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मामले की पृष्ठभूमि: कैसे शुरू हुआ विवाद?
- जस्टिस अजय भनोट की कोर्ट का घटनाक्रम:विवाद तब शुरू हुआ जब न्यायमूर्ति अजय भनोट की अदालत में सुनवाई के दौरान एक पुलिस अधीक्षक (SP) वकीलों के लिए आरक्षित सीट पर बैठ गए। जब एक वकील ने एसपी से पीछे हटने को कहा, तो जज ने वकील से एसपी से माफी मंगवाई। बार एसोसिएशन का आरोप है कि जज ने वकील को जेल भेजने की धमकी दी, वरिष्ठ वकीलों का उपहास उड़ाया और पुलिस अधिकारियों के लिए कोर्ट में अलग कुर्सी लगवाई।
- तोड़-फोड़ और अदालती कार्यवाही में बाधा:बार एसोसिएशन द्वारा बहिष्कार की चेतावनी के बाद बुधवार को कुछ उपद्रवी वकीलों ने न्यायमूर्ति अजय भनोट के कोर्ट रूम में तोड़-फोड़ की और पास में स्थित न्यायमूर्ति देशवाल की कोर्ट के बाहर नारेबाजी की। न्यायमूर्ति देशवाल ने सीसीसीटीवी (CCTV) फुटेज देखकर नारेबाजी करने वाले वकीलों पर अवमानना (Contempt of Court) की कार्यवाही का आदेश दिया है।
- महिला वकील के साथ बदसलूकी और कार्य स्थगन:शुक्रवार को विरोध कर रहे वकीलों ने अन्य अधिवक्ताओं और सरकारी वकीलों को भी कोर्ट रूम में जाने से जबरन रोक दिया। सुनवाई के दौरान एक महिला वकील की रोने की आवाज आई जिसे जबरन रोका जा रहा था। कोर्ट ने इसे दुखद और बार की गरिमा के खिलाफ बताया।
हाईकोर्ट के मुख्य निष्कर्ष और संवैधानिक/सामाजिक संदेश
1. “यदि हाईकोर्ट पर भरोसा घटेगा तो माफिया वकीलों को परेशान करेंगे”:
अदालत ने चेताया कि समाज में वकीलों का सम्मान केवल इसलिए है क्योंकि जनता का हाईकोर्ट पर विश्वास है। “यह न केवल न्यायाधीशों का बल्कि वकीलों का भी कर्तव्य है कि वे उच्च न्यायालय की गरिमा बनाए रखें ताकि जनता का विश्वास बना रहे। यदि उच्च न्यायालय पर जनता का विश्वास समाप्त होता है, तो माफिया और कुछ उपद्रवी सार्वजनिक अधिकारी वकीलों को परेशान करना शुरू कर देंगे, जैसा कि हाल ही में कुछ जिलों में हुआ है।”
2. न्यायिक कार्यवाही ठप करने की अनुमति नहीं:
पीठ ने माना कि केवल इसलिए अदालती कार्यवाहियों को ठप करने की अनुमति नहीं दी जा सकती क्योंकि वकीलों का एक धड़ा काम नहीं करना चाहता, जबकि अधिकांश वकील बहस करने के इच्छुक हैं।
प्रयागराज: भारत का संविधान के अनुच्छेद 215 (अभिलेख न्यायालय के रूप में अवमानना हेतु दंडित करने की उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति), न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) की धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना—अदालती कार्यवाही में बाधा और न्यायिक परिसर में उपद्रव), अधिवक्ता अधिनियम, 1961 के तहत वकीलों के पेशेवर आचरण एवं नैतिक मानक (Bar Council of India Professional Ethics Rules), न्यायिक स्वतंत्रता बनाम हड़ताल का अधिकार, तथा सोशल मीडिया पर उच्च न्यायालय की कार्यप्रणाली को लेकर प्रसारित की जा रही भ्रामक और तोड़-मरोड़ कर पेश की गई