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कोलंबो (3 नवंबर 2026): श्रीलंका के बहुचर्चित और विवादित संगठित अपराध रोकथाम विधेयक (Prevention of Organised Crimes Bill) की संवैधानिक वैधता को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में 20 याचिकाएं दायर की गई हैं। संसद के डिप्टी स्पीकर रिज़वी सालेह (Deputy Speaker Rizvi Salih) ने मंगलवार को संसद को इस संबंध में जानकारी दी।
संविधान के अनुच्छेद 121 (1) के तहत दायर इन याचिकाओं पर सुनवाई के बाद सुप्रीम COURT अपना फैसला संसद अध्यक्ष को सौंपेगा। 20 अक्टूबर को संसद में पेश किए गए इस विधेयक का स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों द्वारा कड़ा विरोध किया जा रहा है।
मानवाधिकार संगठनों (HRW और एमनेस्टी) की गंभीर चिंताएं
ह्यूमन राइट्स वॉच (HRW) और एमनेस्टी इंटरनेशनल (Amnesty International) जैसे वैश्विक संगठनों ने इस विधेयक को वापस लेने की मांग करते हुए चेतावनी दी है कि इसके प्रावधान मौलिक अधिकारों का हनन करेंगे:
- बिना मुकदमे 2 साल तक हिरासत: संदिग्धों को बिना सुनवाई के दो साल तक हिरासत में रखने का प्रावधान।
- दबाव में दिए बयान स्वीकार्य: पुलिस या अधिकारियों के दबाव/उत्पीड़न में लिए गए बयानों (Confessions) को अदालत में सबूत के तौर पर स्वीकार करने की अनुमति।
- बिना वारंट तलाशी व गिरफ्तारी: पुलिस को बिना किसी अदालती वारंट के तलाशी लेने और सूचना न देने पर जेल भेजने के व्यापक अधिकार।
- मीडिया रिपोर्टिंग पर रोक: अदालत की कार्यवाहियों से जुड़ी मीडिया कवरेज पर प्रतिबंध लगाने की शक्तियां।
‘संगठित आपराधिक समूह’ की परिभाषा और विवादास्पद मानदंड
विधेयक के तहत ‘संगठित आपराधिक समूह’ (Organised Criminal Group) को 3 या उससे अधिक लोगों के ऐसे समूह के रूप में परिभाषित किया गया है जो वित्तीय या भौतिक लाभ के लिए गंभीर अपराध करते हैं।
विवाद की मुख्य वजह:
याचिकाकर्ताओं और नागरिक समूहों ने विधेयक के उन प्रावधानों पर सवाल उठाया है जिनके तहत किसी व्यक्ति को केवल कपड़े, हाथ के इशारे (Hand signs), भाषा, टैटू, या किसी परिसर में मौजूदगी/मुलाकात के आधार पर ही आपराधिक गिरोह का सदस्य माना जा सकता है। अधिकारों की रक्षा करने वाली संस्थाओं का तर्क है कि इससे विशिष्ट अपराध के बजाय महज ‘एसोसिएशन’ (मेल-जोल) को ही अपराध बना दिया जाएगा।
केस सारांश: Challenge to Sri Lanka’s Organised Crime Bill
| पहलू | विवरण |
| विधेयक का नाम | Prevention of Organised Crimes Bill (श्रीलंका) |
| सुप्रीम कोर्ट में चुनौती | संविधान के अनुच्छेद 121(1) के तहत 20 याचिकाएं |
| मुख्य आपत्तियां | 2 साल की मनमानी हिरासत, बिना वारंट तलाशी, दबाव में बयान की स्वीकार्यता |
| वैश्विक संगठनों का रुख | HRW और एमनेस्टी इंटरनेशनल ने विधेयक वापस लेने की मांग की |

