Monday, November 2, 2026
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Rajesh Khanna: राजेश खन्ना के साथ रिश्ते को विवाह की कानूनी मान्यता देने की मांग विलासितापूर्ण मुकदमेबाजी है; अनिता आडवाणी की SLP खारिज की

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मामले की पृष्ठभूमि और अदालती घटनाक्रम

  1. आशीर्वाद बंगले से बेदखली का विवाद:अनीता आडवाणी ने दावा किया था कि वह जुलाई 2012 में राजेश खन्ना के निधन से पहले कई वर्षों तक उनके मुंबई स्थित प्रसिद्ध बंगले ‘आशीर्वाद’ (Aashirwad) में उनके साथ लिव-इन रिलेशनशिप में रही थीं। उन्होंने आरोप लगाया कि राजेश खन्ना के निधन के बाद उनकी पत्नी डिंपल कपाड़िया, बेटी ट्विंकल खन्ना और दामाद अक्षय कुमार ने उन्हें बंगले से बेदखल कर दिया था।
  2. घरेलू हिंसा कानून (DV Act) के तहत शिकायत और हाईकोर्ट का फैसला (2015):वर्ष 2013 में आडवाणी ने डिंपल कपाड़िया और उनके परिवार के खिलाफ घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 के तहत शिकायत दर्ज कराकर मासिक रखरखाव और बांद्रा में 3-BHK फ्लैट की मांग की थी। वर्ष 2015 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस शिकायत को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि राजेश खन्ना के साथ उनका रिश्ता विवाह जैसा नहीं था और वह कभी खन्ना परिवार के अन्य सदस्यों के साथ एक ही घर में नहीं रही थीं।
  3. सिविल सूट और सुप्रीम कोर्ट का फैसला:मुंबई की सत्र अदालत द्वारा 2017 में सिविल मुकदमा खारिज किए जाने के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने 1 अप्रैल को दिए अपने आदेश में इस फैसले को बरकरार रखा था। सुप्रीम कोर्ट में आडवाणी के वकील ने तर्क दिया कि यह याचिका ‘गरिमा के अधिकार’ (Right to Dignity) से जुड़ी है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि याचिका में कोई विधिक आधार नहीं है और मामले को खारिज कर दिया।

नई दिल्ली: सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) की धारा 9 सहपठित विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 (Specific Relief Act, 1963) की धारा 34 (विधिक हैसियत/वैवाहिक दर्जे की घोषणा हेतु वाद—Suit for Declaration of Marital Status), घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (DV Act, 2005) की धारा 2(f) (विवाह की प्रकृति के संबंध / Relationship in the nature of marriage), सर्वोच्च न्यायालय की ऐतिहासिक नज़ीर इंद्रा शर्मा बनाम वी.के.वी. शर्मा [(2013) 15 SCC 755] (जिसमें पहले से विवाहित व्यक्ति के साथ लिव-इन संबंध को विवाह की प्रकृति का नहीं माना गया), तथा बिना किसी ठोस विधिक अधिकार के अदालतों का समय बर्बाद करने वाली ‘विलासितापूर्ण मुकदमेबाजी’ (Luxury Litigation) पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक अत्यंत संक्षिप्त, तल्ख और निर्णायक फैसला सुनाया है।

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश (Justice M.M. Sundresh) और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले (Justice Prasanna B. Varale) की खंडपीठ ने पूर्व अभिनेत्री अनिता आडवाणी (Anita Advani) द्वारा बॉम्बे उच्च न्यायालय के 1 अप्रैल के आदेश के खिलाफ दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर विचार करने से साफ इनकार करते हुए उसे पूरी तरह खारिज (Dismissed) कर दिया।

