कैसे पकड़ी गई जालसाजी?
- मूल आदेश (19 नवंबर 2024): 19 नवंबर 2024 को दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा जारी मूल आदेश में केवल 3 पैराग्राफ थे। इसमें ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड मंगवाने का निर्देश देते हुए सुनवाई 14 जनवरी 2025 तक स्थगित की गई थी। इस आदेश में कोई स्टे या रोक नहीं दी गई थी।
- जाली आदेश की कॉपी: सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष एक दूसरी कॉपी पेश की गई, जिसमें एक चौथा पैराग्राफ (Para 4) जोड़ा गया था, जिसमें लिखा था — “Interim Stay Granted” (अंतरिम स्टे प्रदान किया जाता है)।
- विवाद की पृष्ठभूमि: यह मामला दिल्ली के खेड़ा खुर्द में 175 वर्ग गज की संपत्ति पर कब्जे की कोशिश, धोखाधड़ी और जालसाजी से जुड़ी पुलिस शिकायत पर कार्रवाई न होने से संबंधित था। संपत्ति विवाद से जुड़ी सुनवाई के दौरान ही इस जाली आदेश का इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई।
अदालत का फैसला और निर्देश
न्यायमूर्ति कौरव ने अपने 18 सितंबर के आदेश में टिप्पणी की: “किसी अज्ञात व्यक्ति ने इस न्यायालय द्वारा पारित आदेश में हेरफेर की है और ‘अंतरिम रोक दी गई’ शब्दों वाला पैरा 4 जोड़ा है। इस पहलू की जांच की जानी चाहिए और उचित कार्रवाई की जानी आवश्यक है।” — दिल्ली हाईकोर्ट
- पुलिस आयुक्त को निर्देश: अदालत ने याचिकाकर्ता को पुलिस के समक्ष अपना अभ्यावेदन (Representation) प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी और पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया कि वे आवेदन मिलने के 2 महीने के भीतर सभी पहलुओं की जांच कर कानून के अनुसार कार्रवाई करें।
- रजिस्ट्रार जनरल के समक्ष शिकायत: कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को दोनों आदेशों की प्रतियां संलग्न कर हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल (Registrar General) को विस्तृत शिकायत देने का भी अधिकार दिया, ताकि प्रशासनिक स्तर पर इसे तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जा सके।
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने न्यायिक आदेशों में जालसाजी (Fabrication/Forgery of Judicial Orders), न्याय प्रशासन की प्रक्रिया को विकृत करने के दुर्भावनापूर्ण प्रयासों और अदालती रिकॉर्ड के साथ छेड़छाड़ कर अवैध लाभ कमाने की गंभीर आपराधिक प्रवृत्ति पर कड़ा रुख अपनाया है।
न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव की एकल पीठ ने मीना देवी और अन्य द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को यह छूट भी दी कि वे फर्जीवाड़े की प्रमाणित प्रतियों के साथ दिल्ली उच्च न्यायालय के महानिबंधक (Registrar General) के समक्ष भी शिकायत प्रस्तुत करें ताकि प्रशासनिक स्तर पर भी जवाबदेही तय की जा सके। अदालत ने अपने 19 नवंबर 2024 के एक मूल आदेश में फर्जी तरीके से अतिरिक्त पैराग्राफ जोड़कर “Interim stay granted” (अंतरिम रोक मंजूर) लिखे जाने का खुलासा होने पर दिल्ली पुलिस कमिश्नर (Commissioner of Police) को मामले की उच्चस्तरीय जांच करने और दो महीने के भीतर कानून सम्मत दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित करने का सख्त निर्देश दिया है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख अवलोकन एवं विधिक निष्कर्ष
1. ‘किसी अज्ञात व्यक्ति ने कोर्ट का आदेश गढ़ा और फर्जी पैरा-4 जोड़ा’: जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव अदालती आदेश के दो परस्पर विरोधी संस्करणों का परीक्षण करने के बाद न्यायमूर्ति कौरव ने अपने आदेश में दर्ज किया: “ऐसा प्रतीत होता है कि किसी अज्ञात व्यक्ति ने इस न्यायालय द्वारा पारित आदेश में जालसाजी (Fabricated) की है और उसमें ‘Interim stay granted’ (अंतरिम रोक मंजूर) शब्दों से युक्त पैरा संख्या 4 जोड़ दिया है। इस पहलू की गहराई से जांच किए जाने और कानून के अनुसार उचित दंडात्मक कार्रवाई किए जाने की तत्काल आवश्यकता है।”
2. मूल आदेश बनाम गढ़ा गया फर्जी आदेश (Discrepancy Analysis) अदालत ने पत्रावली की सूक्ष्म समीक्षा में पाया कि 19 नवंबर 2024 को पारित वास्तविक आदेश और पक्षकारों के बीच प्रसारित प्रति में गंभीर अंतर था:
- मूल आदेश (Original Order): 19 नवंबर 2024 के वास्तविक अदालती आदेश में कुल केवल तीन (3) पैराग्राफ थे। अदालत ने केवल निचली अदालत के रिकॉर्ड (TCR) को तलब करने का निर्देश दिया था और मामले की सुनवाई 14 जनवरी 2025 तक के लिए स्थगित (Adjourned) की थी। इसमें किसी भी प्रकार की अंतरिम रोक (Stay) नहीं दी गई थी।
