मुख्य विवाद और हाईकोर्ट का कड़ा रुख
- “अदालत की गरिमा से समझौता नहीं”:पीठ ने मामले की गंभीरता को रेखांकित करते हुए कहा:“यह बहुत दर्दनाक (Painful) है… इस अदालत का यह दायित्व है कि वह यह सुनिश्चित करे कि कोर्ट की गरिमा से किसी भी तरह का समझौता न हो। कार्यवाही की औचित्य पर सवाल उठाने वाले सुझावों से भी सावधानीपूर्वक निपटना होगा।”
- कथित झूठा हलफनामा (False Affidavit Issue):
- कोर्ट ने 3 अगस्त को फैसला सुनाया था और 31 अगस्त तक मुख्य सचिव को अनुपालन हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया था। जब हलफनामा दाखिल नहीं हुआ, तो याचिकाकर्ताओं ने अवमानना याचिकाएं दायर कीं।
- राज्य सरकार ने तर्क दिया कि उसने 1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की है। मुख्य सचिव ने हलफनामे में दावा किया कि SLP की कमियों (Defects) को दूर कर दिया गया है।
- हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री की रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि राज्य और PSPCL की अपीलें अभी भी त्रुटिपूर्ण (Defective) पड़ी थीं और दायर नहीं हुई थीं।
- बिना शर्त माफी की पेशकश बनाम याचिकाकर्ताओं का विरोध:
- राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने दलील दी कि मुख्य सचिव का झूठा बयान देने का कोई इरादा नहीं था और वे बिना शर्त माफी मांगने को तैयार हैं।
- वहीं, याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ वकिलों—संजय कौशल और चेतन मित्तल—ने इसका पुरजोर विरोध करते हुए कहा कि राज्य का आचरण स्पष्ट रूप से अवमाननापूर्ण (Contemptuous) है और अदालत की अवमानना का प्रयास किया गया है।
चंडीगढ़: पंजाब सरकार के कर्मचारियों एवं पेंशनभोगियों के महंगाई भत्ते (Dearness Allowance – DA) के बकाए के भुगतान संबंधी न्यायिक आदेशों की जानबूझकर की जा रही अनदेखी, सर्वोच्च न्यायालय में दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) के डिफेक्ट्स (दोष) दूर करने के संबंध में पंजाब के मुख्य सचिव (Chief Secretary) द्वारा दायर हलफनामे में किए गए दावों की विसंगतियों, तथा प्रथम दृष्टया आपराधिक अवमानना (Prima Facie Criminal Contempt) के मामले पर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कड़ा ऐतराज जताया है।
मुख्य न्यायाधीश अश्विनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की खंडपीठ ने शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2026 को यह निर्देश तब पारित किया, जब राज्य सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने अदालत को बताया कि सुप्रीम कोर्ट में डिफेक्ट्स हटाने के संबंध में झूठा बयान देने का मुख्य सचिव का कोई दुर्भावनापूर्ण इरादा नहीं था और यदि अदालत चाहे तो अधिकारी बिना शर्त माफी (Unconditional Apology) मांगने को तैयार हैं। हालांकि, पीठ ने स्पष्ट किया कि अदालत की गरिमा और प्रक्रिया की शुचिता सर्वोपरि है। अदालत ने राज्य के रवैये को “अत्यंत पीड़ादायक” (Very Painful) करार देते हुए पूरे मामले को अवमानना याचिकाओं की सुनवाई करने वाले रोस्टर न्यायाधीश के समक्ष भेजने का निर्देश दिया है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख न्यायिक निष्कर्ष एवं मौखिक टिप्पणियां
1. ‘न्यायालय की गरिमा के साथ किसी भी सूरत में समझौता नहीं’
