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मामले की पृष्ठभूमि और विधिक तर्क
- पति के वेतन से 25% कटौती का सिद्धांत (25% Salary Rule):याचिकाकर्ता पत्नी ने फैमिली कोर्ट कानपुर नगर के आदेश को चुनौती देते हुए तर्क दिया था कि उसे दिया जा रहा ₹19,000 का गुजारा भत्ता सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों के अनुकूल नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार, पति के शुद्ध वेतन का 25% हिस्सा पत्नी को दिया जाना न्यायसंगत और उचित माना गया है।
- पति की सहमति और बैंक को सीधा निर्देश:प्रतिवादी पति (जो इंडियन बैंक, जिला उन्नाव में कार्यरत है) ने वेतन से 25% कटौती के सिद्धांत पर सहमति व्यक्त की। इसके बाद हाईकोर्ट ने प्रधान न्यायाधीश, कुटुंब न्यायालय (कानपुर नगर) को निर्देश दिया कि वे इंडियन बैंक के उच्च अधिकारियों को आयकर (Income Tax) की कटौती के बाद पति के सकल वेतन (Gross Salary) से 25% राशि काटकर सीधे पत्नी के बैंक खाते में जमा कराने का आधिकारिक आदेश जारी करें।
- कानूनी व शास्त्रीय संदर्भ (Legal & Textual Authority):हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय Anju Garg vs Deepak Kumar Garg (2022), CrPC की धारा 125 (नया प्रावधान: BNS की धारा 144) और मनुस्मृति के एकादश अध्याय (अध्याय 11) के 10वें श्लोक को उद्धृत करते हुए कहा कि भारतीय समाज और विधिक व्यवस्था दोनों में परिवार का भरण-पोषण पति का सर्वोच्च नैतिक व संवैधानिक दायित्व माना गया है।
मुख्य विधिक निष्कर्ष
1. सामाजिक सुरक्षा एवं भरण-पोषण कानून का उद्देश्य:
अदालत ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता/भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत भरण-पोषण का उद्देश्य केवल वित्तीय सहायता देना नहीं है, बल्कि महिला और बच्चों को बेसहारा होने से बचाना है।
2. निष्पादन की सुगमता (Ease of Execution):
पति के वेतन से 25% राशि सीधे बैंक द्वारा काटकर पत्नी के खाते में ट्रांसफर करने के निर्देश से अदालती चक्कर काटने और रिकवरी वारंट जारी करने में होने वाली देरी से राहत मिलेगी।
प्रयागराज: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 144 / दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 125 (पत्नी, बच्चों व माता-पिता के भरण-पोषण का वैधानिक अधिकार), सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णयों—कल्याण डे चौधरी बनाम रीता डे चौधरी [(2017) 14 SCC 200] (पति के शुद्ध वेतन का 25% भरण-पोषण के रूप में न्यायसंगत मानक) एवं अंजू गर्ग बनाम दीपक कुमार गर्ग [2022 INSC 1033] (पति का नैतिक और पवित्र दायित्व), तथा प्राचीन भारतीय विधिग्रंथ मनुस्मृति (एकादश अध्याय, श्लोक 10) के न्यायशास्त्रीय सिद्धांतों पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण एवं सांस्कृतिक-विधिक रूप से प्रासंगिक फैसला सुनाया है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि (Justice Praveen Kumar Giri) की एकल पीठ ने पारिवारिक न्यायालय, कानपुर नगर के उस आदेश को संशोधित कर दिया जिसके तहत पत्नी को केवल ₹19,000 प्रति माह भरण-पोषण दिया जा रहा था। उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि इंडियन बैंक में कार्यरत पति के सकल वेतन (Gross Salary) में से आयकर (Income Tax) की कटौती के पश्चात शेष शुद्ध राशि का 25% हिस्सा सीधे बैंक खाते से काटकर पत्नी के सत्यापित बैंक खाते में जमा किया जाए।
