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नालसार (NALSAR) अध्ययन के मुख्य आंकड़े और विधिक संदर्भ
- नियुक्तियों में भारी लैंगिक व विषयगत असमानता:अदालत ने अक्टूबर 2026 में प्रकाशित नालसार के अध्ययन का हवाला दिया, जिसमें वर्ष 2025 के दौरान सर्वोच्च न्यायालय, दिल्ली उच्च न्यायालय और बॉम्बे उच्च न्यायालय द्वारा दर्ज मामलों में की गई 2,283 मध्यस्थ नियुक्तियों का विश्लेषण किया गया था।
- महिलाओं की भागीदारी: दर्ज की गई 2,283 नियुक्तियों में से महिलाओं को केवल 29.97% अवसर मिले।
- तकनीकी विशेषज्ञों की भागीदारी: इंजीनियरों और अन्य तकनीकी पेशेवरों को मात्र 3.10% मामलों में ही मध्यस्थ नियुक्त किया गया।
- सुप्रीम कोर्ट की नजीर और धारा 11(8) का हवाला:हाईकोर्ट ने
Voestalpine Schienen GmbH v. Delhi Metro Rail Corporation Ltd.मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर भरोसा जताया, जिसमें स्पष्ट कहा गया था कि मध्यस्थों के पैनल व्यापक होने चाहिए और उनमें केवल सेवानिवृत्त न्यायाधीश या वकील ही नहीं, बल्कि इंजीनियर और अन्य क्षेत्र-विशेषज्ञ भी शामिल होने चाहिए। - मूल विवाद और निर्णय:मूल मामला Corus Metal नामक साझीदारी फर्म की भूमि बिक्री (₹1.81 करोड़) और खातों के निपटारे (₹74.73 लाख) से जुड़ा था। प्रतिवादी द्वारा ‘स्वीकृति और संतुष्टि’ (Accord and Satisfaction) के आधार पर मध्यस्थता का विरोध किया गया था, जिसे कोर्ट ने
SBI General Insurance Co. Ltd. v. Krish Spinningनजीर के आधार पर खारिज कर दिया। दोनों पक्षों की सहमति के बाद हाईकोर्ट ने न्यायमूर्ति मौना एम. भट्ट (Justice Mauna M Bhatt) को एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया।
मुख्य विधिक निष्कर्ष
1. संस्थागत सुधार और विविधता:
गुजरात उच्च न्यायालय की यह टिप्पणी भारतीय मध्यस्थता पारिस्थितिकी तंत्र (Arbitration Ecosystem) में लैंगिक समानता और तकनीकी विशेषज्ञता को शामिल करने की दिशा में एक प्रगतिशील कदम है।
2. तकनीकी विवादों का त्वरित समाधान:
इंजीनियरों, वित्तीय विशेषज्ञों और अन्य डोमेन विशेषज्ञों की नियुक्ति से जटिल वाणिज्यिक और अवसंरचनात्मक (Infrastructure) मुकदमों का गुणवत्तापूर्ण और शीघ्र निपटारा संभव होगा।
अहमदाबाद: मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 (Arbitration and Conciliation Act, 1996) की धारा 11(6) (न्यायालय द्वारा मध्यस्थ की नियुक्ति का क्षेत्राधिकार) सहपठित धारा 11(8) (मध्यस्थ की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और पक्षकारों द्वारा सहमत अर्हताओं के विचारण का सांविधिक दायित्व), सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय वोएस्टाल्पाइन शीनेन जीएमबीएच बनाम दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन लिमिटेड [(2017) 4 SCC 665] (मध्यस्थता पैनलों को बहु-विषयक और व्यापक बनाने का सिद्धांत), वाणिज्यिक विवादों में ‘पूर्ण समाधान’ (Accord and Satisfaction) की आपत्तियों पर एसबीआई जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम कृष स्पिनिंग [2024 INSC 532] में प्रतिपादित विधिक मानक, तथा हैदराबाद स्थित नालसार विधि विश्वविद्यालय के मिल्टन के. बनर्जी सेंटर फॉर आर्बिट्रेशन लॉ द्वारा अक्टूबर 2026 में प्रकाशित अनुभवजन्य अध्ययन (Arbitrator Appointments in Numbers) के आलोक में गुजरात उच्च न्यायालय ने मध्यस्थता व्यवस्था के पुनर्गठन और समावेशिता पर एक अत्यंत दूरगामी और प्रगतिशील आदेश पारित किया है।
गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति डी.एन. रे (Justice DN Ray) की एकल पीठ ने साझेदारी फर्म ‘कोरस मेटल’ (Corus Metal) की संपत्तियों और खातों के निपटारे से जुड़े दो संबद्ध मध्यस्थता आवेदनों का निस्तारण करते हुए पक्षकारों, वकीलों और मध्यस्थता संस्थाओं (Arbitral Institutions) का आह्वान किया कि वे मध्यस्थों के चयन हेतु बनाए जाने वाले पूल का विस्तार करें, ताकि विधिवत योग्य महिलाओं (Qualified Women) और तकनीकी विशेषज्ञों (Technical Experts) को उनका उचित प्रतिनिधित्व मिल सके।
उच्च न्यायालय ने नालसार (NALSAR) विश्वविद्यालय के अक्टूबर 2026 के ताजा अध्ययन का हवाला देते हुए इस तथ्य पर गहरी चिंता व्यक्त की कि संवैधानिक अदालतों द्वारा की जाने वाली मध्यस्थ नियुक्तियों में महिलाओं की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत से भी कम (29.97%) है, जबकि विशेष तकनीकी ज्ञान रखने वाले गैर-न्यायिक विशेषज्ञों की भागीदारी मात्र 3.10 प्रतिशत पर सिमटी हुई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि योग्यता, सत्यनिष्ठा और स्वतंत्रता से कोई समझौता किए बिना, मध्यस्थता संस्थानों को अपने पैनल बहु-विषयक और विविध बनाने चाहिए। विवाद के गुण-दोष पर अदालत ने प्रतिवादी की ‘पूर्ण समाधान’ की प्रारंभिक आपत्ति को खारिज करते हुए गुजरात उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति मौना एम. भट्ट (Justice Mauna M. Bhatt) को विवाद सुलझाने हेतु एकमात्र मध्यस्थ (Sole Arbitrator) नियुक्त किया।
उच्च न्यायालय के मुख्य कानूनी निष्कर्ष एवं समावेशी टिप्पणियां
1. ‘योग्यता व स्वतंत्रता से समझौता किए बिना महिलाओं और तकनीकी विशेषज्ञों को अवसर मिले’:
न्यायमूर्ति डी.एन. रे ने मध्यस्थता के पारिस्थितिकी तंत्र में व्याप्त असंतुलन पर टिप्पणी करते हुए अपने निर्णय में दर्ज किया: “दक्षता, सत्यनिष्ठा और स्वतंत्रता (Competence, Integrity and Independence) की प्रधानता को कम किए बिना, इस न्यायालय का यह सुविचारित मत है कि मध्यस्थता नियुक्तियों में ऐसा कम प्रतिनिधित्व (Under-representation) तत्काल ध्यान दिए जाने का हकदार है। अतः पक्षकारों, अधिवक्ताओं और मध्यस्थता संस्थानों (Arbitral Institutions) को प्रोत्साहित किया जाता है कि वे उस पूल का दायरा विस्तृत करें जिससे मध्यस्थों का चयन किया जाता है, ताकि उसमें विधिवत अर्हता प्राप्त महिलाओं और तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल किया जा सके।”
2. नालसार (NALSAR) विश्वविद्यालय के अध्ययन ‘आर्बिट्रेटर अपॉइंटमेंट्स इन नंबर्स’ के आंकड़े:
- अदालत ने हैदराबाद स्थित नालसार विधि विश्वविद्यालय के मिल्टन के. बनर्जी सेंटर फॉर आर्बिट्रेशन लॉ (Milon K Banerji Centre for Arbitration Law) द्वारा अक्टूबर 2026 में प्रकाशित अध्ययन का विश्लेषण प्रस्तुत किया:
- इस अनुभवजन्य अध्ययन में भारत के सर्वोच्च न्यायालय, दिल्ली उच्च न्यायालय और बॉम्बे उच्च न्यायालय के समक्ष वर्ष 2025 में पंजीकृत और 30 जून 2026 तक एकत्रित मध्यस्थता मुकदमों में अदालतों द्वारा की गई नियुक्तियों का गहन विश्लेषण किया गया था।
- अध्ययन से पता चला कि कुल 2,283 नियुक्तियों में से (जहाँ लैंगिक पहचान दर्ज थी) केवल 29.97% नियुक्तियां ही महिला मध्यस्थों को मिलीं, जबकि वित्तीय, इंजीनियरिंग या तकनीकी पृष्ठभूमि के विशेषज्ञों को मात्र 3.10% नियुक्तियां ही प्राप्त हो सकीं।
