हाईकोर्ट का निष्कर्ष जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा
बॉम्बे हाईकोर्ट ने याचिका को शुरुआत में ही खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था:
“दुआ (प्रार्थना) मांगना और उसके जवाब में ‘आमीन’ कहना कोई शपथ या संकल्प नहीं है। चूंकि दुआ मूल रूप से भक्त और ईश्वर के बीच संवाद का एक रूप है, इसलिए चुनाव में सफलता के लिए प्रार्थना करना न तो अनुचित प्रभाव डालना है और न ही धर्म के नाम पर वोट मांगना है।” — बॉम्बे हाईकोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने इस व्याख्या से पूर्ण सहमति व्यक्त की और माना कि भाषणों या दुआओं के चुनिंदा हिस्सों को संदर्भ से अलग निकालकर इसे ‘भ्रष्ट आचरण’ (Corrupt Practice) नहीं ठहराया जा सकता।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव प्रचार के दौरान धार्मिक संदर्भों के इस्तेमाल, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (RPA, 1951) के तहत ‘भ्रष्ट आचरण’ (Corrupt Practice) की विधिक परिभाषा, और चुनावी सफलता के लिए सार्वजनिक रूप से ‘दुआ’ (प्रार्थना) मांगने की प्रकृति पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की तीन सदस्यीय पीठ ने समाजवादी पार्टी की उम्मीदवार शान-ए-हिंद निहाल अहमद द्वारा बॉम्बे हाईकोर्ट के 8 जून के फैसले के खिलाफ दायर विशेष अनुमति अपील को खारिज करते हुए मालेगांव सेंट्रल (महाराष्ट्र) से ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के विधायक मुफ्ती मोहम्मद इस्माइल अब्दुल कलीक के निर्वाचन को बरकरार रखा। शीर्ष अदालत ने बॉम्बे उच्च न्यायालय के उस निर्णय को सही ठहराया है जिसमें कहा गया था कि चुनाव में जीत के लिए दुआ करना न तो मतदाताओं पर अनुचित प्रभाव (Undue Influence) डालना है और न ही धर्म के आधार पर वोट मांगना।
बॉम्बे हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख विधिक निष्कर्ष
1. ‘दुआ भक्त और ईश्वर के बीच संवाद है, कोई वचनबद्धता या धार्मिक दबाव नहीं’
बॉम्बे हाईकोर्ट के जिस विधिक निष्कर्ष पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी पूर्ण मुहर लगाई, उसमें अदालत ने स्पष्ट किया था: “दुआ (प्रार्थना) करने का कृत्य और उसके उत्तर में उपस्थित जनसमूह द्वारा ‘आमीन’ कहना किसी भी प्रकार की प्रतिज्ञा या वचनबद्धता (Pledge) का रूप नहीं लेता। चूंकि दुआ मूल रूप से एक आस्तिक/भक्त का अपने ईश्वर के साथ संवाद (Communication by the believer with God) का एक रूप है, इसलिए चुनाव में सफलता के लिए प्रार्थना करना न तो अनुचित प्रभाव का प्रयोग माना जा सकता है और न ही धर्म के नाम पर वोट मांगना। प्रतिवादी पर बीमारी के नाम पर सहानुभूति कार्ड खेलने का आरोप लगाया जा सकता था, परंतु वह कानूनी रूप से पूरी तरह अप्रासंगिक है।”
2. चुनाव याचिका में ‘कार्रवाई के पूर्ण कारण’ (Cause of Action) का अभाव
- हाईकोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश VII नियम 11 और आरपीए की धारा 86(1) के तहत याचिका को सुनवाई की प्रारंभिक दहलीज (Threshold) पर ही खारिज कर दिया था।
- अदालत ने माना था कि चुनाव याचिका में लगाए गए आरोप अस्पष्ट, असत्यापित और कानूनी रूप से भ्रष्ट आचरण सिद्ध करने हेतु आवश्यक भौतिक तथ्यों (Material Facts) के अनिवार्य मानकों को पूरा नहीं करते। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस दृष्टिकोण को सही पाया।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं चुनाव याचिका के आरोप
- 2024 महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव (मालेगांव सेंट्रल):
- नवंबर 2024 के आम चुनाव में AIMIM प्रत्याशी मुफ्ती मोहम्मद इस्माइल को 1,09,653 (या 1,09,563) वोट मिले, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी शेख आसिफ शेख रशीद को 1,09,491 वोट मिले थे।
