1987 का ‘काटीजी’ फैसला और सुप्रीम कोर्ट की आपत्तियाँ
- ‘उदार दृष्टिकोण’ की अंतहीन मिसाल:1987 के Collector, Land Acquisition v. Katiji मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि तकनीकी आधारों के बजाय “व्यापक न्याय” (Substantial Justice) को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और देरी के प्रति उदार रवैया अपनाया जाना चाहिए।
- अदालत की तल्ख टिप्पणी:जस्टिस दत्ता की पीठ ने कहा:“1987 के फैसले के कारण हमारा देश पीछे चला गया है, जब केवल चार दिनों की देरी को माफ करने के लिए इस अदालत ने लगभग 15-16 पन्ने लिख दिए थे। और वह ‘कलेक्टर, लैंड एक्विजिशन बनाम काटीजी’ का फैसला है, जिसे अब इतने लंबे समय से इस्तेमाल किया जा रहा है जैसे कि यह देरी माफी की अर्जियों की सभी बीमारियों का इलाज हो।”
- सरकारी और निजी पक्षकारों के लिए समान कड़े नियम:अदालत ने स्पष्ट किया कि समय-सीमा (Limitation Period) का पालन सभी के लिए समान रूप से लागू होगा:“जब सेबी (SEBI) हमारे सामने समय-बाधित (Time-barred) अपीलों के साथ आएगा, तब भी हम उतने ही सख्त होंगे। हम किसी निजी वादी, सार्वजनिक वादी या सरकार के बीच कोई अंतर नहीं करेंगे… अब से, आपको समय पर आना होगा।”
कार्वी स्टॉक ब्रोकिंग (Karvy) मामला क्या था?
- सेबी की कार्रवाई (अप्रैल 2023): सेबी ने पाया कि कार्वी स्टॉक ब्रोकिंग ने अपने ग्राहकों की सिक्योरिटीज का दुरुपयोग करके ₹1,442.95 करोड़ रुपये की राशि अपनी समूह कंपनियों में डायवर्ट की। सेबी ने कार्वी पर ₹13 करोड़ और पार्थसारथी पर ₹8 करोड़ का जुर्माना लगाया, साथ ही 7 साल के लिए बाजार से प्रतिबंधित कर दिया था।
- SAT द्वारा अपील खारिज (सितंबर 2026): सिक्युरिटीज एपेलेट ट्रिब्यूनल (SAT) ने 9 सितंबर 2026 को अत्यधिक देरी के आधार पर कार्वी की अपील स्वीकार करने से मना कर दिया था।
- सुप्रीम कोर्ट का फैसला: सुप्रीम कोर्ट द्वारा देरी माफ करने से इनकार के बाद SAT का आदेश यथावत बना रहेगा और सेबी की पेनल्टी लागू रहेगी।
नई दिल्ली: मियाद अधिनियम (Limitation Act, 1963) की धारा 5 के अंतर्गत देरी को माफ करने (Condonation of Delay) के न्यायिक मानकों, न्यायपालिका द्वारा ऐतिहासिक रूप से दिखाई गई “अत्यधिक उदारता”, नियामक प्राधिकारियों एवं निजी वादकारियों के बीच समय-सीमा की समानता, तथा वर्ष 1987 के ऐतिहासिक कलेक्टर, लैंड एक्विजिशन बनाम कातीजी (Katiji) फैसले के दुरुपयोग पर सुप्रीम कोर्ट ने एक अत्यंत गंभीर और तीखी न्यायिक टिप्पणी की है।
भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) द्वारा लगाए गए भारी जुर्माने के खिलाफ अपील
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की खंडपीठ ने ‘कार्वी स्टॉक ब्रोकिंग लिमिटेड’ (Karvy Stock Broking) तथा उसके पूर्व अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक (CMD) सी. पार्थसारथी द्वारा दायर अपीलों को खारिज करते हुए यह अवलोकन किया। कार्वी और पार्थसारथी ने सिक्योरिटीज अपीलेट ट्रिब्यूनल (SAT) के 9 सितंबर 2026 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) द्वारा लगाए गए भारी जुर्माने के खिलाफ अपील दायर करने में हुई देरी को माफ करने से इनकार कर दिया गया था। सर्वोच्च न्यायालय ने एसएटी के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि अब समय-सीमा का कड़ाई से पालन अनिवार्य है। शीर्ष अदालत ने अफसोस जताते हुए कहा कि 1987 के उस फैसले ने देश को कानूनी रूप से पीछे धकेल दिया है, क्योंकि वादकारियों ने उसे हर प्रकार की देरी को उचित ठहराने की “रामबाण दवा” (Panacea for all ills) समझ लिया है।
शीर्ष अदालत के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘1987 के कातीजी फैसले ने देश को पीछे धकेला—4 दिन की देरी पर 16 पन्ने लिखे गए’
