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मामले की पृष्ठभूमि और कानूनी तर्क
- ‘ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन’ और ‘भूमिका ट्रस्ट’ नजीरें:सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व में All India Judges Association मामले में शुरुआती न्यायिक सेवाओं के लिए 3 साल की वास्तविक वकालत (Legal Practice) को अनिवार्य किया था। बाद में, Bhumika Trust फैसले में इसे संशोधित करते हुए 1 वर्ष के वास्तविक अभ्यास (Actual Practice) वाले उम्मीदवारों को अतिरिक्त प्रशिक्षण की शर्त पर अनुमति दी गई थी।
- याचिकाकर्ताओं की दलीलें (विभिन्न राज्यों में असमानता):वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य सोंधी ने तर्क दिया कि आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र जैसे राज्य अब भी सेवारत कर्मचारियों को अलग चैनलों के माध्यम से न्यायिक सेवा भर्ती में भाग लेने की अनुमति देते हैं, जबकि कर्नाटक ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के बाद उन्हें बाहर कर दिया है। उन्होंने कहा कि बेंच क्लर्कों और प्रशासनिक कर्मचारियों के पास अदालती काम का व्यापक अनुभव होता है।
- सीजेआई का स्पष्टीकरण और राज्यों को चेतावनी:CJI सूर्या कांत ने स्पष्ट किया कि अभ्यास की शर्त में ढील केवल युवा उम्मीदवारों (विशेषकर महिला वकीलों) की व्यावहारिक कठिनाइयों को देखते हुए दी गई थी। जब याचिकाकर्ता के वकील ने पूछा कि क्या राज्य अपनी नीति बनाने के लिए स्वतंत्र हैं, तो न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची ने चेतावनी दी, “हम राज्यों पर भी इस तरह की छूट देने से रोक (Injunction) लगाने का विचार कर रहे हैं।”
मुख्य विधिक निष्कर्ष
1. न्यायिक स्वतंत्रता और योग्यता के मानक:
सर्वोच्च न्यायालय का यह रुख सुनिश्चित करता है कि अधीनस्थ न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति केवल वकालत के व्यावहारिक अनुभव और विधिक ज्ञान के आधार पर हो, न कि प्रशासनिक अदालती नौकरियों के अनुभव के आधार पर।
2. राज्य स्तर पर एकरूपता:
अदालत के कड़े रुख से यह स्पष्ट होता है कि न्यायिक सेवा प्रवेश के नियमों में सभी राज्यों के भीतर एकरूपता बनी रहनी चाहिए और किसी भी राज्य को सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय न्यूनतम वकालत अनुभव के मापदंडों को दरकिनार करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
नई दिल्ली: भारत का संविधान के अनुच्छेद 234 (जिला न्यायाधीशों से भिन्न व्यक्तियों की न्यायिक सेवा में भर्ती हेतु राज्यपाल, लोक सेवा आयोग और संबंधित उच्च न्यायालय के परामर्श से नियम निर्माण), अनुच्छेद 235 (अधीनस्थ न्यायपालिका पर उच्च न्यायालय का संस्थागत नियंत्रण), न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा हेतु उच्च न्यायालय के ‘परामर्श’ (Consultation) को ‘सहमति’ (Concurrence) माने जाने का संवैधानिक अधिदेश, तथा ऐतिहासिक नज़ीरों ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन बनाम भारत संघ [(2002) 4 SCC 247] एवं हालिया संशोधित निर्णय भूमिका ट्रस्ट बनाम भारत संघ [2026] के तहत सर्वोच्च न्यायालय ने अधीनस्थ न्यायिक सेवा भर्ती के विधिक मानकों पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत (Chief Justice of India Surya Kant), न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची (Justice Joymalya Bagchi) और न्यायमूर्ति वी. मोहना (Justice V. Mohana) की तीन-न्यायाधीशों की विशेष पीठ ने कर्नाटक के 21 सेवारत अदालती कर्मचारियों (बेंच क्लर्क, जजमेंट राइटर आदि) द्वारा दायर विविध आवेदनों को सिरे से खारिज कर दिया। इन कर्मचारियों ने मांग की थी कि उन्हें प्रवेश स्तर की सिविल जज/न्यायिक मजिस्ट्रेट भर्ती में बैठने के लिए अनिवार्य विधिक वकालत अभ्यास (Mandatory Legal Practice Requirement) से एकमुश्त छूट (One-time Relaxation) प्रदान की जाए।
