अनूप बरनवाल में दिए गए CJI वाले पैनल का निर्देश केवल एक अस्थायी व्यवस्था (Interim Arrangement) थी। | यद्यपि वह व्यवस्था अस्थायी थी, लेकिन चुनाव आयोग की स्वतंत्रता का जो संवैधानिक सिद्धांत तय किया गया था, उसका उल्लंघन नहीं किया जा सकता। |
| चयन समिति की संरचना | केवल कार्यपालिका का बहुमत (2:1) होने के आधार पर कानून को अवैध घोषित नहीं किया जा सकता जब तक कि इसकी स्वतंत्र रूप से जांच न हो। | PM और उनके द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री का होना चयन को केवल कार्यपालिका की इच्छा बना देता है; विपक्ष के नेता की उपस्थिति केवल “आभूषण” (Ornamental) बनकर रह जाती है। |

