हाईकोर्ट का निर्णय और मुख्य बिंदु
- पति के साथ रहने की पत्नी की इच्छा: जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान पत्नी ने अदालत को बताया कि उसने अपने पति के परिवार से मिलना शुरू कर दिया है। उसने कहा:“वह अपने पति के खिलाफ मामला आगे नहीं बढ़ाना चाहती और उसके जेल से रिहा होने के बाद शांतिपूर्ण तरीके से अपना वैवाहिक जीवन फिर से शुरू (Resume Cohabitation) करना चाहती है।” — अदालत के समक्ष पत्नी का बयान
- राज्य/पुलिस की कोई आपत्ति नहीं: पत्नी के इस रुख को देखते हुए राज्य सरकार और पुलिस (अभियोजन पक्ष) ने भी आरोपी की जमानत याचिका का विरोध नहीं किया।
- शर्तों के साथ जमानत और निगरानी का आदेश: हाईकोर्ट ने 23 सितंबर को आरोपी को शर्तों के साथ जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। हालांकि, सुरक्षा के मद्देनजर कोर्ट ने जांच अधिकारी (IO) को स्थिति पर नजर रखने का निर्देश दिया:“जांच अधिकारी (IO) को स्थिति की निगरानी करने और भविष्य में कोई शिकायत मिलने पर कानून के अनुसार जांच करने का निर्देश दिया जाता है।” — दिल्ली हाईकोर्ट
नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवाद की सुनवाई के दौरान अदालत परिसर के भीतर ही अपनी पत्नी पर जानलेवा हमला करने के आरोप में जेल में बंद पति को नियमित जमानत (Regular Bail) प्रदान कर दी है।
न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा की एकल पीठ ने आरोपी पति की नियमित जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए 23 सितंबर 2026 को यह आदेश पारित किया। अदालत ने पत्नी के सकारात्मक रुख और अभियोजन (दिल्ली पुलिस/राज्य) द्वारा जमानत याचिका पर कोई आपत्ति न जताए जाने के मद्देनजर कुछ शर्तों के साथ आरोपी को रिहा करने का आदेश दिया। साथ ही, जांच अधिकारी (IO) को भविष्य में स्थिति पर सतत निगरानी रखने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने यह राहत तब दी जब पीड़िता/पत्नी ने स्वयं पीठ के समक्ष उपस्थित होकर स्पष्ट किया कि उसने अपने पति के खिलाफ आपराधिक मामले को आगे न बढ़ाने का फैसला किया है और वह पति के जेल से बाहर आने पर उसके साथ अपने वैवाहिक जीवन को शांतिपूर्ण तरीके से पुनः शुरू करना चाहती है।
सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय के अवलोकन एवं पत्नी का रुख
1. ‘वैवाहिक जीवन को शांतिपूर्वक फिर से शुरू करने की इच्छा’: पत्नी का बयान जमानत अर्जी की सुनवाई के दौरान पीड़िता/पत्नी ने अदालत को अवगत कराया कि वह अपने ससुराल पक्ष और पति के परिवार के सदस्यों से मिलने जाने लगी है और उनके बीच दूरियां कम हुई हैं। न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा ने अपने आदेश में दर्ज किया: “शिकायतकर्ता/पत्नी ने निवेदन किया है कि वह अपने पति के खिलाफ आपराधिक मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाहती है। वह जेल से पति की रिहाई के बाद उसके साथ सहवास (Cohabitation) फिर से शुरू करने की इच्छुक है। उसने स्पष्ट रूप से कहा कि वह अपने वैवाहिक जीवन को शांतिपूर्ण तरीके से पुनः शुरू करना चाहती है।”
2. राज्य का अनापत्ति रुख और जांच अधिकारी (IO) को निर्देश
- पीड़िता के सुलह वाले रुख को देखते हुए राज्य की ओर से पेश अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) ने भी आरोपी की जमानत याचिका पर कोई औपचारिक आपत्ति दर्ज नहीं कराई।