सूचनाओं के विधिक व संस्थागत प्रभावों पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत गंभीर, स्पष्ट और आत्ममंथनकारी आदेश पारित किया है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल (Justice Arun Kumar Singh Deshwal) की एकल पीठ ने जमानत याचिका (Rajesh v State of UP) की सुनवाई के दौरान वकीलों द्वारा अदालती कामकाज ठप करने, साथी वकीलों को जबरन कोर्ट में घुसने से रोकने और सोशल मीडिया पर भड़काऊ पोस्ट डालने की प्रवृत्ति पर गहरी चिंता व्यक्त की।
पीठ ने युवा अधिवक्ताओं को नसीहत दी कि वे सोशल मीडिया पर ‘लाइक्स’ (Likes) बढ़ाने की अंधी दौड़ में पड़ने के बजाय अपनी पढ़ाई और मुकदमों की तैयारी पर ध्यान केंद्रित कर अपने भविष्य और करियर का निर्माण करें। अदालत ने रेखांकित किया कि अधूरी और तोड़-मरोड़ कर पेश की गई डिजिटल सूचनाएं बार और बेंच के बीच अनावश्यक कड़वाहट पैदा करती हैं। अदालत ने कड़े शब्दों में चेतावनी दी कि यदि न्यायपालिका पर से आम जनता का विश्वास उठ गया, तो माफिया और अनियंत्रित प्रशासनिक अधिकारी सबसे पहले वकीलों का ही उत्पीड़न शुरू करेंगे।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘सोशल मीडिया पर लाइक्स बढ़ाने के बजाय मुकदमों की तैयारी पर ध्यान दें युवा वकील’
न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने सोशल मीडिया पर वकीलों द्वारा न्यायपालिका के विरुद्ध चलाए जा रहे अभियानों पर प्रहार करते हुए अपने आदेश में दर्ज किया: “युवा अधिवक्ताओं को सोशल मीडिया पर अपने ‘लाइक्स’ (Likes) बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय अपने करियर के निर्माण के लिए अपने अध्ययन और मुकदमों की तैयारी पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। युवा वकील इस उच्च न्यायालय का भविष्य हैं। इस अदालत के अधिकांश न्यायाधीश और वरिष्ठ अधिवक्ता युवा वकीलों के भविष्य के लिए एक अनुकूल वातावरण बनाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं—क्योंकि भविष्य में यही युवा अधिवक्ता इस अदालत के वरिष्ठ वकील और न्यायाधीश बनेंगे। सोशल मीडिया पर अधूरी और तोड़-मरोड़ कर पेश की गई सूचनाएं बार और बेंच के बीच अनावश्यक मतभेद और दूरियां पैदा करती हैं।”
2. ‘जनता का विश्वास टूटा तो माफिया और अनियंत्रित अधिकारी वकीलों को सताएंगे’:
- खंडपीठ ने वकीलों को न्यायपालिका की संस्थागत गरिमा की रक्षा करने का उनका बुनियादी कर्तव्य याद दिलाते हुए कहा:“उच्च न्यायालय के अधिवक्ताओं को समाज में सम्मान केवल इसलिए मिलता है क्योंकि आम जनता का उच्च न्यायालय पर अटूट विश्वास है।इस न्यायालय का यह दृढ़ मत है कि उच्च न्यायालय की गरिमा को बनाए रखना केवल न्यायाधीशों का ही नहीं, बल्कि अधिवक्ताओं का भी समान कर्तव्य है ताकि जनता का भरोसा कायम रहे। यदि उच्च न्यायालय पर से जनता का विश्वास क्षीण हो गया, तो माफिया और कुछ अनियंत्रित लोक अधिकारी वकीलों को ही प्रताड़ित करना शुरू कर देंगे—जैसा कि हाल ही में कुछ जिलों में हुआ और जिसे समाचार पत्रों में भी प्रमुखता से उजागर किया गया था।”