शीर्ष अदालत ने दिवंगत बॉलीवुड सुपरस्टार राजेश खन्ना (Rajesh Khanna) के साथ अपने कथित लिव-इन संबंध को कानूनी तौर पर ‘विवाह’ घोषित कराने की मांग को सीधे तौर पर “विलासितापूर्ण मुकदमेबाजी” (Luxury Litigation) करार दिया। अदालत ने टिप्पणी की कि जब बॉम्बे हाईकोर्ट और मुंबई की सत्र अदालत दोनों ही इस दीवानी वाद को गुण-दोष के आधार पर खारिज कर चुकी हैं और इससे पूर्व 2015 में घरेलू हिंसा कानून के तहत भी उनके रिश्ते को विवाह के समतुल्य नहीं माना गया था, तो ऐसी स्थिति में इस याचिका पर विचार करने का कोई वैधानिक आधार नहीं बनता है।

शीर्ष अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां

1. ‘यह मात्र विलासितापूर्ण मुकदमेबाजी (Luxury Litigation) है; हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं’:

न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की मंशा और न्यायिक समय के दुरुपयोग पर प्रहार करते हुए दर्ज किया:

“प्रस्तुत मामला पूरी तरह से ‘विलासितापूर्ण मुकदमेबाजी’ (Luxury Litigation) की श्रेणी में आता है।

बॉम्बे उच्च न्यायालय के सुविचारित आदेश में हस्तक्षेप करने या इस याचिका पर आगे विचार करने का कोई विधिक आधार (No grounds to entertain the petition) मौजूद नहीं है। अतः विशेष अनुमति याचिका खारिज की जाती है।”

2. ‘गरिमा के अधिकार’ के नाम पर वैवाहिक दर्जे की घोषणा की मांग अस्वीकार:

  • याचिकाकर्ता अनिता आडवाणी के वकील ने दलील दी कि यह मुकदमा संपत्ति के लिए नहीं बल्कि ‘गरिमा के अधिकार’ (Right to Dignity) की रक्षा के लिए है; चूंकि वह दिवंगत अभिनेता के साथ कई वर्षों तक उनके आवास में रहीं, इसलिए उनके रिश्ते को सामाजिक और कानूनी गरिमा प्रदान करने हेतु विवाह घोषित किया जाना चाहिए।
  • खंडपीठ ने इस तर्क को विधिक रूप से असंगत माना और स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा का अधिकार किसी व्यक्ति को कानून की स्थापित सीमाओं से परे जाकर किसी पहले से विवाहित पुरुष की कानूनी पत्नी के रूप में कृत्रिम वैवाहिक दर्जा प्राप्त करने का सांविधिक अधिकार नहीं देता।

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मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2012–2026)