शीर्ष अदालत ने दो-टूक शब्दों में स्पष्ट किया कि न्यायिक सेवा एक अत्यंत संवेदनशील और विशिष्ट विधिक पद है; इसे किसी भी परिस्थिति में न्यायालय के गैर-न्यायिक प्रशासनिक कर्मचारियों के लिए “पदोन्नति का संवर्ग” (Promotional Post for other cadres) नहीं बनाया जा सकता। पीठ ने कहा कि यद्यपि अदालती कर्मचारी प्रशासनिक कार्य कुशलतापूर्वक करते हैं, किंतु वे वास्तविक वकालत और अदालत कक्ष में विधिक बहस के अनुभव का विकल्प नहीं हो सकते।
शीर्ष अदालत के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘न्यायिक सेवा अन्य संवर्गों के लिए प्रमोशन का जरिया नहीं बन सकती’:
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने न्यायिक पदों की गरिमा और विशिष्टता को रेखांकित करते हुए स्पष्ट दर्ज किया: “आप न्यायिक सेवा को अन्य संवर्गों के लिए पदोन्नति का पद (You cannot make judicial service a promotional post for other cadres) नहीं बना सकते। अदालत कक्ष में मुकदमों का फैसला करने और न्यायिक शक्तियों का प्रयोग करने के लिए बार में वास्तविक वकालत का अनुभव होना अनिवार्य है। हम अपने पूर्ववर्ती निर्णयों में निर्धारित अनिवार्य पात्रता शर्तों में किसी प्रकार की ढिलाई देकर इसे समाप्त नहीं करेंगे।”
2. ‘अदालत कर्मचारी वह काम करते हैं जो वकील नहीं कर सकते, पर यह न्यायिक पद का रास्ता नहीं’:
- जब वरिष्ठ अधिवक्ता ने दलील दी कि बेंच क्लर्क और जजमेंट राइटर अदालती कार्यवाही और फाइल प्रबंधन से गहराई से परिचित होते हैं, तो न्यायमूर्ति वी. मोहना ने हस्तक्षेप करते हुए कहा:“कोर्ट क्लर्क, बेंच क्लर्क और सभी अदालती कर्मचारी—वे निश्चित रूप से वह प्रशासनिक कार्य करते हैं जो वकील नहीं कर सकते। किंतु उनके इस कार्य को न्यायिक सेवा में पदोन्नति के एक चैनल (Channel for promotion) के रूप में नहीं माना जा सकता।”
3. ‘अगस्त 2026 की छूट युवा वकीलों और महिलाओं के लिए थी, सेवारत कर्मचारियों के लिए नहीं’:
- मुख्य न्यायाधीश ने अगस्त 2026 में भूमिका ट्रस्ट मामले में दी गई ढिलाई (3 साल के स्थान पर अतिरिक्त प्रशिक्षण की शर्त के साथ 1 साल का अनुभव) की पृष्ठभूमि स्पष्ट की:
- सीजेआई ने नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज की छात्राओं के साथ अपनी बातचीत का हवाला देते हुए बताया कि लंबी वकालत की अनिवार्यता युवा महिला उम्मीदवारों के लिए विवाह और स्थानांतरण के कारण कठिनाई पैदा करती थी।
- यह छूट केवल युवा अधिवक्ताओं (Young Legal Practitioners) को ध्यान में रखकर तैयार की गई थी, न कि अदालत के नियमित वेतनभोगी कर्मचारियों को वकालत की आवश्यकता से पूर्ण मुक्ति देने के लिए।
4. ‘राज्यों द्वारा मनमानी व्याख्या पर सुप्रीम कोर्ट रोक लगाने को तैयार’:
- जब याचिकाकर्ताओं के वकील ने कहा कि आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र अभी भी इन-सर्विस कोर्ट कर्मचारियों को अलग कोटे से जज बनने की अनुमति दे रहे हैं और राज्य अपनी नीतियां बनाने के लिए स्वतंत्र हैं, तो न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची ने सख्त चेतावनी दी:“हम ऐसे राज्यों पर रोक लगाने (We are minded to injunct the States) का पूरा मानस बना रहे हैं।”
