Sunday, November 8, 2026
HomeHigh CourtPolice In Court: गुजरात में लोग 10-15 साल दीवानी मुकदमों का इंतजार...

Police In Court: गुजरात में लोग 10-15 साल दीवानी मुकदमों का इंतजार नहीं कर सकते; पुलिस तभी 25-50% कट ले रही है, क्योंकि उन्हें वेतन अपर्याप्त लगती है

FOLLOW US FOR MORE LEGAL UPDATES ON WhatsApp

मामले की पृष्ठभूमि और विधिक तर्क

  1. मामले की पृष्ठभूमि और राजनीतिक विवाद:21 अक्टूबर को काजलबेन ठाकोर ने शिकायत दर्ज कराई थी कि उनकी जमीन की बिक्री को लेकर अगस्त महीने में तीन लोगों (रवि मंसूख ठाकोर, गभू बाभू रबारी और बलदेव रबारी) ने उनके पति पोपटजी ठाकोर का अपहरण कर लिया था। प्राथमिकी में गुजरात कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष जगदीश ठाकोर का नाम शामिल था, जिसे कांग्रेस ने पुलिस अधिकारी के इशारे पर दुर्भावनापूर्वक जोड़ा गया नाम करार दिया था।
  2. दंपति का हलफनामा और कोर्ट में बयान:6 नवंबर को सुनवाई के दौरान original complainant काजलबेन, हर्षदभाई और कथित पीड़ित पोपटजी ठाकोर स्वयं हाईकोर्ट में पेश हुए। उन्होंने हलफनामा दायर कर कहा कि उनके बीच का विवाद पूरी तरह सुलझ गया है और अब उन्हें आरोपियों के खिलाफ केस चलाने में कोई दिलचस्पी नहीं है। उन्होंने स्वीकार किया कि आगे केस चलाने से पक्षों का नुकसान होगा।
  3. पुलिस के खिलाफ आरोपों पर टिप्पणी से इनकार:हलफनामों में अदालज पुलिस कर्मियों के आचरण पर भी गंभीर आरोप लगाए गए थे। हालांकि, न्यायमूर्ति गीता गोपी ने स्पष्ट किया कि “अदालत पुलिस के खिलाफ लगाए गए इन आरोपों की गहराई में जाने का इरादा नहीं रखती है” और पक्षों के बीच हुए स्वैच्छिक समझौते को प्राथमिकता देते हुए एफआईआर को निरस्त कर दिया।

मुख्य विधिक व समन न्यायशास्त्र निष्कर्ष

1. निजी/जमीन विवादों में अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग:

यह निर्णय स्थापित करता है कि भले ही प्राथमिकी BNS के तहत गंभीर या गैर-शमनीय (Non-Compoundable) धाराओं में दर्ज की गई हो, यदि मामला मूलतः जमीन या दीवानी लेन-देन से जुड़ा है और पक्षकार स्वेच्छा से समझौता कर लेते हैं, तो अदालतों को न्यायिक समय और प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए अंतर्निहित शक्तियों (Inherent Powers) का उपयोग कर कार्यवाही समाप्त कर देनी चाहिए।

2. पीड़ित की प्रत्यक्ष सहमति और न्यायिक सत्यापन:

उच्च न्यायालयों द्वारा आपराधिक कार्यवाहियों को रद्द करते समय यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि शिकायतकर्ता और पीड़ित पर कोई दबाव न हो और उनके बयान स्वतंत्र इच्छा (Free Will) पर आधारित हों।

अहमदाबाद/गांधीनगर: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 (आपराधिक कार्यवाहियों व प्राथमिकी को रद्द करने की उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति—पूर्ववर्ती CrPC धारा 482), दीवानी भूमि विवादों में पुलिस तंत्र के ‘समानांतर न्यायिक व्यवस्था’ (Parallel Police Adjudication in Civil Land Disputes) के रूप में कार्य करने पर न्यायिक रोक, पुलिस अधिकारियों द्वारा ‘अवैध वसूली व कट मनी’ (Rent-seeking & Extortion by Police Officers), तथा झूठी आपराधिक प्राथमिकी दर्ज कराने के पीछे उच्च प्रशासनिक/पुलिस दबाव के विधिक परीक्षण के तहत गुजरात उच्च न्यायालय में अत्यंत सनसनीखेज अदालती कार्यवाही सामने आई है।