मुख्य न्यायाधीश अश्विनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की खंडपीठ ने राज्य के आचरण पर क्षोभ व्यक्त करते हुए कहा:“यह बेहद पीड़ादायक (Very painful) है। इस न्यायालय का यह अनिवार्य दायित्व है कि वह यह सुनिश्चित करे कि अदालत की गरिमा (Majesty of the Court) के साथ किसी भी रूप में समझौता न हो। अदालती कार्यवाहियों के संचालन या औचित्य पर सवाल उठाने वाले किसी भी संकेत से अत्यंत सावधानीपूर्वक निपटा जाना आवश्यक है। ऐसी परिस्थितियों में, हम इस मामले को रोस्टर के अनुसार क्षेत्राधिकार रखने वाली उपयुक्त अवमानना अदालत (Contempt Bench as per Roster) के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश देना उचित समझते हैं।”
2. सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री की रिपोर्ट और मुख्य सचिव के हलफनामे में विरोधाभास:
- खंडपीठ ने रेखांकित किया कि मुख्य सचिव ने पूर्व में हाईकोर्ट में हलफनामा दायर कर दावा किया था कि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष दायर एसएलपी के सभी तकनीकी दोष (Defects) दूर कर दिए गए हैं।
- परंतु जब हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री से आधिकारिक रिपोर्ट प्राप्त की, तो खुलासा हुआ कि पंजाब सरकार और पंजाब स्टेट पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (PSPCL) द्वारा दायर अपीलें अभी भी दोषपूर्ण (Defective) बनी हुई थीं और उन्हें सुनवाई हेतु सूचीबद्ध नहीं कराया गया था।
- आवेदकों ने दलील दी कि यह अदालत को गुमराह करने और अवमानना की कार्यवाही को टालने का सुनियोजित प्रयास था।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियागत कालक्रम
| तिथि / चरण | न्यायिक कार्यवाही एवं घटनाक्रम |
| 3 अगस्त 2026 | एलपीए (LPA) का निस्तारण: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने लेटर्स पेटेंट अपील का निपटारा करते हुए कर्मचारियों को डीए बकाए के भुगतान का स्पष्ट आदेश दिया और मुख्य सचिव को 31 अगस्त तक अनुपालन हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। |
| 31 अगस्त 2026 | अनुपालन हलफनामे का अभाव: निर्धारित तिथि तक मुख्य सचिव द्वारा कोई अनुपालन हलफनामा पेश नहीं किया गया, जिसके चलते कर्मचारी संघों द्वारा अवमानना याचिकाएं (Contempt Petitions) दायर की गईं। |
| 1 सितंबर 2026 | सुप्रीम कोर्ट में SLP का हवाला: राज्य सरकार ने हाईकोर्ट को अवगत कराया कि उसने फैसले के खिलाफ 1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर कर दी है। हाईकोर्ट ने राज्य को अपनी अपील पर सुनवाई कराने का उचित अवसर देने के लिए मामले को बार-बार स्थगित किया। |
| अक्टूबर 2026 | डिफेक्ट्स का खुलासा: सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री से पता चला कि याचिकाएं अभी भी डिफेक्टिव हैं, जबकि राज्य ने पहले हलफनामा देकर दोष दूर होने की बात कही थी। |
| 9 अक्टूबर 2026 | रोस्टर बेंच को प्रेषण: चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली पीठ ने मामले को आपराधिक अवमानना के दृष्टिकोण से नियमित रोस्टर बेंच के समक्ष भेजा। |
अदालत में वकीलों की तीखी बहस
- राज्य सरकार का पक्ष (वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह):
- वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने दलील दी कि मुख्य सचिव की ओर से अदालत को झूठा बयान देने या गुमराह करने का कोई जानबूझकर इरादा नहीं था।
- उन्होंने कहा कि यदि अदालत को लगता है कि कोई प्रक्रियागत त्रुटि हुई है, तो मुख्य सचिव अदालत के समक्ष बिना शर्त माफी मांगने (Unconditional Apology) के लिए पूरी तरह तैयार हैं।
- कर्मचारियों/आवेदकों का कड़ा विरोध (वरिष्ठ अधिवक्ता संजय कौशल एवं चेतन मित्तल):