- पीठ ने पुनः दोहराया कि न्यायिक सेवा नियमावली बनाते समय संबंधित उच्च न्यायालय का परामर्श ‘सहमति’ के समान होता है और अखिल भारतीय न्यायिक मानकों को कमजोर करने की अनुमति किसी राज्य को नहीं दी जाएगी।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं विधिक कालक्रम (2002–2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| फोरम / न्यायालय | भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक विविध आवेदन क्षेत्राधिकार) |
| पीठ | मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| आदेश की तिथि | 4 नवंबर 2026 |
| केस संदर्भ | 21 अदालती कर्मचारी बनाम भारत संघ व अन्य [Miscellaneous Applications in Writ Petition (Civil) — Judicial Service Rules / 2026] |
| आवेदकगण | कर्नाटक के विभिन्न जिला एवं अधीनस्थ न्यायालयों में कार्यरत 21 कर्मचारी (मुख्यतः बेंच क्लर्क, जजमेंट राइटर और वरिष्ठ प्रशासनिक सहायक)। |
| आवेदकों के वरिष्ठ अधिवक्ता | वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य सोंधी (Senior Advocate Aditya Sondhi)। |
| मूल मांग (Relief Sought) | अधीनस्थ न्यायपालिका में सिविल जज (कनिष्ठ प्रभाग) / न्यायिक मजिस्ट्रेट के चयन हेतु विज्ञापित भर्ती में भाग लेने के लिए बार काउंसिल में न्यूनतम वकालत अभ्यास की अनिवार्यता से एकमुश्त छूट (One-time relaxation) प्रदान की जाए। |
| आवेदकों के मुख्य तर्क | 1. व्यावहारिक प्रशासनिक अनुभव: वे वर्षों से अदालतों में न्यायाधीशों के साथ काम कर रहे हैं, फाइलों का अध्ययन करते हैं और अदालती प्रक्रिया को वकीलों से बेहतर समझते हैं। 2. राज्यों में असमानता: आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और महाराष्ट्र अपने यहां इन-सर्विस कोर्ट कर्मचारियों को न्यायिक सेवा भर्ती में बैठने का विभागीय अवसर दे रहे हैं, जबकि कर्नाटक ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला देकर उन्हें अपात्र घोषित कर दिया। 3. भूमिका ट्रस्ट फैसले का विस्तार: अगस्त 2026 में जब कोर्ट ने प्रैक्टिस की शर्तों में ढिलाई दी है, तो कर्मचारियों को भी इसका लाभ मिलना चाहिए। |
| सुप्रीम कोर्ट का निर्णय | सभी आवेदन खारिज (Dismissed); पूर्व निर्णयों में किसी भी प्रकार का संशोधन करने या अदालत कर्मचारियों को अनिवार्य वकालत अनुभव से छूट देने से इनकार। |
विधिक एवं संवैधानिक विश्लेषण: ‘अनुच्छेद 234, न्यायिक स्वतंत्रता और बार का अनिवार्य अनुभव’
- अनुच्छेद 234 और न्यायिक स्वतंत्रता का सिद्धांत:
- संविधान का अनुच्छेद 234 यह स्पष्ट करता है कि किसी राज्य की न्यायिक सेवा में व्यक्तियों की नियुक्ति राज्य लोक सेवा आयोग और संबंधित उच्च न्यायालय के परामर्श के बाद राज्यपाल द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार ही होगी।
- सर्वोच्च न्यायालय ने स्टेट ऑफ बिहार बनाम बाल मुकुंद साह [(2000) 4 SCC 640] में यह सुस्थापित किया था कि न्यायिक सेवा अन्य सिविल सेवाओं (जैसे कार्यपालिका या क्लर्क संवर्ग) से पूरी तरह भिन्न है। कार्यपालिका या विधायिका उच्च न्यायालय की सहमति के बिना अपनी मर्जी से कोई ‘विभागीय कोटा’ या ‘प्रमोशन चैनल’ नहीं बना सकती।
- अदालत कक्ष की वकालत (Active Advocacy) क्यों अनिवार्य है?
