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मामले की पृष्ठभूमि और 2002 की निचली अदालत का फैसला
- शादी, उत्पीड़न और प्रताड़ना:पीड़िता का विवाह 9 मई 1997 को दिल्ली पुलिस के एएसआई तिलक राज से हुआ था। शादी के बाद से ही ससुराल वालों द्वारा मारुति कार और ₹50,000 नकद दहेज की मांग को लेकर उसे प्रताड़ित किया जा रहा था। 21 अक्टूबर 1998 को उस पर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी गई।
- एसडीएम (SDM) द्वारा दर्ज मृत्युपूर्व बयान:22 अक्टूबर 1998 को एसडीएम द्वारा प्रश्न-उत्तर के रूप में दर्ज बयान (PW-4/A) में पीड़िता ने अपने पति और सास-ससुर द्वारा आग लगाने की बात कही। 23 अक्टूबर को उसकी मृत्यु हो गई।
- निचली अदालत का 2002 का फैसला:कड़कड़डूमा कोर्ट (Karkardooma Courts) के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 11 जुलाई 2002 को तिलक राज, उसके पिता प्रेम सिंह (जिसकी अपील के दौरान मृत्यु हो गई) और माँ अनोखी देवी को धारा 302/201/498A/34 के तहत दोषी ठहराया था, जबकि ननद राज कुमारी को धारा 498A में सजा सुनाई थी।
हाईकोर्ट के मुख्य विधिक निष्कर्ष और सिद्धांत
1. अंगूठे की छाप कोरी (Blank) आने की वैज्ञानिक वजह (Degloving):
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के मूल रिकॉर्ड का सूक्ष्मता से निरीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि दोनों हाथों में 100% जलने और त्वचा छिलने (Degloving of skin) के कारण उंगलियों की लकीरें (Ridges) नष्ट हो गई थीं। इसलिए, एहतियातन लिया गया अंगूठे का निशान कोरा आया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एसडीएम से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि उन्हें त्वचा विशेषज्ञ जैसा ज्ञान हो।
2. 100% जली अवस्था में मानसिक क्षमता (Mental Capacity):
सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक नज़ीरों—State of M.P. v. Dal Singh (2013), Laxman v. State of Maharashtra (2002) और Govindappa v. State of Karnataka (2010) का हवाला देते हुए पीठ ने माना कि केवल बर्न का प्रतिशत अधिक होने से कोई व्यक्ति बयान देने में अयोग्य नहीं हो जाता। 21 अक्टूबर को अयोग्य घोषित होने के बाद डॉक्टरों द्वारा प्राथमिक उपचार से मरीज 22 अक्टूबर को मानसिक रूप से स्थिर अवस्था में आ गया था।
3. निष्पक्षता और बरी करने का आधार:
कोर्ट ने पाया कि पीड़िता ने अपने मृत्युपूर्व बयान में अपनी ननद (राज कुमारी) को उस दिन अनुपस्थित बताकर बख्श दिया था। यह साबित करता है कि बयान किसी के सिखाने-पढ़ाने (Tutored) पर नहीं दिया गया था। विशिष्ट आरोपों के अभाव में ननद राज कुमारी और सास को धारा 498A (क्रूरता) से बरी कर दिया गया।
नई दिल्ली: भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (IEA) की धारा 32(1) / भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA) की धारा 26 (मृत्युकालिक कथन / Dying Declaration की साक्ष्य ग्राह्यता एवं विश्वसनीयता), भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 302 (हत्या), धारा 498A (दहेज प्रताड़ना व क्रूरता), धारा 201 (अपराध के साक्ष्य को विलोपित करना), 100% झुलसी हुई (100% Burns) पीड़िता की सुसंगत मानसिक क्षमता (Fit State of Mind) और हाथों की त्वचा उतरने (Degloving of Skin) के कारण अंगूठे के निशान के ब्लैंक (खाली) रह जाने के विधिक प्रभाव, तथा 28 वर्षों से फरार उद्घोषित अपराधियों (Proclaimed Offenders) के संबंध में पुलिस आयुक्त की जवाबदेही पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण, नज़ीरी और विस्तृत फैसला सुनाया है।
दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति नवीन चावला (Justice Navin Chawla) और न्यायमूर्ति अरुण भारद्वाज (Justice Arun Bhardwaj) की खंडपीठ ने वर्ष 1998 के बहुचर्चित व नृशंस दुल्हन दहन मामले में दिल्ली पुलिस के सहायक उप-निरीक्षक (ASI) तिलक राज (Tilak Raj) की हत्या (धारा 302 IPC) और साक्ष्य नष्ट करने (धारा 201 IPC) की दोषसिद्धि को पूरी तरह बरकरार रखा है।
अदालत ने बचाव पक्ष के उस पारंपरिक तर्क को सिरे से खारिज कर दिया कि 100% जली हुई और हाथों की त्वचा उधड़ जाने वाली पीड़िता सुसंगत बयान देने या अंगूठे का निशान लगाने की स्थिति में नहीं हो सकती। खंडपीठ ने सुस्थापित नज़ीरों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि डॉक्टर का फिटनेस सर्टिफिकेट और अंगूठे का निशान केवल सतर्कता के नियम (Rules of Caution) हैं, किसी वैध मृत्युकालिक कथन की अनिवार्य कानूनी आवश्यकताएं (Legal Requirements) नहीं। इसके साथ ही अदालत ने 77 वर्षीय सास अनोखी देवी की हत्या की सजा को उसके द्वारा पहले से काटी गई लगभग 5 वर्ष 7 माह की सजा पर सीमित किया, ननद (विवाहित बहन) को क्रूरता के आरोप से बरी किया, और दिल्ली पुलिस आयुक्त को 28 वर्षों से फरार चल रहे दो उद्घोषित अपराधियों (सुदेश और हंस राज) को तुरंत गिरफ्तार कर मासिक प्रगति रिपोर्ट (Monthly Progress Reports) दाखिल करने का कड़ा निर्देश दिया।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं विधिक टिप्पणियां
1. ‘डॉक्टर का प्रमाण पत्र और अंगूठे का निशान केवल सावधानी के नियम हैं, कानूनी शर्तें नहीं’
न्यायमूर्ति नवीन चावला और न्यायमूर्ति अरुण भारद्वाज की खंडपीठ ने संविधान पीठ के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए अपने निर्णय में स्पष्ट विधिक सिद्धांत दर्ज किया:
“प्रासंगिक न्यायिक नज़ीरों को ध्यान में रखते हुए, न तो डॉक्टर का प्रमाण पत्र और न ही अंगूठे का निशान किसी वैध मृत्युकालिक कथन (Dying Declaration) के लिए कानूनी आवश्यकता है, बल्कि यह केवल सावधानी का एक नियम (Rule of Caution) मात्र है। प्रस्तुत मामले में, मृत्युकालिक कथन (PW 4/A) उप-विभागीय मजिस्ट्रेट (SDM) द्वारा दर्ज किया गया था और इसे डॉक्टर के चिकित्सकीय समर्थन (Medical Endorsement) का संबल प्राप्त था, जिससे सावधानी के इस नियम की पूरी तरह संतुष्टि होती है।”
2. ‘डीग्लोविंग’ (त्वचा उधड़ना) और अंगूठे के निशान का ब्लैंक होना:
- बचाव पक्ष ने दलील दी थी कि मृत्युकालिक कथन पर अंगूठे का निशान लगभग गायब/खाली है, जिससे साबित होता है कि बयान जाली है।
- हाईकोर्ट ने निचली अदालत का मूल भौतिक रिकॉर्ड मंगवाकर परीक्षण किया और दर्ज किया:“मृत्युकालिक कथन दर्ज करने वाले एसडीएम से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि उसके पास त्वचा रोग या बर्न विशेषज्ञ का चिकित्सीय ज्ञान हो। रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ नहीं है जिससे यह साबित हो कि एसडीएम को यह जानकारी दी गई थी कि हाथों की खाल उतरने (Degloving) के कारण पीड़िता के अंगूठे का निशान सार्थक नहीं आएगा।ऐसा प्रतीत होता है कि एसडीएम ने खाल उधड़ने की वास्तविकता को समझे बिना केवल एक एहतियाती उपाय के रूप में अंगूठे का निशान लिया। ट्रायल कोर्ट के भौतिक रिकॉर्ड से स्पष्ट है कि पीड़िता का अंगूठे का निशान लिया तो गया, किंतु उसमें कोई स्पष्ट रेखाएं या उभार (Curves or Ridges) नहीं उभरे और वह लगभग खाली (Blank) रह गया। यह तथ्य स्वयं स्पष्ट करता है कि अंगूठा लगाने का वास्तविक प्रयास किया गया था, किंतु डीग्लोविंग के कारण निशान खाली आया।”