- आवेदकों की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता संजय कौशल और चेतन मित्तल (सहायक अधिवक्ता: गगनेश्वर वालिया और हरगुन सेठी) ने मामले को केवल अवमानना रोस्टर बेंच को भेजने के सुझाव का भी विरोध किया और पीठ से तुरंत कड़ी कार्रवाई की मांग की।
- उन्होंने दलील दी कि राज्य सरकार का आचरण शुरू से ही घोर अवमाननाकारी रहा है और उन्होंने जानबूझकर झूठे हलफनामे देकर अदालती कार्यवाही को कलंकित (Scandalise the court’s proceedings) करने का प्रयास किया है, ताकि न्यायिक आदेशों के अनुपालन से बचा जा सके।
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971):
- धारा 2(b) (सिविल अवमानना): किसी भी अदालत के निर्णय, डिक्री, दिशा-निर्देश, आदेश या अन्य प्रक्रिया की जानबूझकर अवज्ञा (Wilful Disobedience)।
- धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना): कोई भी ऐसा कृत्य या प्रकाशन जो अदालत के प्राधिकार को कमतर करता हो, न्याय प्रशासन में बाधा डालता हो या न्यायिक कार्यवाही को कलंकित (Scandalises or Tends to Scandalise) करता हो। अदालत के समक्ष झूठा हलफनामा दाखिल करना आपराधिक अवमानना का दायरा आकर्षित करता है।
- बिना शर्त माफी की विधिक सीमा (Proviso to Section 12):
- यद्यपि अवमानना अधिनियम की धारा 12 के तहत बिना शर्त माफी पर अदालत सजा माफ कर सकती है, परंतु सुप्रीम कोर्ट ने एम.वाई. शरीफ और प्रीतम पाल मामलों में दोहराया है कि माफी वास्तविक पश्चाताप (Real Contrition) से आनी चाहिए, न कि केवल कानूनी शिकंजे से बचने के लिए एक हथियार या ढाल के रूप में।
- संविधान का अनुच्छेद 215:
- उच्च न्यायालय एक अभिलेख न्यायालय (Court of Record) है और उसे अपनी अवमानना के लिए दंडित करने की अंतर्निहित संवैधानिक शक्ति प्राप्त है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: महंगाई भत्ता (DA) बकाया अनुपालन एवं अवमानना याचिकाएं [पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय]
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश अश्विनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: 9 अक्टूबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- पंजाब राज्य की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह
- आवेदकों / कर्मचारियों की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता संजय कौशल एवं चेतन मित्तल, साथ में अधिवक्ता गगनेश्वर वालिया एवं हरगुन सेठी
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 की धाराएं 2(b), 2(c), 11, 12 एवं 14
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 215 (अभिलेख न्यायालय की अवमानना शक्तियां)
- पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय नियम एवं ऑर्डर्स (रोस्टर क्षेत्राधिकार)
- वर्तमान स्थिति: खंडपीठ ने मुख्य सचिव के आचरण पर गंभीर असंतोष व्यक्त करते हुए अवमानना मामले को संबंधित रोस्टर पीठ के समक्ष त्वरित सुनवाई हेतु स्थानांतरित कर दिया।
Punjab News:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय (CJI अश्विनी कुमार मिश्रा व जस्टिस रोहित कपूर) |
| प्रतिवादी | पंजाब सरकार एवं पंजाब के मुख्य सचिव (वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह द्वारा प्रतिनिधित्व) |
| मूल विवाद | कर्मचारियों के महंगाई भत्ते (DA) के भुगतान आदेश का अनुपालन न करना और सुप्रीम कोर्ट SLP पर झूठा दावा |
| कोर्ट का रुख | “अदालत की गरिमा से समझौता नहीं किया जा सकता”; अवमानना मामला रोस्टर जज को भेजा गया। |

