Friday, September 25, 2026
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Custody Battles: वैवाहिक और बच्चे की कस्टडी विवादों में पॉक्सो कानून का दुरुपयोग; झूठे आरोपों से आरोपी माता-पिता की प्रतिष्ठा धूमिल, देशव्यापी गाइडलाइन पढ़ें

गाइडलाइंस लागू होने के लिए दो मुख्य शर्तें (Threshold Conditions)

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ये विशेष सुरक्षात्मक दिशानिर्देश केवल तभी लागू होंगे जब:

  1. बच्चे के खिलाफ POCSO अपराध का आरोप उसी घर में रहने वाले माता-पिता या परिवार के किसी सदस्य पर लगाया गया हो।
  2. माता-पिता के बीच पहले से कोई वैवाहिक या कस्टडी विवाद (Matrimonial Dispute) लंबित हो।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी की गई देशव्यापी गाइडलाइंस

1.1. बिना जांच के तुरंत/स्वचालित गिरफ्तारी पर रोक:BNSS की धारा 35 के तहत.

POCSO FIR दर्ज होते ही पुलिस आरोपी पिता या परिजन को सीधे गिरफ्तार नहीं कर सकती। जांच अधिकारी (IO) को गिरफ्तारी से पहले ठोस कारण (Reason to Believe) दर्ज करना अनिवार्य होगा।

2.2. बाल मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की अनिवार्य जांच:NIMHANS या DCPU विशेषज्ञ द्वारा evaluation.

किसी भी दंडात्मक या कड़क कार्रवाई से पहले, पुलिस को जिला बाल संरक्षण इकाई (DCPU) के माध्यम से बाल एवं किशोर मनोचिकित्सक (Child & Adolescent Psychiatrist) या क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट से बच्चे का स्वतंत्र मूल्यांकन कराना होगा।

3.3. विशेषज्ञ रिपोर्ट के आधार पर गिरफ्तारी का फैसला:

पुलिस केवल विशेषज्ञ की रिपोर्ट और अन्य साक्ष्यों का समग्र विश्लेषण करने के बाद ही यह तय करेगी कि गिरफ्तारी आवश्यक है या नहीं।

4.4. विशेष अदालतों (POCSO Courts) के लिए फ़िल्टर प्रक्रिया:धारा 33 के तहत सीधी निजी शिकायतों हेतु.

यदि कोई माता/पिता पुलिस के बजाय सीधे विशेष अदालत में निजी शिकायत दर्ज कराता है, तो जज को समन जारी करने से पहले बाल मनोचिकित्सक से बच्चे का मूल्यांकन कराना अनिवार्य होगा।

मूल मामले की पृष्ठभूमि और CBI जांच के निष्कर्ष

यह मामला एक पूर्व पति-पत्नी के बीच 9 साल की बेटी ‘M’ की कस्टडी को लेकर था। जब पारिवारिक अदालत और हाईकोर्ट ने कस्टडी पिता को सौंप दी, तो मां ने मार्च 2024 में पिता और उसके परिवार के खिलाफ POCSO एक्ट की धारा 10 (गंभीर यौन शोषण) के तहत FIR दर्ज करा दी।

  • CBI और NIMHANS की संयुक्त जांच: सुप्रीम कोर्ट ने संवेदनशीलता को देखते हुए मामले की जांच CBI और NIMHANS (बेंगलुरु) के विशेषज्ञों की टीम को सौंपी।
  • झूठे आरोपों का खुलासा: वर्षों के सीसीटीवी फुटेज, स्कूल टीचर और पड़ोसियों के बयानों और मनोवैज्ञानिक जांच के बाद CBI ने रिपोर्ट दी कि आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि बच्ची को लगातार माता-पिता के झगड़े और गढ़ी गई कहानियों के संपर्क में रखने के कारण उसका मन प्रभावित हुआ था।
  • कोर्ट का कड़ा रुख: सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह FIR केवल अदालत के कस्टडी आदेश को नाकाम करने के लिए कराई गई थी। कोर्ट ने पिता के खिलाफ दर्ज FIR को पूरी तरह रद्द (Quash) कर दिया और बच्ची की वैधानिक कस्टडी पुनः पिता को सौंप दी।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक कलह और बच्चों की कस्टडी (Child Custody Battles) की कानूनी लड़ाई में ‘प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज’ (POCSO) एक्ट, 2012 के बढ़ते दुरुपयोग पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए देशव्यापी सुरक्षात्मक दिशानिर्देश (Nationwide Safeguards) निर्धारित किए हैं। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि कस्टडी हासिल करने के लिए जीवनसाथी द्वारा एक-दूसरे के खिलाफ बच्चे के यौन शोषण के झूठे आरोप मढ़ने की प्रवृत्ति न्याय प्रशासन और बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य दोनों के लिए अत्यंत घातक है।