चरण / विवरणतथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे
याचिकाकर्ता पक्षअनिता आडवाणी (Anita Advani) — पूर्व अभिनेत्री; जिसने दिवंगत अभिनेता राजेश खन्ना के साथ लंबे समय तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहने का दावा किया।
प्रतिवादी पक्ष1. डिंपल कपाड़िया (Dimple Kapadia) — दिवंगत राजेश खन्ना की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी।
2. ट्विंकल खन्ना (Twinkle Khanna) — पुत्री।
3. अक्षय कुमार (Akshay Kumar) — दामाद।
विवाद का उद्भव (जुलाई 2012)जुलाई 2012 में राजेश खन्ना के निधन के पश्चात अनिता आडवाणी ने आरोप लगाया कि उन्हें बांद्रा स्थित उनके प्रतिष्ठित बंगले ‘आशीर्वाद’ (Aashirwad) से डिंपल कपाड़िया और उनके परिवार द्वारा जबरन बेदखल कर दिया गया।
घरेलू हिंसा वाद (2013–2015)अनिता ने वर्ष 2013 में DV Act, 2005 के तहत डिंपल कपाड़िया, ट्विंकल खन्ना और अक्षय कुमार के खिलाफ परिवाद दर्ज कराया, जिसमें मुंबई के पॉश बांद्रा इलाके में एक 3-BHK फ्लैट और भारी मासिक भरण-पोषण की मांग की गई।
बॉम्बे हाईकोर्ट का 2015 का ऐतिहासिक फैसलावर्ष 2015 में बॉम्बे उच्च न्यायालय ने अनिता आडवाणी की घरेलू हिंसा शिकायत को यह कहते हुए पूरी तरह रद्द (Quashed) कर दिया कि:
1. अनिता कभी भी डिंपल कपाड़िया या उनके परिवार के साथ साझा गृहस्थी (Shared Household) में नहीं रहीं, अतः उनके खिलाफ केस नहीं बनता।
2. राजेश खन्ना का विवाह कभी कानूनी रूप से विच्छेदित (Divorced) नहीं हुआ था; अतः एक पहले से विवाहित व्यक्ति के साथ लिव-इन संबंध को कानूनन ‘विवाह की प्रकृति का संबंध’ (Relationship in the nature of marriage) नहीं माना जा सकता।
दीवानी वाद का दौर (2017–2026)घरेलू हिंसा केस खारिज होने के बाद अनिता ने मुंबई सेशंस कोर्ट में सिविल सूट दाखिल कर यह घोषणा चाही कि राजेश खन्ना के साथ उनके रिश्ते को ‘विवाह’ का दर्जा दिया जाए। सत्र अदालत ने 2017 में इसे खारिज किया, और 1 अप्रैल 2026 को बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी सत्र अदालत के निर्णय को सही ठहराया।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णयविशेष अनुमति याचिका खारिज (Dismissed); मामले को ‘लक्ज़री लिटिगेशन’ मानते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश पूर्णतः बरकरार रखा गया।

विधिक एवं विधायी विश्लेषण: ‘लिव-इन संबंध बनाम विवाह की प्रकृति (इंद्रा शर्मा नज़ीर)’

  • ‘इंद्रा शर्मा बनाम वी.के.वी. शर्मा’ [(2013) 15 SCC 755] की बाध्यकारी नज़ीर:
    • सर्वोच्च न्यायालय ने इस ऐतिहासिक फैसले में स्पष्ट दिशा-निर्देश तय किए थे कि कौन सा लिव-इन संबंध कानूनन “विवाह की प्रकृति का” (In the nature of marriage) माना जाएगा।
    • शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया था कि यदि कोई महिला यह जानते हुए किसी विवाहित पुरुष के साथ सहवास करती है कि उस पुरुष का अपनी कानूनी पत्नी से विधिवत तलाक नहीं हुआ है, तो ऐसे रिश्ते को समाज या कानून विवाह का दर्जा नहीं दे सकता। ऐसा संबंध केवल एक विवाहेतर या सहमति-आधारित सहवास हो सकता है, किंतु वह महिला को ‘पत्नी’ के विधिक अधिकार या संपत्ति में उत्तराधिकार प्रदान नहीं कर सकता।
  • हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 5(i) का अवरोध:
    • हिंदू कानून के तहत एक-विवाह (Monogamy) का नियम निरपेक्ष है।
    • राजेश खन्ना और डिंपल कपाड़िया भले ही कई दशकों से अलग-अलग रह रहे थे (Estranged), किंतु उनके बीच कभी भी कानूनी रूप से विवाह-विच्छेद (तलाक) की डिक्री पारित नहीं हुई थी। जब तक पहला विवाह कानूनी रूप से समाप्त नहीं होता, तब तक किसी भी तीसरे व्यक्ति के साथ किए गए किसी भी धार्मिक अनुष्ठान या लंबे सहवास को कानूनन ‘विवाह’ घोषित नहीं किया जा सकता।
  • ‘लक्ज़री लिटिगेशन’ (Luxury Litigation) का विधिक अर्थ:
    • भारतीय न्यायशास्त्र में ‘विलासितापूर्ण मुकदमेबाजी’ उन मुकदमों को कहा जाता है जो आम नागरिकों की बुनियादी आजीविका, स्वतंत्रता या कानूनी क्षति की रक्षा के लिए नहीं लड़े जाते, बल्कि समृद्ध और साधन संपन्न पक्षों द्वारा बिना किसी वास्तविक सांविधिक आधार के केवल अपनी सामाजिक हैसियत, प्रचार, या दिवंगत हस्तियों की विशाल संपत्तियों पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाने के लिए अदालतों पर थोपे जाते हैं।
    • सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि न्यायपालिका का बहुमूल्य समय ऐसे आधारहीन दावों के लिए उपलब्ध नहीं कराया जा सकता।

