Wednesday, September 30, 2026
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ITAT Case: यूएस से भारत भेजे गए कर्मचारियों पर टैक्स का मामला; EY (अर्न्स्ट एंड यंग) ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका

मुख्य संकेतक (Key Indicators)

  • लागत-से-लागत पुनर्भुगतान बनाम FTS (Fees for Technical Services): EY US का तर्क है कि भारत भेजी गई टीम के लिए प्राप्त भुगतान केवल वेतन और खर्चों का लागत-से-लागत पुनर्भुगतान (Cost-to-Cost Reimbursement) है, जिसमें कोई प्रॉफिट मार्जिन शामिल नहीं है। वहीं, आयकर विभाग का कहना है कि यह भारत-अमेरिका द्विपक्षीय कर संधि (DTAA) के अनुच्छेद 12 के तहत कर योग्य तकनीकी सेवा शुल्क है।
  • ‘मेक अवेलेबल’ (Make Available) का नियम: दिल्ली हाईकोर्ट ने माना था कि अमेरिकी कर्मचारियों द्वारा भारतीय इकाइयों के कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया गया और तकनीकी ज्ञान का हस्तांतरण हुआ, जिससे यह सेवा DTAA के Make Available परीक्षण को पूरा करती है।
  • रोजगार पर नियंत्रण (Lien on Employment): उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाते हुए नोट किया कि कर्मचारी केवल 2-3 वर्षों के लिए भारत आए थे और उनका मूल नियोक्ता EY US ही रहा, क्योंकि भारतीय इकाई उनके मूल रोजगार अनुबंध को समाप्त नहीं कर सकती थी।
  • आईटीएटी (ITAT) को रिमांड: अमेरिकी संस्था द्वारा भारतीय ग्राहकों को दी गई अन्य पेशेवर सेवाओं के मुद्दे पर दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले को पुनर्विचार के लिए आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) को वापस भेज दिया था।

नई दिल्ली: बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) के भीतर विदेशी कर्मचारियों की भारतीय शाखाओं में प्रतिनियुक्ति (Secondment of Employees), वेतन-लागत की प्रतिपूर्ति (Cost Reimbursements) और भारत-अमेरिका दोहरे कराधान परिहार समझौते (India-US DTAA) के तहत तकनीकी सेवा शुल्क (Fees for Technical Services – FTS) की कर-योग्यता पर एक बड़ा विवाद देश की शीर्ष अदालत पहुंच गया है।

दिल्ली उच्च न्यायालय की खंडपीठ (न्यायमूर्ति वी. कामेश्वर राव और न्यायमूर्ति विनोद कुमार) ने 18 जून को पांच अपीलों (कर निर्धारण वर्ष 2018-19 से 2022-23) का निपटारा करते हुए आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT) के आदेश को पलट दिया था। उच्च न्यायालय ने माना था कि EY US द्वारा भारत प्रतिनियुक्त किए गए कर्मचारियों की सेवाएं केवल सामान्य प्रशासनिक कार्य नहीं थीं, बल्कि तकनीकी प्रकृति की थीं, जिन्होंने DTAA के अनुच्छेद 12(4)(b) के तहत “मेक अवेलेबल” (Make Available) परीक्षण को संतुष्ट किया। वैश्विक कंसल्टिंग फर्म अर्न्स्ट एंड यंग यूएस एलएलपी (Ernst & Young US LLP – EY US) ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अपील दायर की है, जिसमें आयकर विभाग (Revenue) के पक्ष में फैसला सुनाते हुए सेकंडमेंट भुगतानों को भारत में कर-योग्य माना गया था।

दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के मुख्य विधिक निष्कर्ष

1. ‘मेक अवेलेबल’ (Make Available) टेस्ट की पूर्ति और कौशल हस्तांतरण दिल्ली हाईकोर्ट ने EY US के उस तर्क को खारिज कर दिया था जिसमें कहा गया था कि कर्मचारियों की प्रतिनियुक्ति में कोई तकनीकी जानकारी या विशेषज्ञता (Know-how/Expertise) हस्तांतरित नहीं की गई:

  • अदालत ने सेकंडेड कर्मचारियों के कार्यक्षेत्र (Scope of Work) की जांच की और पाया कि वे भारतीय संस्थाओं में:
    • स्थानीय कर्मचारियों को प्रशिक्षण (Training) दे रहे थे।
    • EY ग्रुप की वैश्विक नीतियों, पद्धतियों और प्रक्रियाओं को लागू कर रहे थे।
    • भारतीय संस्थाओं में गुणवत्ता मानकों (Quality Standards) का रखरखाव सुनिश्चित कर रहे थे।
  • पीठ ने स्पष्ट रूप से दर्ज किया:“निर्धारिती द्वारा दी जाने वाली सेवाओं में तकनीकी सेवाएं शामिल हैं जो ‘मेक अवेलेबल’ परीक्षण को संतुष्ट करती हैं, क्योंकि इसके माध्यम से कौशल और ज्ञान का स्पष्ट हस्तांतरण (Transfer of Skill/Knowledge) हुआ है।”

2. 2-3 साल का सीमित कार्यकाल और मूल नियोक्ता पर ग्रहणाधिकार (Lien)

  • हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि संबंधित कर्मचारी केवल 2 से 3 वर्षों की सीमित अवधि के लिए भारत प्रतिनियुक्त किए गए थे और कार्यभार समाप्त होते ही वे वापस EY US लौट गए।
  • अदालत ने माना कि यद्यपि भारतीय संस्थाओं के पास प्रतिनियुक्ति (Secondment) को समाप्त करने का अधिकार था, परंतु वे उन कर्मचारियों का EY US के साथ मौजूद मूल रोजगार संबंध (Underlying Relationship) समाप्त नहीं कर सकती थीं।
  • EY US का अपने कर्मचारियों पर निरंतर ग्रहणाधिकार (Lien) बना रहा, जिससे वे पूरी तरह भारतीय संस्था के वास्तविक कर्मचारी नहीं माने जा सकते थे।

3. ITAT के रुख को पलटना: ‘लागत प्रतिपूर्ति’ का दावा खारिज

  • इससे पूर्व आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT) ने EY US के पक्ष में फैसला देते हुए माना था कि भारतीय संस्थाओं द्वारा अमेरिकी संस्था को किए गए भुगतान केवल ‘लागत-से-लागत प्रतिपूर्ति’ (Cost-to-Cost Reimbursements) थे और प्रतिनियुक्ति अवधि के दौरान वे भारतीय इकाई के ही कर्मचारी बन गए थे।
  • उच्च न्यायालय ने ITAT के इस दृष्टिकोण को गलत पाया और सभी पांचों अपीलों में ITAT के आदेश को निरस्त करते हुए सेकंडमेंट पेमेंट्स पर आयकर विभाग (राजस्व) के पक्ष में व्यवस्था दी।

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अमेरिका से भारतीय ग्राहकों को दी गई पेशेवर सेवाओं का मुद्दा रिमांड

इस विवाद में एक दूसरा पहलू EY US द्वारा संयुक्त राज्य अमेरिका से भारतीय ग्राहकों को सीधे प्रदान की गई पेशेवर सेवाओं (Professional Services) के लिए प्राप्त भुगतानों का भी था:

  • इस मुद्दे पर उच्च न्यायालय ने कोई अंतिम आदेश पारित नहीं किया।
  • पीठ ने पाया कि ITAT ने उन सेवाओं की प्रकृति का पर्याप्त रूप से परीक्षण नहीं किया था जिन्हें कर निर्धारण अधिकारी (AO) ने कर-योग्य FTS माना था।
  • अतः अदालत ने इस विशिष्ट प्रश्न को पुनर्विचार हेतु ITAT को वापस भेजते हुए (Remand back) निर्देश दिया कि वह सभी सुसंगत रिकॉर्डों की जांच कर एक तर्कसंगत आदेश पारित करे।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्ववर्ती फैसलों का प्रभाव एवं विधिक महत्व