3. 100% जलने के बावजूद मानसिक सचेतता और ‘रिससिटेशन’ (पुनर्जीवन) का चिकित्सीय विज्ञान:
- अदालत द्वारा बुलाए गए बर्न विशेषज्ञ डॉक्टर के साक्ष्य का विश्लेषण करते हुए पीठ ने माना कि घटना के दिन (21 अक्टूबर) शॉक और घबराहट के कारण पीड़िता मानसिक रूप से अचेत हो सकती थी, किंतु अस्पताल में तरल पदार्थ और दवाओं (Resuscitation) के बाद 22 अक्टूबर को वह होश में आ गई थी।
- शीर्ष अदालत की संविधान पीठ के फैसले लक्ष्मण बनाम महाराष्ट्र राज्य [(2002) 6 SCC 710], मध्य प्रदेश राज्य बनाम दल सिंह [(2013) 14 SCC 159] और गोविंदप्पा बनाम कर्नाटक राज्य [(2010) 6 SCC 533] का हवाला देते हुए पीठ ने तय किया कि:“केवल जलने का प्रतिशत (Burn Percentage) किसी मरीज की मानसिक सुसंगतता और बयान देने की क्षमता तय नहीं करता। यदि मजिस्ट्रेट संतुष्ट है कि पीड़िता सचेत अवस्था में बोल रही थी, तो 100% जली पीड़िता का बयान पूर्णतः विश्वसनीय और सजा का आधार बन सकता है।”
4. बयान का गैर-सिखाया हुआ (Non-tutored) स्वरूप:
- अदालत ने नोट किया कि पीड़िता ने अपने बयान में ननद राज कुमारी (जो घटना के समय वहां मौजूद नहीं थी) पर आग लगाने का कोई आरोप नहीं लगाया। यदि बयान सिखाया-पढ़ाया (Tutored) गया होता, तो परिवार के सभी सदस्यों को झूठा फंसाया जाता। ननद की गैर-मौजूदगी दर्ज करना बयान की सत्यनिष्ठा को प्रमाणित करता है।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (1997–2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| केस संदर्भ | राज कुमारी व अन्य बनाम राज्य (NCT ऑफ दिल्ली) [2026:DHC:9629-DB] |
| पीठासीन पीठ | न्यायमूर्ति नवीन चावला एवं न्यायमूर्ति अरुण भारद्वाज |
| मृतका एवं विवाह | पीड़िता का विवाह 9 मई 1997 को दिल्ली पुलिस के तत्कालीन एएसआई तिलक राज के साथ हुआ था। |
| घटना का विवरण (21 अक्टूबर 1998) | शादी के लगभग डेढ़ वर्ष बाद, पीड़िता को 100% जली हुई अवस्था में एलएनजेपी (LNJP) अस्पताल में भर्ती कराया गया। 23 अक्टूबर 1998 को उसने दम तोड़ दिया। थाना कल्याणपुरी में हत्या व दहेज हत्या की धाराओं में प्राथमिकी दर्ज हुई। |
| एसडीएम के समक्ष बयान (PW 4/A) | 22 अक्टूबर 1998 को कार्यपालक दंडाधिकारी (SDM) ने प्रश्नोत्तरी रूप में बयान दर्ज किया। पीड़िता ने बताया कि पति मारुति कार की मांग कर रहा था; वह दो बार पिता से ₹50,000 लाकर दे चुकी थी; घटना के दिन पति और ससुराल वालों की मौजूदगी में उस पर मिट्टी का तेल छिड़क कर आग के हवाले कर दिया गया। |
| धारा 201 IPC (साक्ष्य विलोपन) | पुलिस ने जब घटनास्थल का मुआयना किया तो पाया कि फर्श को धोकर साफ कर दिया गया था, किंतु वहां से मिट्टी के तेल की तीव्र गंध आ रही थी, जिससे साक्ष्य नष्ट करने का अपराध प्रमाणित हुआ। |
| ट्रायल कोर्ट का निर्णय (11.07.2002) | अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ASJ), कड़कड़डूमा कोर्ट ने पति तिलक राज, ससुर प्रेम सिंह और सास अनोखी देवी को धारा 302, 201 और 498A/34 IPC के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी; ननद राज कुमारी को धारा 498A में दोषी ठहराया गया था। |