3. महिला वकील का उत्पीड़न और सरकारी वकीलों को रोकने की तीखी निंदा:
- सुनवाई के दौरान अदालत ने दर्ज किया कि कुछ उपद्रवी वकीलों ने कोर्ट रूम के बाहर पहरा देकर अन्य साथी वकीलों को बहस करने से जबरन रोका:“एक जमानत अर्जी की सुनवाई के दौरान अदालत को एक महिला वकील की रोने की आवाजें सुनाई दीं, जो अपने मुवक्किल के मुकदमे की पैरवी के लिए कोर्ट रूम में प्रवेश करना चाहती थीं। उन्हें प्रताड़ित किया गया और जबरन कोर्ट में आने से रोका गया।यहाँ तक कि सरकारी अधिवक्ता को भी कुछ वकीलों द्वारा जबरन अदालत कक्ष में बैठने से रोक दिया गया। कुछ अधिवक्ताओं का ऐसा आचरण बार और न्यायालय दोनों की प्रतिष्ठा और गरिमा के कतई अनुकूल नहीं है। अधिवक्ताओं की गरिमा में केवल निजी वकीलों की ही नहीं, बल्कि सरकारी वकीलों की गरिमा भी पूरी तरह शामिल है।”
4. ‘बहुमत वकालत करना चाहता है, चंद वकीलों के कारण कार्यवाही ठप नहीं हो सकती’:
- अदालत ने दो-टूक कहा कि केवल इसलिए न्यायिक कार्य को बाधित नहीं होने दिया जा सकता क्योंकि वकीलों का एक छोटा सा वर्ग अदालत को चलने नहीं देना चाहता, जबकि अधिकांश अधिवक्ता अपने मामलों पर बहस करने के लिए उत्सुक हैं।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (अक्टूबर 2026)
| चरण / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल (Justice Arun Kumar Singh Deshwal) |
| विवाद का तात्कालिक कारण | इसी सप्ताह न्यायमूर्ति अजय भनोट (Justice Ajay Bhanot) के कोर्ट रूम में एक अप्रिय घटना घटी। कोर्ट रूम में पुलिस अधीक्षकों (SP) व उच्चाधिकारियों के बैठने के लिए वकीलों की आरक्षित कुर्सियों के पास अलग व्यवस्था की गई थी। एक वकील ने पुलिस अधिकारी के आगे बैठने पर आपत्ति जताई और उन्हें पीछे हटने को कहा। आरोप है कि जस्टिस भनोट ने वकील पर नाराजगी जताते हुए उन्हें संबंधित पुलिस अधिकारी से माफी मांगने को कहा। |
| हाईकोर्ट बार एसोसिएशन का रुख | बार एसोसिएशन ने मंगलवार को प्रेस बयान जारी कर आरोप लगाया कि जज ने वकील को जेल भेजने की धमकी दी और एक अन्य वरिष्ठ वकील का उपहास उड़ाया। बार ने चेतावनी दी कि यदि कार्रवाई नहीं हुई तो वे कोर्ट का बहिष्कार करेंगे। |
| बुधवार की हिंसक घटनाएं | यद्यपि बार ने अदालत के बहिष्कार का कोई आधिकारिक प्रस्ताव पारित नहीं किया था, किंतु वकीलों के एक समूह ने उग्र रूप धारण करते हुए न्यायमूर्ति अजय भनोट के कोर्ट रूम में तोड़फोड़ (Vandalised the courtroom) की और नारेबाजी की। |
| जस्टिस देशवाल की अदालत पर प्रभाव | चूंकि जस्टिस देशवाल का कोर्ट रूम पास में ही स्थित है, इसलिए बुधवार से ही भारी हंगामे और नारेबाजी के कारण उनकी पीठ मुकदमों की सुनवाई नहीं कर पा रही थी। |
