अदालत की मुख्य टिप्पणियाँ और कानूनी तर्क (Key Observations)
- केवल पारिवारिक संबंध होना काफी नहीं:अदालत ने स्पष्ट किया कि घरेलू हिंसा अधिनियम उन कृत्यों पर लागू होता है जो शारीरिक, मानसिक, मौखिक, भावनात्मक या आर्थिक नुकसान पहुँचाते हैं। केवल सास-ससुर या पारिवारिक संबंध (Domestic Relationship) होना ही किसी को कानून के तहत दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है।
- वयस्क बेटे के कृत्यों का दायरा:याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि उसका ससुर अपने शादीशुदा और वयस्क बेटे को किसी अन्य महिला के साथ शामिल होने से रोकने में विफल रहा। इस पर अदालत ने कहा:“किसी पिता को केवल इसलिए DV एक्ट के तहत जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि उसने अपने वयस्क बेटे के आचरण को नियंत्रित नहीं किया।”
- ठोस तथ्यों और साक्ष्यों का अभाव:अदालत ने उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता ने ससुर के आचरण को ‘अपमान, उपहास, अपमानजनक या धमकी’ करार दिया था, लेकिन इसके समर्थन में कोई विशिष्ट तथ्य या तारीखें पेश नहीं कीं। पीठ ने कहा:“शब्द जैसे ‘अपमानित किया’, ‘चिल्लाया’ और ‘गाली दी’ केवल निष्कर्ष हैं। उनके पीछे के ठोस तथ्यों के बिना, ये धारा 3 के तहत मौखिक या भावनात्मक क्रूरता नहीं बनाते हैं।”
- व्यावसायिक संबंधों पर स्पष्टीकरण:अदालत ने यह भी नोट किया कि याचिकाकर्ता और उसका ससुर एक फर्म में साझेदार (Partners) थे। कोर्ट ने कहा कि हालांकि व्यावसायिक विवाद सीधे DV एक्ट के दायरे से बाहर नहीं होते, लेकिन यह साबित करना आवश्यक है कि महिला को कानून के तहत संरक्षित किसी संसाधन या अधिकार से वंचित किया गया था।
नई दिल्ली: घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 (DV Act) के तहत ससुराल पक्ष के वृद्ध सदस्यों की विधिक जवाबदेही की सीमा, ‘घरेलू हिंसा’ की वैधानिक परिभाषा और वयस्क बच्चों के वैवाहिक आचरण के लिए माता-पिता के उत्तरदायित्व पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने अत्यंत महत्वपूर्ण विधिक सिद्धांत प्रतिपादित किया है।
विवाहिता द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज
न्यायमूर्ति मधु जैन की एकल पीठ ने एक विवाहिता द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता ने निचली अदालत के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसने घरेलू हिंसा की शिकायत में उसके ससुर के विरुद्ध कार्यवाही शुरू करने से इनकार कर दिया था। उच्च न्यायालय ने निचली अदालत के निष्कर्षों को पूर्णतः सही ठहराते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसी कोई तथ्यात्मक सामग्री मौजूद नहीं है जो ससुर को कथित घरेलू हिंसा से सीधे तौर पर जोड़ती हो।उच्च न्यायालय ने व्यवस्था दी है कि केवल अपने बालिग बेटे के वैवाहिक आचरण को नियंत्रित न कर पाने या उसके विवाहेतर संबंधों पर अंकुश न लगा पाने के आधार पर किसी ससुर को घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत घसीटा या उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘वयस्क बेटे के आचरण पर पिता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता’ याचिकाकर्ता बहू का मुख्य आरोप था कि उसके पति के किसी अन्य महिला के साथ संबंध थे और उसके ससुर ने अपने बेटे के खिलाफ कोई सुधारात्मक कदम नहीं उठाया और न ही उसे रोका। इस पर न्यायमूर्ति मधु जैन ने दो-टूक व्यवस्था दी: “केवल इसलिए कि एक पिता ने अपने वयस्क/बालिग बेटे (Adult Son) के आचरण को नियंत्रित नहीं किया, उसे घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत उत्तरदायी (Liable) नहीं बनाया जा सकता। अधिनियम के प्रावधान ऐसे आचरण पर लागू होते हैं जो शारीरिक या मानसिक नुकसान पहुंचाता है या नुकसान की धमकी देता है—जिसमें मौखिक, भावनात्मक और आर्थिक दुर्व्यवहार शामिल हैं। परंतु केवल एक साझा घरेलू संबंध (Domestic Relationship) का होना अपने आप में इस कानून के दंडात्मक व सुरक्षामूलक प्रावधानों को आकर्षित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।”
2. ‘अपमानित किया’ और ‘गाली दी’ जैसे शब्द महज निष्कर्ष हैं, ठोस तथ्य नहीं: अदालत ने याचिका में लगाए गए आरोपों के कानूनी स्तर की समीक्षा करते हुए कहा: “‘अपमानित किया’ (Insulted), ‘चिल्लाया’ (Shouted) और ‘गाली दी’ (Abused) जैसे शब्द महज निष्कर्ष (Conclusions) हैं। जब तक इनके पीछे के ठोस अंतर्निहित तथ्यों, विशिष्ट घटनाओं, समय और संदर्भ (Underlying Facts) को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत न किया जाए, तब तक ये शब्द घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 3 के तहत मौखिक या भावनात्मक दुर्व्यवहार (Verbal or Emotional Abuse) का कानूनी आधार नहीं बना सकते।”
3. साझेदारी फर्म और व्यावसायिक विवाद का दायरा:
- अदालत ने यह भी संज्ञान में लिया कि याचिकाकर्ता और उसके ससुर एक व्यावसायिक फर्म में साझेदार (Partners in a Firm) थे।
- पीठ ने स्पष्ट किया:
- यद्यपि कोई व्यावसायिक या वाणिज्यिक विवाद स्वतः घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 3 के दायरे से बाहर नहीं हो जाता।
- परंतु इसके लिए यह ठोस रूप से साबित किया जाना अनिवार्य है कि उस विवाद के कारण महिला को किसी ऐसे आर्थिक संसाधन (Economic Resource) से वंचित किया गया, जिसका संरक्षण कानून द्वारा प्रदान किया गया है। वर्तमान मामले में ऐसा कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि
- विवाद की उत्पत्ति:
- याचिकाकर्ता महिला का अपने पति से वैवाहिक विवाद चल रहा था। महिला का आरोप था कि उसके पति का किसी अन्य महिला के साथ अवैध संबंध था, जिसके कारण वैवाहिक जीवन में तनाव पैदा हुआ।
- ससुर के विरुद्ध आरोप:
- महिला ने घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के तहत शिकायत दर्ज कराई, जिसमें उसने पति के साथ-साथ अपने ससुर को भी पक्षकार बनाया।
- आरोप लगाया गया कि ससुर ने अपने बेटे को नियंत्रित नहीं किया और जब उसने विरोध किया, तो ससुर का आचरण “अपमान, उपहास, प्रताड़ना और धमकी” भरा रहा।
- निचली अदालत का रुख:
- ट्रायल कोर्ट (मजिस्ट्रेट अदालत) ने पाया कि ससुर के खिलाफ आरोप अत्यंत सामान्य, अस्पष्ट और निराधार हैं तथा वैवाहिक कलह में ससुर की कोई सीधी भूमिका नहीं पाई गई। अदालत ने ससुर के खिलाफ समन जारी करने या कार्यवाही आगे बढ़ाने से इनकार कर दिया।
- हाईकोर्ट में चुनौती:
- महिला ने इस आदेश के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर की, जिसे उच्च न्यायालय ने आधारहीन मानते हुए खारिज कर दिया।
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005?
