Thursday, October 1, 2026
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PM Vs Kejriwal: राजनीतिक प्रतिशोध साधने के लिए अदालतों का इस्तेमाल नहीं हो सकता; पीएम मोदी की डिग्री मामले में अरविंद केजरीवाल पर 25,000 जुर्माना

मुख्य संकेतक और अदालती टिप्पणियां (Key Highlights)

  • CIC ने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम किया:खंडपीठ ने एकल पीठ के इस निष्कर्ष को सही माना कि केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने गुजरात और दिल्ली विश्वविद्यालय को पीएम मोदी की डिग्री विवरण देने का निर्देश देकर अपने वैधानिक अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) का उल्लंघन किया था। RTI अधिनियम की धारा 6(1) के तहत सूचना पाने के लिए जन सूचना अधिकारी (PIO) को निर्धारित शुल्क के साथ आवेदन देना अनिवार्य है, जबकि केजरीवाल ने ऐसा कोई सीधा आवेदन प्रस्तुत नहीं किया था। CIC द्वारा इसे स्वतः संज्ञान (Suo motu) लेना गलत था।
  • “राजनीतिक प्रतिशोध के लिए अदालतों का इस्तेमाल अनुचित”:अदालत ने केजरीवाल के आचरण पर एकल पीठ की टिप्पणियों को चुनौती देने वाली याचिका खारिज करते हुए कहा:“सांविधिक प्राधिकारियों और अदालतों का उपयोग राजनीतिक प्रतिशोध (Political Vengeance) को व्यक्त करने के लिए एक सार्वजनिक मंच के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। सार्वजनिक पद पर आसीन एक राजनीतिक नेता अपने राजनीतिक उद्देश्यों के लिए वैधानिक कार्यवाहियों का उपयोग नहीं कर सकता।”
  • प्रधानमंत्री की शैक्षणिक योग्यता और लोकहित (Public Interest):हाईकोर्ट ने उस तर्क को भी सिरे से खारिज कर दिया कि प्रधानमंत्री पद पर होने के कारण शैक्षणिक रिकॉर्ड सार्वजनिक हित का विषय हैं। अदालत ने स्पष्ट किया: “भारत के प्रधानमंत्री—जो जनता के चुने हुए प्रतिनिधि हैं—की शैक्षणिक योग्यता की जानकारी मांगने के लिए किसी लोकहित (Public Interest) की आवश्यकता नहीं है, जब उनकी शैक्षणिक योग्यता का संवैधानिक पद पर उनके चुनाव पर कोई असर नहीं पड़ता है।”
  • RTI अधिनियम की धारा 8(1)(e) और 8(1)(j) के तहत छूट:अदालत ने कहा कि किसी विश्वविद्यालय द्वारा किसी छात्र के शैक्षणिक रिकॉर्ड ‘विश्वास आधारित संबंध’ (Fiduciary Relationship) में रखे जाते हैं। निजता के अधिकार (Right to Privacy) और RTI के तहत जानकारी के अधिकार के बीच संतुलन बनाते हुए, डिग्री विवरण धारा 8(1)(e) और 8(1)(j) के तहत छूट प्राप्त व्यक्तिगत जानकारी (Exempt Personal Information) की श्रेणी में आते हैं।

अहमदाबाद: सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act) के तहत भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक डिग्रियों को सार्वजनिक करने की मांग, केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) के क्षेत्राधिकार और राजनीतिक हस्तियों द्वारा न्यायिक मंचों के इस्तेमाल को लेकर गुजरात हाईकोर्ट ने युगांतरकारी फैसला सुनाया है।

भारत में चुनाव लड़ने के लिए कोई न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य नहीं

मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति डी.एन. रे की खंडपीठ ने एकल पीठ (Single Judge Bench) के मार्च 2023 के फैसले की पुष्टि की, जिसमें सीआईसी के उस आदेश को रद्द कर दिया गया था जिसके तहत गुजरात विश्वविद्यालय और दिल्ली विश्वविद्यालय को प्रधानमंत्री की डिग्री का विवरण केजरीवाल को सौंपने का निर्देश दिया गया था। खंडपीठ ने दो-टूक व्यवस्था दी कि केवल प्रधानमंत्री का संवैधानिक पद धारण करना उनकी शैक्षणिक योग्यताओं को सार्वजनिक करने का कोई ‘व्यापक लोकहित’ (Larger Public Interest) स्थापित नहीं करता, क्योंकि भारत में चुनाव लड़ने के लिए कोई न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य नहीं है। गुजरात उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने आम आदमी पार्टी (AAP) के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल की अंतर-अदालती अपील (Intra-Court Appeal) को खारिज करते हुए उन पर लगाए गए ₹25,000 के हर्जाने/मुकदमा खर्च (Costs) को पूरी तरह बरकरार रखा है।

उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘अदालतें और वैधानिक संस्थाएं राजनीतिक प्रतिशोध निकालने का मंच नहीं’