3. ‘वोएस्टाल्पाइन’ नज़ीर और तकनीकी विवादों का वैज्ञानिक समाधान:
- पीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय वोएस्टाल्पाइन शीनेन जीएमबीएच बनाम डीएमआरसी [(2017) 4 SCC 665] पर निर्भरता व्यक्त करते हुए रेखांकित किया:
- मध्यस्थों का पैनल केवल पूर्व न्यायाधीशों और वकीलों तक ही सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि उसमें इंजीनियरों, वास्तुकारों, चार्टर्ड अकाउंटेंट्स और उद्योग विशेषज्ञों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
- तकनीकी विशेषज्ञता रखने वाले पेशेवरों का समावेशन उन वाणिज्यिक विवादों को त्वरित और सटीक ढंग से हल करने में निर्णायक सिद्ध होता है जिनमें जटिल और विशिष्ट इंजीनियरिंग या वित्तीय मुद्दे अंतर्ग्रस्त होते हैं।
मामले की तथ्यात्मक पृष्ठभूमि एवं प्रक्रियात्मक कालक्रम (2020–2026)
| संदर्भ / विवरण | तथ्यात्मक स्थिति एवं पक्षों के दावे |
| फोरम / न्यायालय | गुजरात उच्च न्यायालय, अहमदाबाद (मूल मध्यस्थता क्षेत्राधिकार — धारा 11) |
| पीठासीन न्यायाधीश | न्यायमूर्ति डी.एन. रे (Justice DN Ray) (एकल पीठ) |
| निर्णय की तिथि | नवंबर 2026 |
| केस संदर्भ | शिल्पाबेन बनाम जैस्मीन प्रवीणचंद्र शाह एवं संबद्ध मध्यस्थता याचिका [R/Petitions under Arbitration Act No. … / 2026] |
| याचिकाकर्ता पक्ष | शिल्पाबेन व अन्य (Shilpaben & Ors.) — मृतक साझेदार स्वर्गीय संजय प्रवीणचंद्र शाह के विधिक वारिस (Legal Heirs)। |
| प्रतिवादी पक्ष | जैस्मीन प्रवीणचंद्र शाह (Jasmin Pravinchandra Shah) — साझेदारी फर्म ‘कोरस मेटल’ के जीवित साझेदार। |
| साझेदारी फर्म की पृष्ठभूमि | • फर्म ‘कोरस मेटल’ (Corus Metal) का गठन जून 2020 में दोनों साझेदारों (संजय शाह और जैस्मीन शाह) के बीच 50:50 की समान लाभ-हानि हिस्सेदारी के साथ हुआ था। • साझेदारी विलेख (Partnership Deed) में विवादों के समाधान हेतु मध्यस्थता खंड (Arbitration Clause) मौजूद था। |
| विवाद का मूल उद्भव | याचिकाकर्ताओं ने गंभीर आरोप लगाए कि: 1. प्रतिवादी जैस्मीन शाह ने फर्म के स्वामित्व वाली अचल संपत्ति/जमीन को ₹1.81 करोड़ में बेच दिया, किंतु मृतक साझेदार संजय शाह को उनके हिस्से का 50% प्रतिफल अदा नहीं किया। 2. दिसंबर 2025 में संजय शाह के आकस्मिक निधन के उपरांत, उनके विधिक वारिसों ने फर्म के खातों के निपटारे और फर्म में जमा ₹74.73 लाख की पूंजीगत राशि के वितरण की मांग की, जिसे प्रतिवादी ने देने से मना कर दिया। |
| प्रतिवादी का विधिक बचाव | प्रतिवादी ने धारा 11 के तहत मध्यस्थ नियुक्त किए जाने का विरोध करते हुए तर्क दिया कि पक्षों के बीच पूर्व में ही ‘समझौता और पूर्ण संतुष्टि’ (Accord and Satisfaction) हो चुकी है, अतः अब कोई मध्यस्थता योग्य विवाद जीवित नहीं है। |
| आपत्ति का न्यायिक निस्तारण | उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय SBI जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम कृष स्पिनिंग [2024 INSC 532] का हवाला देते हुए व्यवस्था दी कि धारा 11 के सीमित दायरे में अदालत यह तय नहीं कर सकती कि समझौता पूर्ण था या नहीं; यह जांचना मध्यस्थता न्यायाधिकरण (Arbitral Tribunal) का क्षेत्राधिकार है। |
| अंतिम आदेश | मध्यस्थता याचिकाएं स्वीकार (Allowed); पक्षकारों की सहमति से गुजरात उच्च न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति मौना एम. भट्ट (Former Judge Justice Mauna M. Bhatt) को एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया गया। मध्यस्थता की कार्यवाही गुजरात उच्च न्यायालय मध्यस्थता केंद्र (घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय) नियम, 2021 के तहत संचालित होगी। |