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने 1987 के फैसले के अनपेक्षित परिणामों का विश्लेषण करते हुए दो-टूक कहा:“हमारा देश 1987 के उस निर्णय के कारण पीछे धकेल दिया गया है, जब केवल चार दिनों की देरी को माफ करने के लिए इस अदालत ने लगभग 15-16 पृष्ठ लिख डाले थे। और वह निर्णय था ‘कलेक्टर, लैंड एक्विजिशन बनाम कातीजी’ (Collector, Land Acquisition v. Katiji), जिसका इस्तेमाल इतने लंबे समय से इस तरह किया जा रहा है मानो यह विलंब माफी के आवेदनों में हर मर्ज की रामबाण दवा (Panacea for all ills) हो।”
2. तकनीकी पहलुओं पर सारवान न्याय (Substantial Justice) के सिद्धांत का दुरुपयोग:
- 1987 के कातीजी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने व्यवस्था दी थी कि अदालतों को विलंब माफी में उदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए और “तकनीकी आधारों पर सारवान न्याय की अनदेखी नहीं होनी चाहिए”।
- वर्तमान पीठ ने रेखांकित किया कि इस सिद्धांत की आड़ में वादकारी वैधानिक अपीलीय समय-सीमाओं को पूरी तरह नजरअंदाज करने लगे और इसे अनिश्चितकाल तक देरी को माफ कराने का एक सामान्य अधिकार मान बैठे।
3. विवेकाधिकार के प्रयोग बनाम अपीलीय समीक्षा में अंतर (शिव राज सिंह केस):
- पीठ ने शिव राज सिंह (Sheo Raj Singh) सहित बाद के न्यायिक निर्णयों का हवाला देते हुए विधिक स्थिति स्पष्ट की:
- जब कोई अदालत स्वयं किसी मामले में देरी माफ करने के लिए अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करती है, तब अलग मानक लागू होते हैं।
- परंतु जब कोई अपीलीय अदालत (जैसे सुप्रीम कोर्ट) यह समीक्षा कर रही हो कि क्या किसी अधीनस्थ न्यायाधिकरण (जैसे SAT) ने देरी माफ न करके अपने विवेक का उचित प्रयोग किया है, तो अपीलीय अदालत तब तक हस्तक्षेप नहीं करती जब तक कि वह आदेश पूरी तरह विकृत (Perverse) न हो।
4. सेबी (SEBI) और सरकार को भी दो-टूक चेतावनी: ‘हम सबके साथ समान रूप से कठोर होंगे’
पीठ ने स्पष्ट किया कि समय-सीमा की यह सख्ती केवल निजी वादकारियों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि सरकारी संस्थाओं और विनियामकों पर भी समान रूप से लागू होगी:“जब सेबी (SEBI) भी हमारे समक्ष समय-बाधित (Time-barred) अपीलों के साथ आएगा, तो हम उसके प्रति भी उतने ही कठोर होंगे। हम किसी निजी वादकारी, सार्वजनिक वादकारी या सरकार के बीच कोई अंतर नहीं पहचानेंगे… अब से, आपको निर्धारित समय के भीतर ही आना होगा।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: कार्वी का ₹1,442 करोड़ का घोटाला
- सेबी का 28 अप्रैल 2023 का दंडात्मक आदेश:
- सेबी ने अपनी विस्तृत जांच में पाया था कि कार्वी स्टॉक ब्रोकिंग लिमिटेड ने अपने ग्राहकों (Clients) की प्रतिभूतियों (Securities) का अवैध और अनाधिकृत उपयोग कर बैंकों से फंड जुटाए।
- ब्रोकरेज फर्म ने लगभग ₹1,442.95 करोड़ की भारी राशि अपनी संबंधित समूह कंपनियों (Group Companies) में डायवर्ट कर दी थी।
- सेबी ने गंभीर कदाचार के लिए कार्वी पर ₹13 करोड़ और तत्कालीन सीएमडी सी. पार्थसारथी पर ₹8 करोड़ का भारी जुर्माना लगाया था।
- इसके अलावा, दोनों को सात वर्षों के लिए प्रतिभूति बाजार (Securities Market) में प्रवेश करने से प्रतिबंधित कर दिया गया था।
- एसएटी (SAT) का देरी माफ करने से इनकार (9 सितंबर 2026):
- कार्वी और पार्थसारथी ने सेबी के इस आदेश के खिलाफ प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण (SAT) में अपील दायर करने में भारी विलंब किया।
- 9 सितंबर 2026 को एसएटी ने उनके द्वारा बताए गए कारणों को अपर्याप्त मानते हुए देरी माफ करने से साफ इनकार कर दिया और अपीलें खारिज कर दीं।
- सुप्रीम कोर्ट में चुनौती:
- वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और बलबीर सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि मामले में भारी वित्तीय देनदारी और प्रतिबंध शामिल हैं, अतः कातीजी मामले के सिद्धांतों के तहत गुण-दोष पर सुनवाई के लिए देरी को माफ किया जाना चाहिए था।
- सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए एसएटी के आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा और सेबी के निष्कर्षों के गुण-दोष में प्रवेश किए बिना अपीलों को निरस्त कर दिया।
विधिक एवं विधायी विश्लेषण: क्या कहता है कानून?