- मुफ्ती इस्माइल मात्र बेहद कड़े अंतर से विजयी घोषित हुए थे। तीसरे स्थान पर रहीं सपा प्रत्याशी शान-ए-हिंद को 9,624 वोट मिले थे।
- चुनाव याचिका में लगाए गए मुख्य आरोप:
- धार्मिक प्रभाव और दुआ: याचिका में आरोप लगाया गया कि मुफ्ती इस्माइल मालेगांव की जामा मस्जिद और ईदगाह के इमाम हैं। उन्होंने गांधीनगर चौक, फतेह मैदान और नूरी टावर मछली बाजार में प्रचार के दौरान अपनी जीत के लिए ‘दुआ’ कराई और लोगों को ‘आमीन’ बुलवाकर धार्मिक रूप से बांधा।
- धार्मिक ग्रंथों और प्रतीकों का उपयोग: आरोप था कि 16 अक्टूबर 2024 को जामा मस्जिद में दरस-ए-कुरान के दौरान महिला शासक चुनने के खिलाफ बातें कही गईं। प्रचार में ईवीएम के 5 नंबर बटन को इस्लाम के 5 स्तंभों और 5 वक्त की नमाज से जोड़ा गया, और एक प्रचारक ने मतदाताओं से अल्लाह के नाम पर पतंग (AIMIM चुनाव चिह्न) को वोट देने की कसम खाने को कहा।
- मृत मतदाताओं के नाम पर वोटिंग: याचिका में आरोप था कि मतदाता सूची में 1,082 मृत व्यक्तियों के नाम शामिल थे जिनके नाम पर फर्जी मतदान हुआ, जो जीत के बेहद कम अंतर को देखते हुए चुनाव परिणाम को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: शान-ए-हिंद बनाम मुफ्ती मोहम्मद इस्माइल अब्दुल कलीक व अन्य [सिविल अपील – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- अपील का मूल आधार: बॉम्बे उच्च न्यायालय का आदेश दिनांक 8 जून 2026 [चुनाव याचिका संख्या 28990/2025]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- अपीलकर्ता (सपा प्रत्याशी) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी
- प्रतिवादी विधायक (मुफ्ती इस्माइल) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत (सहयोगी: अधिवक्ता शुकुल घतोले एवं अश्विन हिरुलकर)
- प्रासंगिक कानून एवं धाराएं:
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act, 1951) की धारा 123(2) (अनुचित प्रभाव / Undue Influence – दैवीय अप्रसन्नता या आध्यात्मिक दंड का भय दिखाना)
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 123(3) (धर्म, मूलवंश, जाति, समुदाय या धार्मिक प्रतीकों के आधार पर वोट मांगना)
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) का आदेश VII नियम 11 (वादपत्र खारिज करना / Rejection of Plaint)
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- अभिराम सिंह बनाम सी.डी. कोमाचेन (2017, सुप्रीम कोर्ट 7-जज संविधान पीठ) — ‘धारा 123(3) के तहत धर्म के आधार पर अपील करना भ्रष्ट आचरण है, परंतु सामान्य व्यक्तिगत प्रार्थना या आध्यात्मिक संवाद जब तक मतदाताओं पर कोई आध्यात्मिक प्रतिबंध या दबाव न डाले, तब तक वह भ्रष्ट आचरण की श्रेणी में नहीं आता।’
- कुलदीप सिंह बनाम प्रकाश सिंह बादल (सुप्रीम कोर्ट) — ‘चुनाव याचिका में लगाए गए भ्रष्ट आचरण के आरोपों को quasi-criminal (अर्ध-आपराधिक) माना जाता है; इसके लिए ठोस, सटीक और स्पष्ट विवरण (Full particulars) देना अनिवार्य है।’
- पीठ: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति संदीप मेहता (सर्वोच्च न्यायालय)
- अंतिम निर्णय: अपील खारिज (Appeal Dismissed); AIMIM विधायक का निर्वाचन पूरी तरह वैध ठहराया गया।
Soliciting Votes: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ के न्यायाधीश | न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति संदीप मेहता |
| चुनाव क्षेत्र | मालेगांव सेंट्रल विधानसभा सीट (महाराष्ट्र चुनाव 2024) |
| विजेता उम्मीदवार | मुफ्ती मोहम्मद इस्माइल अब्दुल खालिक (AIMIM) |
| अपीलकर्ता | शान-ए-हिंद निहाल अहमद (समाजवादी पार्टी) |
| मुख्य मुद्दा | क्या अभियान में ‘दुआ’ मांगना जन प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA) के तहत भ्रष्ट आचरण (Corrupt Practice) है? |