- फर्जी आदेश (Forged Version): अदालत में प्रस्तुत किए गए दूसरे संस्करण में तीन पैराग्राफों के नीचे एक अनधिकृत चौथा पैराग्राफ जोड़ा गया था, जिसमें लिखा था—“Interim stay granted”, जिसके आधार पर निचली अदालत की कार्यवाहियों और संपत्ति विवाद को प्रभावित करने का प्रयास किया गया।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं संपत्ति विवाद
- खेड़ा खुर्द संपत्ति विवाद: विवाद दिल्ली के खेड़ा खुर्द स्थित 175 वर्ग गज की एक आवासीय संपत्ति पर कब्जे, धोखाधड़ी और दस्तावेजों की जालसाजी से जुड़ा है।
- पुलिस निष्क्रियता की शिकायत: याचिकाकर्ताओं (मीना देवी व अन्य) ने 7 सितंबर को दिल्ली पुलिस कमिश्नर को शिकायत देकर आरोप लगाया था कि उक्त संपत्ति को हड़पने के लिए जाली दस्तावेजों और गंभीर धोखाधड़ी का सहारा लिया गया है, परंतु पुलिस कोई ठोस कार्रवाई नहीं कर रही है।
- हाईकोर्ट में फर्जीवाड़े का खुलासा: उच्च न्यायालय के समक्ष सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने उजागर किया कि संबंधित पूर्ववर्ती कार्यवाहियों में पारित आदेश की दो अलग-अलग प्रतियां मौजूद हैं—एक जिसमें केवल स्थगन था और दूसरी जिसमें फर्जी स्टे ऑर्डर जुड़ा हुआ था।
उच्च न्यायालय का अंतिम निर्देशात्मक आदेश
- पुलिस कमिश्नर को जांच का निर्देश: अदालत ने याचिकाकर्ताओं को छूट दी कि वे जाली आदेश के संबंध में विस्तृत अभ्यावेदन (Representation) के साथ दिल्ली पुलिस कमिश्नर से संपर्क करें। पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया गया कि वे अभ्यावेदन प्राप्त होने के दो महीने (Two Months) के भीतर पूरे मामले की समग्र जांच करवाएं और आवश्यक विधिक कार्रवाई (एफआईआर दर्ज करना आदि) सुनिश्चित करें।
- रजिस्ट्रार जनरल के समक्ष शिकायत: याचिकाकर्ताओं को दोनों आदेशों की प्रतियां संलग्न कर दिल्ली हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भी औपचारिक शिकायत देने की स्वतंत्रता दी गई। पीठ ने कहा:“यदि उक्त शिकायत रजिस्ट्रार जनरल के समक्ष दायर की जाती है, तो उसे उसके तार्किक निष्कर्ष (Logical Conclusion) तक पहुंचाया जाए।”
- पक्षकारों के अधिकार सुरक्षित: सभी पक्षों के अधिकारों और दावों को खुला (Open) रखते हुए अदालत ने वर्तमान याचिका का निस्तारण कर दिया।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: मीना देवी व अन्य बनाम राज्य व अन्य [रिट याचिका / आपराधिक विविध याचिका – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं की ओर से: अधिवक्ता ओ.पी. अग्रवाल, एम.ए. खान एवं आशीष प्रताप सिंह
- राज्य (दिल्ली पुलिस) की ओर से: अतिरिक्त स्थायी वकील (ASC) आनंद वी. खत्री
- अन्य प्रतिवादियों की ओर से: अधिवक्ता वी.पी. राणा एवं रूपांशु मलिक
- प्रासंगिक कानून एवं धाराएं:
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 336(3), 338, 340 (दस्तावेजों की जालसाजी, कूटरचना एवं न्यायालय के अभिलेखों के साथ धोखाधड़ी) / पूर्ववर्ती IPC की धारा 466, 468, 471 एवं 193
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 215 / पूर्ववर्ती CrPC की धारा 195 व धारा 340 (न्याय प्रशासन के विरुद्ध अपराधों पर संज्ञान की प्रक्रिया)
- न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) की धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना – न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप व उसे दूषित करना)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- इकबाल सिंह मारवाह बनाम मीनाक्षी मारवाह (2005, सुप्रीम कोर्ट 5-जज संविधान पीठ) — ‘न्यायालय में पेश किए जाने से पूर्व या बाद में अदालती आदेशों व दस्तावेजों में की गई जालसाजी न्याय प्रशासन की अखंडता पर सीधा हमला है; ऐसे मामलों में आपराधिक कानून पूरी कठोरता से लागू होना चाहिए।’
- चंद्र शीशम बनाम चीफ सेक्रेटरी (सुप्रीम कोर्ट) — ‘न्यायिक आदेशों को गढ़ना या उनमें हेरफेर करना न्यायालय की घोर आपराधिक अवमानना है, जिसमें किसी भी दोषी को बख्शा नहीं जा सकता।’
- पीठ: न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव (दिल्ली उच्च न्यायालय)
- आदेश तिथि: 18 सितंबर 2026 (निस्तारित)
Forged Orders:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव (Justice Purushaindra Kumar Kaurav) |
| मामला | मीना देवी व अन्य बनाम राज्य व अन्य (Meena Devi & Anr. v The State & Ors.) |
| मुद्धा | उच्च न्यायालय के आदेश में फर्जी पैरा जोड़कर अंतरिम स्टे (रोक) दिखाना |
| जांच का आदेश | दिल्ली पुलिस आयुक्त को 2 महीने के भीतर जांच पूरी करने का निर्देश |

