हाईकोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु
- नगर निगम सीमा में आने के बाद भी DTCP का अधिकार कायम: आरोपियों/प्लॉट धारकों ने तर्क दिया था कि एक बार लाइसेंस प्राप्त कॉलोनी नगर निगम (Municipal Corporation) के अधीन आ जाती है, तो बिल्डिंग बाय-लॉ उल्लंघन पर कार्रवाई का अधिकार केवल नगर निगम का होता है, DTCP का नहीं। हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया।
- अधिनियम, 1975 (Haryana Act, 1975) का दायरा: पीठ ने कहा कि हरियाणा विकास एवं शहरी क्षेत्र नियमन अधिनियम, 1975 राज्य के सभी शहरी क्षेत्रों पर लागू होता है। जब तक कॉलोनी का लाइसेंस और उसके ज़ोनिंग प्लान लागू हैं, तब तक धारा 3B और धारा 10 के तहत प्रवर्तन (Enforcement) की शक्तियां DTCP निदेशक के पास बनी रहेंगी।
- नियमों का पालन केवल डेवलपर नहीं, प्लॉट मालिकों की भी जिम्मेदारी: अदालत ने कहा कि लाइसेंस और ज़ोनिंग प्लान की शर्तों (Zoning and Layout Plans) का पालन करने का दायित्व केवल बिल्डर/डेवलपर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्लॉट खरीदने वाले मालिकों और उस पर रहने वाले निवासियों पर भी समान रूप से लागू होता है।
- अवैध निर्माण रोकने के पूर्ण अधिकार: DTCP निदेशक या उनके द्वारा अधिकृत अधिकारी (जैसे DTPE) किसी भी अवैध निर्माण को रोकने, सील करने या संपत्ति को उसके मूल स्वरूप में वापस लाने के लिए आवश्यक कदम उठा सकते हैं।
चंडीगढ़: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा के शहरी क्षेत्रों, विशेषकर गुरुग्राम की निजी लाइसेंस प्राप्त कॉलोनियों (Licensed Colonies) में अवैध निर्माण, जोनिंग उल्लंघन और रिहायशी संपत्तियों के गैर-कानूनी व्यावसायिक उपयोग पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक व्यवस्था दी है।
मुख्य न्यायाधीश अश्विनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की खंडपीठ ने गुरुग्राम की प्रतिष्ठित डीएलएफ सिटी (DLF City) में लगभग 4,000 अवैध निर्माणों और जोनिंग उल्लंघनों से जुड़ी याचिकाओं के बैच पर अंतरिम आदेश पारित करते हुए यह फैसला सुनाया। अदालत ने उन व्यक्तिगत प्लॉट धारकों और कब्जाधारियों की दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया, जिनका तर्क था कि नगर निगम के गठन के बाद DTCP की प्रवर्तन शक्तियां निष्प्रभावी हो गई हैं। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई लाइसेंस प्राप्त कॉलोनी नगर निगम (Municipal Corporation Gurugram – MCG) की सीमाओं में शामिल हो जाती है, तब भी नगर एवं ग्राम नियोजन विभाग (Department of Town and Country Planning – DTCP) का प्रवर्तन क्षेत्राधिकार (Enforcement Jurisdiction) समाप्त नहीं होता। DTCP के प्रवर्तन विंग (District Town Planner Enforcement – DTPE) को हरियाणा शहरी क्षेत्र विकास एवं विनियमन अधिनियम, 1975 के तहत अवैध निर्माणों को सील करने, ढहाने और भूमि को मूल स्थिति में बहाल करने का पूर्ण वैधानिक अधिकार प्राप्त है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं अवलोकन
1. ‘नगर निगम में शामिल होने से 1975 के अधिनियम का क्षेत्राधिकार समाप्त नहीं होता’ खंडपीठ ने हरियाणा विकास एवं शहरी क्षेत्र विनियमन अधिनियम, 1975 (1975 Act) के क्षेत्रीय विस्तार और वैधानिक मंशा का विश्लेषण करते हुए व्यवस्था दी: “हरियाणा विकास एवं शहरी क्षेत्र विनियमन अधिनियम, 1975 का विस्तार हरियाणा के सभी शहरी क्षेत्रों पर है। किसी लाइसेंस प्राप्त कॉलोनी का गुरुग्राम नगर निगम (MCG) की सीमाओं में शामिल होना उक्त अधिनियम द्वारा प्रदत्त वैधानिक क्षेत्राधिकार को समाप्त नहीं करता है।”