| अपील के दौरान स्थिति | ससुर प्रेम सिंह की अपील के लंबित रहने के दौरान मृत्यु हो गई, जिससे उनके खिलाफ मामला समाप्त (Abated) हो गया। |
| हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय | 1. तिलक राज (ASI): हत्या (धारा 302) और साक्ष्य नष्ट करने (धारा 201) की दोषसिद्धि बरकरार; तीन कार्यदिवसों के भीतर आत्मसमर्पण का आदेश। 2. अनोखी देवी (सास): 77 वर्ष की आयु को देखते हुए हत्या की सजा भुगती गई अवधि (5 वर्ष, 7 माह, 1 दिन) पर सीमित; धारा 498A से बरी। 3. राज कुमारी (ननद): विशिष्ट आरोपों के अभाव में धारा 498A से पूर्णतः बरी। 4. दिल्ली पुलिस आयुक्त को निर्देश: 28 वर्षों से फरार घोषित अपराधियों (सुदेश और हंस राज) की गिरफ्तारी हेतु प्रत्येक माह प्रगति रिपोर्ट हाईकोर्ट में प्रस्तुत की जाए। |
विधिक एवं चिकित्सीय विश्लेषण: ‘मृत्युकालिक कथन और त्वचा उधड़ना (Degloving)’
- संविधान पीठ का ऐतिहासिक सिद्धांत (Laxman v. State of Maharashtra):
- सर्वोच्च न्यायालय की 5 जजों की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया था कि मृत्युकालिक कथन को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि उस पर डॉक्टर का औपचारिक प्रमाण पत्र नहीं था कि पीड़िता मानसिक रूप से स्वस्थ थी।
- वास्तविक कसौटी यह है कि क्या बयान दर्ज करने वाले न्यायिक/कार्यपालक मजिस्ट्रेट ने स्वयं यह संतुष्टि कर ली थी कि पीड़िता बोलने और समझने की सुसंगत स्थिति में थी। एसडीएम द्वारा दर्ज प्रश्न-उत्तर प्रारूप और डॉक्टर की मौखिक पुष्टि ने इस कसौटी को पूरी तरह संतुष्ट किया।
- ‘डीग्लोविंग’ (Degloving) का फॉरेंसिक यथार्थ:
- जब कोई व्यक्ति 100% जलता है, तो त्वचा की बाह्य परतें (Epidermis and Dermis) जलकर अलग हो जाती हैं। फॉरेंसिक भाषा में इसे ‘डीग्लोविंग’ कहा जाता है।
- ऐसी स्थिति में अंगूठे की लकीरें (Ridges and Loops) स्याही को ग्रहण नहीं कर पातीं। यदि ऐसे दस्तावेज पर एक बहुत स्पष्ट और सुंदर फिंगरप्रिंट आ जाता, तो वह वास्तव में जालसाजी का संदेह पैदा करता। निशान का लगभग खाली (ब्लैंक) आना यह सिद्ध करता है कि एसडीएम ने पीड़िता के झुलसे हुए हाथ से ही निशान लेने का वास्तविक प्रयास किया था।
- 28 वर्ष से फरार अपराधियों पर पुलिस आयुक्त की जवाबदेही:
- मामले में दो अन्य आरोपी—सुदेश और हंस राज—पिछले 28 वर्षों से फरार चल रहे थे और उन्हें भगोड़ा घोषित किया गया था।
- हाईकोर्ट ने पुलिस प्रशासन की इस घोर शिथिलता पर गंभीर नाराजगी जताते हुए सीधे दिल्ली पुलिस कमिश्नर को व्यक्तिगत रूप से निगरानी करने और मासिक रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश देकर कानून के शासन के प्रति न्यायिक प्रतिबद्धता को रेखांकित किया।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- न्यायालय: दिल्ली उच्च न्यायालय, नई दिल्ली (आपराधिक अपीलीय क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: राज कुमारी व अन्य बनाम राज्य (NCT ऑफ दिल्ली) [2026:DHC:9629-DB]
- पीठ: न्यायमूर्ति नवीन चावला एवं न्यायमूर्ति अरुण भारद्वाज (खंडपीठ)
- निर्णय की तिथि: नवंबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: अपील आंशिक रूप से निस्तारित; ASI तिलक राज की हत्या की सजा बरकरार (3 दिन में सरेंडर का आदेश); सास की सजा भुगती गई अवधि पर सीमित; ननद बरी; पुलिस कमिश्नर को भगोड़ों की गिरफ्तारी का निर्देश।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- अपीलकर्ताओं की ओर से: अधिवक्ता डी.बी. गोस्वामी (Advocate D.B. Goswami)।