- एक न्यायिक मजिस्ट्रेट को भारतीय साक्ष्य अधिनियम (अब BSA), दंड प्रक्रिया और नागरिक प्रक्रिया के तहत गवाहों की जिरह का मूल्यांकन करना होता है, वकीलों के तर्कों को परखना होता है और निष्पक्ष न्यायिक विवेक का प्रयोग करना होता है।
- एक बेंच क्लर्क या टाइपिस्ट चाहे कितना भी कुशल क्यों न हो, उसका काम प्रशासनिक और लिपिकीय (Clerical & Ministerial) होता है। उसने कभी स्वयं कानून की दलीलें नहीं गढ़ीं, गवाहों से सवाल-जवाब नहीं किए और न ही बार के पेशेवर दबाव का सामना किया है। यदि क्लर्कों को बिना वकालत किए सीधे पीठ पर बैठा दिया जाए, तो यह न्यायिक निर्णय की गुणवत्ता और स्वतंत्रता को गंभीर नुकसान पहुंचाएगा।
- राज्यों में विसंगति पर सर्वोच्च न्यायालय का कड़ा रुख:
- कुछ राज्यों (जैसे आंध्र प्रदेश, तेलंगाना) में कोर्ट स्टाफ को न्यायिक सेवा में 10-15% कोटा दिए जाने की पुरानी परिपाटियों पर न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची की यह टिप्पणी कि “We are minded to injunct the States” एक स्पष्ट संकेत है कि सर्वोच्च न्यायालय पूरे देश में न्यायिक सेवा भर्ती के नियमों को एकरूप बनाने और ऐसे पिछले दरवाजे से होने वाले चयनों (Backdoor Channels) को समाप्त करने की दिशा में अग्रसर है।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- न्यायालय: भारत का सर्वोच्च न्यायालय, नई दिल्ली (संवैधानिक अपीलीय/विविध आवेदन क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: कर्नाटक के सेवारत अदालत कर्मचारी (21 आवेदक) बनाम भारत संघ व अन्य [Miscellaneous Applications in All India Judges Association / Bhumika Trust Matters / 2026]
- पीठ: मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना
- आदेश की तिथि: 4 नवंबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: सभी आवेदन पूर्णतः निरस्त/खारिज (Dismissed); कोई एकमुश्त छूट नहीं।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- आवेदकों (अदालत कर्मचारियों) की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य सोंधी (Senior Advocate Aditya Sondhi)।
- प्रतिवादियों (भारत संघ व राज्य) की ओर से: केंद्र व संबंधित उच्च न्यायालयों के स्थायी विधि अधिकारी।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक उपबंध:
- भारत का संविधान:
- अनुच्छेद 234 — न्यायिक सेवा में जिला न्यायाधीशों से भिन्न व्यक्तियों की भर्ती
- अनुच्छेद 235 — अधीनस्थ न्यायालयों पर उच्च न्यायालय का नियंत्रण
- अनुच्छेद 14 व 16 — सार्वजनिक रोजगार में समानता एवं विधिक वर्गीकरण
- कर्नाटक न्यायिक सेवा (भर्ती) नियम सहपठित विभिन्न राज्यों के न्यायिक सेवा भर्ती नियम
