सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख कानूनी सिद्धांत और NFHS-5 का हवाला
- राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के आंकड़े: शीर्ष अदालत ने अपने 157 पन्नों के फैसले में NFHS-5 (2019-2021) के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा:“भारत में 18 से 49 वर्ष की लगभग 29.3% विवाहित महिलाओं ने अपने पति के हाथों शारीरिक या यौन हिंसा का सामना किया है। इनमें से लगभग तीन-चौथाई (75%) महिलाओं ने कभी किसी से इसकी शिकायत नहीं की और न ही किसी को इसके बारे में बताया। यह आंकड़े साबित करते हैं कि शोषित महिला की चुप्पी अपवाद नहीं बल्कि आम नियम है।”
- शोषणकर्ता द्वारा बनाई गई बंदिशों का लाभ उसे नहीं मिल सकता: पीठ ने आरोपी द्वारा दिए गए तर्कों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि एक अत्याचारी पति अपनी पत्नी को डरा-धमकाकर और अलग-थलग करके जिस चुप्पी के लिए मजबूर करता है, उसी चुप्पी का इस्तेमाल कोर्ट में गवाह की विश्वसनीयता खत्म करने के लिए नहीं कर सकता।
- आघात (Trauma) पर प्रतिक्रिया का कोई तय फॉर्मूला नहीं: कोर्ट ने रूढ़िवादी धारणाओं पर प्रहार करते हुए कहा:“मानव समाज में हर व्यक्ति डर, आघात और उत्पीड़न पर एक जैसा व्यवहार नहीं करता। किसी पीड़िता या चश्मदीद के व्यवहार को मापने के लिए कोई मानक फॉर्मूला नहीं हो सकता। महिला का संकोच और देरी डर, शर्म, सामाजिक बंदिशों या गंभीर परिणामों की आशंका से उपजती है; यह झूठ का प्रतीक नहीं है।”
- महिला को ‘बंधक’ की स्थिति में देखा जाना चाहिए: पीड़िता की मां की स्थिति का वर्णन करते हुए कोर्ट ने कहा कि एक असहाय महिला, जिसके आने-जाने और फोन पर बात करने पर पति का पूरा नियंत्रण हो और जिसे जान से मारने की धमकियां दी गई हों, वह कोई “स्वतंत्र एजेंट” नहीं होती कि पहली फुर्सत में थाने पहुंच जाए। वह वास्तव में एक बंधक (Captive) के समान जीवन जी रही होती है।
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू हिंसा, वैवाहिक यौन शोषण, और आघात (Trauma) के शिकार गवाहों—विशेषकर महिलाओं—के आचरण पर एक ऐतिहासिक और मील का पत्थर साबित होने वाला 157-पृष्ठीय विधिक फैसला सुनाया है।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की तीन सदस्यीय विशेष पीठ ने 6 वर्षीय सौतेली बेटी के बार-बार यौन उत्पीड़न और नृशंस हत्या के दोषी की अपील पर यह व्यवस्था दी। पीठ ने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (इंदौर खंडपीठ) द्वारा पुष्टि की गई फांसी की सजा को स्वाभाविक जीवन के अंत तक आजीवन कारावास (Imprisonment for the remainder of natural life) में बदलते हुए स्पष्ट किया कि अभियोजन का पूरा मामला पीड़िता की मां की चश्मदीद गवाही पर मजबूती से टिका हुआ है, जिसकी देरी को बचाव पक्ष द्वारा हथियार नहीं बनाया जा सकता। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट रूप से घोषणा की है कि पति द्वारा दी जाने वाली शारीरिक या यौन प्रताड़ना की घटनाओं की तुरंत रिपोर्ट न कर पाने या खामोश रहने के आधार पर किसी पीड़ित महिला के बयानों को संदिग्ध नहीं माना जा सकता। अदालत ने पाया कि भारतीय सामाजिक संदर्भ में ऐसी लाचार खामोशी कोई ‘अपवाद’ नहीं, बल्कि ‘सामान्य सामाजिक यथार्थ’ (Norm) है।
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख विधिक अवलोकन एवं दार्शनिक निष्कर्ष
1. NFHS-5 का डेटा: ‘75% पीड़ित महिलाएं कभी शिकायत नहीं करतीं’
पीठ ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5, 2019-2021) के आधिकारिक आंकड़ों का न्यायिक संज्ञान लेते हुए कहा:
- भारत में 18 से 49 वर्ष की आयु वर्ग की लगभग 29.3% विवाहित महिलाओं ने अपने जीवनसाथी के हाथों शारीरिक या यौन हिंसा का सामना किया है।
- सबसे भयावह तथ्य यह है कि ऐसी हिंसा झेलने वाली महिलाओं में से लगभग तीन-चौथाई (75%) ने कभी किसी से मदद नहीं मांगी और न ही किसी के सामने उस हिंसा का खुलासा किया।
- खंडपीठ ने रेखांकित किया:“देश के सबसे बड़े सर्वेक्षण से प्राप्त ये आंकड़े यह स्थापित करते हैं कि शोषित महिला की खामोशी कोई अपवाद नहीं बल्कि एक सामान्य नियम (Norm) है। अपराध की तुरंत रिपोर्ट न करना पीड़ितों की अत्यधिक सामान्य और स्वाभाविक प्रतिक्रिया है, न कि कोई ऐसा विचलन जिसे संदेह की दृष्टि से देखा जाए।”
2. ‘अनलॉक्ड दरवाजा बिना पैसे और सहारे की महिला के लिए आजादी की सड़क नहीं होता’
दोषी के इस तर्क को अदालत ने सिरे से खारिज कर दिया कि मां ने महीनों तक पुलिस या मायके में शिकायत क्यों नहीं की। अदालत ने मां की विवश स्थिति का मार्मिक और संवेदनशील विधिक विश्लेषण किया:
- महिला अपने पहले पति की मृत्यु के बाद बेसहारा विधवा थी, जिसके चार बच्चे थे। उसने सहारे की उम्मीद में अपीलकर्ता से दूसरा विवाह किया था।
- पति उसके आने-जाने पर नजर रखता था, संपर्कों को सीमित करता था और फोन का इस्तेमाल केवल अपनी अनुमति वाले नंबरों तक सीमित रखता था।
- अदालत ने टिप्पणी की:“ऐसी परिस्थितियों में फंसी महिला कोई स्वतंत्र एजेंट (Free Agent) नहीं होती जिससे यह उम्मीद की जाए कि वह पहला मौका मिलते ही थाने पहुंच जाएगी। वह केवल लाक्षणिक नहीं, बल्कि वास्तविक अर्थों में एक बंधक (Captive) थी। एक खुला हुआ दरवाजा (Unlocked door) उस महिला के लिए आजादी की खुली सड़क नहीं बन जाता जिसके पास कोई साधन नहीं, यात्रा के लिए पैसे नहीं, एक हिंसक पति (जिसने उसे जिंदा गाड़ देने की धमकी दी थी) से बचने के लिए कोई सुरक्षित पनाहगाह नहीं, और गोद में एक गंभीर रूप से घायल बच्ची हो जिसे वह सुरक्षित स्थान तक ले जाने में असमर्थ थी।”
3. ट्रॉमा पर कोई ‘मानक प्रतिक्रिया’ (Model Response) नहीं हो सकती
अदालत ने रूढ़िवादी न्यायिक सोच पर कड़ा प्रहार करते हुए व्यवस्था दी:
- मनुष्य किसी गहरे सदमे, आतंक या दुर्व्यवहार पर एक समान या पूर्व-अनुमानित तरीके से प्रतिक्रिया नहीं करते।
- किसी पीड़ित या गवाह के आचरण को जांचने के लिए कोई तयशुदा “मॉडल रिस्पॉन्स” नहीं हो सकता कि यदि उसने वैसा व्यवहार नहीं किया तो उसे झूठा घोषित कर दिया जाए।
- यौन अपराध के गवाह या पीड़ित का संकोच डर, शर्म, सामाजिक बंदिशों या बोलने के भयानक परिणामों की वास्तविक आशंका से उपजा होता है। ऐसा विलंब या चुप्पी किसी भी स्थिति में ‘झूठ का तमगा’ (Badge of Falsehood) नहीं है।
4. शोषक की रणनीति: ‘डर से चुप कराओ, फिर चुप्पी को ही बेगुनाही का सबूत बनाओ’
अदालत ने घरेलू हिंसा के मुकदमों में अपराधियों द्वारा अपनाए जाने वाले कानूनी हथकंडों को उजागर करते हुए कहा:
- ऐसे मामलों की यह एक स्थायी विशेषता रही है कि जिस गोपनीयता, अलगाव और आतंक के जरिए शोषक अपनी पीड़िता को चुप कराता है, बाद में उसी चुप्पी का इस्तेमाल कोर्ट रूम में पीड़िता की विश्वसनीयता को नष्ट करने के लिए करता है।
- अपराधी पहले डर दिखाकर खामोशी हासिल करता है, और फिर उस खामोशी और दबाव में देर से दिए गए बयानों को इस बात का सबूत बनाने की कोशिश करता है कि ऐसा कोई अपराध कभी हुआ ही नहीं था।
