हाईकोर्ट का रुख और सुनवाई के मुख्य बिंदु
- हिरासत में पूछताछ की जरूरत नहीं: सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल सरकार (राज्य पक्ष) ने स्वीकार किया कि पत्रकारों की हिरासत में पूछताछ (Custodial Interrogation) की आवश्यकता नहीं है।
- जांच में सहयोग की शर्त: कोर्ट ने नोट किया कि दोनों पत्रकार BNSS की धारा 35(3) के तहत जारी पुलिस नोटिसों का पालन कर चुके हैं और जांच में सहयोग कर रहे हैं। मामला 7 साल से कम सजा वाले अपराधों से जुड़ा है।
- कोर्ट का आदेश: न्यायाधीश ने पत्रकारों को भविष्य में भी पुलिस जांच में सहयोग करने का निर्देश दिया और कहा कि यदि वे सहयोग नहीं करते हैं तो राज्य सरकार इस अंतरिम संरक्षण को रद्द करने के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकती है।
कोलकाता: कलकत्ता हाईकोर्ट ने प्रतिष्ठित बंगाली दैनिक समाचार पत्र आनंदबाजार पत्रिका (Anandabazar Patrika – ABP) की संपादक ईशानी दत्ता राय और वरिष्ठ मुख्य रिपोर्टर सोमा मुखर्जी को उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक प्राथमिकी (FIR) में किसी भी प्रकार की दंडात्मक पुलिस कार्रवाई (Coercive Action) से अंतरिम सुरक्षा प्रदान कर दी है।
न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य की एकल पीठ ने पत्रकारों की याचिका पर सुनवाई करते हुए निर्देश दिया कि पुलिस प्राधिकारी 15 दिसंबर 2026 तक या अदालत के अगले आदेश तक, जो भी पहले हो, याचिकाकर्ता पत्रकारों के खिलाफ कोई भी दंडात्मक कदम न उठाएं। अदालत ने यह राहत तब दी जब राज्य सरकार ने स्पष्ट रूप से सूचित किया कि पत्रकारों से हिरासत में पूछताछ (Custodial Interrogation) की कोई आवश्यकता नहीं है और वे जांच में लगातार सहयोग कर रहे हैं। यह विवाद अखबार द्वारा जाधवपुर विश्वविद्यालय में छात्र गुटों के बीच हुई हिंसक झड़प की खबर पर ‘गेरुआ गुंडागर्दी’ (Gerua Gundami / Saffron Hooliganism) शीर्षक (Headline) लगाने से उपजा था, जिस पर हिंदू धार्मिक भावनाएं आहत करने का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई गई थी।
उच्च न्यायालय के प्रमुख अवलोकन एवं विधिक निर्देश
1. ’15 दिसंबर तक दंडात्मक कार्रवाई पर रोक; पत्रकार जांच में सहयोग जारी रखें’
राज्य सरकार के रुख और जांच रिकॉर्ड का संज्ञान लेते हुए न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य ने अपने आदेश में दर्ज किया: “संबंधित पुलिस प्राधिकारियों को निर्देश दिया जाता है कि वे याचिकाकर्ताओं के खिलाफ 15 दिसंबर 2026 तक या अगले आदेश तक, जो भी पहले हो, कोई दंडात्मक कदम न उठाएं। याचिकाकर्ता (पत्रकार) जांच में पूरा सहयोग करेंगे और यदि उपरोक्त आपराधिक मामले के संबंध में भविष्य में कोई नोटिस जारी किया जाता है, तो उसका विधिवत अनुपालन करेंगे।”
2. धारा 196 BNS (धार्मिक व सामाजिक सौहार्द बिगाड़ना) पर फैसला जांच एजेंसी के अधिकार क्षेत्र में छोड़ा
- पत्रकारों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दलील दी कि शिकायत केवल अखबार की हेडलाइन को लेकर की गई है, जबकि खबर की मूल रिपोर्टिंग या उसके तथ्यों पर कोई आपत्ति नहीं उठाई गई है।
- बचाव पक्ष ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 196 (विभिन्न समूहों के बीच वैमनस्य या शत्रुता को बढ़ावा देना / पूर्ववर्ती IPC 153A) के लागू होने पर भी सवाल उठाया और तर्क दिया कि शिकायत में दो या अधिक समूहों के बीच दुश्मनी पैदा करने का कोई आवश्यक कानूनी आरोप नहीं बनता।
- उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वह वर्तमान चरण में यह तय नहीं कर रहा है कि धारा 196 लागू होती है या नहीं; यह प्रश्न जांच पूरी करने के दौरान जांच एजेंसी (Investigating Agency) के परीक्षण के दायरे में आता है।
3. BNSS की धारा 35(3) के नोटिस का अनुपालन और 7 साल से कम की सजा
- पीठ ने संज्ञान लिया कि पत्रकारों ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 35(3) [पूर्ववर्ती CrPC धारा 41A] के तहत जारी जांच नोटिसों का पूरी तरह अनुपालन किया है और वे पुलिस के समक्ष उपस्थित हुए हैं।
- अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि प्राथमिकी में लगाए गए कथित अपराध 7 वर्ष से कम की सजा के दायरे में आते हैं, इसलिए गिरफ्तारी का कोई ठोस विधिक औचित्य नहीं बनता।
- राज्य सरकार को यह स्वतंत्रता (Liberty) दी गई कि यदि पत्रकार भविष्य में जांच में सहयोग करने में विफल रहते हैं, तो राज्य इस अंतरिम संरक्षण को संशोधित या रद्द कराने के लिए दोबारा हाईकोर्ट का रुख कर सकता है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं विवाद
