याचिका में उठाए गए मुख्य मुद्दे और आरोप
- ट्रस्ट फंड्स का हस्तांतरण और नियंत्रण: प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि 1974 से चले आ रहे BCI ट्रस्ट की जगह 2020 में एक नया ट्रस्ट PEARL-First बनाया गया। BCI के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा (जो 2012 से पद पर हैं) ने खुद को इस नए ट्रस्ट का आजीवन ट्रस्टी घोषित कर दिया और BCI के फंड्स इस नए ट्रस्ट में ट्रांसफर कर दिए गए।
- नियामक ही संस्था चला रहा है (Conflict of Interest): याचिका में गोवा और आंध्र प्रदेश में राज्य सरकारों के साथ मिलकर शुरू किए गए दो लॉ कॉलेजों का जिक्र किया गया। आरोप है कि इन कॉलेजों के गवर्निंग एक्ट्स के तहत BCI को ही कॉलेजों का पूरा प्रबंधन दे दिया गया है (कार्यकारी परिषद के 35 में से 27 सदस्य BCI द्वारा मनोनीत हैं)। प्रशांत भूषण ने कहा: “एक रेगुलेटर (नियामक) उसी संस्था को खुद नहीं चला सकता जिसे वह नियंत्रित करता है। यह सिद्धांत सुप्रीम कोर्ट द्वारा BCCI केस सहित कई फैसलों में स्थापित किया जा चुका है।”
- कॉलेजों की मान्यता के नाम पर करोड़ों का चंदा: वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने कोर्ट को बताया कि नए लॉ कॉलेजों को मंजूरी देने के बदले BCI ट्रस्ट में करोड़ों रुपये के दान (Donations) आ रहे हैं।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) द्वारा देश में कानूनी शिक्षा के नियमन की विधिक सीमा, ‘विनियामक बनाम संचालक’ (Regulator versus Operator) के बीच हितों के सीधे टकराव (Conflict of Interest), और बीसीआई ट्रस्ट ‘पर्ल-फर्स्ट’ (PEARL-First Trust) के जरिए गोवा और आंध्र प्रदेश में राज्य सरकारों से जमीन व सहमति लेकर खुद लॉ कॉलेज चलाने के तौर-तरीकों पर कड़ा विधिक रुख अपनाया है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने अधिवक्ता गिरीश मित्तल द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए बीसीआई को औपचारिक नोटिस जारी किया। साथ ही अदालत ने मामले की प्रति सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के कार्यालय को भी तामील करने का निर्देश दिया। शीर्ष अदालत ने मौखिक रूप से व्यवस्था दी है कि बीसीआई कानूनी शिक्षा के मानकों को बढ़ावा देने और न्यूनतम पाठ्यक्रम तय करने की विनियामक संस्था हो सकती है, लेकिन वह विश्वविद्यालयों और कॉलेजों के दैनिक प्रबंधन और संचालन को नियंत्रित (Control) नहीं कर सकती।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख विधिक अवलोकन एवं तीखी टिप्पणियां
1. ‘पाठ्यक्रम तय कीजिए, कॉलेज मत चलाइए; BCI शिक्षा विशेषज्ञ नहीं’: CJI सूर्यकांत कानूनी शिक्षा के क्षेत्र में बीसीआई की सीमा तय करते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट शब्दों में कहा: “आप पाठ्यक्रम तय कर सकते हैं कि डिग्री चार साल की होगी या पांच साल की। आप कानूनी शिक्षा को बढ़ावा दे सकते हैं और उसके लिए प्रोत्साहक कदम उठा सकते हैं। लेकिन आप इसे नियंत्रित (Control) नहीं कर सकते। आप (BCI) कानूनी शिक्षा के बारे में क्या जानते हैं? इसके लिए अकादमिक विशेषज्ञ (Experts) मौजूद हैं।”
2. बीसीआई की विनियामक शक्ति की सीमा और धारा 7(1)(h) का परीक्षण
- CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि अदालत सबसे पहले यह तय करेगी कि क्या बार काउंसिल के पास कानून विश्वविद्यालयों पर पूर्ण प्रशासनिक नियंत्रण करने का कोई अधिकार है भी या नहीं:“सबसे पहले हम यह निर्धारित करना चाहेंगे कि क्या बार काउंसिल के पास लॉ यूनिवर्सिटीज को विनियमित और नियंत्रित करने की कोई शक्ति है। अधिवक्ता अधिनियम, 1961 की धारा 7(1)(h) कहती है कि बीसीआई का काम ‘कानूनी शिक्षा को बढ़ावा देना और ऐसे शिक्षण के मानक निर्धारित करना’ है। हम इसका सूक्ष्म परीक्षण करेंगे और यदि आवश्यकता हुई, तो इस मुद्दे को बड़ी संविधान पीठ (Larger Bench) को भी संदर्भित करेंगे। मूल प्रश्न यही है कि कानूनी शिक्षा को नियंत्रित करने के लिए BCI कितनी सक्षम विशेषज्ञ संस्था है।”
याचिकाकर्ता और वरिष्ठ अधिवक्ताओं की प्रमुख दलीलें
1. प्रशांत भूषण (याचिकाकर्ता गिरीश मित्तल की ओर से): ‘नियामक खुद संस्थान नहीं चला सकता’
- वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि 1974 से चले आ रहे मूल बीसीआई ट्रस्ट को 2020 में बदलकर ‘पर्ल-फर्स्ट ट्रस्ट’ (PEARL-First Trust) बना दिया गया, जिसमें तत्कालीन चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने खुद को आजीवन ट्रस्टी (Lifetime Trustee) घोषित कर लिया।
- उन्होंने रेखांकित किया कि गोवा और आंध्र प्रदेश में राज्य विधानमंडलों द्वारा बनाए गए कानूनों के तहत इन नए लॉ कॉलेजों की एग्जीक्यूटिव काउंसिल (EC) के 35 में से 27 सदस्य सीधे BCI द्वारा मनोनीत किए जाते हैं।
- हितों का टकराव (Conflict of Interest):“अधिनियम के प्रावधान अनिवार्य रूप से बार काउंसिल को ही इन कॉलेजों का सर्वेसर्वा बना देते हैं। यह स्थापित प्रशासनिक न्यायशास्त्र का बुनियादी नियम है कि जो संस्था नियामक (Regulator) है, वह उसी संस्थान का संचालन (Operator) नहीं कर सकती जिसे वह विनियमित कर रही है। यह सिद्धांत सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘बीसीसीआई’ (BCCI Case) सहित कई ऐतिहासिक फैसलों में तय किया जा चुका है।”
2. वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता: ‘मशरूम की तरह उग रहे कॉलेजों की मान्यता के नाम पर करोड़ों का डोनेशन’
- वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता ने हलफनामे का समर्थन करते हुए बीसीआई ट्रस्ट के वित्तीय लेन-देन पर गंभीर आरोप लगाए:“देश भर में कुकुरमुत्ते (Mushrooming) की तरह खुल रहे निजी लॉ कॉलेजों को मान्यता और अनुमोदन (Approval) देने के एवज में बीसीआई ट्रस्ट में करोड़ों रुपयों का दान/डोनेशन आ रहा है। हम इस संबंध में अकाट्य दस्तावेज अदालत के रिकॉर्ड पर दाखिल कर रहे हैं।”
3. आत्माराम नाडकर्णी (प्रतिवादी की ओर से): ‘मेडिकल काउंसिल की तरह बीसीआई को भी अधिकार’
- वरिष्ठ अधिवक्ता आत्माराम नाडकर्णी ने बीसीआई का बचाव करते हुए दलील दी कि मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI/NMC) भी मेडिकल शिक्षा का नियमन करती है और डॉक्टरों का नामांकन संभालती है।
- उन्होंने संविधान पीठ के फैसलों और यूजीसी (UGC) के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि पेशेवर शिक्षा के नियमन का विशेष अधिकार विनियामक निकायों में निहित होता है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं ‘PEARL-First’ विवाद
- 1974 का ट्रस्ट बनाम 2020 का नया ट्रस्ट: बीसीआई ने 1974 के मूल वैधानिक ट्रस्ट को दरकिनार करते हुए 2020 में ‘PEARL-First Trust’ का गठन किया।
- करोड़ों के फंड्स का डायवर्जन: याचिका में आरोप लगाया गया है कि ऑल इंडिया बार एग्जामिनेशन (AIBE) और लॉ कॉलेजों की इंस्पेक्शन फीस से एकत्रित सार्वजनिक धन को बीसीआई के मुख्य खाते से इस ट्रस्ट में अंतरित किया गया।