अदालत ने इस तर्क को अस्वीकार कर दिया कि लाइसेंस की शर्तों, अनुमोदित लेआउट और जोनिंग प्लान को लागू करने के लिए केवल नगर निगम ही सक्षम प्राधिकारी है।
2. धारा 3B और धारा 10 का परस्पर विधिक संबंध
- अदालत ने अधिनियम की धाराओं की व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया:“यदि लाइसेंस अस्तित्व में रहता है, और यदि अधिनियम की धारा 3B अनुमोदित योजनाओं और लाइसेंस की शर्तों के विपरीत किसी भी निर्माण कार्य को निषिद्ध करती है, तो धारा 10 (जो धारा 3B से जुड़ी प्रवर्तन और दंडात्मक प्रावधान है) को भी अनिवार्य रूप से जीवित रहना होगा।”
- खंडपीठ ने रेखांकित किया कि DTCP निदेशक या उनके द्वारा अधिकृत कोई भी अधिकारी (जैसे DTP Enforcement) आगे के अवैध निर्माण को रोकने या किसी भी इमारत/भूमि को उसकी मूल स्थिति में बहाल (Restore) करने के लिए आवश्यक सभी कदम उठाने हेतु पूरी तरह सशक्त है।
3. लेआउट और जोनिंग प्लान का पालन केवल बिल्डर नहीं, हर प्लॉट मालिक का दायित्व
- अदालत ने व्यवस्था दी कि कॉलोनी के लाइसेंस की शर्तों में यह अनिवार्य शर्त शामिल होती है कि जोनिंग या लेआउट प्लान का सख्ती से पालन किया जाएगा।
- पीठ ने स्पष्ट किया कि इस दायित्व का पालन करने की जिम्मेदारी केवल मूल डेवलपर (जैसे DLF) तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दायित्व प्रत्येक व्यक्ति, जिसमें व्यक्तिगत प्लॉट मालिक (Plot Owners) और वर्तमान अधिभोगी/किराएदार (Occupiers) शामिल हैं, पर समान रूप से लागू होता है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं विधिक कालक्रम
- उल्लंघन का स्वरूप:
- गुरुग्राम प्रशासन और आरडब्ल्यूए द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों के अनुसार, डीएलएफ सिटी के विभिन्न फेजों में बड़े पैमाने पर अनधिकृत निर्माण किए गए हैं।
- सामान्य (General) और ईडब्ल्यूएस (EWS) दोनों श्रेणियों के रिहायशी प्लॉटों का बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उपयोग (Commercialization) किया जा रहा है—जैसे रिहायशी मकानों में अवैध गेस्ट हाउस, दुकानें, क्लिनिक और दफ्तर खोलना, अतिरिक्त मंजिलों का अवैध निर्माण और कवर्ड एरिया की सीमा लांघना।
- 2021 की याचिकाएं और फरवरी 2025 का आदेश:
- डीएलएफ सिटी आरडब्ल्यूए और ‘DLF-3 वॉयस’ ने वर्ष 2018 की एक्शन टेकन रिपोर्ट (ATR) के आधार पर अवैध निर्माणों पर कार्रवाई की मांग को लेकर 2021 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
- फरवरी 2025 में, उच्च न्यायालय ने हरियाणा बिल्डिंग कोड और जोनिंग नियमों के उल्लंघन के आधार पर अधिकारियों को डीएलएफ सिटी में लगभग 4,000 अनधिकृत निर्माणों के खिलाफ दो महीने के भीतर सख्त कार्रवाई करने का निर्देश दिया था।
- सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप (अक्टूबर 2025):
- प्रभावित संपत्ति मालिकों ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत (Natural Justice) के उल्लंघन का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
- अक्टूबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश को इस आधार पर निरस्त कर दिया कि प्रभावित पक्षों को अपनी बात रखने का अवसर नहीं दिया गया था, और हाईकोर्ट को प्रभावित लोगों की सुनवाई करके नए सिरे से त्वरित (Fast-track) सुनवाई करने का निर्देश दिया।