- 20 अगस्त की जाधवपुर यूनिवर्सिटी हिंसा: 19-20 अगस्त को जाधवपुर विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग एवं तकनीकी छात्र संघ (FETSU) की आम सभा (GBM) के दौरान अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) और वामपंथी छात्र संगठनों के बीच हिंसक झड़पें हुई थीं, जिसमें कई छात्र घायल हुए थे। दोनों गुटों ने एक-दूसरे पर परिसर में बाहरी उपद्रवियों को बुलाने का आरोप लगाया था।
- ‘गेरुआ गुंडागर्दी’ हेडलाइन और राजनीतिक विवाद: आनंदबाजार पत्रिका ने 21 अगस्त के अपने मुख्य पृष्ठ पर इस घटना को ‘गेरुआ गुंडागर्दी’ (Saffron Hooliganism) शीर्षक के साथ प्रकाशित किया। इस हेडलाइन पर कड़ा ऐतराज जताते हुए राजनीतिक स्तर पर और हिंदू संगठनों द्वारा तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की गई।
- बोबाजार थाने में एफआईआर (28 अगस्त): संजय शास्त्री महाराज नामक एक आध्यात्मिक साधु/नेमधारी की शिकायत पर कोलकाता के बोबाजार पुलिस स्टेशन में एफआईआर दर्ज की गई। शिकायतकर्ता का आरोप था कि ‘गेरुआ’ (भगवा) रंग सनातन हिंदू आस्था, त्याग और साधना का पवित्र प्रतीक है; इसे ‘गुंडागर्दी’ शब्द से जोड़ना करोड़ों हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर आहत करना और सामाजिक विद्वेष भड़काना है।
- अखबार के दफ्तर पर प्रदर्शन: 1 सितंबर को कोलकाता स्थित आनंदबाजार पत्रिका के मुख्य कार्यालय के बाहर भगवाधारी प्रदर्शनकारियों ने उग्र प्रदर्शन किया था और कार्यालय की बाहरी दीवारों पर भगवा रंग पोत दिया था, जिसके बाद पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ गई थीं।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: ईशानी दत्ता राय व अन्य बनाम पश्चिम बंगाल राज्य व अन्य [WPA No. 24272 of 2026 – कलकत्ता उच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ता (पत्रकारों) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता एस.एन. मुखर्जी एवं संदीपान गांगुली (सहयोगी: अधिवक्ता अरूणाभ देब, दीपन कुमार सरकार, आशिका डागा, मातृ प्रसाद दास एवं संपूर्णा मुखर्जी)
- राज्य (पश्चिम बंगाल सरकार) की ओर से: अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) राजदीप मजूमदार (सहयोगी: अधिवक्ता मयूख मुखर्जी एवं सायन मुखर्जी)
- प्रासंगिक कानून एवं धाराएं:
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 196 (धर्म, जाति, भाषा आदि के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता को बढ़ावा देना / पूर्ववर्ती IPC 153A)
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 299 (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कृत्य / पूर्ववर्ती IPC 295A)
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 35(3) (पुलिस के समक्ष उपस्थिति का नोटिस / पूर्ववर्ती CrPC धारा 41A)
- भारत का संविधान – अनुच्छेद 19(1)(a) (वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा प्रेस की स्वतंत्रता) एवं अनुच्छेद 226
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014, सुप्रीम कोर्ट) — ‘7 वर्ष से कम की सजा वाले अपराधों में नियमित गिरफ्तारी पर पाबंदी; पुलिस को CrPC 41A / BNSS 35(3) के नोटिस तंत्र का पालन करना अनिवार्य है।’
- रोमेश थापर बनाम मद्रास राज्य एवं इंडियन एक्सप्रेस बनाम भारत संघ (सुप्रीम कोर्ट) — ‘प्रेस की स्वतंत्रता लोकतंत्र की आधारशिला है; किसी तीखे संपादकीय या हेडलाइन को आपराधिक मंशा के बिना सीधे सांप्रदायिक अपराध के दायरे में नहीं खींचा जा सकता।’
- पीठ: न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य (कलकत्ता उच्च न्यायालय)
- आदेश का प्रभाव: 15 दिसंबर 2026 तक गिरफ्तारी व दंडात्मक कार्रवाई पर पूर्ण रोक; मामले की अगली सुनवाई 1 दिसंबर 2026 को निर्धारित।
Saffron Hooliganism: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | कलकत्ता उच्च न्यायालय (Calcutta High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति सौगत भट्टाचार्य (Justice Saugata Bhattacharyya) |
| याचिकाकर्ता | ईशानी दत्ता राय व अन्य (ABP की संपादक और पत्रकार) |
| घटना की वजह | जादवपुर यूनिवर्सिटी हिंसा पर “गेरुआ गुंडामी” हेडलाइन छापना |
| दर्ज थाना | बाउबाजार पुलिस स्टेशन, कोलकाता (FIR 28 अगस्त को दर्ज) |
| अदालत का अंतरिम फैसला | 15 दिसंबर 2026 तक कठोर कार्रवाई पर रोक; जांच में सहयोग करने का निर्देश |

