Friday, August 21, 2026
HomeSupreme CourtChild Maintenance: मां की ₹1.5 लाख प्रति माह की कमाई बच्चों के...

Child Maintenance: मां की ₹1.5 लाख प्रति माह की कमाई बच्चों के रखरखाव के लिए पिता की जिम्मेदारी कम करने का आधार नहीं; सुप्रीम कोर्ट

मुख्य बिंदु (Key Indicators)

  • गणितीय गणना से तय नहीं होगी जिम्मेदारी: कोर्ट ने कहा कि बच्चों का भरण-पोषण दोनों माता-पिता की संयुक्त जिम्मेदारी है, लेकिन इसे केवल गणितीय या आंकिक जोड़-घटाव (Arithmetic Alone) से विभाजित नहीं किया जा सकता।
  • पालन-पोषण का अमूल्य योगदान: नौकरी के साथ-साथ दो बेटियों की दैनिक जरूरतों और परवरिश का ख्याल रख रही माँ का योगदान वित्तीय योगदान से कहीं अधिक और बड़ा होता है।
  • इलाहाबाद हाईकोर्ट का आदेश रद्द: सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें माँ की ₹1.5 लाख प्रति माह की कमाई को देखते हुए पिता की देनदारी को आधा (₹15,000 प्रति बेटी) कर दिया गया था।
  • पिता की स्थिति और आय: पिता एक योग्य डॉक्टर हैं और स्वयं ₹2 लाख प्रति माह कमाते हैं। इस स्थिति में दो स्कूली बेटियों के लिए ₹60,000 प्रति माह कोई बड़ी राशि नहीं है।

Child Maintenance: सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि मां का आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना या अच्छी कमाई करना, अपने नाबालिग बच्चों के प्रति पिता के भरण-पोषण (Child Maintenance) के दायित्व को कम करने का कारण नहीं बन सकता। अदालत ने कहा कि मां द्वारा बच्चों की रोजमर्रा की देखभाल और परवरिश एक ऐसा वास्तविक योगदान है, जिसे केवल पैसे से नहीं मापा जा सकता।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसने पिता द्वारा दिए जाने वाले अंतरिम भरण-पोषण को ₹60,000 प्रति माह से घटाकर ₹30,000 प्रति माह (प्रत्येक बेटी के लिए ₹15,000) कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां एवं कानूनी निष्कर्ष

  1. गणितीय हिसाब से तय नहीं हो सकता भरण-पोषण
    • पीठ ने कहा: “मां का कमाना अपने आप में पिता के दायित्व को आधा करने की वजह नहीं है। बच्चों के भरण-पोषण की जिम्मेदारी दोनों माता-पिता की होती है, लेकिन इसे सिर्फ साधारण अंकगणितीय गणना (Mathematical Calculation) से विभाजित नहीं किया जा सकता।”
  2. मां की देखभाल का अमूल्य योगदान
    • अदालत ने माना कि दोनों बेटियां (उम्र लगभग 8 और 9 वर्ष) अपनी मां के साथ रहती हैं, जो स्वयं एक स्त्री रोग विशेषज्ञ (Gynaecologist) के रूप में काम करते हुए उनकी दैनिक जरूरतों और परवरिश का ख्याल रख रही हैं।
    • पीठ ने टिप्पणी की: “इस तरह की देखभाल को पैसे में नहीं तोला जा सकता, लेकिन यह एक वास्तविक योगदान है, और अक्सर पिता के वित्तीय योगदान से भी बड़ा होता है।”
  3. पिता की वित्तीय क्षमता और बच्चे की जरूरतें
    • प्रतिवादी-पति स्वयं एक योग्य डॉक्टर है और उसकी अपनी घोषणा के अनुसार उसकी आय ₹2 लाख प्रति माह है।
    • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर पत्नी की ₹1.5 लाख की कमाई को अलग भी रख दिया जाए, तो भी पिता की हैसियत को देखते हुए दो स्कूली बच्चों के लिए ₹60,000 प्रति माह की राशि अत्यधिक नहीं है।
  4. पारिवारिक अदालत का मूल आदेश बहाल
    • शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के उस मूल आदेश को पूरी तरह से बहाल कर दिया, जिसमें प्रत्येक बेटी के लिए ₹30,000 प्रति माह (कुल ₹60,000/माह) अंतरिम भरण-पोषण तय किया गया था।
    • कोर्ट ने पति को तीन महीने के भीतर बकाया राशि (Arrears) का भुगतान करने का निर्देश दिया।

Also Read; Elevator Operator: लिफ्ट/एलिवेटर दुर्घटना में किसकी जिम्मेदारी? कोर्ट ने तय की निर्माता, ऑपरेटर और मालिक की संयुक्त जवाबदेही; जानें और क्या-क्या हैं

मामले के मुख्य तथ्य और कानूनी विश्लेषण

यह मामला एक डॉक्टर दंपत्ति और उनकी दो नाबालिग बेटियों (उम्र 9 और 8 वर्ष) से जुड़ा है। माँ, जो पेशे से स्त्री रोग विशेषज्ञ (Gynaecologist) हैं और ₹1.5 लाख प्रति माह कमाती हैं, ने फैमिली कोर्ट द्वारा दिए गए ₹60,000 प्रति माह (₹30,000 प्रति बेटी) के अंतरिम भत्ते को इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा घटाकर ₹30,000 किए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण और कानूनी सिद्धांत न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने माना कि भले ही माँ की आय को गणना से बाहर रखा जाए, तब भी हाईकोर्ट द्वारा भत्ते में की गई कटौती सही नहीं ठहरती।

पीठ ने अपने आदेश में कहा: अपीलकर्ता-पत्नी का कमाना अपने आप में पिता की देनदारी को आधा करने का कारण नहीं है। बेटियों के दैनिक जीवन की देखभाल माँ कर रही है। ऐसे देखभाल और समय को पैसों में मापा नहीं जा सकता, लेकिन यह एक वास्तविक और अक्सर सबसे बड़ा योगदान होता है।

अदालत ने कहा कि ₹2 लाख प्रति माह कमाने वाले डॉक्टर-पिता के लिए अपनी दो छोटी बेटियों की पढ़ाई और परवरिश के लिए ₹60,000 प्रति माह देना बिल्कुल भी अत्यधिक नहीं है।

केस अवलोकन (Case Snapshot)

पहलूविवरण
अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठन्यायमूर्ति विक्रम नाथ एवं न्यायमूर्ति संदीप मेहता
मूल आदेशइलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को पलटा जिसने भरण-पोषण आधा कर दिया था
मुख्य सिद्धांतमां की आय के आधार पर पिता का Child Maintenance का दायित्व कम नहीं किया जा सकता; परवरिश का योगदान वित्तीय योगदान के बराबर/बड़ा है।
अंतिम निर्देशदोनों नाबालिग बेटियों के लिए ₹60,000 प्रति माह (₹30,000 प्रति बच्चा) भरण-पोषण बहाल।

RELATED ARTICLES

Most Popular

Patna
overcast clouds
31 ° C
31 °
31 °
79 %
3.1kmh
100 %
Fri
33 °
Sat
37 °
Sun
37 °
Mon
37 °
Tue
33 °

Recent Comments