सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियां और निष्कर्ष
- POCSO आरोपी को कस्टडी देना पूरी तरह अनुचित: शीर्ष अदालत ने स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा:“जब तक प्रतिवादी-पिता आपराधिक मुकदमे का सामना कर रहा है, तब तक उसे किसी भी स्थिति में बच्चों की कस्टडी का हकदार व्यक्ति नहीं माना जा सकता। चार्जशीट दाखिल होने के बाद पिता को कस्टडी सौंपना पूरी तरह से अनुचित और अवांछनीय है।” — सर्वोच्च न्यायालय
- दिल्ली हाईकोर्ट की प्रतिकूल टिप्पणियां हटाईं (Expunged): दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने पहले के आदेश में कहा था कि पिता पर लगाए गए यौन शोषण के आरोप “प्रेरित या मनगढ़ंत” प्रतीत होते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की इन टिप्पणियों को खारिज करते हुए रिकॉर्ड से हटा दिया और कहा कि मुकदमे से पहले ऐसी टिप्पणियां समय से पहले (Premature) थीं।
- सांस्कृतिक जड़ें (Cultural Roots) खत्म होने का तर्क खारिज: पिता की ओर से तर्क दिया गया था कि यदि मां बच्चों को अपने साथ यूके (UK) ले जाती है, तो बच्चे अपनी बंगाली सांस्कृतिक जड़ों से कट जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा:“केवल दूसरे देश में बसने मात्र से यह धारणा नहीं बनाई जा सकती कि बच्चे अपने सांस्कृतिक मूल्यों को खो देंगे।” — सर्वोच्च न्यायालय
- मां को बच्चों के साथ UK ले जाने की अनुमति: अदालत ने मां को अपने दोनों बच्चों (13 वर्ष और 7 वर्ष) को यूके ले जाने और वहां के स्कूल में दाखिला कराने की अनुमति दे दी। मां को 6 सप्ताह के भीतर बच्चों के स्कूल विवरण का हलफनामा (Affidavit) जमा करने का निर्देश दिया गया है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने बाल अधिकारों, बाल कल्याण और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत दर्ज आपराधिक मुकदमों के बीच बच्चों की अभिरक्षा (Child Custody) के विधिक सिद्धांतों पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने दिल्ली उच्च न्यायालय और पारिवारिक अदालत (Family Court) के उन फैसलों को रद्द कर दिया, जिनमें 13 और 7 वर्ष के दो बच्चों की पूरी कस्टडी पिता को सौंप दी गई थी। शीर्ष अदालत ने न केवल कस्टडी मां को बहाल की, बल्कि उसे दोनों बच्चों को अपने साथ यूनाइटेड किंगडम (UK) ले जाने और वहां के स्कूल में दाखिला कराने की अनुमति भी प्रदान कर दी। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट रूप से घोषणा की है कि जब तक कोई पिता अपने ही बच्चे के यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोपों में पॉक्सो कानून के तहत आपराधिक मुकदमे (Prosecution) का सामना कर रहा है, तब तक उसे किसी भी परिस्थिति में बच्चों की कस्टडी नहीं दी जा सकती।
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख अवलोकन एवं विधिक निष्कर्ष
1. ‘अभियोजन के रहते कस्टडी देना पूरी तरह अनुचित व न्याय-विरुद्ध’ न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कड़े शब्दों में स्पष्ट किया: “किसी भी परिस्थिति में, प्रतिवादी-पिता जब तक आपराधिक अभियोजन का सामना कर रहा है, तब तक उसे बच्चों की अभिरक्षा का हकदार व्यक्ति नहीं माना जा सकता। यदि बेटे को पिता को सौंप दिया जाता है, तो पॉक्सो कार्यवाही के दौरान बेटे द्वारा स्वतंत्र और निष्पक्ष गवाही (Free and fair deposition) देने की संभावना व्यावहारिक रूप से नगण्य (Virtually negligible) हो जाएगी।”
पीठ ने आगे जोड़ा: “एक बार जब पुलिस ने जांच के बाद पिता के खिलाफ पॉक्सो अधिनियम के तहत अपराध का गठन करने वाले आरोपों के संबंध में आरोप पत्र (Chargesheet) दाखिल कर दिया है, तो बच्चे की कस्टडी पिता को सौंपना पूरी तरह से अवांछित (Unwarranted) और अनुचित (Unjustified) होगा।”
2. दिल्ली हाईकोर्ट की प्रतिकूल टिप्पणियों को रिकॉर्ड से हटाया (Expunged)
- दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह टिप्पणी की थी कि पिता के खिलाफ यौन शोषण के आरोप “प्रेरित” (Motivated) प्रतीत होते हैं।
- सर्वोच्च न्यायालय ने हाईकोर्ट के इस दृष्टिकोण को असमय और अनुचित बताते हुए उक्त सभी प्रतिकूल टिप्पणियों को आदेश से पूरी तरह हटा (Expunge) दिया।
- अदालत ने कहा कि ट्रायल पूरा होने से पहले ही उच्च न्यायालय द्वारा आरोपों को प्रेरित मान लेना आपराधिक न्याय प्रणाली के बुनियादी सिद्धांतों के विपरीत है।
3. ‘विदेश जाने से सांस्कृतिक जड़ें खोने की कोई कानूनी पूर्वधारणा नहीं’
- पिता की ओर से दी गई इस दलील को शीर्ष अदालत ने पूरी तरह खारिज कर दिया कि यदि मां बच्चों को यूके ले गई तो वे अपनी “बंगाली सांस्कृतिक जड़ों” (Bengali Roots) को खो देंगे।
