हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणियाँ
- अदालत को गुमराह करने पर नाराजगी:पीठ ने कहा कि प्रथम दृष्टया मुख्य सचिव द्वारा अदालत के समक्ष तथ्यों का जानबूझकर गलत बयान दिया गया है:“जब यह बयान दिया गया कि अपील फिर से दायर की गई है, तो अदालत को यह संदेश देना था कि कमियों को दूर कर लिया गया है… एक महीने बाद भी त्रुटिपूर्ण अपील फिर से दाखिल करना प्रथम दृष्टया यह दर्शाता है कि प्रयास केवल अदालत को गुमराह करने का था।”
- ‘बेंच-हंटिंग’ और राजनीतिक बयानों पर फटकार:पंजाब सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता बेंच-हंटिंग (Bench-hunting) कर रहे हैं और चुनाव नज़दीक होने के कारण अदालत का राजनीतिक इस्तेमाल किया जा रहा है। इस पर सीजेआई मिश्रा ने सख्त लहजे में कहा:“आप जो कह रहे हैं, उसके प्रति सचेत और सावधान रहें। हम पहले दिन से स्पष्ट हैं कि हम राजनीतिक पहलुओं में नहीं पड़ने वाले। यह देश कानून के शासन (Rule of Law) से चलता है और इस मामले में जो हो रहा है वह बेहद असामान्य और अवांछनीय है।”
चंडीगढ़: पंजाब सरकार के सेवारत कर्मचारियों और सेवानिवृत्त पेंशनरों के बकाया महंगाई भत्ते (DA) व महंगाई राहत (DR) भुगतान से जुड़े 3 अगस्त 2026 के ऐतिहासिक फैसले पर अमल न करने, सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) के नाम पर लगातार गुमराह करने, और रजिस्ट्री के डिफेक्ट्स (आपत्तियों) को लेकर अदालत के समक्ष गलत बयानबाजी करने के मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने ऐतिहासिक रूप से अत्यंत सख्त कदम उठाया है।
डिफेक्ट्स हटाकर एसएलपी दोबारा दाखिल कर दी गई
मुख्य न्यायाधीश अश्विनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री से प्राप्त आधिकारिक रिपोर्ट का अवलोकन करने के बाद पाया कि मुख्य सचिव ने सोमवार को अदालत में जो दावा किया था कि “डिफेक्ट्स हटाकर एसएलपी दोबारा दाखिल (Re-filed) कर दी गई है”, वह सरासर असत्य था। सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री की रिपोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि 1 सितंबर 2026 से लंबित एसएलपी में दर्जनों आपत्तियां जस की तस बनी हुई हैं और दोबारा की गई फाइलिंग भी खामियों से भरी हुई है। अदालत ने राज्य सरकार की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ताओं द्वारा ‘बेंच-हंटिंग’ (Bench-hunting) और ‘राजनीति से प्रेरित याचिका’ के लगाए गए आरोपों को भी सिरे से खारिज करते हुए सख्त चेतावनी दी। उच्च न्यायालय ने पंजाब के मुख्य सचिव के.ए.पी. सिन्हा (K.A.P. Sinha) को आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) का कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया है।
उच्च न्यायालय के प्रमुख विधिक निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘मुख्य सचिव द्वारा अदालत को जानबूझकर गुमराह किया गया—आपराधिक अवमानना का नोटिस’
मुख्य न्यायाधीश अश्विनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर की खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री की रिपोर्ट के आधार पर आदेश में दर्ज किया:
*”रिकॉर्ड पर रखी गई आधिकारिक सामग्री के आधार पर, हम प्रथम दृष्टया पाते हैं कि मुख्य सचिव द्वारा न्यायालय के समक्ष तथ्यों का जानबूझकर गलत बयान (Deliberate misstatement of fact) दिया गया है।
हम मुख्य सचिव को यह स्पष्टीकरण देने के लिए नोटिस जारी कर रहे हैं कि झूठे दावे करके इस न्यायालय को जानबूझकर गुमराह (Willfully misleading this Court) करने के लिए उनके विरुद्ध आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए।”*
2. डिफेक्टिव अपील को दोबारा दाखिल करना केवल समय काटने का हथकंडा:
- महाधिवक्ता (AG) मनिंदरजीत सिंह बेदी ने बचाव में कहा कि सरकार ने 1 अक्टूबर को एसएलपी दोबारा दाखिल कर दी थी और हो सकता है कि रजिस्ट्री ने बाद में कुछ नई आपत्तियां लगाई हों।
- अदालत ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए कहा:*”जब अदालत के समक्ष यह बयान दिया गया कि अपील ‘री-फाइल’ कर दी गई है, तो अदालत को यह संदेश देना अभिप्रेत था कि अपील में मौजूद सभी दोषों/खामियों (Defects) को ठीक कर दिया गया है। लगभग एक महीने का समय बीत जाने के बाद भी खामियों से भरी अपील को ही दोबारा दाखिल करना प्रथम दृष्टया यह साबित करता है कि इसका एकमात्र उद्देश्य अदालत के सामने तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना था। हम राज्य के इस आचरण को किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं कर सकते।”*
3. ‘देश कानून के शासन से चलता है, अदालत का इस्तेमाल कोई नहीं कर सकता’:
पंजाब सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह द्वारा यह कहे जाने पर कि “हम कानून के शासन (Rule of Law) वाले देश में रहते हैं”, पीठ ने करारा उत्तर दिया:
- मुख्य न्यायाधीश मिश्रा ने कहा:“इस न्यायालय को यह सुनिश्चित करना है कि यह संस्था कानून के शासन द्वारा ही संचालित हो। हम आपको बता दें कि इस विशेष मामले में हमारे सामने जो कुछ घटित हो रहा है, वह अत्यंत असामान्य और विचित्र (Unusual and strange) है; और हम इसका कतई समर्थन नहीं करते।”
- अदालत ने कहा कि एसएलपी फाइल करने में कुछ दिन या एक सप्ताह का समय लग सकता है, परंतु इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि आप अनिश्चित काल तक खामियों को सुधारने के नाम पर समय खींचते रहें।
सुनवाई का तीखा घटनाक्रम: ‘बेंच-हंटिंग’ के आरोप पर खंडपीठ की कड़ी आपत्ति
सुनवाई के दौरान पंजाब सरकार और उच्च न्यायालय के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली:
- पंजाब सरकार की आपत्ति (अधिकारिता का सवाल):
- वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने दलील दी कि खंडपीठ द्वारा 3 अगस्त को मूल अपील का निस्तारण (Disposal) कर दिया गया था। चूंकि आदेश के गैर-अनुपालन पर एकल पीठ के समक्ष पहले से ही एक अवमानना याचिका लंबित है, इसलिए खंडपीठ को इस निस्तारित अपील में विविध अर्जियों की सुनवाई करने का कोई क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) नहीं है।
- ‘बेंच-हंटिंग’ और राजनीतिक कोण का आरोप:
- विकास सिंह ने तीखा तर्क रखते हुए कहा कि याचिकाकर्ता ‘बेंच-हंटिंग’ (अपनी पसंद की बेंच चुनना) कर रहे हैं और यह अदालत राजनीतिक रूप से प्रेरित (Politically motivated) याचिकाकर्ताओं द्वारा इस्तेमाल की जा रही है, विशेषकर तब जब राज्य में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं।
- मुख्य न्यायाधीश की सख्त चेतावनी:
- मुख्य न्यायाधीश अश्विनी कुमार मिश्रा ने वरिष्ठ वकील को आगाह करते हुए कहा: “कृपया आप जो कह रहे हैं, उसके प्रति पूरी तरह सजग और सतर्क रहें (Please be conscious and careful about what you say)।”
- पीठ ने स्पष्ट किया: “हम पूरी तरह सचेत हैं कि हमें किसी भी राजनीतिक पहलू में नहीं पड़ना है। यह वह टिप्पणी है जो हमने पहले दिन ही कर दी थी।”
- आवेदकों का प्रत्युत्तर:
- याचिकाकर्ताओं/कर्मचारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता संजय कौशल ने पलटवार करते हुए कहा कि खंडपीठ इस मामले में अधिकार-शून्य (Functus Officio) नहीं हुई है, क्योंकि 3 अगस्त के आदेश में स्वयं मुख्य सचिव को अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) प्रस्तुत करने का सकारात्मक निर्देश दिया गया था। इसके अतिरिक्त, वर्तमान अर्जियां संविधान के अनुच्छेद 215 (उच्च न्यायालय की अपनी अवमानना के लिए दंडित करने की अंतर्निहित संवैधानिक शक्तियां) के तहत दायर की गई हैं।
तथ्यात्मक पृष्ठभूमि: क्या था 3 अगस्त का मूल निर्णय?