विधिक एवं संस्थागत विश्लेषण: ‘धारा 11(8), मध्यस्थता में विविधता और कृष स्पिनिंग नज़ीर’
- मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11(8) का विधिक अधिदेश:
- धारा 11(8) स्पष्ट करती है कि मध्यस्थ की नियुक्ति करते समय मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित प्राधिकारी निम्नलिखित बातों का ध्यान रखेगा:
- वे अर्हताएं, जो पक्षकारों के करार द्वारा अपेक्षित हैं; तथा
- अन्य ऐसे विचार जो एक स्वतंत्र और निष्पक्ष मध्यस्थ की नियुक्ति सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हों।
- गुजरात उच्च न्यायालय ने यह रेखांकित किया कि ‘निष्पक्षता और व्यापकता’ केवल एक औपचारिक शर्त नहीं है। जब तक मध्यस्थता पूल में केवल सेवानिवृत्त जजों या पुरुष वकीलों का ही वर्चस्व बना रहेगा, तब तक वाणिज्यिक विवादों में उद्योग-विशिष्ट और आधुनिक दृष्टिकोण का समावेश नहीं हो सकता।
- धारा 11(8) स्पष्ट करती है कि मध्यस्थ की नियुक्ति करते समय मुख्य न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित प्राधिकारी निम्नलिखित बातों का ध्यान रखेगा:
- ‘एसबीआई जनरल इंश्योरेंस बनाम कृष स्पिनिंग’ [2024 INSC 532] का सिद्धांत:
- भारत के सर्वोच्च न्यायालय की तीन-न्यायाधीशों की पीठ ने वर्ष 2024 में यह व्यवस्था दी थी कि मध्यस्थता अधिनियम की धारा 11(6A) के तहत न्यायालय का क्षेत्राधिकार केवल इस बात की प्रथम दृष्टया जांच करने तक सीमित है कि क्या पक्षकारों के बीच एक वैध मध्यस्थता समझौता मौजूद है।
- यदि कोई पक्ष यह दावा करता है कि उसने दावा ‘पूर्ण और अंतिम निपटारे’ (Full and Final Settlement / Accord and Satisfaction) के रूप में सुलझा लिया है, तो क्या वह समझौता धोखाधड़ी, दबाव या स्वेच्छा से हुआ था—यह तय करने की पूर्ण शक्ति मध्यस्थ न्यायाधिकरण के पास है (Kompetenz-Kompetenz सिद्धांत)। गुजरात हाईकोर्ट ने इसी आधार पर प्रतिवादी की रुकावट डालने वाली याचिका खारिज की।
- भारत को अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थता हब बनाने में विविधता का महत्व:
- लंदन कोर्ट ऑफ इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन (LCIA) और सिंगापुर इंटरनेशनल आर्बिट्रेशन सेंटर (SIAC) जैसे वैश्विक मंचों पर लैंगिक विविधता और बहु-विषयक मध्यस्थों की नियुक्ति को प्राथमिकता दी जाती है।
- भारत में जब तक कानूनी पेशे और मध्यस्थता संस्थानों में महिलाओं तथा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स/इंजीनियरों की भागीदारी 3-4% के निचले स्तर पर रहेगी, तब तक भारत वैश्विक मध्यस्थता केंद्र (Global Arbitration Hub) के रूप में अपनी साख मजबूत नहीं कर सकता। न्यायमूर्ति डी.एन. रे का यह निर्णय भारतीय संस्थागत मध्यस्थता के लिए एक मार्गदर्शक दस्तावेज है।
विधिक विवरण एवं संदर्भ
- न्यायालय: गुजरात उच्च न्यायालय, अहमदाबाद (मूल मध्यस्थता क्षेत्राधिकार)
- केस संदर्भ: शिल्पाबेन बनाम जैस्मीन प्रवीणचंद्र शाह [R/Petitions under Arbitration Act No. … / 2026]
- पीठासीन न्यायाधीश: न्यायमूर्ति डी.एन. रे (Justice DN Ray) (एकल पीठ)
- निर्णय की तिथि: नवंबर 2026
- कार्यवाही का परिणाम: याचिकाएं स्वीकृत; पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति मौना एम. भट्ट एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त।