- पीठ ने सतर्क करते हुए कहा:“घरेलू दुर्व्यवहार की वास्तविकताओं से अवगत किसी भी अदालत को इस चालाकी (Stratagem) का शिकार होने से पूरी तरह सावधान रहना चाहिए, और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि शोषक द्वारा अपनी पीड़िता पर थोपी गई लाचारी और अक्षमता का लाभ खुद शोषक को न मिलने पाए।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं सजा में बदलाव
- घटना: मध्य प्रदेश के इंदौर में अपीलकर्ता ने अपनी 6 वर्षीय सौतेली बच्ची के साथ लंबे समय तक क्रूर यौन उत्पीड़न किया और अंततः उसकी हत्या कर दी।
- ट्रायल और हाईकोर्ट का रुख: ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को दुष्कर्म, हत्या और पॉक्सो कानून के तहत दोषी मानते हुए मौत की सजा सुनाई, जिसे नवंबर 2019 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने भी ‘दुर्लभ से दुर्लभतम’ (Rarest of Rare) मानते हुए बरकरार रखा था।
- सुप्रीम कोर्ट का निर्णय:
- शीर्ष अदालत ने मां की चश्मदीद गवाही को पूरी तरह विश्वसनीय माना और दोषसिद्धि को बरकरार रखा।
- हालांकि, सजा की मात्रा (Sentencing) के बिंदु पर विचार करते हुए अदालत ने फांसी की सजा को शेष प्राकृतिक जीवन के लिए कारावास (Life imprisonment for the remainder of natural life without remission) में बदल दिया।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: अपीलकर्ता (दोषी) बनाम मध्य प्रदेश राज्य [आपराधिक अपील – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
- प्रासंगिक कानून एवं धाराएं:
- भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 302 (हत्या), धारा 376 (दुष्कर्म) एवं 376AB (12 वर्ष से कम उम्र की बच्ची से दुष्कर्म)
- लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) की धारा 5/6 (गंभीर प्रवेदी यौन हमला)
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 118 (गवाह की सक्षमता), धारा 134 (गवाहों की संख्या नहीं, गुणवत्ता महत्वपूर्ण) एवं धारा 8 (आचरण की सुसंगतता)
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 354(3) (मृत्युदंड बनाम आजीवन कारावास)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत व नजीरें:
- अपूर्वा बनाम राज्य (दिल्ली उच्च न्यायालय) एवं सर्वोच्च न्यायालय की लैंगिक संवेदनशीलता हैंडबुक — ‘यौन अपराधों में महिलाओं के रूढ़िवादिता-आधारित आचरण (Stereotypical Behaviour) का मूल्यांकन करने की न्यायिक प्रवृत्ति की कड़ी भर्त्सना।’
- पंजाब राज्य बनाम गुरमीत सिंह (1996, सुप्रीम कोर्ट) — ‘यौन उत्पीड़न की पीड़िता या उसके परिजनों द्वारा रिपोर्ट दर्ज कराने में देरी को तब तक संदेह से नहीं देखा जाना चाहिए जब तक कि उसके पीछे कोई दुर्भावनापूर्ण आधार साबित न हो।’
- मच्छी सिंह एवं बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980) — ‘मृत्युदंड के मामलों में शमनकारी परिस्थितियों (Mitigating Circumstances) का मूल्यांकन।’
- पीठ: न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई (सर्वोच्च न्यायालय)
- निर्णय परिणाम: दोषसिद्धि बरकरार; मृत्युदंड को बिना किसी छूट के ताउम्र कारावास में परिवर्तित किया गया।
Spousal Abuse: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ के न्यायाधीश | न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता एवं न्यायमूर्ति विजय विश्नोई |
| अपराध का स्वरूप | 6 साल की सौतेली बेटी के साथ बार-बार यौन शोषण और हत्या |
| आरोपी की दलील | पीड़िता की मां (पत्नी) महीनों तक चुप रही, इसलिए उसकी गवाही अविश्वसनीय है |
| सुप्रीम कोर्ट का निर्णय | मां की गवाही को पूर्णतः सत्य माना; मौत की सजा को प्राकृतिक जीवन भर के कारावास में बदला |