  • नॉर्दर्न ऑपरेटिंग सिस्टम्स (NOS) नजीर का प्रभाव:
    • सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले—कमिश्नर ऑफ सेंट्रल एक्साइज बनाम मैसर्स नॉर्दर्न ऑपरेटिंग सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड (NOS – 2022)—में सेवा कर (Service Tax) के संदर्भ में यह सिद्धांत प्रतिपादित किया गया था कि विदेशी होल्डिंग कंपनी द्वारा प्रतिनियुक्त कर्मचारी भारतीय सहायक कंपनी के नहीं बल्कि विदेशी कंपनी के ही बने रहते हैं, और उनके वेतन की प्रतिपूर्ति पर कर देयता बनती है।
    • दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला इसी सिद्धांत को प्रत्यक्ष कर (Direct Tax) और DTAA व्याख्या पर लागू करता दिखाई देता है।
  • MNCs और क्रॉस-बॉर्डर वर्कफोर्स पर असर:
    • यदि सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखता है, तो भारत में काम करने वाली दर्जनों वैश्विक आईटी, कंसल्टिंग और वित्तीय फर्मों (Big 4 सहित) के लिए विदेशी कर्मचारियों के सेकंडमेंट पर भारी विदहोल्डिंग टैक्स (TDS/FTS) और पूर्वव्यापी देनदारियों का खतरा बढ़ जाएगा।
    • दूसरी ओर, यदि EY US सफल होती है, तो यह स्थापित होगा कि वास्तविक लागत-प्रतिपूर्ति पर कोई तकनीकी सेवा शुल्क (FTS) लागू नहीं किया जा सकता जब तक कि कोई स्वतंत्र सेवा अनुबंध न हो।

विधिक विवरण

  • केस संदर्भ: अर्न्स्ट एंड यंग यूएस एलएलपी बनाम भारत संघ व अन्य [विशेष अनुमति याचिका (सिविल) – भारत का सर्वोच्च न्यायालय]
  • आक्षेपित निर्णय: दिल्ली उच्च न्यायालय का खंडपीठ निर्णय (दिनांक 18 जून 2026, न्यायमूर्तियों वी. कामेश्वर राव एवं विनोद कुमार द्वारा 5 आयकर अपीलों में पारित)
  • संबद्ध कर निर्धारण वर्ष (AYs): AY 2018-19, 2019-20, 2020-21, 2021-22 और 2022-23
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक संधियां:
    • भारत-अमेरिका दोहरा कराधान परिहार समझौता (India-US DTAA):
      • अनुच्छेद 12(4)(b) (रॉयल्टी एवं तकनीकी सेवाओं के लिए शुल्क – ‘Make Available’ क्लॉज)
    • आयकर अधिनियम, 1961:
      • धारा 9(1)(vii) (भारत में उपार्जित या प्रोद्भूत मानी जाने वाली तकनीकी सेवाओं के लिए फीस)
      • धारा 195 (अनिवासी को भुगतान पर स्रोत पर कर कटौती / TDS)
  • संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
    • कमिश्नर ऑफ सेंट्रल एक्साइज बनाम मैसर्स नॉर्दर्न ऑपरेटिंग सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड (2022, सुप्रीम कोर्ट 3-जज बेंच) — ‘कर्मचारियों की प्रतिनियुक्ति में विदेशी मूल कंपनी का उन पर ग्रहणाधिकार बना रहता है; यह जनशक्ति आपूर्ति की सेवा मानी जाएगी।’
    • डायरेक्टर ऑफ इनकम टैक्स बनाम मॉर्गन स्टेनली एंड कंपनी (2007, सुप्रीम कोर्ट) — ‘स्थायी प्रतिष्ठान (PE) और विदेशी कर्मचारियों की प्रतिनियुक्ति के दौरान सेवा और रोजगार संबंधों का परीक्षण।’
  • वर्तमान स्थिति: EY US द्वारा विशेष अनुमति याचिका (SLP) सुप्रीम कोर्ट में दायर; रजिस्ट्री सत्यापन के उपरांत प्रारंभिक सुनवाई और नोटिस जारी करने हेतु शीर्ष अदालत की पीठ के समक्ष सूचीबद्ध होना प्रतीक्षित।

ITAT Case:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
याचिकाकर्ताEY US (अर्न्स्ट एंड यंग, अमेरिका)
प्रतिवादीभारत संघ / आय कर विभाग (Union of India / Income Tax Department)
संबंधित अदालतसर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
विवादित आदेशदिल्ली उच्च न्यायालय की पीठ (18 जून 2026) का फैसला, जिसमें आईटीएटी (ITAT) के आदेश को रद्द कर दिया गया था।
मुख्य विवादक्या विदेशी कंपनी से भारतीय इकाई में भेजे गए कर्मचारियों का वेतन पुनर्भुगतान (Cost Reimbursement) “तकनीकी सेवाओं के लिए शुल्क” (Fees for Technical Services – FTS) मानकर कर योग्य है?
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