- मियाद अधिनियम, 1963 (Limitation Act, 1963) की धारा 5:
- अपील या आवेदन निर्धारित अवधि बीत जाने के बाद केवल तभी स्वीकार किया जा सकता है जब अपीलार्थी अदालत को संतुष्ट करे कि उसके पास निर्धारित समय में अपील न करने का “पर्याप्त कारण” (Sufficient Cause) था।
- कानून की सुस्थापित स्थिति है कि “पर्याप्त कारण” का अर्थ प्रत्येक दिन की उचित और वास्तविक व्याख्या होना चाहिए; केवल लापरवाही या टालमटोल पर्याप्त कारण नहीं हो सकती।
- ‘कलेक्टर, लैंड एक्विजिशन बनाम कातीजी (1987) 2 SCC 107’ का विधिक संदर्भ:
- जस्टिस एम.पी. ठक्कर द्वारा लिखे गए इस ऐतिहासिक फैसले में अदालतों को निर्देश दिया गया था कि वे देरी माफ करने में अत्यधिक तकनीकी और संकीर्ण रुख न अपनाएं, क्योंकि कोई भी वादकारी जानबूझकर देरी से लाभ नहीं उठाता।
- परंतु पिछले चार दशकों में वाणिज्यिक और प्रतिभूति कानूनों में यह महसूस किया गया कि अनिश्चितकालीन देरी के कारण बाजार की स्थिरता और न्यायिक समयबद्धता गंभीर रूप से बाधित होती है।
- वाणिज्यिक व प्रतिभूति मामलों में समय-सीमा की कठोरता:
- सेबी बनाम सुनील कृष्णा कड़कड़े (सुप्रीम कोर्ट) और ओएनजीसी बनाम गुजरात एनर्जी (2017) में शीर्ष अदालत ने माना है कि विशेष आर्थिक कानूनों (SEBI Act, Commercial Courts Act, IBC) में निर्धारित वैधानिक समय-सीमा का कड़ाई से पालन होना चाहिए ताकि वित्तीय मामलों में निश्चितता (Finality) बनी रहे।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: कार्वी स्टॉक ब्रोकिंग लिमिटेड व अन्य बनाम भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) [सिविल अपील – सर्वोच्च न्यायालय]
- पीठ: न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू (खंडपीठ)
- निर्णय की तिथि: 9 अक्टूबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- अपीलार्थियों (कार्वी एवं पार्थसारथी) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी एवं बलबीर सिंह
- संबद्ध ऐतिहासिक निर्णय:
- कलेक्टर, लैंड एक्विजिशन, अनंतनाग बनाम कातीजी (1987, 2-जज पीठ, सुप्रीम कोर्ट) — ‘देरी की माफी में उदारवादी दृष्टिकोण का सिद्धांत।’
- शिव राज सिंह बनाम भारत संघ (2023, सुप्रीम कोर्ट) — ‘अपीलीय समीक्षा में विवेकाधिकार की सीमाएं।’
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक धाराएं:
- मियाद अधिनियम, 1963 (Limitation Act) की धारा 5 (पर्याप्त कारण के आधार पर विलंब माफी)
- भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (SEBI Act) की धारा 15T एवं 15Z (एसएटी और सुप्रीम कोर्ट में अपील)
- अंतिम परिणाम: कार्वी स्टॉक ब्रोकिंग की अपीलें पूर्णतः खारिज; एसएटी का देरी माफ न करने का आदेश बरकरार; सेबी द्वारा लगाए गए कुल ₹21 करोड़ के जुर्माने और 7 साल के बाजार प्रतिबंध प्रभावी बने रहेंगे।
Limitation Act: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | सर्वोच्च न्यायालय (जस्टिस दीपंकर दत्ता और जस्टिस शील नागू) |
| अपीलकर्ता | कार्वी स्टॉक ब्रोकिंग लिमिटेड एवं सी. पार्थसारथी (वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी द्वारा प्रतिनिधित्व) |
| प्रतिवादी | भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) |
| मूल विवाद | सेबी द्वारा लगाए गए ₹21 करोड़ के जुर्माने को देरी से SAT में चुनौती देना |
| सुप्रीम कोर्ट का फैसला | अपील खारिज; देरी माफ करने के लिए 1987 के ‘काटीजी’ फैसले के अंधाधुंध इस्तेमाल पर रोक का संदेश। |