न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने पति-पत्नी के बीच लंबे समय से चल रहे कस्टडी विवाद में पिता के खिलाफ दर्ज पॉक्सो मामले को पूरी तरह रद्द (Quash) करते हुए यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) और ‘निम्हांस’ (NIMHANS), बेंगलुरु के बाल मनोचिकित्सकों की संयुक्त जांच रिपोर्ट में पाया गया कि पिता पर लगाए गए आरोप पूरी तरह निराधार थे और वैवाहिक विवाद के कारण बच्चे के मन में गढ़े गए थे।

सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख अवलोकन: ‘किसी भी कीमत पर जीत’ की खतरनाक मानसिकता

न्यायमूर्ति पारदीवाला और न्यायमूर्ति विश्वनाथन की पीठ ने कस्टडी विवादों में वकीलों और सलाहकारों की भूमिका पर तीखी टिप्पणी करते हुए दर्ज किया: “ऐसे उदाहरण दुर्लभ नहीं हैं जहां भोले-भाले पक्षकारों को उनके सलाहकारों द्वारा गुमराह किया जाता है, जिनमें कुछ मामलों में ऐसे अड़ियल कानूनी पेशेवर (Recalcitrant Legal Professionals) भी शामिल हैं जो ‘किसी भी कीमत पर जीतो’ (Win at any cost) के उद्देश्य से आग में घी डालने का काम करते हैं। अक्सर क्रोध से घिरा और अहंकार से अंधा हुआ माता या पिता इन चालों का शिकार हो जाता है, और इसके गंभीर व विनाशकारी परिणामों से पूरी तरह अनभिज्ञ रहता है।”

अदालत ने रेखांकित किया कि झूठे पॉक्सो आरोप लगने से व्यक्ति को अपनी बेगुनाही साबित करने से पहले ही अपूरणीय सामाजिक बदनामी, सार्वजनिक अपमान और गैर-जरूरी गिरफ्तारी का सामना करना पड़ता है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित 4 अनिवार्य सुरक्षात्मक दिशानिर्देश (Mandatory Safeguards)

शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि ये सुरक्षा उपाय तभी लागू होंगे जब दो प्रारंभिक शर्तें (Threshold Conditions) पूरी होंगी:

  1. पॉक्सो का कथित अपराध बच्चे के माता-पिता या उसके साथ एक ही छत के नीचे रहने वाले परिवार के सदस्य द्वारा किया गया बताया गया हो।
  2. माता-पिता के बीच पहले से कोई वैवाहिक विवाद (Matrimonial Dispute) या कस्टडी की कानूनी लड़ाई चल रही हो।

इन परिस्थितियों में निम्नलिखित दिशानिर्देश अनिवार्य होंगे:

  1. स्वतः या त्वरित गिरफ्तारी पर रोक (No Automatic Arrest):
    • केवल पॉक्सो की एफआईआर दर्ज होने मात्र से जांच अधिकारी (IO) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 35 (पूर्ववर्ती CrPC धारा 41) के तहत आरोपी को सीधे गिरफ्तार नहीं करेंगे।
    • अदालत ने दोहराया कि गिरफ्तारी की वैधानिक शक्ति होना और उस शक्ति के प्रयोग का औचित्य होना दो अलग-अलग विषय हैं। गिरफ्तारी के लिए ठोस ‘विश्वास करने का कारण’ (Reason to Believe) दर्ज करना अनिवार्य होगा।
  2. बाल मनोचिकित्सक/मनोवैज्ञानिक से अनिवार्य मूल्यांकन (Mandatory Child Expert Evaluation):
    • किसी भी दंडात्मक या गिरफ्तारी की कार्रवाई से पहले पुलिस या विशेष किशोर पुलिस इकाई (SJPU) को जिला बाल संरक्षण इकाई (DCPU) के परामर्श से बाल एवं किशोर मनोचिकित्सा (Child & Adolescent Psychiatry) या क्लिनिकल मनोविज्ञान के किसी विशेषज्ञ से बच्चे का स्वतंत्र मूल्यांकन कराना होगा।
  3. विशेषज्ञ रिपोर्ट पर विचार करना अनिवार्य (Expert Report as a Pre-condition):
    • पुलिस गिरफ्तारी का निर्णय लेने से पहले अन्य साक्ष्यों के साथ बाल मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की मूल्यांकन रिपोर्ट पर अनिवार्य रूप से विचार करेगी। हालांकि, यह रिपोर्ट जांच एजेंसी के विवेक का मार्गदर्शन करेगी, अंतिम चार्जशीट या क्लोजर रिपोर्ट का एकमात्र आधार नहीं होगी।
  4. विशेष अदालत के समक्ष प्राइवेट परिवाद हेतु फिल्टर (Filter for Private Complaints):
    • जब कोई माता या पिता सीधे पॉक्सो कोर्ट में धारा 33 के तहत निजी परिवाद (Private Complaint) दर्ज कराता है, तो विशेष न्यायाधीश आरोपी को समन जारी करने या संज्ञान लेने से पहले बाल मनोचिकित्सक से बच्चे का मूल्यांकन कराना सुनिश्चित करेंगे (केवल असाधारण मामलों में लिखित कारणों से छूट संभव)।

समानांतर कस्टडी मामलों में पॉक्सो एफआईआर का प्रभाव

  • झूठी धारणा से बचाव: अदालत ने व्यवस्था दी कि समानांतर चल रही कस्टडी या अभिभावकत्व (Guardianship) कार्यवाहियों में केवल पॉक्सो एफआईआर दर्ज होने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि आरोप सत्य हैं। अदालतों को स्वतंत्र रूप से प्रथम दृष्टया विचार करना चाहिए।
  • लागू होने का दायरा: ये सुरक्षात्मक दिशानिर्देश फैसले की तिथि पर लंबित सभी चल रही पुलिस जांचों और उन निजी परिवादों पर तुरंत लागू होंगे जिनमें अभी तक समन जारी नहीं हुआ है।
  • रजिस्टर का अद्यतनीकरण: देश के सभी जिलों की जिला बाल संरक्षण इकाइयों (DCPUs) को निर्देश दिया गया है कि वे पॉक्सो नियम, 2020 के नियम 5 के तहत अपने विशेषज्ञ रजिस्टरों को अद्यतन करें और योग्य बाल मनोचिकित्सकों के नाम जोड़ें।

मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं सीबीआई की जांच

  • विवाद की पृष्ठभूमि: दंपती का विवाह 2011 में हुआ था और 2015 में बेटी ‘M’ का जन्म हुआ। 2018 में विवाद के बाद लंबी कानूनी लड़ाई चली। मार्च 2022 में फैमिली कोर्ट ने पिता को कस्टडी सौंपी, जिसे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा। जून 2023 में बच्ची पिता को सौंपी गई।
  • पिता पर पॉक्सो एफआईआर: मुलाक़ात के अधिकारों में बदलाव के दौरान मार्च 2024 में मां ने पिता और उनके परिजनों पर पॉक्सो एक्ट की धारा 10 (गंभीर यौन उत्पीड़न) के तहत गंभीर आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज करा दी।
  • सुप्रीम कोर्ट द्वारा सीबीआई जांच: सुप्रीम कोर्ट ने संवेदनशीलता को देखते हुए डीआईजी स्तर के अधिकारी और महिला मनोवैज्ञानिक की अगुवाई वाली सीबीआई टीम को जांच सौंपी।
  • सीबीआई व NIMHANS की क्लिनिकल रिपोर्ट:
    • वर्षों की सीसीटीवी फुटेज, स्कूल काउंसलर, ट्यूशन टीचर और पड़ोसियों के बयानों की जांच के बाद पाया गया कि आरोपों की पुष्टि करने वाला कोई साक्ष्य नहीं है।
    • मनोचिकित्सकों ने निष्कर्ष निकाला कि लंबे समय से चले आ रहे माता-पिता के झगड़े, बार-बार की कानूनी बहसों और परिजनों द्वारा बार-बार दोहराई गई कहानियों के प्रभाव के कारण बच्ची के बयान प्रभावित हुए थे। उसमें यौन शोषण से जुड़ा कोई आघात या चिंता के लक्षण नहीं पाए गए।
  • एफआईआर रद्द और कस्टडी बहाल: सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई रिपोर्ट स्वीकार करते हुए पिता के खिलाफ पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी और रोसी जैकब फैसले के अनुसार ‘बच्चे के सर्वोत्तम कल्याण’ (Welfare of the Child) के आधार पर कानूनी कस्टडी पिता को बहाल कर दी। बेंगलुरु फैमिली कोर्ट को निम्हांस डॉक्टरों की समिति के मार्गदर्शन में बच्ची को पिता के साथ चरणबद्ध तरीके से जोड़ने का निर्देश दिया गया।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: ‘R’ बनाम ‘E’ व अन्य [आपराधिक अपील – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
  • प्रासंगिक कानून एवं धाराएं:
    • लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) की धारा 10, 22 (झूठे परिवाद हेतु दंड) एवं धारा 33
    • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 35 (वारंट के बिना गिरफ्तारी की शर्तें / पूर्ववर्ती CrPC धारा 41)
    • किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 (JJ Act) की धारा 75
    • पॉक्सो नियम, 2020 का नियम 5 (विशेषज्ञों का पैनल)
    • हिंदू अल्पसंख्यक और संरक्षकता अधिनियम, 1956 एवं संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 (कस्टडी सिद्धांत)
  • संबद्ध न्यायिक नजीरें:
    • अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014, सुप्रीम कोर्ट) — ‘7 वर्ष तक की सजा वाले मामलों में स्वतः गिरफ्तारी पर रोक और धारा 41 CrPC का कड़ाई से पालन।’
    • रोसी जैकब बनाम जैकब ए. चक्रमाक्कल (1973, सुप्रीम कोर्ट) — ‘कस्टडी मामलों में माता-पिता के वैधानिक अधिकारों से ऊपर बच्चे का कल्याण सर्वोपरि है।’
    • गेद्दाम झांसी बनाम तेलंगाना राज्य एवं अचिन गुप्ता बनाम हरियाणा राज्य — ‘वैवाहिक विवादों में आपराधिक कानूनों के दुरुपयोग पर चिंता।’
  • पीठ: न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन (सर्वोच्च न्यायालय)
  • अनुपालन निर्देश: फैसले की प्रति सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को प्रत्येक पुलिस स्टेशन में तामील कराने हेतु, और सभी उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल को अधीनस्थ अदालतों में अनुपालन हेतु प्रेषित की गई।

Custody Battles: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतसर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठ के न्यायाधीशन्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति के.वी. विश्वनाथन
मूल मामला‘R’ v. ‘E’ & Anr. (माता-पिता के बीच बच्चे की कस्टडी की जंग)
मामले में जांच एजेंसीकेंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) एवं NIMHANS बेंगलुरु के विशेषज्ञ
कोर्ट का अंतिम फैसलापिता के खिलाफ दर्ज फर्जी FIR रद्द; बच्चे की कस्टडी पिता को सौंपी गई
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