| CCTV फुटेज और अवमानना कार्रवाई | जस्टिस देशवाल ने बुधवार को ही रजिस्ट्रार (प्रोटोकॉल) को निर्देश दिया था कि वे कोर्ट रूम के बाहर के सीसीटीवी फुटेज खंगालें और नारेबाजी व उपद्रव करने वाले वकीलों की पहचान करें, ताकि उनके विरुद्ध बार काउंसिल में अनुशासनात्मक कार्यवाही और हाईकोर्ट में आपराधिक अवमानना (Contempt of Court) की कार्यवाही शुरू की जा सके। |
| शुक्रवार का घटनाक्रम | कुछ वकीलों ने अन्य वकीलों और सरकारी वकीलों को जबरन रोक दिया; एक महिला वकील को कोर्ट रूम में प्रवेश करने पर प्रताड़ित किया गया। पीठ ने कई मामलों को स्थगित करते हुए यह विस्तृत आदेश पारित किया। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘न्यायालय की शुचिता, वकीलों की हड़ताल और अवमानना’
- ‘एक्स-कैप्टन हरीश उप्पल बनाम भारत संघ’ [(2003) 2 SCC 45] की नज़ीर:
- सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने स्पष्ट और निर्विवाद रूप से यह कानून तय किया है कि वकीलों के पास अदालतों का बहिष्कार करने या हड़ताल पर जाने का कोई मौलिक या कानूनी अधिकार नहीं है।
- वादकारियों (मुवक्किलों) ने अपनी स्वतंत्रता और संपत्ति की रक्षा के लिए वकीलों को फीस देकर वकालतनामा सौंपा होता है। वकीलों द्वारा अदालतों को जबरन बंद करवाना और दूसरे वकीलों को अपनी बात रखने से रोकना न केवल अनुबंध का उल्लंघन है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत नागरिकों के ‘न्याय पाने के मौलिक अधिकार’ पर सीधा आघात है।
- न्यायालय कक्ष में तोड़फोड़ और आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt):
- न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c) के अनुसार, कोई भी ऐसा कृत्य जो न्याय प्रशासन में बाधा उत्पन्न करता है या न्यायिक प्रक्रिया को कलंकित करता है, ‘आपराधिक अवमानना’ है।
- एक जज के कोर्ट रूम में घुसकर तोड़फोड़ करना और साथी वकीलों व महिला अधिवक्ताओं को शारीरिक बल से रोकना कानून के शासन (Rule of Law) को खुली चुनौती देना है। सीसीटीवी फुटेज से पहचान कर कार्रवाई करने का आदेश यह दर्शाता है कि न्यायालय ऐसी अराजकता को मूकदर्शक बनकर बर्दाश्त नहीं करेगा।
- सोशल मीडिया पर सस्ती लोकप्रियता बनाम व्यावसायिक मर्यादा:
- वर्तमान डिजिटल युग में कई वकील यूट्यूब, इंस्टाग्राम और एक्स पर रील्स और पोस्ट्स बनाकर खुद को ‘बार का मसीहा’ दिखाने की होड़ में लग जाते हैं।
- कोर्ट रूम की संवेदनशील बहसों को संदर्भ से बाहर काटकर परोसना और जजों पर दुर्भावनापूर्ण टिप्पणियां करना युवा वकीलों के विधिक भविष्य को बर्बाद करता है। पीठ का यह मार्गदर्शन अत्यंत सामयिक है कि वकीलों की असली ताकत उनके विधिक तर्क, अध्ययन और केस की तैयारी में है, न कि सोशल मीडिया एल्गोरिदम के ‘लाइक्स’ और ‘शेयर्स’ में।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रयागराज (एकल पीठ – आपराधिक क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: राजेश बनाम उत्तर प्रदेश राज्य [Bail Application – Criminal Misc.]
- पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल
- आदेश की तिथि: 30 अक्टूबर 2026 (शुक्रवार)
- कार्यवाही का परिणाम: कई मामलों को उपद्रव के कारण स्थगित किया गया; बार एसोसिएशन से गरिमा बहाली की अपील; सीसीटीवी फुटेज से उपद्रवियों की पहचान और दंडात्मक कार्रवाई के निर्देश जारी।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारत का संविधान — अनुच्छेद 215 (उच्च न्यायालय की अवमानना शक्तियां) एवं अनुच्छेद 21 (त्वरित न्याय का अधिकार)
- न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 (Contempt of Courts Act, 1971) — धारा 2(c) (आपराधिक अवमानना—अदालती कार्यवाही में बाधा व हिंसा)
- अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (Advocates Act, 1961) — धारा 35 (व्यावसायिक कदाचार हेतु अनुशासनात्मक कार्रवाई)
- बार काउंसिल ऑफ इंडिया नियम (भाग VI – अध्याय II) — अदालत, साथी वकीलों और विरोधियों के प्रति अधिवक्ता के कर्तव्य
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- अदालती गरिमा और युवा अधिवक्ताओं के आचरण का विधिक मानक: ‘अधिवक्ता समाज में केवल इसलिए सम्मान पाते हैं क्योंकि न्यायपालिका की साख अक्षुण्ण है; यदि संस्थागत मर्यादा नष्ट होती है तो सबसे अधिक नुकसान वकीलों का ही होगा; युवा वकीलों को सोशल मीडिया पर प्रचार पाने के बजाय अपने केस की तैयारी और विधि के अध्ययन पर ध्यान देना चाहिए; चंद वकीलों द्वारा अदालती कामकाज में बलपूर्वक बाधा डालना, कोर्ट रूम में तोड़फोड़ करना या महिला व सरकारी वकीलों को प्रवेश से रोकना आपराधिक अवमानना और पेशेवर कदाचार है जिसके विरुद्ध कठोरतम कानूनी कार्रवाई न्यायोचित है।’
- वर्तमान स्थिति व संस्थागत प्रभाव: इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद रजिस्ट्रार (प्रोटोकॉल) द्वारा सीसीटीवी फुटेज के आधार पर उपद्रवी वकीलों को चिह्नित करने की प्रक्रिया तेज कर दी गई है; साथ ही हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के पदाधिकारियों से बेंच और बार के बीच संवाद स्थापित कर अदालत कक्षों की गरिमा और सुरक्षा तत्काल बहाल करने का औपचारिक आग्रह किया गया है।
Justice Ajay Bhanot:मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court), प्रयागराज |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल (Justice Arun Kumar Singh Deshwal) |
| मामला/साइटेशन | राजेश बनाम यूपी राज्य (Rajesh v State of UP) |
| विवाद की पृष्ठभूमि | न्यायमूर्ति अजय भनोट की कोर्ट में पुलिस अधीक्षक (SP) को वकीलों की कुर्सी से हटाने पर वकील से कथित दुर्व्यवहार/माफी मंगवाने के बाद वकीलों का हंगामा, कोर्ट रूम में तोड़ा-फोड़ी व कामकाज ठप करना। |
| अदालत की मुख्य टिप्पणियां | 1. लाइक्स के बजाय करियर पर ध्यान दें: वकीलों को सोशल मीडिया पर भ्रामक व अधूरी जानकारी डालकर लाइक्स बटोरने के बजाय पढ़ाई पर ध्यान देना चाहिए। 2. जनता का विश्वास बनाए रखें: यदि हाईकोर्ट पर जनता का भरोसा कम हुआ तो माफिया और उपद्रवी अधिकारी वकीलों को परेशान करने लगेंगे। 3. वकीलों को रोकने पर फटकार: महिला अधिवक्ताओं और सरकारी वकीलों को जबरन कोर्ट में प्रवेश करने से रोकने को शर्मनाक व अमर्यादित बताया। |