- खंडपीठ ने टिप्पणी की:“केवल किसी अन्य देश में स्थानांतरित हो जाने से बच्चे अपने सांस्कृतिक मूल्यों को खो देंगे—ऐसी कोई विधिक पूर्वधारणा नहीं बनाई जा सकती।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि
- वैवाहिक विवाद और अलग रहना: दंपती का विवाह 2011 में हुआ था। वैवाहिक कलह और कथित शारीरिक प्रताड़ना के बाद पत्नी ने 2018 में गर्भावस्था के दौरान ससुराल छोड़ दिया था। तभी से बेटा (जन्म 2013) और बाद में जन्मी बेटी (जन्म 2019) अपनी मां के साथ ही रह रहे थे।
- निम्हांस (NIMHANS) में खुलासा और पॉक्सो केस:
- वर्ष 2023 में जब बेटे ने अत्यधिक आक्रामकता के लक्षण दिखाए, तो मां उसे राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य एवं तंत्रिका विज्ञान संस्थान (NIMHANS), बेंगलुरु ले गई।
- नैदानिक परामर्श और मनोवैज्ञानिक जांच के दौरान बेटे ने पिता द्वारा अतीत में किए गए यौन उत्पीड़न की घटनाओं का खुलासा किया, जिसके आधार पर पिता के खिलाफ पॉक्सो कानून के तहत प्राथमिकी दर्ज हुई और पुलिस ने जांचोपरांत चार्जशीट दाखिल की।
- अधीनस्थ अदालतों का दृष्टिकोण: पारिवारिक अदालत ने बच्चों की एकमात्र कस्टडी पिता को सौंपने का आदेश दिया था, जिसे दिल्ली हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा था। हाईकोर्ट के अनुसार ये आरोप वैवाहिक विवाद के चलते लगाए गए प्रतीत होते थे।
- सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप: शीर्ष अदालत ने पाया कि मां वर्षों से बच्चों की प्राथमिक देखभालकर्ता (Primary Caregiver) रही है, जबकि पिता का आचरण प्रतिशोधात्मक (Vindictive Nature) रहा है।
सर्वोच्च न्यायालय के अंतिम निर्देश
- कस्टडी और विदेश जाने की अनुमति: मां को दोनों बच्चों की कानूनी कस्टडी दी जाती है और उसे बच्चों को अपने साथ यूके ले जाकर वहां के स्कूल में प्रवेश दिलाने की अनुमति है।
- हलफनामा दाखिल करने की शर्त: मां को आदेश के छह सप्ताह के भीतर बच्चों के स्कूल में दाखिले का पूरा विवरण हलफनामे के माध्यम से प्रस्तुत करना होगा।
- अदालत में पेश करने का वचन: मां को औपचारिक अंडरटेकिंग देनी होगी कि जब भी कोई सक्षम भारतीय अदालत निर्देश देगी, वह बच्चों को अदालत के समक्ष पेश करेगी।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: मां बनाम पिता व अन्य [सिविल अपील / विशेष अनुमति याचिका – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- अपीलकर्ता (मां) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता ज़ोहेब हुसैन
- प्रतिवादी (पिता) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता श्याम दीवान
- प्रासंगिक कानून एवं धाराएं:
- लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) — बाल यौन शोषण के प्रावधान
- हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम, 1956 की धारा 13 (नाबालिग के सर्वोत्तम कल्याण का सिद्धांत)
- संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 (Guardians and Wards Act, 1890) की धारा 7 और 17
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम / भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 — गवाहों की स्वतंत्रता व गवाही पर अनुचित प्रभाव का सिद्धांत
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- गौरव जैन बनाम भारत संघ एवं रोसी जैकब बनाम जैकब ए. चक्रमाक्कल (1973, सुप्रीम कोर्ट) — ‘कस्टडी तय करने में माता-पिता के दावे गौण हैं; बच्चे की शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक सुरक्षा और सर्वोत्तम हित (Welfare of the Child) ही एकमात्र और निर्णायक कसौटी है।’
- विक्रमवीर वोहरा बनाम शालिनी वोहरा (2010, सुप्रीम कोर्ट) — ‘यदि प्राथमिक देखभालकर्ता माता या पिता को रोजगार के लिए विदेश जाना पड़ता है, तो केवल इस आधार पर बच्चे की कस्टडी से उसे वंचित नहीं किया जा सकता।’
- पीठ: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता (सर्वोच्च न्यायालय)
Child Custody:मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ के न्यायाधीश | न्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं न्यायमूर्ति संदीप मेहता |
| अपीलकर्ता | बच्चों की मां (दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील) |
| मुख्य मुद्दा | POCSO आरोपी पिता को बच्चों की कस्टडी देने और मां को बच्चों के साथ यूके (UK) ले जाने की अनुमति |
| सुप्रीम कोर्ट का फैसला | हाईकोर्ट का आदेश रद्द; कस्टडी मां को दी गई और बच्चों को UK ले जाने की अनुमति मिली। |