न्यायमूर्ति गिरि ने अपने आदेश में विशेष रूप से रेखांकित किया कि असहाय पत्नी, नाबालिग बच्चों और वृद्ध माता-पिता का भरण-पोषण करना पति का केवल एक सांविधिक कर्तव्य नहीं है, बल्कि यह एक ‘पवित्र दायित्व’ (Pious Obligation) है, जिसे प्राचीन धर्मशास्त्रीय ग्रंथों (मनुस्मृति) से लेकर भारत के सर्वोच्च न्यायालय तक ने समान रूप से मान्यता दी है।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं न्यायिक टिप्पणियां
1. ‘कानूनी ही नहीं, पवित्र दायित्व (Pious Obligation) है; सुप्रीम कोर्ट और मनुस्मृति में समान व्यवस्था’:
न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि ने भरण-पोषण के दार्शनिक और विधिक आधारों की व्याख्या करते हुए अपने आदेश में दर्ज किया: “यह न्यायालय यह अवलोकित करता है कि यदि पति की साध्वी पत्नी (Chaste Wife), नाबालिग बच्चे और माता-पिता स्वयं का भरण-पोषण करने में आर्थिक रूप से असमर्थ हैं, तो उनका भरण-पोषण करना पति पर न केवल एक कानूनी (Legal) बल्कि एक पवित्र दायित्व (Pious Obligation) भी है।
यह विधिक स्थिति माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ‘अंजू गर्ग व अन्य बनाम दीपक कुमार गर्ग’ (2022 INSC 1033 : 2022 SCC OnLine SC 1314) के पैरा 10, धारा 125 Cr.P.C. / धारा 144 BNSS, तथा मनुस्मृति के अध्याय XI के श्लोक 10 (एकादश अध्याय श्लोक 10) में भी समान रूप से प्रतिपादित की गई है।”
2. ‘कल्याण डे चौधरी’ 25% वेतन मानक का कड़ाई से अनुपालन:
- पारिवारिक न्यायालय ने पत्नी को ₹19,000 प्रति माह देने का निर्देश दिया था, जबकि पत्नी ने ₹40,000 प्रति माह की मांग की थी।
- उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के स्थापित मानक को लागू करते हुए स्पष्ट किया:“सर्वोच्च न्यायालय के सुस्थापित सिद्धांतों के अनुसार पति के शुद्ध वेतन का 25 प्रतिशत हिस्सा पत्नी के भरण-पोषण हेतु उचित और न्यायसंगत माना गया है। चूंकि पति इंडियन बैंक में विंडो ऑपरेटर के रूप में कार्यरत है और उसने कटौती पर अपनी सहमति व्यक्त की है, अतः उसके वेतन से 25% की सीधी कटौती का निर्देश देना न्यायोचित है।”
3. सीधे नियोक्ता (बैंक) को वेतन कटौती का आदेश:
- भरण-पोषण वसूली में होने वाली अंतहीन मुकदमों और देरी से बचने के लिए पीठ ने स्पष्ट प्रशासनिक तंत्र बनाया:“प्रधान न्यायाधीश, पारिवारिक न्यायालय, कानपुर नगर को निर्देशित किया जाता है कि वे इंडियन बैंक, जिला उन्नाव के संबंधित उच्चाधिकारी को आदेश जारी करें कि वह पति के सकल वेतन में से केवल आयकर की राशि घटाकर शेष वेतन का 25% भरण-पोषण राशि के रूप में सीधे उसके वेतन खाते से काटे और इसे पुनरीक्षणकर्ता संख्या 1/पत्नी के सत्यापित बैंक खाते में अंतरित करे।”
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक विवरण
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| फोरम / न्यायालय | इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ प्रयागराज (आपराधिक पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि (Justice Praveen Kumar Giri) (एकल पीठ) |
| केस संदर्भ | पिंकी वर्मा व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य [Criminal Revision No. … / 2026] |
| पुनरीक्षणकर्ता (पत्नी) | पिंकी वर्मा एवं अन्य (Pinki Verma and Another) |