गुजरात उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति गीता गोपी (Justice Gita Gopi) की एकल पीठ ने 6 नवंबर 2026 (शुक्रवार) को गांधीनगर के अदालज पुलिस स्टेशन (Adalaj Police Station) में वरिष्ठ कांग्रेस नेता एवं पूर्व प्रदेश अध्यक्ष जगदीश ठाकोर (Jagdish Thakor) और दो अन्य के विरुद्ध दर्ज कथित अपहरण और आपराधिक धमकी की प्राथमिकी (FIR) को पूरी तरह रद्द (Quashed) कर दिया। यह एफआईआर लगभग ₹150 करोड़ मूल्य के एक विशाल भूखंड (Land parcel valued at around Rs 150 crore) के विक्रय विलेख (Sale Deed) से जुड़े विवाद से उपजी थी।

याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद याज्ञिक (Advocate Anand Yagnik) ने अदालत के समक्ष खुलासा किया कि शिकायतकर्ता महिला, उसके पति (तथाकथित अपहृत किसान) और उसके भाई को गुजरात कैडर के एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी (Senior IPS Officer) द्वारा धमकाया गया था ताकि वे इस ₹150 करोड़ की बेशकीमती जमीन को कौड़ियों के भाव (Throwaway Price) दो अन्य चहेते व्यक्तियों को बेच दें, और मना करने पर वरिष्ठ कांग्रेसी नेता का नाम घसीटते हुए यह मनगढ़ंत अपहरण का केस दर्ज कराया गया। अदालत में शिकायतकर्ता और ‘अपहृत’ पति दोनों ने शपथ पत्र देकर स्वीकार किया कि यह पूरा केस फर्जी था। राज्य सरकार के कड़े विरोध के बाद यद्यपि आदेश में से आईपीएस अधिकारी का नाम हटाने पर सहमति बनी, किंतु सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति गीता गोपी ने पूरे गुजरात में जमीन विवादों में पुलिस की समानांतर अदालतों और रिश्वतखोरी पर अभूतपूर्व और ऐतिहासिक मौखिक टिप्पणियां (Scathing Oral Observations) कीं।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति गीता गोपी की तीखी मौखिक टिप्पणियां

सुनवाई के दौरान जब राज्य सरकार के लोक अभियोजक हार्दिक दवे ने शपथ पत्र में वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी का नाम लिए जाने और पुलिस पर वसूली के आरोप लगाने पर आपत्ति जताई, तो न्यायमूर्ति गीता गोपी ने बेहद तल्ख लहजे में गुजरात पुलिस तंत्र की कड़वी सच्चाई को उजागर किया:

1. ‘पुलिस बिजनेस कर रही है, उन्हें अपनी सैलरी कम लगती है’: “पुलिस की इसमें गहरी दिलचस्पी (Police is interested) है। वे कोई कानून व्यवस्था नहीं संभाल रहे, वे व्यापार (They are doing business) कर रहे हैं। उन्हें अपनी सरकारी तनख्वाह अपर्याप्त (Find their salary inadequate) लगती है।”

2. ‘वे पैसे लेते हैं, हमें सब पता है; बहुत कम साहसी लोग इसे लिखकर रिकॉर्ड पर लाते हैं’:

  • जब याचिकाकर्ताओं के वकील आनंद याज्ञिक ने सीधे आरोप लगाया कि पुलिस अधिकारियों ने इस जमीन सौदे में भारी धनराशि ली है और सरकारी वकील ने आईपीएस अधिकारी का नाम रिकॉर्ड में आने पर आपत्ति की, तो जज ने दो-टूक कहा:

*”वे पैसे लेते हैं (They take money)। हम सब कुछ जानते हैं। क्या हम नहीं जानते? ऐसी बातें सामान्यतः उजागर नहीं की जातीं। बहुत कम साहसी लोग (Very few courageous people) होते हैं जो इसे लिखित रूप में दर्ज करने का साहस जुटा पाते हैं।

इसे रिकॉर्ड पर आने दीजिए। यह रिकॉर्ड पर क्यों नहीं आना चाहिए? व्यक्तिगत रूप से मैं चाहती हूं कि यह सब रिकॉर्ड पर आए (Personally I want it to come)।”*

3. ‘पूरे गुजरात में पुलिस अदालत बनकर काम कर रही है; लोग 25-50% कट दे रहे हैं’:

  • न्यायमूर्ति गीता गोपी ने दीवानी अदालतों में होने वाले अत्यधिक विलंब और उसके कारण पुलिस के ‘कंगारू कोर्ट’ में तब्दील होने पर गहरी पीड़ा व्यक्त की:

“जब जमीन के मामलों की बात आती है, तो पूरे गुजरात में पुलिस एक ‘अदालत’ (Police has begun functioning as a court) के रूप में काम करने लगी है।

लोग भी पुलिस के पास इसलिए जा रहे हैं क्योंकि नागरिकों में दीवानी मामलों के निपटारे के लिए 10-15 साल तक इंतजार करने का धैर्य (No patience for waiting 10-15 years) नहीं बचा है। उन्हें लगता है कि पुलिस के पास जाने से विवाद तुरंत सुलझ जाता है, इसलिए वे सोचते हैं कि पुलिस वाले भले ही 25 से 50 प्रतिशत (25-50 per cent cut) ले जाएं, लेकिन मामला तुरंत खत्म हो जाए।

लेकिन यह कोई सही तरीका नहीं है। हमें अपनी न्यायपालिका की रक्षा करनी होगी (We have to protect our institution)। अदालत के अधिकारी होने के नाते, हम इस न्यायिक प्रणाली की रक्षा करने के लिए बाध्य हैं।”

Also Read; Nalsar Research: नालसार अध्ययन में लैंगिक विषमता पर चिंता…हाईकोर्ट ने दिया ऐतिहासिक सुझाव;मध्यस्थता में महिलाओं और तकनीकी विशेषज्ञों की भागीदारी बढ़ाएं