- हालांकि, किसी भी अप्रिय घटना की पुनरावृत्ति को रोकने के लिए उच्च न्यायालय ने जांच अधिकारी पर एक सुरक्षात्मक दायित्व तय करते हुए आदेश दिया:“जांच अधिकारी (IO) को निर्देश दिया जाता है कि वह जमीनी स्थिति की लगातार निगरानी (Monitor) करे और यदि भविष्य में कोई भी नई शिकायत प्राप्त होती है, तो कानून के अनुसार उसकी तुरंत विधिवत जांच करे।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि
- जनवरी 2025 की घटना (कोर्ट परिसर में हमला): पति और पत्नी के बीच पारिवारिक अदालत में वैवाहिक विवाद की कार्यवाही चल रही थी। जनवरी 2025 में एक सुनवाई के सिलसिले में दोनों अदालत परिसर पहुंचे थे, जहां उनके बीच तीखी कहासुनी और झगड़ा हो गया। आरोप है कि पति ने गुस्से में आकर अदालत परिसर में ही पत्नी पर हमला कर दिया।
- हत्या के प्रयास का मामला दर्ज: पत्नी की लिखित शिकायत पर संबंधित थाने की पुलिस ने आरोपी पति के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 307 (हत्या का प्रयास) के तहत मामला दर्ज कर उसे उसी दिन गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया था।
- वैवाहिक विवादों की वापसी: जेल में रहने के दौरान दोनों परिवारों के बीच आपसी सुलह-समझौता हुआ, जिसके बाद पत्नी ने पहले से शुरू की गई वैवाहिक विवाद से जुड़ी कार्यवाहियां वापस ले लीं और पति की जमानत का समर्थन किया।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: आरोपी पति बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली) [आपराधिक विविध (जमानत याचिका) – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (पति) की ओर से: अधिवक्ता पवन मेहता, कणव भट्टा, ललित कश्यप एवं नितिन भारद्वाज
- राज्य (NCT दिल्ली) की ओर से: अतिरिक्त लोक अभियोजक शोएब हैदर
- प्रासंगिक कानून एवं धाराएं:
- भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 307 (हत्या का प्रयास) / भारतीय न्याय संहिता (BNS) के समतुल्य प्रावधान
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 483 / पूर्ववर्ती CrPC धारा 439 (उच्च न्यायालय की नियमित जमानत देने की विशेष शक्तियां)
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना व सहवास के सिद्धांत)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- बी.एस. जोशी बनाम हरियाणा राज्य (2003, सुप्रीम कोर्ट) एवं ज्ञान सिंह बनाम पंजाब राज्य (2012) — ‘यद्यपि धारा 307 गैर-शमनीय (Non-compoundable) अपराध है, परंतु जब विवाद मूल रूप से वैवाहिक या पारिवारिक हो और पक्षकारों ने अपने मतभेद सुलझाकर शांतिपूर्ण जीवन शुरू करने का फैसला कर लिया हो, तो न्याय के व्यापक हित और परिवार की रक्षा के लिए अदालतों को उदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।’
- पीठ: न्यायमूर्ति मिनी पुष्करणा (दिल्ली उच्च न्यायालय)
- आदेश तिथि: 23 सितंबर 2026 (शर्तों के साथ जमानत मंजूर; IO को निगरानी का निर्देश)
Husband Bail: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति मिनी पुष्कर्णा (Justice Mini Pushkarna) |
| घटना | जनवरी 2025 में कोर्ट परिसर में पति-पत्नी के बीच कहासुनी के बाद हमला |
| दर्ज मामला | हत्या के प्रयास (Attempt to Murder) का मामला दर्ज |
| कोर्ट का रुख | पत्नी की सहमति और पुलिस की अनापत्ति (No Objection) पर जमानत मंजूर |