| विपक्षी (पति) | पति — जो इंडियन बैंक (Indian Bank), जिला उन्नाव (UP) की शाखा में ‘विंडो ऑपरेटर’ (Window Operator) के पद पर नियमित कर्मचारी के रूप में कार्यरत है। |
| पारिवारिक न्यायालय का मूल आदेश | प्रधान न्यायाधीश, पारिवारिक न्यायालय, कानपुर नगर ने पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण हेतु ₹19,000 प्रति माह का अंतरिम/अंतिम आदेश पारित किया था। |
| पत्नी की मांग एवं विधिक दलीलें | अधिवक्ता दिवस वर्मा ने दलील दी कि: • बढ़ती महंगाई और जीवन स्तर को देखते हुए ₹19,000 की राशि अपर्याप्त है; उन्होंने इसे बढ़ाकर ₹40,000 प्रति माह करने का अनुरोध किया। • सर्वोच्च न्यायालय ने कल्याण डे चौधरी मामले में तय किया है कि भरण-पोषण के रूप में पति की शुद्ध परिलब्धियों (Net Salary) का 25% हिस्सा दिया जाना अनिवार्य कानूनी पैमाना है। |
| पति का विधिक रुख | पति की ओर से पेश अधिवक्ता भोले राम ने अदालत के समक्ष यह स्वीकार किया कि यदि आयकर को छोड़कर उसके वेतन से सीधे 25% की कटौती की जाती है, तो उसे इस पर कोई आपत्ति नहीं है। |
| उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय | आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार/निस्तारित; पारिवारिक न्यायालय का ₹19,000 का आदेश संशोधित; पति के सकल वेतन से इनकम टैक्स घटाकर 25% की सीधी कटौती कर पत्नी के खाते में भेजने का निर्देश। |
विधिक, धर्मशास्त्रीय एवं विधायी विश्लेषण: ‘मनुस्मृति और आधुनिक भरण-पोषण न्यायशास्त्र’
- मनुस्मृति के श्लोक (अध्याय XI, श्लोक 10) का न्यायिक संदर्भ:
- प्राचीन भारतीय विधि परंपरा में गृहस्थ धर्म के अंतर्गत परिवार के आश्रित सदस्यों के भरण-पोषण को सर्वोच्च कर्तव्य माना गया है। श्लोक का मूल भाव यह है कि माता-पिता, साध्वी पत्नी और अबोध संतान का पोषण किसी भी परिस्थिति में उपेक्षित नहीं किया जा सकता; चाहे व्यक्ति स्वयं कष्ट में हो, उसे इन आश्रितों के जीवन-यापन की व्यवस्था करनी ही होती है।
- उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय समाज में भरण-पोषण का विचार केवल पश्चिमी संविदात्मक दायित्व नहीं है, बल्कि यह हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना और धर्म (न्याय) का अभिन्न अंग रहा है।
- सर्वोच्च न्यायालय का ‘अंजू गर्ग’ (2022) निर्णय:
- सर्वोच्च न्यायालय ने अंजू गर्ग बनाम दीपक कुमार गर्ग में यह सिद्धांत पुनः दोहराया था कि एक सक्षम पति अपनी पत्नी और बच्चों को लाचार नहीं छोड़ सकता।
- धारा 125 CrPC / धारा 144 BNSS का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विवाह टूटने की स्थिति में महिला और बच्चे भुखमरी, गरीबी और सामाजिक उपेक्षा की कगार पर न पहुंचें।
- 25% कटौती का विधिक फॉर्मूला (Gross minus Income Tax):
- भरण-पोषण तय करते समय पति प्रायः जीपीएफ (GPF), लोन की ईएमआई (EMI) और एलआईसी (LIC) जैसी स्वैच्छिक कटौतियां दिखाकर अपना शुद्ध वेतन बहुत कम दर्शाने का प्रयास करते हैं।
- उच्च न्यायालय ने इस विवाद को जड़ से समाप्त करते हुए स्पष्ट व्यवस्था दी कि कटौती केवल वैधानिक आयकर (Income Tax) की ही घटाई जाएगी। ऋण या अन्य निजी कटौतियों को घटाने से पूर्व के सकल वेतन में से 25% काटा जाएगा, जिससे पत्नी को उसका वास्तविक विधिक हक प्राप्त हो सके।
विधिक विवरण एवं उपस्थित अधिवक्ता
- न्यायालय: इलाहाबाद उच्च न्यायालय, प्रधान पीठ प्रयागराज (आपराधिक पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: पिंकी वर्मा व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य [Criminal Revision No. … / 2026]
- पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार गिरि (Justice Praveen Kumar Giri) (एकल पीठ)
- निर्णय की तिथि: नवंबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: आपराधिक पुनरीक्षण निस्तारित; पारिवारिक न्यायालय कानपुर नगर का आदेश संशोधित; पति के वेतन से 25% कटौती का बैंक को सीधा निर्देश जारी।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- पुनरीक्षणकर्ता (पत्नी) की ओर से: अधिवक्ता दिवस वर्मा (Advocate Diwas Verma)।
- विपक्षी (पति) की ओर से: अधिवक्ता भोले राम (Advocate Bhole Ram)।
- राज्य (UP State) की ओर से: शासकीय अधिवक्ता (Government Advocate)।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) — धारा 144 (पत्नी, संतान और माता-पिता के भरण-पोषण का आदेश / पूर्ववर्ती CrPC धारा 125)
- हिंदू दत्तक तथा भरण-पोषण अधिनियम, 1956 (HAMA, 1956) — धारा 18 (हिंदू पत्नी का भरण-पोषण अधिकार)
- मनुस्मृति — एकादश अध्याय, श्लोक 10 (Chapter XI, Verse 10)
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- भरण-पोषण के पवित्र दायित्व और वेतन प्रतिशत का विधिक मानक: ‘असमर्थ पत्नी, अवयस्क बच्चों और वृद्ध माता-पिता का भरण-पोषण करना पति का केवल एक कानूनी दायित्व नहीं बल्कि धर्मशास्त्रों (मनुस्मृति) और आधुनिक न्यायशास्त्र (सर्वोच्च न्यायालय के नज़ीरी फैसले) दोनों के तहत एक पवित्र दायित्व (Pious Obligation) है; नियमित वेतनभोगी पति के मामले में भरण-पोषण की राशि का निर्धारण करते समय केवल अनिवार्य आयकर की कटौती घटाकर शेष सकल वेतन का 25 प्रतिशत हिस्सा पत्नी हेतु स्वीकृत किया जाना विधि सम्मत और उचित मानक है; मुकदमों की पुनरावृत्ति रोकने हेतु अदालतें सीधे नियोक्ता बैंक/विभाग को वेतन खाते से 25% राशि काटकर पत्नी के बैंक खाते में भेजने का आदेश दे सकती हैं।’
- वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: उच्च न्यायालय के इस आदेश के पश्चात प्रधान न्यायाधीश, पारिवारिक न्यायालय कानपुर नगर द्वारा इंडियन बैंक के क्षेत्रीय प्रबंधक/उन्नाव शाखा प्रबंधक को औपचारिक अधिपत्र (Warrant/Direction) प्रेषित किया जा रहा है, ताकि चालू माह से ही पति के वेतन से 25% राशि काटकर पिंकी वर्मा के बैंक खाते में सीधे जमा कराई जा सके।
Pious Obligation: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court), प्रयागराज |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति प्रवीन कुमार गिरि (Justice Praveen Kumar Giri) |
| मामला/साइटेशन | पिंकी वर्मा व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (Pinki Verma And Another v. State of UP and Another) |
| याचिकाकर्ता (Wife) | पिंकी वर्मा (₹40,000 प्रति माह गुजारा भत्ता की मांग) | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता दिवस वर्मा |
| प्रतिवादी (Husband) | इंडियन बैंक में विंडो ऑपरेटर (Window Operator) के रूप में कार्यरत पति | प्रतिनिधित्व: अधिवक्ता भोले राम |
| निचली अदालत का आदेश | फैमिली कोर्ट (कानपुर नगर) ने पहले ₹19,000 प्रति माह भरण-पोषण तय किया था। |
| अदालत का अंतिम निर्णय | याचिका स्वीकार (Enhanced): सुप्रीम कोर्ट के 25% वेतन वाले फॉर्मूले के आधार पर पति के ग्रॉस सैलरी (आयकर कटौती के बाद) से 25% की सीधे बैंक से कटौती कर पत्नी के खाते में ट्रांसफर करने का आदेश। |

