याचिका की मुख्य मांगें (Key Issues in PIL)
यह जनहित याचिका (PIL) एनजीओ ‘एक्शन फॉर ऑटिज़्म’ द्वारा दर्ज की गई है, जिसमें ऑटिज़्म, डिस्लेक्सिया (Dyslexia) और ADHD जैसे न्यूरोडाइवर्जेंट स्थितियों से जूझ रहे लोगों के अधिकारों और सुरक्षा के लिए व्यापक सुधारों की मांग की गई है।
- विभिन्न क्षेत्रों में भेदभाव: याचिका में बताया गया है कि न्यूरोडाइवर्जेंट व्यक्तियों को स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, रोजगार, वित्तीय सेवाओं और बीमा (Insurance) में लगातार भेदभाव और बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
- कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन: ‘दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016’ (RPWD Act, 2016) और ‘नेशनल ट्रस्ट एक्ट’ जैसी वैधानिक व्यवस्थाओं के बावजूद, इन लोगों को जीवन और स्वास्थ्य बीमा आसानी से नहीं मिलता या अत्यधिक प्रीमियम वसूला जाता है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (RPwD Act) के वैधानिक अधिदेश, न्यूरोडाइवर्जेंट (Neurodivergent) व्यक्तियों के जीवन बीमा व वित्तीय सुरक्षा के अधिकारों, और बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (IRDAI) द्वारा जारी परिपत्रों के जमीनी क्रियान्वयन पर कड़ा संज्ञान लिया है।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की खंडपीठ ने गैर-सरकारी संगठन ‘एक्शन फॉर ऑटिज्म’ (Action for Autism) द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए IRDAI को सार्वजनिक (Public Sector) और निजी (Private Sector) दोनों बीमा कंपनियों द्वारा जारी की गई पॉलिसियों का वास्तविक और व्यापक डेटा अगली सुनवाई तक रिकॉर्ड पर पेश करने का सख्त निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल दिशा-निर्देश या सर्कुलर जारी कर देना ही विनियामक दायित्व की इतिश्री नहीं है; यह देखना अनिवार्य है कि क्या इन उपायों से वास्तव में ऑटिज्म और सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित नागरिकों को बीमा कवर प्राप्त हुआ है या नहीं।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख अवलोकन एवं निर्देश
1. ‘कागजी सर्कुलर बनाम धरातल पर वास्तविकता’: खंडपीठ
- सुनवाई के दौरान IRDAI की ओर से पेश वकील ने अदालत को अवगत कराया कि प्राधिकरण ने ऑटिज्म से पीड़ित व्यक्तियों को बीमा कवरेज प्रदान करने के संबंध में पहले ही दो विस्तृत सर्कुलर जारी कर रखे हैं और उन्हें जवाबी हलफनामे के साथ रिकॉर्ड पर रखा गया है।
- इस पर न्यायमूर्ति नागरत्ना और न्यायमूर्ति महादेवन की पीठ ने तीखा सवाल किया कि क्या इन विनियामक परिपत्रों का कोई वास्तविक लाभ लाभार्थियों तक पहुंचा भी है?
- अदालत ने जानना चाहा कि क्या इन नियमों के बाद बीमा कंपनियों ने वास्तव में ऑटिज्म से पीड़ित व्यक्तियों को जीवन बीमा पॉलिसियां जारी की हैं या यह केवल कागजों तक सीमित रहा है।
2. सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट निर्देशात्मक आदेश
खंडपीठ ने IRDAI को सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की सभी कंपनियों से आंकड़े जुटाकर हलफनामा दाखिल करने का आदेश देते हुए कहा: “IRDAI के विद्वान अधिवक्ता इस संबंध में निर्देश प्राप्त करें और ऑटिज्म (Autism), सेरेब्रल पाल्सी (Cerebral Palsy) और एस्परगर सिंड्रोम (Asperger’s Syndrome) से पीड़ित व्यक्तियों के जीवन का बीमा करने हेतु सार्वजनिक क्षेत्र के साथ-साथ निजी क्षेत्र की बीमा कंपनियों द्वारा वास्तव में जारी की गई पॉलिसियों की संख्या का पूरा डेटा तैयार करें, और अगली सुनवाई की तारीख तक यह वस्तुस्थिति/डेटा अदालत के रिकॉर्ड पर प्रस्तुत करें।”
याचिका में उठाए गए प्रमुख विधिक व प्रणालीगत मुद्दे
1. वित्तीय सेवाओं और बीमा में प्रणालीगत बाधाएं (Systemic Barriers)