विधिक प्रतिनिधित्व:
- याचिकाकर्ताओं (शिल्पाबेन व अन्य) की ओर से: याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ एवं स्थायी अधिवक्तागण।
- प्रतिवादी (जैस्मीन शाह) की ओर से: प्रतिवादी के अधिवक्तागण।
- प्रासंगिक कानून एवं विधिक प्रावधान:
- मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 (Arbitration and Conciliation Act, 1996):
- धारा 11(6) — मध्यस्थ की नियुक्ति हेतु न्यायालय से अनुरोध
- धारा 11(6A) — मध्यस्थता समझौते के अस्तित्व का परीक्षण
- धारा 11(8) — मध्यस्थ की अर्हता, स्वतंत्रता व निष्पक्षता संबंधी विचार
- धारा 16 — मध्यस्थ न्यायाधिकरण का अपने क्षेत्राधिकार पर स्वयं निर्णय लेने का अधिकार (Kompetenz-Kompetenz)
- भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 (Indian Partnership Act, 1932) — साझेदार की मृत्यु के उपरांत खातों का निपटारा व परिसंपत्तियों का विभाजन
- गुजरात उच्च न्यायालय मध्यस्थता केंद्र (घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय) नियम, 2021
- मध्यस्थता और सुलह अधिनियम, 1996 (Arbitration and Conciliation Act, 1996):
- संबद्ध न्यायिक सिद्धांत:
- मध्यस्थता में विविधता, संस्थागत सुधार और क्षेत्राधिकार का विधिक मानक: ‘वाणिज्यिक मध्यस्थता में दक्षता, सत्यनिष्ठा और स्वतंत्रता सर्वोपरि हैं, किंतु मध्यस्थों के चयन पूल को केवल एक विशिष्ट वर्ग (पूर्व न्यायाधीशों या पुरुष वकीलों) तक सीमित रखना आधुनिक विवाद समाधान व्यवस्था के प्रतिकूल है; पक्षकारों, वकीलों और मध्यस्थता संस्थानों का यह दायित्व है कि वे मध्यस्थों के पैनल का विस्तार कर उसमें योग्य महिलाओं और तकनीकी विशेषज्ञों (इंजीनियरों व वित्तीय विशेषज्ञों) को यथोचित स्थान दें; तकनीकी विशेषज्ञों की मौजूदगी जटिल वाणिज्यिक और बुनियादी ढांचा विवादों के वैज्ञानिक व त्वरित निस्तारण में सहायक होती है; तथा धारा 11 के तहत मध्यस्थ की नियुक्ति करते समय न्यायालय ‘पूर्ण समाधान’ (Accord and Satisfaction) के विवादों में प्रवेश नहीं करेगा, बल्कि यह निर्णय मध्यस्थ न्यायाधिकरण के क्षेत्राधिकार पर छोड़ते हुए मामले को तुरंत मध्यस्थ के समक्ष संदर्भित करेगा।’
- वर्तमान स्थिति व अनुपालन निर्देश: उच्च न्यायालय के आदेशानुसार विवाद की संपूर्ण पत्रावली गुजरात उच्च न्यायालय मध्यस्थता केंद्र को अग्रेषित कर दी गई है; एकमात्र मध्यस्थ न्यायमूर्ति मौना एम. भट्ट (सेवानिवृत्त) पक्षकारों को नोटिस जारी कर साक्ष्य, खातों के ऑडिट और ₹1.81 करोड़ की बिक्री राशि के 50% हिस्से व ₹74.73 लाख की पूंजी के दावों पर समयबद्ध मध्यस्थता विचारण प्रारंभ करेंगी।
Nalsar Research: मामले का संक्षिप्त विवरण (At A Glance)
| विवरण | जानकारी |
| संबंधित अदालत | गुजरात उच्च न्यायालय (Gujarat High Court) |
| न्यायाधीश | न्यायमूर्ति डी. एन. राय (Justice DN Ray) |
| मामला/केस | Shilpaben v. Jasmine (और सम्बद्ध मामले) |
| संदर्भित अध्ययन | नालसार यूनिवर्सिटी (NALSAR, Hyderabad) के ‘मिलन के. बनर्जी सेंटर फॉर आर्बिट्रेशन लॉ’ का अक्टूबर 2026 अध्ययन (Arbitrator Appointments in Numbers) |
| कानूनी प्रावधान | मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11(8) (Section 11(8) Arbitration and Conciliation Act, 1996) |
| नियुक्त मध्यस्थ | न्यायमूर्ति मौना एम. भट्ट (पूर्व न्यायाधीश, गुजरात उच्च न्यायालय) |