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम

संदर्भ / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
फोरम / न्यायालयगुजरात उच्च न्यायालय, अहमदाबाद (आपराधिक अंतर्निहित क्षेत्राधिकार — धारा 528 BNSS / 482 CrPC)
पीठासीन न्यायाधीशन्यायमूर्ति गीता गोपी (Justice Gita Gopi) (एकल पीठ)
आदेश की तिथि6 नवंबर 2026 (शुक्रवार)
केस संदर्भजगदीश ठाकोर व अन्य बनाम गुजरात राज्य व अन्य [Criminal Misc. Application / 2026]
मुख्य याचिकाकर्ताजगदीश ठाकोर (Jagdish Thakor) — वरिष्ठ कांग्रेस नेता, पूर्व सांसद एवं पूर्व अध्यक्ष, गुजरात प्रदेश कांग्रेस कमेटी (GPCC), तथा दो अन्य।
याचिकाकर्ताओं के मुख्य अधिवक्ताप्रसिद्ध मानवाधिकार व वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद याज्ञिक (Advocate Anand Yagnik)।
प्रतिवादी पक्षगुजरात राज्य (गृह विभाग व पुलिस) — लोक अभियोजक हार्दिक दवे (Public Prosecutor Hardik Dave) द्वारा प्रतिनिधित्व।
मूल शिकायतकर्ता व कथित पीड़ित1. काजलबेन ठाकोर (Kajalben Thakor) — मूल शिकायतकर्ता।
2. पोपटजी चेहाराजी ठाकोर (Popatji Thakor) — कथित अपहृत किसान (पति)।
3. हर्षदभाई रामतुजी ठाकोर (भाई)।
संबंधित पुलिस स्टेशनअदालज पुलिस स्टेशन (Adalaj Police Station), जिला गांधीनगर, गुजरात।
विवादित संपत्ति का वित्तीय पैमानागांधीनगर क्षेत्र में स्थित एक विशाल भूखंड, जिसका बाजार मूल्य लगभग ₹150 करोड़ (Rs 150 Crore) आंका गया है।
याचिकाकर्ताओं (वकील आनंद याज्ञिक) के गंभीर आरोपयाचिका में आरोप लगाया गया कि गुजरात के एक अत्यंत वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी (Senior IPS Officer) ने जमीन हड़पने के उद्देश्य से शिकायतकर्ता परिवार पर भारी दबाव डाला था कि वे जमीन को बाजार मूल्य से बहुत कम (कौड़ियों के भाव) दो पसंदीदा खरीदारों को बेच दें। जब किसान परिवार इसके लिए तैयार नहीं हुआ, तो विपक्ष के कद्दावर नेता जगदीश ठाकोर की छवि खराब करने और सौदे को जबरन पूरा कराने के लिए पुलिसिया रसूख का इस्तेमाल कर अपहरण और धमकी की मनगढ़ंत एफआईआर दर्ज कराई गई।
शिकायतकर्ता व ‘अपहृत’ का अदालत में रुखकाजलबेन, उनके कथित तौर पर अपहृत पति पोपटजी और उनके भाई ने उच्च न्यायालय में उपस्थित होकर संयुक्त हलफनामा दिया। उन्होंने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि “केस पूरी तरह से फर्जी था (The case was fake)” और पुलिस अधिकारी के अनुचित दबाव ও जबरदस्ती के कारण यह एफआईआर लिखवाई गई थी। उन्होंने एफआईआर रद्द करने पर पूर्ण सहमति दी।
आईपीएस अधिकारी के नाम पर विधिक तकरारराज्य सरकार के लोक अभियोजक हार्दिक दवे ने स्वीकार किया कि एफआईआर रद्द की जा सकती है, किंतु उन्होंने हलफनामे में वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी का नाम शामिल किए जाने पर तीखा विरोध दर्ज कराया। अंततः राज्य की जिद और कानूनी गतिरोध टालने हेतु याचिकाकर्ताओं और शिकायतकर्ता ने अधिकारी का नाम औपचारिक हलफनामे से हटाने पर सहमति दी, जिसके बाद एफआईआर रद्द हुई।
उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णयआपराधिक विविध याचिका स्वीकृत (Allowed); अदालज पुलिस स्टेशन में दर्ज प्राथमिकी और संपूर्ण आपराधिक कार्यवाहियां पूरी तरह निरस्त/रद्द (Quashed)।

विधिक एवं संस्थागत विश्लेषण: ‘पुलिस द्वारा दीवानी विवादों का समानांतर निपटारा और न्याय प्रणाली का क्षरण’