विधिक विवरण एवं संदर्भ

  • न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय (दीवानी अपीलीय क्षेत्राधिकार)
  • केस संदर्भ: अनिता आडवाणी बनाम डिंपल कपाड़िया व अन्य [Special Leave Petition (Civil) / 2026]
  • पीठ: न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश एवं न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले (खंडपीठ)
  • निर्णय की तिथि: नवंबर 2026
  • कार्यवाही का परिणाम: विशेष अनुमति याचिका पूर्णतः खारिज; बॉम्बे उच्च न्यायालय का 1 अप्रैल का आदेश बहाल।
  • प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
    • घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (DV Act, 2005) — धारा 2(f) (घरेलू संबंध) एवं धारा 12
    • हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA, 1955) — धारा 5(i) (वैध विवाह की शर्तें—पूर्व जीवनसाथी का जीवित न होना) एवं धारा 11 (शून्य विवाह)
    • विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963 (Specific Relief Act, 1963) — धारा 34 (विधिक हैसियत की घोषणा)
    • भारत का संविधान — अनुच्छेद 136 (विशेष अनुमति याचिका) एवं अनुच्छेद 21
  • संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
    • लिव-इन संबंध और वैवाहिक दर्जे की घोषणा का विधिक मानक: ‘किसी पहले से कानूनी रूप से विवाहित पुरुष के साथ लंबे समय तक लिव-इन में रहने मात्र से किसी महिला को उसके रिश्ते को ‘विवाह’ घोषित कराने का विधिक अधिकार प्राप्त नहीं हो जाता; जहाँ पक्षों के बीच कोई वैध विवाह नहीं हुआ हो और पुरुष का पूर्व विवाह विधिक रूप से कायम रहा हो, वहाँ दीवानी वाद के जरिए वैवाहिक दर्जे की घोषणा की मांग कानून के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत है; ऐसे निरर्थक वादों को ‘विलासितापूर्ण मुकदमेबाजी’ (Luxury Litigation) माना जाएगा जिसे अदालतों द्वारा तुरंत खारिज किया जाना चाहिए।’
  • वर्तमान स्थिति व विधिक प्रभाव: सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका खारिज किए जाने के साथ ही राजेश खन्ना के साथ रिश्ते को कानूनी विवाह का दर्जा दिलवाने और दिवंगत अभिनेता की संपत्ति पर किसी भी प्रकार का वैवाहिक दावा ठोकने की अनिता आडवाणी की 14 वर्षों से चल रही विधिक लड़ाई हमेशा के लिए अंतिम रूप से समाप्त हो गई है।

Rajesh Khanna: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)

विवरणजानकारी
संबंधित अदालतभारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India)
पीठन्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश एवं न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले
याचिकाकर्ताअनीता आडवाणी (Anita Advani)
प्रतिवादी पक्षडिंपल कपाड़िया, ट्विंकल खन्ना एवं अक्षय कुमार (राजेश खन्ना के कानूनी वारिस)
मुख्य मांगदिवंगत राजेश खन्ना के साथ लिव-इन संबंध को कानूनी विवाह का दर्जा देना।
अदालत का अंतिम निर्णययाचिका खारिज: सुप्रीम कोर्ट ने इसे ‘लग्जरी लिटिगेशन’ मानते हुए याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया।
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