- प्रतिवादी (दिल्ली राज्य) की ओर से: अतिरिक्त लोक अभियोजक (APP) अमन उस्मान (Aman Usman)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (IEA) — धारा 32(1) (मृत्युकालिक कथन की ग्राह्यता) / BSA 2023 की धारा 26
- भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC):
- धारा 302 — हत्या के लिए दंड (ASI तिलक राज की सजा पुष्ट)
- धारा 201 — अपराध के साक्ष्य को विलोपित करना
- धारा 498A — पति या उसके नातेदारों द्वारा क्रूरता (विशिष्ट साक्ष्य के अभाव में महिला आरोपी बरी)
- धारा 34 — सामान्य आशय
- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) — धारा 82 व 83 (उद्घोषित अपराधी की गिरफ्तारी व कुर्की)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- मृत्युकालिक कथन की वैधता का विधिक मानक: ‘डॉक्टर का फिटनेस प्रमाण पत्र और अंगूठे का निशान केवल सतर्कता के नियम (Rules of Caution) हैं, किसी मृत्युकालिक कथन की अनिवार्य कानूनी आवश्यकताएं नहीं; 100% जली हुई पीड़िता भी आपातकालीन चिकित्सकीय पुनर्जीवन (Resuscitation) के बाद सचेत व सुसंगत बयान दे सकती है; डीग्लोविंग के कारण अंगूठे के निशान की लकीरें न उभरना बयान को संदेहास्पद नहीं बनाता बल्कि घटना की प्रामाणिकता को पुष्ट करता है; कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज ऐसे निष्पक्ष मृत्युकालिक कथन के आधार पर अन्य स्वतंत्र साक्ष्यों के बिना भी हत्या की दोषसिद्धि कानूनी रूप से पूरी तरह वैध है।’
- वर्तमान स्थिति व विधिक प्रभाव: दिल्ली हाईकोर्ट के इस निर्णय के बाद दिल्ली पुलिस के दोषी एएसआई तिलक राज को 3 कार्यदिवसों के भीतर ट्रायल कोर्ट/जेल अधिकारियों के समक्ष आत्मसमर्पण करना होगा, अन्यथा पुलिस उसे तुरंत गिरफ्तार कर जेल भेजेगी; वहीं दिल्ली पुलिस कमिश्नर को 28 साल से फरार सुदेश और हंस राज की गिरफ्तारी की स्थिति रिपोर्ट हर महीने हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी।
Dying Declaration: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court), नई दिल्ली |
| पीठ | न्यायमूर्ति नवीन चावला एवं न्यायमूर्ति अरुण भारद्वाज |
| मामला/साइटेशन | राज कुमारी एवं अन्य बनाम राज्य (NCT ऑफ दिल्ली) [2026:DHC:9629-DB] |
| याचिकाकर्ता पक्ष (आरोपी) | तिलक राज (ASI, दिल्ली पुलिस), अनोखी देवी (माँ) और राज कुमारी (विवाहित बहन) | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता डी.बी. गोस्वामी |
| प्रतिवादी पक्ष | राज्य (NCT of Delhi) | प्रतिनिधित्व: अमन उस्मान (अतिरिक्त लोक अभियोजक) |
| मूल अपराध/घटना | 21 अक्टूबर 1998 को कल्याणपुरी थाना क्षेत्र में दहेज (मारुति कार व ₹50,000) की मांग को लेकर पत्नी पर मिट्टी का तेल छिड़ककर आग लगाई गई; 23 अक्टूबर 1998 को 100% जलने से LNJP अस्पताल में मृत्यु। |
| हाईकोर्ट का अंतिम निर्णय | 1. ASI पति (तिलक राज): धारा 302 (हत्या), 201 (साक्ष्य नष्ट करना) व 498A (क्रूरता) के तहत आजीवन कारावास की सजा बरकरार; 3 दिन में सरेंडर के निर्देश। 2. सास (अनोखी देवी): धारा 302 के तहत सजा बरकरार, परंतु 77 वर्ष की आयु के कारण 5 वर्ष 7 महीने की काटी गई सजा को पर्याप्त माना; धारा 498A से बरी। 3. ननद (राज कुमारी): धारा 498A की दोषसिद्धि निरस्त कर पूरी तरह बरी। 4. पुलिस आयुक्त को निर्देश: 28 साल से फरार आरोपियों (सुदेश और हंस राज) को गिरफ्तार कर मासिक रिपोर्ट पेश करने का आदेश। |