- धारा 2(f) (घरेलू संबंध – Domestic Relationship):
- कानून उन व्यक्तियों के बीच लागू होता है जो एक ही साझे घर (Shared Household) में एक साथ रहे हों। परंतु केवल इस संबंध की उपस्थिति किसी व्यक्ति को स्वतः उत्तरदाता (Respondent) नहीं बनाती जब तक कि उसने घरेलू हिंसा का कोई विशिष्ट कृत्य न किया हो।
- धारा 3 (घरेलू हिंसा की परिभाषा):
- घरेलू हिंसा में शामिल हैं:
- शारीरिक दुर्व्यवहार (Physical Abuse)
- यौन दुर्व्यवहार (Sexual Abuse)
- मौखिक और भावनात्मक दुर्व्यवहार (Verbal and Emotional Abuse – जैसे अपमान, उपहास, गाली-गलौज)
- आर्थिक दुर्व्यवहार (Economic Abuse)
- घरेलू हिंसा में शामिल हैं:
- वैवाहिक विवादों में दूर के रिश्तेदारों और बुजुर्गों को घसीटने की प्रवृत्ति पर रोक:
- सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर यह दोहराया है कि वैवाहिक विवादों में पति के बुजुर्ग माता-पिता या अन्य रिश्तेदारों को बिना किसी विशिष्ट और ठोस आरोप के केवल दबाव बनाने के उद्देश्य से मुकदमों में नहीं घसीटा जाना चाहिए।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: बहू (याचिकाकर्ता) बनाम ससुर व अन्य [आपराधिक पुनरीक्षण याचिका – दिल्ली उच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति मधु जैन (एकल पीठ)
- निर्णय का समय: अगस्त/अक्टूबर 2026
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 (DV Act, 2005):
- धारा 2(a), 2(f) एवं 2(q) (व्यथित व्यक्ति, घरेलू संबंध और प्रत्यर्थी की परिभाषा)
- धारा 3 (घरेलू हिंसा की परिभाषा – मौखिक, भावनात्मक एवं आर्थिक दुर्व्यवहार की अनिवार्यता)
- धारा 12 (संरक्षण अधिकारी या मजिस्ट्रेट को आवेदन)
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 397/401 [समतुल्य: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 438/442] — उच्च न्यायालय का पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार
- घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 (DV Act, 2005):
- संबद्ध ऐतिहासिक न्यायिक नजीरें:
- गीता मेहरोत्रा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2012, सुप्रीम कोर्ट) — ‘वैवाहिक विवादों में सामान्य और व्यापक आरोपों के आधार पर पति के परिवार के सदस्यों को अनावश्यक रूप से मुकदमों में शामिल करना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।’
- कमलेश देवी बनाम जयपाल (2019, सुप्रीम कोर्ट) — ‘घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत राहत पाने के लिए यह साबित करना अनिवार्य है कि प्रत्यर्थी ने व्यथित व्यक्ति के विरुद्ध वास्तव में कोई घरेलू हिंसा कारित की हो; महज घरेलू संबंध होना पर्याप्त नहीं है।’
- अंतिम निर्णय: पुनरीक्षण याचिका पूरी तरह खारिज; ससुर के खिलाफ घरेलू हिंसा की कार्यवाही न चलाने का निचली अदालत का आदेश कानून सम्मत ठहराया गया।
DV Act: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) |
| पीठ | न्यायमूर्ति मधु जैन |
| मूल विवाद | बहु द्वारा ससुर के खिलाफ घरेलू हिंसा (DV Act) के तहत मामला दर्ज करने की याचिका। |
| मुख्य आरोप | ससुर ने दूसरी महिला के साथ पति के संबंधों पर रोक नहीं लगाई और अपमानित/गाली-गलौज की। |
| अदालत का फैसला | याचिका खारिज; केवल पारिवारिक संबंध होना या बेटे पर नियंत्रण न रख पाना घरेलू हिंसा नहीं है। |