- गोवा और आंध्र प्रदेश में निजी/स्वायत्त विश्वविद्यालय: बीसीआई ट्रस्ट ने राज्य सरकारों के साथ एमओयू (MoU) करके जमीनें हासिल कीं और राज्य कानूनों के जरिए ऐसे विश्वविद्यालय स्थापित किए जहां मान्यता देने वाली संस्था (BCI) ही स्वयं संचालक और प्रशासक की भूमिका में आ गई।
सुप्रीम कोर्ट का आदेश
- औपचारिक नोटिस जारी: अदालत ने याचिका पर बार काउंसिल ऑफ इंडिया और अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी किया, जिसे बीसीआई के स्टैंडिंग काउंसिल ने स्वीकार किया।
- सॉलिसिटर जनरल को सूचना: खंडपीठ ने निर्देश दिया कि इस याचिका की एक प्रति भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के कार्यालय को भी अनिवार्य रूप से सौंपी जाए ताकि केंद्र सरकार और शीर्ष विधि अधिकारी का पक्ष भी रिकॉर्ड पर आ सके।
- दिशानिर्देश तय करने का संकेत: अदालत ने संकेत दिया कि यदि आवश्यक हुआ तो कानूनी शिक्षा के नियमन में बीसीआई बनाम यूजीसी/अकादमिक विशेषज्ञों के अधिकारों का दायरा तय करने के लिए विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: गिरीश मित्तल बनाम बार काउंसिल ऑफ इंडिया व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता की ओर से: अधिवक्ता प्रशांत भूषण एवं वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा गुप्ता
- प्रतिवादियों/बीसीआई की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता आत्माराम नाडकर्णी एवं बीसीआई स्टैंडिंग काउंसिल
- भारत संघ / विधि अधिकारी: भारत के सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का कार्यालय
- प्रासंगिक कानून एवं धाराएं:
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) की धारा 7(1)(h) (कानूनी शिक्षा के मानकों का संवर्धन व निर्धारण), धारा 15 एवं धारा 49(1)(d)
- विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 (UGC Act) के तहत उच्च शिक्षण संस्थानों के मानक
- भारतीय ट्रस्ट अधिनियम, 1882
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 142 एवं अनुच्छेद 32
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- बीसीसीआई बनाम क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बिहार (2015, सुप्रीम कोर्ट) — ‘सार्वजनिक या विनियामक कर्तव्यों का निर्वहन करने वाली संस्था के पदाधिकारी अपने निजी या समानांतर व्यावसायिक हितों के साथ संस्थान का संचालन नहीं कर सकते; विनियामक निष्पक्षता के लिए हितों का टकराव पूरी तरह निषिद्ध है।’
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया बनाम बोनी एफओआई (2005, सुप्रीम कोर्ट) एवं सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ (1998) — ‘अधिवक्ता अधिनियम की धारा 7(1)(h) के तहत बीसीआई को कानूनी शिक्षा के न्यूनतम मानक तय करने का अधिकार है, लेकिन यह अधिकार विश्वविद्यालय की स्वायत्तता को समाप्त करने तक विस्तृत नहीं है।’
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना (सर्वोच्च न्यायालय)
Power Of BCI: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ (Judges) | CJI सूर्य कांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| याचिकाकर्ता | गिरिश मित्तल (Girish Mittal) |
| याचिकाकर्ता के वकील | वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण (Prashant Bhushan) |
| मुख्य मुद्दा | BCI ट्रस्ट (‘PEARL-First’) के फंड्स का इस्तेमाल, हितों का टकराव (Conflict of Interest) और BCI के अधिकार क्षेत्र का दायरा |