खंडपीठ ने अरविंद केजरीवाल के आचरण और इस मुकदमेबाजी के पीछे के राजनीतिक उद्देश्यों पर तीखी न्यायिक टिप्पणी दर्ज की:

*”सांविधिक प्राधिकरणों (Statutory Authorities) और न्यायालयों को राजनीतिक प्रतिशोध (Political Vengeance) को हवा देने के लिए एक सार्वजनिक मंच के रूप में नहीं माना जाना चाहिए। सार्वजनिक पद पर बैठा कोई भी राजनीतिक नेता अपने राजनीतिक मकसदों को साधने के लिए वैधानिक कार्यवाहियों का दुरुपयोग नहीं कर सकता।

अपीलकर्ता ने सीआईसी के समक्ष अपने खिलाफ चल रही कार्यवाही में जिस प्रकार का जवाब दिया और उसके बाद लिखित दलीलें दाखिल करके मामले को जिस आक्रामक तरीके से आगे बढ़ाया, वह अपने आप में सब कुछ बयां करता है और इस पर हमें किसी अतिरिक्त टिप्पणी या अवलोकन की आवश्यकता नहीं है।”*

2. प्रधानमंत्री पद और लोकहित (Larger Public Interest) की दलील खारिज

अदालत ने केजरीवाल की उस मुख्य दलील को सिरे से नकार दिया कि प्रधानमंत्री देश के सर्वोच्च निर्वाचित प्रतिनिधि हैं, अतः जनता को उनकी डिग्री जानने का व्यापक अधिकार है:

“भारत के प्रधानमंत्री की शैक्षणिक योग्यता से संबंधित जानकारी मांगने के लिए किसी लोकहित—व्यापक लोकहित (Larger Public Interest) की तो बात ही छोड़िए—की कतई आवश्यकता नहीं है, जब वे जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि हैं और उनकी शैक्षणिक योग्यता का उनके संवैधानिक पद पर चुने जाने से कोई प्रत्यक्ष विधिक संबंध या प्रभाव नहीं है।”

3. निजता का अधिकार बनाम सूचना का अधिकार (आरटीआई की धारा 8)

  • खंडपीठ ने रेखांकित किया कि किसी भी छात्र के शैक्षणिक दस्तावेज उसकी व्यक्तिगत जानकारी (Personal Information) होते हैं, जिसे विश्वविद्यालय एक विश्वास-आधारित संबंध (Fiduciary Relationship) के तहत अपने पास रखता है।
  • अदालत ने विधिक संतुलन स्पष्ट करते हुए कहा:“दो परस्पर विरोधी अधिकारों—एक व्यक्ति की निजता के अधिकार (Right to Privacy) और आरटीआई अधिनियम, 2005 के तहत नागरिक के सूचना मांगने के अधिकार—के बीच संतुलन साधते हुए, हमारा यह दृढ़ मत है कि सीआईसी द्वारा मांगी गई जानकारी आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1)(e) [विश्वास-आधारित संबंध] और धारा 8(1)(j) [व्यक्तिगत जानकारी] के तहत छूट प्राप्त श्रेणी में आती है। प्रतिवादी विश्वविद्यालय को इसे उजागर करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।”

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सीआईसी (CIC) की प्रक्रियात्मक विफलता: बिना आवेदन के स्वतः संज्ञान

उच्च न्यायालय ने पाया कि केंद्रीय सूचना आयोग ने आरटीआई कानून के बुनियादी विधिक ढांचे का घोर उल्लंघन किया था:

  1. धारा 6(1) के तहत कोई औपचारिक आवेदन नहीं: आरटीआई अधिनियम की धारा 6(1) के अनुसार, किसी भी सूचना को प्राप्त करने के लिए संबंधित लोक प्राधिकरण के जन सूचना अधिकारी (PIO) के समक्ष निर्धारित शुल्क के साथ लिखित या इलेक्ट्रॉनिक आवेदन प्रस्तुत करना अनिवार्य होता है।
  2. जवाब को आवेदन मानना गैरकानूनी:
    • वर्ष 2016 में केजरीवाल के अपने चुनावी पहचान पत्र (EPIC) से जुड़े एक आरटीआई मामले में सुनवाई चल रही थी।
    • केजरीवाल ने 28 अप्रैल 2016 को दिए गए अपने जवाबी पत्र में प्रधानमंत्री मोदी की डिग्री का उल्लेख किया था।
    • सीआईसी ने कानून के विपरीत जाकर उस सामान्य जवाबी पत्र को ही आरटीआई आवेदन मान लिया और गुजरात विश्वविद्यालय व दिल्ली विश्वविद्यालय को सीधे रिकॉर्ड खोजने और जानकारी देने का निर्देश जारी कर दिया।
  3. क्षेत्राधिकार से परे कार्य: अदालत ने स्पष्ट किया कि आरटीआई अधिनियम के तहत सीआईसी के पास इस प्रकार स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognisance) लेने या औपचारिक आवेदन व निर्धारित प्रक्रिया के बिना निर्देश जारी करने का कोई वैधानिक अधिकार क्षेत्र नहीं था।