- गैर-सरकारी संगठन ‘एक्शन फॉर ऑटिज्म’ द्वारा वर्ष 2025 में दायर इस जनहित याचिका का उद्देश्य न्यूरोडाइवर्जेंट स्थितियों—जैसे ऑटिज्म, डिस्लेक्सिया और अटेंशन-डेफिसिट/हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर (ADHD)—से ग्रसित व्यक्तियों के अधिकारों की सुरक्षा और संवर्धन हेतु व्यापक संस्थागत सुधार सुनिश्चित करना है।
- याचिका में रेखांकित किया गया है कि देश में कानूनी सुरक्षा उपाय (RPwD Act, 2016) मौजूद होने के बावजूद न्यूरोडाइवर्जेंट व्यक्तियों को निम्नलिखित क्षेत्रों में भारी भेदभाव और संरचनात्मक बाधाओं का सामना करना पड़ता है:
- स्वास्थ्य सेवा और बीमा: बीमा कंपनियां अक्सर ऑटिज्म या बौद्धिक भिन्नता का खुलासा होते ही जीवन बीमा और स्वास्थ्य बीमा देने से एकतरफा इनकार कर देती हैं या अत्यधिक अनुचित शर्तें लगाती हैं।
- शिक्षा एवं रोजगार: स्कूलों में समावेशी माहौल का अभाव और कार्यस्थलों पर यथोचित समायोजन (Reasonable Accommodation) न मिलना।
- वित्तीय सेवाएं: बैंक खाते खोलने, वित्तीय साधनों का उपयोग करने और स्वतंत्र रूप से संपत्ति प्रबंधन में आने वाली विधिक रुकावटें।
2. कार्रवाई का विस्तार
- शीर्ष अदालत ने इससे पूर्व केंद्र सरकार, सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय और दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग (DEPwD) से जवाब तलब किया था।
- अब कार्यवाहियों का दायरा बढ़ाते हुए अदालत ने बीमा कंपनियों द्वारा अपनाए जाने वाले मनमाने रवैये और विनियामक विफलता की न्यायिक समीक्षा शुरू कर दी है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: एक्शन फॉर ऑटिज्म बनाम भारत संघ व अन्य [W.P.(C) No. 729 of 2025 – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक कानून एवं विनियम:
- दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 (Rights of Persons with Disabilities Act, 2016 – RPwD Act) की धारा 3 (समानता व गैर-भेदभाव), धारा 24 (सामाजिक सुरक्षा एवं बीमा) एवं धारा 25 (स्वास्थ्य देखभाल)
- नेशनल ट्रस्ट एक्ट, 1999 (ऑटिज्म, सेरेब्रल पाल्सी, मानसिक मंदता और बहु-दिव्यांगता ग्रस्त व्यक्तियों के कल्याण हेतु राष्ट्रीय न्यास अधिनियम)
- बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (IRDAI Act, 1999) सहपठित स्वास्थ्य व जीवन बीमा विनियम
- संयुक्त राष्ट्र दिव्यांगजन अधिकार सम्मेलन (UNCRPD), जिस पर भारत ने हस्ताक्षर किए हैं।
- प्रासंगिक संवैधानिक प्रावधान: भारत का संविधान – अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समानता), अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध), और अनुच्छेद 21 (मानवीय गरिमा के साथ जीवन जीने का मौलिक अधिकार)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- विकास कुमार बनाम यूपीएससी (2021, सुप्रीम कोर्ट) — ‘यथोचित समायोजन (Reasonable Accommodation) प्रदान करना राज्य और उसकी संस्थाओं का केवल एक वैधानिक दायित्व नहीं बल्कि मौलिक अधिकार का अभिन्न हिस्सा है; दिव्यांगता के आधार पर किसी भी नागरिक को मुख्यधारा की वित्तीय या सामाजिक सुविधाओं से वंचित नहीं किया जा सकता।’
- पीठ: न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन (सर्वोच्च न्यायालय)
- अगली कार्यवाही: IRDAI को सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों की बीमा कंपनियों से जारी पॉलिसियों का वास्तविक संख्यात्मक डेटा तैयार कर अगली सुनवाई तक सीलबंद/शपथपत्र के रूप में प्रस्तुत करना होगा।
Action for Autism: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ (Judges) | न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन |
| याचिकाकर्ता | एक्शन फॉर ऑटिज़्म (Action for Autism – NGO) |
| मुख्य निर्देश | IRDAI सार्वजनिक और निजी बीमा कंपनियों द्वारा दी गई पॉलिसियों का डेटा पेश करे |
| मुद्दे का दायरा | न्यूरोडाइवर्जेंट व्यक्तियों के अधिकारों और बीमा सुरक्षा में भेदभाव |