  • दीवानी न्याय प्रणाली का संकट और पुलिस का अनधिकृत हस्तक्षेप:
    • न्यायमूर्ति गीता गोपी की टिप्पणियों ने भारतीय न्याय प्रणाली के सबसे दुखद और नग्न सत्य को उजागर किया है: दीवानी मुकदमों (Civil Suits for Specific Performance / Title) के निस्तारण में लगने वाले 10 से 15 वर्षों का अत्यधिक समय।
    • अदालतों की इस धीमी गति का अनुचित लाभ उठाकर पुलिस थानों में जमीन विवादों को सुलझाने के लिए अनौपचारिक “समझौता केंद्र” (Extortionist Arbitration Hubs) खोल लिए गए हैं।
    • भू-माफिया और कॉर्पोरेट खरीदार वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को 25% से 50% तक का “कट” या कमीशन देकर वास्तविक भूमि स्वामियों पर आपराधिक मुकदमे (जैसे अपहरण, जबरन वसूली, जालसाजी) ठोकवाते हैं, ताकि वे डरकर सस्ते में जमीन की रजिस्ट्री कर दें।
  • अधिवक्ताओं और न्यायपालिका का संवैधानिक दायित्व:
    • जज ने अत्यंत मार्मिक ढंग से रेखांकित किया कि भले ही पुलिसिया प्रक्रिया त्वरित दिखती हो, किंतु यह विधि के शासन (Rule of Law) का अंत है।
    • अदालत के अधिकारियों (बार और बेंच) का यह प्राथमिक दायित्व है कि वे न्यायपालिका की संस्थागत गरिमा (Institutional Integrity) की रक्षा करें। यदि पुलिस ही तय करने लगेगी कि जमीन किसकी है और किसे बेची जाएगी, तो संविधान का अनुच्छेद 300A (संपत्ति का अधिकार) और अदालतों का अस्तित्व ही बेमानी हो जाएगा।
  • धारा 528 BNSS (पूर्ववर्ती 482 CrPC) और फर्जी मुकदमों पर प्रहार:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल [1992 Supp (1) SCC 335] में स्पष्ट किया था कि जहाँ एफआईआर स्पष्ट रूप से दुर्भावनापूर्ण (Mala fide) हो और किसी नागरिक या राजनीतिक व्यक्ति से प्रतिशोध लेने या अनुचित लाभ साधने के लिए गढ़ी गई हो, वहाँ उच्च न्यायालय को मूकदर्शक नहीं बने रहना चाहिए।
    • गुजरात हाईकोर्ट ने इस मामले में त्वरित हस्तक्षेप कर न केवल एक वरिष्ठ राजनेता को राजनीतिक साजिश से बचाया, बल्कि यह भी स्थापित किया कि जमीन के विवादों में पुलिस की दादागीरी को उच्च न्यायपालिका किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं करेगी।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: गुजरात उच्च न्यायालय, अहमदाबाद (आपराधिक अंतर्निहित क्षेत्राधिकार — धारा 528 BNSS / 482 CrPC)
  • केस संदर्भ: जगदीश ठाकोर व अन्य बनाम गुजरात राज्य व अन्य [Criminal Misc. Application / 2026]
  • पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति गीता गोपी (Justice Gita Gopi) (एकल पीठ)
  • आदेश की तिथि: 6 नवंबर 2026 (शुक्रवार)
  • कार्यवाही का परिणाम: आपराधिक विविध याचिका स्वीकृत; ₹150 करोड़ की जमीन के सौदे को लेकर अदालज पुलिस स्टेशन में दर्ज अपहरण व धमकी की प्राथमिकी (FIR) पूरी तरह निरस्त/रद्द (Quashed)।

विधिक प्रतिनिधित्व:

  • याचिकाकर्ताओं (जगदीश ठाकोर व अन्य) की ओर से:
    • प्रमुख अधिवक्ता: आनंद याज्ञिक (Advocate Anand Yagnik) एवं सहयोगी विधिक टीम।
  • प्रतिवादी गुजरात राज्य की ओर से:
    • लोक अभियोजक (Public Prosecutor): हार्दिक दवे (Hardik Dave)।
  • शिकायतकर्ता एवं पीड़ित पक्ष (काजलबेन व पोपटजी ठाकोर) की ओर से: स्वतंत्र विधिक परामर्शदाता।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) — धारा 528 (उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियां — पूर्ववर्ती CrPC धारा 482)
    • भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) — अपहरण, व्यपहरण एवं आपराधिक धमकी (आपराधिक षड्यंत्र संबंधी धाराएं)
    • भारत का संविधान:
      • अनुच्छेद 21 — व्यक्तिगत स्वतंत्रता व निष्पक्ष जांच का मौलिक अधिकार
      • अनुच्छेद 300A — संपत्ति का सांविधिक अधिकार (जबरन निष्कासन या दबाव पर रोक)
    • सर्वोच्च न्यायालय के मार्गदर्शक सिद्धांत:
      • दीवानी प्रकृति के भूमि विवादों में आपराधिक मुकदमों का दुरुपयोग (Abuse of Process in Civil Matters)
      • पुलिस तंत्र द्वारा वित्तीय उगाही और शक्ति के दुरुपयोग के विरुद्ध न्यायिक नियंत्रण
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • दीवानी भूमि विवाद, पुलिसिया समानांतर अदालतें और आपराधिक प्रक्रिया के दुरुपयोग का विधिक मानक: ‘पुलिस का कार्य अपराध की रोकथाम और जांच करना है, न कि दीवानी भूमि विवादों में अदालत बनकर फैसला सुनाना या कमीशनखोरी (Rent-seeking) में लिप्त होना; जब किसी ₹150 करोड़ की संपत्ति के सौदे में किसी पक्षकार पर जमीन को औने-पौने दामों में बेचने का दबाव बनाने हेतु पुलिस अधिकारियों की मिलीभगत से अपहरण का मनगढ़ंत और झूठा आपराधिक केस दर्ज कराया जाता है, तो यह कानून के शासन का खुला उपहास है; जब स्वयं मूल शिकायतकर्ता और कथित ‘अपहृत’ व्यक्ति अदालत में हलफनामा देकर यह प्रमाणित कर दें कि पुलिस के दबाव में यह झूठा केस दर्ज हुआ था और जमीन का विवाद मूलतः दीवानी था, तो धारा 528 BNSS के तहत ऐसी दुर्भावनापूर्ण प्राथमिकी को तुरंत प्रभाव से रद्द किया जाना न्याय के हित में अनिवार्य है; तथा दीवानी मुकदमों में होने वाले विलंब का लाभ उठाकर पुलिस को 25-50% कट लेकर समझौते कराने वाली समानांतर न्याय प्रणाली (Parallel Kangaroo Courts) बनने की अनुमति नहीं दी जा सकती, और बार व बेंच दोनों का यह पावन कर्तव्य है कि वे न्यायिक संस्थाओं की शुचिता की रक्षा करें।’
  • वर्तमान स्थिति व अंतिम प्रभाव: गुजरात उच्च न्यायालय द्वारा प्राथमिकी रद्द किए जाने के बाद पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जगदीश ठाकोर के विरुद्ध शुरू की गई कथित आपराधिक जांच का पटाक्षेप हो गया है; हालांकि, वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी का नाम भले ही औपचारिक हलफनामे से राज्य के दबाव में हटा लिया गया हो, किंतु जस्टिस गीता गोपी द्वारा खुली अदालत में पुलिस की कार्यप्रणाली, भ्रष्टाचार और जमीन मामलों में ‘कट मनी’ सिंडिकेट पर की गई तीखी मौखिक टिप्पणियों ने राज्य के गृह विभाग, पुलिस मुख्यालय और नौकरशाही के भीतर गहरा हड़कंप मचा दिया है। यह मामला गुजरात में भूमि घोटालों में पुलिसिया दखलअंदाजी पर अंकुश लगाने की दिशा में एक ऐतिहासिक न्यायिक मील का पत्थर बन गया है।

Police In Court: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतगुजरात उच्च न्यायालय (Gujarat High Court)
न्यायाधीशन्यायमूर्ति गीता गोपी (Justice Gita Gopi)
केस / पक्षकारगभू रबारी व अन्य बनाम गुजरात राज्य व अन्य
संबंधित नेता/अधिकारीजगदीश ठाकोर (पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष – FIR में ‘थर्ड पार्टी’ के रूप में उल्लेख)
संबंधित पुलिस थानाअदालज पुलिस स्टेशन, गांधीनगर (Bharatiya Nyaya Sanhita – BNS)
मूल विवाद21 अक्टूबर को काजलबेन ठाकोर द्वारा जमीन बिक्री विवाद में पति पोपजी ठाकोर के अगस्त से गायब/अपहृत होने का आरोप; बाद में दंपति द्वारा कोर्ट में पेश होकर आपसी सुलह का हलफनामा देना।
अदालत का अंतिम आदेशप्राथमिकी निरस्त (FIR Quashed): पक्षों के बीच बाहर सौहार्दपूर्ण समझौते (Out of Court Settlement) को स्वीकार करते हुए पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द।

RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
clear sky
28.9 ° C
28.9 °
28.9 °
47 %
0.8kmh
0 %
Sun
29 °
Mon
30 °
Tue
30 °
Wed
29 °
Thu
29 °

Recent Comments