तुच्छ मुकदमों पर चिंता: सुप्रीम कोर्ट के जज ने कहा—ज़रा-ज़रा सी बात पर भावनाएं आहत होने से दर्ज हो रहे केस, जो आपराधिक न्याय प्रणाली पर भारी बोझ बन चुके हैं।
अदालतों में मुकदमों का अंबार: नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के अनुसार देश में 4.27 करोड़ से अधिक आपराधिक मामले लंबित, जिनमें से 95% निचली अदालतों में हैं।
पुलिस और अभियोजकों की कार्यशैली पर सवाल: हिरासत में हिंसा और मुठभेड़ (एन्काउंटर) की घटनाओं पर जताई गहरी चिंता; कहा—’फर्जी मुठभेड़ पुलिस व्यवस्था की विफलता है।’
नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान ने देश की आपराधिक न्याय प्रणाली में दर्ज हो रहे “तुच्छ और हास्यास्पद मुकदमों” (frivolous cases) पर कड़ा प्रहार किया है। उन्होंने कहा कि ऐसे आपराधिक केस दर्ज होना, जो न्याय प्रणाली में कभी आने ही नहीं चाहिए, लोगों की समझदारी और बुद्धिमत्ता पर सीधा प्रहार हैं।
न्यायमूर्ति भुयान नई दिल्ली स्थित ‘इंडीविजुअल एंड कॉन्स्टिट्यूशनल ज्यूरिसप्रूडेंस’ (CCJCJ) द्वारा “एथिक्स इन क्रिमिनल लिटिगेशन – ड्यूटीज ऑफ डिफेंस एंड द प्रॉसिक्यूशन” विषय पर आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। इस कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अभय एस. ओके और दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस अमित शर्मा सहित कई वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व न्यायाधीश भी मौजूद थे।
किन मामलों को बताया ‘हास्यास्पद’?
अपने संबोधन के दौरान जस्टिस भुयान ने उन तुच्छ मुकदमों की सूची रखी, जो रोजाना अदालतों का समय बर्बाद कर रहे हैं:
- खान-पान और अभिव्यक्ति पर केस: किसी विशेष प्रकार का भोजन करने, कविता पाठ करने या किसी के लिए जमानत मांगने हेतु नारे लगाने पर एफआईआर।
- सोशल मीडिया और कला पर आपत्ति: सोशल मीडिया पर टिप्पणी करने, स्टैंड-अप कॉमेडी करने और फिल्मों या किताबों के नाम/सामग्री को लेकर दर्ज मुकदमे।
- चार्जशीट दाखिल होना: उन्होंने दुख जताया कि ऐसे मामलों में केवल एफआईआर ही दर्ज नहीं होती, बल्कि जांच एजेंसियां यह जानते हुए भी चार्जशीट दाखिल कर देती हैं कि अदालत में इनका क्या नतीजा निकलेगा।
“लोग ज़रा-ज़रा सी बात पर आहत (hurt sentiments) हो जाते हैं और तुरंत ऐसे केस दर्ज करवा देते हैं। यह हमारी न्याय प्रणाली को पंगु बना रहा है।”
— जस्टिस उज्ज्वल भुयान
लंबित मामलों का बोझ और ‘एकमुश्त माफी’ का प्रस्ताव
नेशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड (NJDG) के आंकड़ों का हवाला देते हुए जस्टिस भुयान ने बताया कि 17 सितंबर तक भारतीय अदालतों में 4.27 करोड़ से अधिक आपराधिक मामले लंबित हैं। इनमें से 95% मामले अकेले ट्रायल कोर्ट (निचली अदालतों) में चल रहे हैं।
| डेटा / आंकड़े | स्थिति |
| कुल लंबित आपराधिक मामले | 4.27 करोड़ से अधिक |
| निचली अदालतों में हिस्सेदारी | 95% |
| प्रस्तावित समाधान | गैर-गंभीर/गैर-सेशन मामलों के लिए एकमुश्त माफी (One-time Amnesty) |
इस स्थिति से निपटने के लिए उन्होंने सुझाव दिया कि निचली अदालतों को तुच्छ मुकदमों को खत्म करने के लिए एक विशेष अभियान चलाना चाहिए। इसके अलावा, गैर-गंभीर (non-serious) और छोटे-मोटे आपराधिक मामलों में “एकमुश्त माफी” (One-time Amnesty) दी जानी चाहिए ताकि अदालतें उन गंभीर मामलों पर ध्यान केंद्रित कर सकें जिन्हें वास्तव में न्यायिक समीक्षा की आवश्यकता है।
Frivolous Litigation:पुलिस बर्बरता और मुठभेड़ों पर सवाल
हिरासत में हिंसा (custodial violence) और कथित एनकाउंटर (मुठभेड़ों) पर बोलते हुए जस्टिस भुयान ने कहा कि वे इस धारणा पर फिर से विचार करने के लिए मजबूर हैं कि ‘डी.के. बासु’ (D.K. Basu) फैसले के बाद कस्टोडियल वायलेंस खत्म हो गया था।
- एक्स्ट्रा-ज्यूडिशियल किलिंग्स: उन्होंने कहा कि देश में गैर-न्यायिक हत्याएं (extrajudicial killings) बढ़ रही हैं। “पुलिसकर्मियों का फर्जी मुठभेड़ों का सहारा लेना पूरी तरह से अस्वीकार्य है। यह पुलिसिंग और जांच प्रणाली की विफलता है।”
- पुलिस का आक्रामक रवैया: उन्होंने देर रात आरोपियों को क्राइम सीन पर ले जाने और वहां गोलीबारी की घटनाओं पर सवाल उठाए। साथ ही प्रदर्शनकारियों पर पुलिस अधिकारियों द्वारा आपा खोकर हाथ से मारपीट करने की प्रवृत्ति की आलोचना की।
सरकारी अभियोजकों (Public Prosecutors) की स्वतंत्रता
सरकारी वकीलों (Public Prosecutors) की भूमिका पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि मुकदमों को वापस लेने का फैसला स्वतंत्र न्यायिक सोच पर होना चाहिए, न कि कार्यपालिका (सरकार) के दबाव में।
उन्होंने कहा, “मुझे संदेह है कि इस देश में अब ऐसा कोई लोक अभियोजक बचा है जो अपने अधिकारी या बॉस के सामने खड़ा होकर कह सके कि वह गलत फैसले का समर्थन नहीं करेगा।” उन्होंने माना कि अभियोजक संस्थागत दबावों का सामना करते हैं, और जो स्वतंत्र रूप से दबाव का विरोध करता है, वह प्रशंसा का पात्र है।
निष्कर्ष: जस्टिस भुयान ने कहा कि न्याय प्रणाली में जनता का विश्वास निष्पक्ष प्रक्रिया पर निर्भर करता है। सज़ा इसलिए विश्वसनीय होनी चाहिए क्योंकि वह निष्पक्षता से मिली है, और बरी होना इसलिए भरोसेमंद होना चाहिए क्योंकि बहस ईमानदारी से की गई थी। इसके लिए अभियोजक का निष्पक्ष होना और बचाव पक्ष के वकील का ईमानदार होना अनिवार्य है।