विवाद का घटनाक्रम

  • अप्रैल 2016: सीआईसी के तत्कालीन सूचना आयुक्त एम. श्रीधर आचार्युलु ने केजरीवाल के पत्र पर संज्ञान लेते हुए पीएमओ, गुजरात यूनिवर्सिटी और दिल्ली यूनिवर्सिटी को प्रधानमंत्री की डिग्रियों के संबंध में निर्देश जारी किए।
  • मार्च 2023 (एकल पीठ का निर्णय): गुजरात विश्वविद्यालय ने सीआईसी के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी। एकल न्यायाधीश ने सीआईसी का आदेश रद्द कर दिया और कानून के दुरुपयोग पर अरविंद केजरीवाल पर ₹25,000 का जुर्माना लगाया।
  • रिव्यू याचिका खारिज: केजरीवाल द्वारा दायर समीक्षा याचिका (Review Petition) को एकल पीठ ने खारिज कर दिया।
  • सितंबर 2026 (डिवीजन बेंच का फैसला): मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति डी.एन. रे की खंडपीठ ने दोनों आधारों पर एकल पीठ के फैसले को सही ठहराते हुए केजरीवाल की अपील खारिज कर दी और ₹25,000 के हर्जाने को यथावत बनाए रखा।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: अरविंद केजरीवाल बनाम गुजरात विश्वविद्यालय व अन्य [अपील / एलपीए – गुजरात उच्च न्यायालय, अहमदाबाद]
  • पीठ: मुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल और न्यायमूर्ति डी.एन. रे (खंडपीठ)
  • फैसले की तिथि: 29 सितंबर 2026
  • विधिक प्रतिनिधित्व:
    • अपीलकर्ता (अरविंद केजरीवाल) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी (साथ में अधिवक्ता विवेक जैन, आयुषी ए. शाह, अमित भंडारी, मोहम्मद इरशाद एवं औम एम. कोटवाल)
    • प्रतिवादी (गुजरात विश्वविद्यालय) की ओर से: सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता (साथ में अतिरिक्त महाधिवक्ता मनीषा लवकुमार, अधिवक्ता रजत नायर, अमन मेहता एवं शर्मिष्ठा रावल)
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
    • सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act, 2005):
      • धारा 6(1) (सूचना प्राप्त करने हेतु निर्धारित प्रक्रिया और विधिक आवेदन की अनिवार्यता)
      • धारा 8(1)(e) (वैश्वासिक संबंध / Fiduciary Relationship में रखी गई सूचना के प्रकटीकरण से छूट)
      • धारा 8(1)(j) (व्यक्तिगत सूचना की गोपनीयता, जिसका किसी सार्वजनिक गतिविधि या व्यापक लोकहित से कोई सरोकार न हो)
      • धारा 19 एवं 20 (अपीलीय शक्तियां और दंड)
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 226 (उच्च न्यायालय का असाधारण रिट क्षेत्राधिकार)
    • भारत का संविधान – अनुच्छेद 21 (निजता का मौलिक अधिकार / Right to Privacy)
  • संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
    • सीबीएसई बनाम आदित्य बंदोपाध्याय (2011, सुप्रीम कोर्ट) — ‘परीक्षा बोर्ड और विश्वविद्यालयों द्वारा छात्रों के अंक और रिकॉर्ड विश्वास-आधारित (Fiduciary) संबंध में रखे जाते हैं; आरटीआई का उपयोग निजी जिज्ञासा या दुर्भावनापूर्ण उद्देश्यों के लिए नहीं किया जा सकता।’
    • गिरीश रामचंद्र देशपांडे बनाम सीआईसी (2013, सुप्रीम कोर्ट) — ‘किसी व्यक्ति का सेवा रिकॉर्ड, व्यक्तिगत ब्योरा या शैक्षणिक विवरण धारा 8(1)(j) के तहत व्यक्तिगत सूचना है, जब तक कि असाधारण लोकहित साबित न हो।’
  • अंतिम परिणाम: अंतर-अदालती अपील पूरी तरह खारिज; एकल पीठ द्वारा लगाया गया ₹25,000 का हर्जाना बरकरार; सीआईसी का पूर्ववर्ती प्रकटीकरण आदेश अवैध घोषित।

PM Vs Kejriwal: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतगुजरात उच्च न्यायालय (Gujarat High Court)
खंडपीठमुख्य न्यायाधीश सुनीता अग्रवाल एवं न्यायमूर्ति डी.एन. राय
अपीलकर्ताअरविंद केजरीवाल (आम आदमी पार्टी नेता)
प्रतिवादीगुजरात यूनिवर्सिटी व अन्य
अदालत का फैसलाअपील खारिज; CIC का 2016 का आदेश रद्द करने और 25,000 रुपये जुर्माने का एकल पीठ का फैसला बरकरार।
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