- केंद्रीय दरों पर डीए का भुगतान: 3 अगस्त 2026 के अपने फैसले में हाईकोर्ट ने पंजाब सरकार को आदेश दिया था कि वह राज्य के सभी कर्मचारियों और पेंशनरों को महंगाई भत्ते/महंगाई राहत की सभी बकाया किस्तों का भुगतान उसी दर पर करे जो राज्य में तैनात अखिल भारतीय सेवा (IAS/IPS/IFS) अधिकारियों को दी जा रही है।
- सरकारी फिजूलखर्ची व विज्ञापनों पर रोक: अदालत ने यह शर्त भी लगाई थी कि जब तक बुजुर्ग पेंशनरों और कर्मचारियों का बकाया चुकता नहीं होता, तब तक सरकार प्रिंट मीडिया, टीवी या सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े आत्म-प्रचार वाले विज्ञापनों जैसे किसी भी अनुत्पादक खर्च का सहारा नहीं लेगी।
- 31 अगस्त की समय-सीमा: मुख्य सचिव को 31 अगस्त तक अनुपालन हलफनामा देना था, जिसे सरकार ने नहीं दिया। इसके विपरीत, सरकार ने 1 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर करने की बात कही, लेकिन एक महीने से अधिक समय तक उस याचिका में लगी आपत्तियों (Defects) को ठीक नहीं कराया।
उच्च न्यायालय द्वारा जारी निर्देश
- आपराधिक अवमानना का कारण बताओ नोटिस: मुख्य सचिव के.ए.पी. सिन्हा को औपचारिक नोटिस जारी कर पूछा गया है कि अदालत में झूठे बयान देकर न्यायिक प्रक्रिया को भटकाने के लिए उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही क्यों न चलाई जाए।
- व्यक्तिगत उपस्थिति का सख्त आदेश: मुख्य सचिव को आगामी सुनवाई पर भी अदालत में व्यक्तिगत रूप से (Physically) उपस्थित रहने का निर्देश दिया गया है।
- मामले की अगली तिथि: वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह द्वारा व्यक्तिगत रूप से पेश होकर बहस करने के अनुरोध पर, खंडपीठ ने मामले की सुनवाई शुक्रवार के लिए मुकर्रर कर दी है।
विधिक विवरण
- केस संदर्भ: कर्मचारी संघ / पेंशनर्स बनाम पंजाब राज्य व अन्य [अनुच्छेद 215 सहपठित अवमानना विविध आवेदन – पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय]
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश अश्विनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति रोहित कपूर (खंडपीठ)
- आदेश की तिथि: 6 अक्टूबर 2026
- विधिक प्रतिनिधित्व:
- पंजाब सरकार की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह, महाधिवक्ता (AG) मनिंदरजीत सिंह बेदी
- आवेदकों (कर्मचारियों) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता संजय कौशल
- प्रशासनिक उपस्थिति: के.ए.पी. सिन्हा (मुख्य सचिव, पंजाब सरकार)
- प्रासंगिक संवैधानिक व वैधानिक प्रावधान:
- भारत का संविधान:
- अनुच्छेद 215 (उच्च न्यायालय का अभिलेख न्यायालय होना तथा अवमानना के लिए दंडित करने की अंतर्निहित शक्तियां)
- अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार — राज्य संवर्ग बनाम एआईएस अधिकारियों का डीए विवाद)
- अनुच्छेद 136 (सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल करने की प्रक्रियागत अनिवार्यताएं)
- न्यायालय अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971):
- धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना — अदालत के समक्ष मिथ्या साक्ष्य प्रस्तुत करना या न्याय प्रशासन के मार्ग में जानबूझकर बाधा उत्पन्न करना)
- धारा 12 (अवमानना हेतु दंड)
- भारत का संविधान:
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- न्यायिक प्रक्रिया से खिलवाड़ का निषेध — ‘अदालत के समक्ष झूठा हलफनामा दाखिल करना या अपीलीय उपचार के नाम पर फर्जी दावे करना न्याय प्रशासन के साथ गंभीर खिलवाड़ है; कार्यपालिका का कोई भी शीर्ष अधिकारी कानून से ऊपर नहीं है।’
- वर्तमान स्थिति: मुख्य सचिव को आपराधिक अवमानना का नोटिस जारी; शुक्रवार को व्यक्तिगत उपस्थिति के साथ अगली विस्तृत सुनवाई नियत।
Punjab Govt: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित न्यायालय | पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश अश्वनी कुमार मिश्रा एवं न्यायमूर्ति रोहित कपूर |
| अवमानना नोटिस प्राप्तकर्ता | के.पी. सिन्हा (मुख्य सचिव, पंजाब सरकार) |
| मूल मामला | पंजाब के सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को IAS/IPS/IFS अधिकारियों की तर्ज पर बकाया DA/DR का भुगतान करने का 3 अगस्त का आदेश। |
| विवाद का कारण | सुप्रीम कोर्ट में दायर SLP की कमियाँ (Defects) दूर करने को लेकर हाईकोर्ट में गलत बयानबाज़ी करना। |