- वर्तमान स्थिति: सुप्रीम कोर्ट के रिमांड के बाद उच्च न्यायालय ने सभी पक्षों—आरडब्ल्यूए, डीएलएफ, प्रभावित प्लॉट मालिकों और हरियाणा सरकार—की दलीलें सुनकर यह अंतरिम आदेश पारित किया है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: डीएलएफ सिटी रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन व अन्य बनाम हरियाणा राज्य, नगर एवं ग्राम नियोजन विभाग (DTCP), नगर निगम गुरुग्राम व अन्य [रिट याचिका (सिविल) – पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय]
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- डीएलएफ सिटी आरडब्ल्यूए की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता अमित झांजी (साथ में अधिवक्ता साहिबा सिद्धू, एलिजा गुप्ता, रिफत सोइन, हरनाज कौर)
- डीएलएफ-3 वॉयस की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद छिब्बर (साथ में अधिवक्ता संचार आनंद, अभिनव सूद, करण पाठक, अर्श बीर, अतीवराज संधू, मेहंदी सिंघल)
- डीएलएफ की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता रणदीप एस. राय एवं राजीव आनंद (साथ में राधिका मेहता, फरहाद कोहली, शेफाली गोयल, संदीप कौर)
- हरियाणा राज्य की ओर से: अतिरिक्त महाधिवक्ता अंकुर मित्तल
- अन्य संबंधित पक्षों/प्लॉट मालिकों की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता शैलेंद्र जैन, सरतेज सिंह नरूला, अक्षय भान, संजीव शर्मा, जय वीर यादव, अनमोल रतन सिद्धू, सुनील चड्ढा, नचिकेता जोशी, आशीष चोपड़ा आदि।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- हरियाणा शहरी क्षेत्र विकास एवं विनियमन अधिनियम, 1975 (Haryana Development and Regulation of Urban Areas Act, 1975) की धारा 3B (स्वीकृत नक्शों/लाइसेंस शर्तों के विरुद्ध निर्माण पर रोक), धारा 10 (उल्लंघन पर ध्वस्तीकरण, सीलिंग व अभियोजन के अधिकार) एवं धारा 12।
- हरियाणा नगर निगम अधिनियम, 1994 (Haryana Municipal Corporation Act, 1994)।
- हरियाणा बिल्डिंग कोड (Haryana Building Code) एवं अनुमोदित जोनिंग विनियम।
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- समवर्ती क्षेत्राधिकार (Concurrent Jurisdiction) का सिद्धांत — ‘जब तक कि किसी विशेष कानून में स्पष्ट रूप से अधिकार न छीने गए हों, एक विशिष्ट विकास अधिनियम (Special Planning Enactment) के तहत नियुक्त वैधानिक योजना प्राधिकरण का क्षेत्राधिकार सामान्य नगरपालिका कानून के लागू होने से स्वतः समाप्त नहीं होता।’
- संविदात्मक एवं वैधानिक दायित्व — ‘लाइसेंस प्राप्त निजी कॉलोनियों में भूमि के उप-विभाजन या भवन निर्माण का अधिकार योजना प्राधिकरण द्वारा स्वीकृत जोनिंग सीमाओं से आबद्ध होता है; प्लॉट खरीदार मूल लाइसेंस की शर्तों से विलग नहीं हो सकते।’
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश अश्विनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर (पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय)
- निर्णय का सार: DTCP/DTPE का क्षेत्राधिकार बरकरार; अवैध निर्माणों और व्यावसायिक गतिविधियों के खिलाफ प्रशासनिक प्रवर्तन कार्रवाई को कानूनन सही ठहराया गया।
DLF City: मामले का संक्षिप्त विवरण (At a Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय |
| न्यायाधीश | मुख्य न्यायाधीश अश्विनी कुमार मिश्रा व न्यायमूर्ति रोहित कपूर |
| याचिकाकर्ता | डीएलएफ सिटी रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन और अन्य बनाम हरियाणा राज्य |
| मुख्य विवाद | गुरुग्राम के डीएलएफ क्षेत्र में रिहायशी प्लॉटों का व्यावसायिक इस्तेमाल और अवैध निर्माण |
| कोर्ट का फैसला | ‘हरियाणा विकास एवं शहरी क्षेत्र नियमन अधिनियम, 1975’ के तहत DTCP को सीलिंग और बुलडोजर/ध्वस्तीकरण की कार्रवाई का अधिकार है। |