- पूर्ववर्ती संविधान पीठ व विशेष पीठ नज़ीरें:
- ऑल इंडिया जजेस एसोसिएशन बनाम भारत संघ [(2002) 4 SCC 247]
- भूमिका ट्रस्ट बनाम भारत संघ [सुप्रीम कोर्ट, अगस्त 2026]
- भारत का संविधान:
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- न्यायिक सेवा भर्ती, अनिवार्य वकालत अनुभव और संस्थागत स्वतंत्रता का विधिक मानक: ‘न्यायिक सेवा राज्य की अन्य सिविल सेवाओं या मंत्रालयी संवर्गों की भांति कोई पदोन्नति का पद (Promotional Post) नहीं है, बल्कि यह संप्रभु न्यायिक शक्तियों के प्रयोग का एक विशिष्ट और स्वतंत्र संवैधानिक अंग है; अधीनस्थ न्यायपालिका में प्रवेश स्तर (सिविल जज) पर चयन हेतु बार में वास्तविक विधिक वकालत का न्यूनतम अनुभव एक अनिवार्य और अपरिवर्तनीय योग्यता है; अदालत के लिपिकीय या प्रशासनिक कर्मचारियों (बेंच क्लर्क, जजमेंट राइटर आदि) को उनके कार्यालयीन अनुभव के आधार पर वकालत अभ्यास की अनिवार्यता से कोई एकमुश्त या नियमित छूट नहीं दी जा सकती; तथा न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा हेतु अनुच्छेद 234 के अंतर्गत भर्ती नियमों में उच्च न्यायालय की सहमति अनिवार्य है और राज्यों को अखिल भारतीय न्यायिक मानकों के विपरीत अलग विभागीय संवर्ग बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।’
- वर्तमान स्थिति व अंतिम प्रभाव: सर्वोच्च न्यायालय के इस आदेश के बाद कर्नाटक सहित देश भर के उन सभी अदालती कर्मचारियों के लिए न्यायिक सेवा में सीधे जज बनने के रास्ते बंद हो गए हैं, जिनके पास बार काउंसिल में पंजीकृत सक्रिय अधिवक्ता के रूप में अनिवार्य विधिक वकालत का अनुभव नहीं है; सभी उम्मीदवारों को चाहे वे अदालत में सेवारत हों या बाहर, न्यायिक सेवा परीक्षा में बैठने के लिए बार में प्रैक्टिस की विहित शर्तों को पूरा करना ही होगा।
Court Staff: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | भारत का सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) |
| पीठ | CJI सूर्या कांत, न्यायमूर्ति जयमाल्या बागची एवं न्यायमूर्ति वी. मोहना |
| याचिकाकर्ता | कर्नाटक के 21 सेवारत अदालती कर्मचारी (बेंच क्लर्क, जजमेंट राइटर आदि) | प्रतिनिधित्व: वरिष्ठ अधिवक्ता आदित्य सोंधी |
| मूल विषय/मांग | सेवारत कोर्ट स्टाफ को सिविल जज/न्यायिक सेवा भर्ती में कानूनी प्रैक्टिस (Law Practice) की अनिवार्यता से एकमुश्त छूट देना। |
| संबंधित नजीरें | All India Judges Association v. Union of India एवं Bhumika Trust v. Union of India |
| अदालत का अंतिम आदेश | याचिकाएं खारिज: प्रैक्टिस में छूट देने से मना; राज्यों द्वारा अलग नीति बनाने पर भी रोक (Injunction) लगाने का संकेत। |

